Thursday, March 20, 2008

वक्त के प्रवाह में

अशोक गुप्ता़
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
हम कगार पर खड़े,
यहां लड़े वहां लड़े,
आंख जब खुली पता चला कि कुछ न रह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
हर बुज़ुर्ग जो मिला हमसे यही कह गया,
देश को सम्हालना,यूं ही खो न डालना,
रेत सा ईमान था, ढह गया सो ढह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
हर गरीब था कि ज़ुल्म हाथ जोड़ सह गया,
हम किनारा कर गए,दूर से निकल गए,
हमको क्या पड़ी थी लहू बह गया तो बह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
त्राहि त्राहि मच उठी, यह गया लो वह गया,
हम पोटली पकड़ रहे,स्वर्ण को जकड़ रहे,
डाकुओं का गिरोह लूटकर सुबह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
शहर शहर सिहर उठा कि गांव गांव दह गयागली गली सुलग उठी,
वसुंधरा बिलख उठी,धर्मपाल का अधर्म दे हमें प्रलय गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
हरेक जीव जान में छा अजीब भय गया,
मृत्यु की पुकार सुन,मां का चीत्कार सुन,
आसमां भी कैसी कैसी यातनाएं सह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
इन्सां बहक बहक उठा कैसी पी वो मय गया,
पढ़े लिखे अनपढ़ हुए,जो संत थे कुजन हुए,
बापू तुम्हारे स्वप्न का बचा क्या रह गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
अब तो आंख खोल लो, नींद का समय गया,
अपने मन में ठान लो,अपना सीना तान लो,
फिर न पूछना कहां सूर्य का उदय गया,
वक्त के प्रवाह में जो भी था सो बह गया।
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