Tuesday, March 25, 2008

जमूरा

प्रेम कुमार
घर भर में कोई सहज नहीं था। न माँ, न पिताजी, न पत्नी, न बहनें! मेरे गाँव आने पर लोगों का मुझसे मिलने आना सबको अच्छा लगता रहा है। पर आज वैसा नहीं था। सबकी कोशिश थी कि उनके आने पर मैं उनसे न मिलू। मिलू भी तो उन्हें या उनके काम को कोई तवज्जो न दूं। पिताजी उन्हें लपाड़िया बताकर अपनी खीझ निकाल रहे थे। माँ उनके बहरूपिएपन की बातें बता-बताकर अपनी झुझलाहट कम कर रही थीं। पत्नी और बहनों ने मिलकर कई बार उन्हें जनानिया, लुच्चा, लफंगा सिद्ध कर दिया था। और मैं था कि किसी अमंगल के घटने की आशंका से त्रस्त, कुंदमन सुबह से ही दरवाजे के पास चारपाई पर पड़ा उनके आने का इंतजार कर रहा था।
पिताजी इस बात पर चिढ़े थे कि तीन दिन से उन्होंने देहरी की धूल ले डाली है। काम पूछा तो बताया नहीं। ऊपर से आग में यह घी और - 'पढ़ाई-लिखाई का मामला है उन्हीं को बताना है।' पिताजी इस बात पर भी आग बबूला थे कि उन्होंने मेरा आधा नाम लेकर ही आने के बारे में पूछा था। इसीलिए उनके आने की सूचना देते समय पिताजी खूब गुस्से में थे - 'तुम दोनों में बड़ा कौन है? तू कि वो? नाम तो ऐसे ले रहा था जैसे गोद में खिलाया हो उसने तुझे। हमें काम नहीं बताएंगे, पर आने की पूछने के लिए सुबह-शाम दिमाग हमारा चाटेंगे! लपाड़िया, चुगलखोर कहीं का! तू उसके चक्कर में मत आ जाना! खुद किसी की चिरी उँगली पर पेशाब तक नहीं करेंगे, पर मतलब पर गधे को भी बाप बना लेंगे। तू भूल गया क्या? तेरी नौकरी लगी तो कैसा-कैसा जहर उगलता घूमा था ये गाँव भर में ...।' माँ को मौका मिला तो उन्होंने भी कान में फसफुसा दिया - 'बड़ा नौटंकीबाज है। सामने मिलेगा तो कैसा चाची-चाची कहकर झुका आएगा, पीठ पीछे एक-एक की हजार-हजार बनाकर उड़ाएगा! तेरी बहनों के बारे में यही तो उड़ाता घूमा था पिछली साल! सबकी बहन-बेटियों को बदनाम करता फिरता है। आग भी तो नहीं लगती ऐसों की जीभ में! जिस घर में घुसा, बजवाकर, तीन-तेरह कराकर ही निकला वहाँ से! बातें ऐसी कि पानी में भी आग लग जाए ... ।' पत्नी और बहनों ने भी खूब कारनामे सुनाए थे उनके! सबके चेहरों पर तनाव था, खिंचाव था। सब चाहते थे, मैं उनसे न मिलू, उन्हें न सुनू। सबकी हाँ में हाँ मिलाते हुए मैंने भी उनसे जुड़े कुछ अजीब किस्से सबको सुनाए थे। अंत में इस ओर से भी सावधान किया था कि ऐसे लोग चिढ़कर किस सीमा तक आ सकते हैं। बड़ी मुश्किल और मशक्कत से मैं घर के लोगों को इस बात पर राजी कर पाया कि मैं उनसे मिल लूँ, उनकी बात सुन लूँ, पर किसी काम के लिए हाँ कतई न करूँ!
प्रोफेसर साब हैं क्या ऽऽऽ?' आवाज की चुभती तेजी ने मुझे उठाकर चारपाई पर बिठा दिया। बदले, आदरसूचक सम्बोधन को सुनकर राहत मिली। चाहा कि सारे घर ने यह सुना हो। मेरी नमस्ते का खाँसते-हँसते उत्तर देते हुए तकिया खिसकाकर वे सिरहाने की तरफ बैठ चुके थे। कंधे पर पड़े हरे रंग के लम्बे अँगोछे से मुँह-माथे का पसीना खूब रगड़-रगड़कर पौंछा था। थोड़ा घूमकर पीठ दीवार से टिका ली थी और पैरों को फैलाकर लगभग सीधा कर लिया था! मेरे कुछ कहने से पहले उनकी गर्दन घर के अंदर की दिशा में मुड़ चुकी थी - अरे लाली, पानी-फानी लाओ कुछ! गजब की गर्मी है! गला चटका जा रहा है! कुछ पल उनकी मिचमिची आँखों ने मुझे इस तरह देखा जैसे मुझमें से अपना कुछ छिप-खो गया ढूढ़-निकाल लेना हो उन्हें! उसके बाद उन्होंने कई ऐसे प्रश्न एक साथ दागे, जिनके उत्तर खुद उन्होंने दे लिए थे - और सुनाओ, क्या हाल हैं वहाँ के? तुम लोग तो बादशाह हो, बादशाह! जाओ, न जाओ; पढ़ाओ, न पढ़ाओ, तुम्हारी तनख्वाह दूध पीती रहती है। हमेशा हरी की हरी! मरना तो हम जैसों का है। रोज कुँआ खोदो, फिर भी पानी निकलने की गारंटी नहीं। क्या तनख्वाह मिलती है तुम्हें अब? सुना है पच्चीस-तीस हजार मिलते हैं। खूब पुण्य किए होंगे हमारे चाचा-चाची ने पिछले जन्म में। उनके बेटे इतने नोट छाप देते हैं एक महीने में कि बैंक की मशीन भी क्या छापेगी? गाँव के बालक बताते रहते हैं - बड़ी तरक्की की है तुमने, खूबनाम कमाया है। कॉलिज में खूब चलती है तुम्हारी! हमें खुशी इस बात की है कि इस में हमारी भी नामवरी है। किसी के भी सामने छाती ठोककर कह सकते हैं कि हमारा भाई भी इतना बड़ा प्रोफेसर है ...!
उनका इतना बोलना चिढ़ पैदा कर रहा था। गनीमत हुई कि अंजू ने पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ाया। ही-ही कर लम्बी हँसी-हँसे! गिलास थामने को हाथ आगे बढ़ाया -लगता है हमारी चाची नहीं हैं घर में? होतीं तो खाली पानी आ ही नहीं सकता था किसी के सामने। दुनियाँ जानती है कि वो बिना चाय-नाश्ते के रास्ता चलते को भी नहीं जाने देतीं!
अंजू को देखा तो लगा कि वह अब फटी, कि अब बरसी! हस्तक्षेप जरूरी लगा - नहीं, माँ घर पर ही हैं! चाय अपने सामने बनवा रही होंगी शायद ...। गटागट की आवाज के साथ उन्होंने पानी अंदर उतारा, भीगे होठ अंगोछे से पौंछे और फिर जेब से बीड़ी के बंडल और माचिस को बाहर निकाला। बीड़ी को मुँह तक ले जाते-ले जाते रुके! जैसे कुछ खास ध्यान आया हो। फुसफुसाते से ऐसे बोले जैसे बड़ों के लिहाज की रस्म अदा कर हरे हों - प्रोफेसर के दरवाजे पर भी क्या भैया को अपनी बीड़ी फूकनी पडेगी?' बुरा-सा मुँह बनाया, दायाँ हाथ नाचने-मटकने लगा - इसी बात से हमें ये मास्टरी दो कौड़ी की नहीं लगती! कितना ही कमा लें, पर रहेंगे किरमिची ही! उस दुलारे के बेटा की दरियादिली देखो! है तो फौज में रंगरूट-पर जब आता है तो अंग्रेजी शराब की बोतलें और विदेश की सिगरेट लाता है। यार-दोस्तों को इतनी पिलवाता है कि पिछला सारा कोटा पूरा कर जाता है।' उन्हें देखना, सुनना असह्‌य हो रहा था। टालने के लिए कह दिया - 'आज बीड़ी से काम चला लें! घर में कोई सिगरेट लाने वाला भी तो नहीं है!' उन्हें जैसे मालूम था कि मैं यही कहूगा। बड़ी होश्यारी से उन्होंने भीतर बचाकर रखे को कहने का मौका पा लिया था - 'भली फिक्र की तुमने? तुम्हारा ये भतीजा आखिर किस मर्ज की दवा है? चल रे रजुआ …! सड़क पर खड़ा-खड़ा क्या आने-जाने वालों को ताक रहा है? देख, तेरे चाचा जी कुछ कह रहे हैं!'
अच्छी-भली शक्ल, सजी-सँवरी देह, अठारह-उन्नीस की उम्र का वह लड़का गर्दन झुकाए मेरे सामने आ खड़ा हुआ था। पैसे निकालकर देने के अलावा अब कोई चारा नहीं बचा था। लड़का जाने को मुड़ा ही था कि वे गरजे - 'तमीज तो सारी उम्र आने से रही। मगज में गोबर जो भरा है। ऊँट हो गए पर अक्ल नहीं आई। ये पूछा कि सिगरेट कौन-सी लानी है? चाचाजी के पैर तक नहीं छुए तुमने। बड़ों के पैर छूने में नाक नीची होती है इनकी। सीखो कुछ, नहीं तो सारी उम्र मूड़ पकड़कर रोओगे ...।' लड़का लौटा। अनमने, थके-से उसके हाथ मेरे पैरों की ओर बढ़े जिस तरह वह चरण स्पर्श कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, उससे मुझे वितृष्णा ही हुई। भुनभुनाता, पैर पटकता हुआ लड़का चल देने को मुड़ा। पिता होने के नाते वे अपने बेटे को अच्छी तरह समझते थे। शायद इसीलिए उसके कुछ न पूछने पर भी उसे समझाए जा रहे थे - 'विल्स फिल्टर की पांच सिगरेट! और हाँ - एक डबल जीरो का पान - इकराम की दुकान का। जल्दी लौटना - कहीं यार-बाशी में जा बैठे ...।'
लड़के के जाते ही उनकी बातों के विषय, अंदाज-सब एकदम बदल गए थे। परिवर्तन की गति और शैली से भौंचक में उन्हें चुप बैठा देखता-सुनता भर रहा था। गिरगिट भी शायद ही इतनी जल्दी रंग बदलता होगा! बीच-बीच में भीगी-सी हो उठती उनकी खरखरी तेज आवाज कह रही थी कि वे काफी कुछ बताने की जल्दी में हैं। अपने तीनों बच्चों के बारे में बताने से उनकी शुरुआत हुई। फिर अपने इरादों, योग्यताओं पर उन्होंने लम्बा व्याख्यान दिया। बेमन, तनावपूर्ण मनःस्थिति में उन्हें सुनते हुए मेरी समझ में सिर्फ इतना आया कि उनकी बेटी तीन साल की है। उससे बड़ा बेटा सातवीं क्लास में आया है। तीसरे इस सबसे बड़े बेटे ने इस साल प्रमोशन से इंटर पास किया है। बड़ी ठसक से बताते रहे थे कि अपने इस नाकारा बेटे को पास कराने के लिए उन्हें किस-किस मास्टर से निहोरे करने पड़े! बोर्ड में नकल कराने और नम्बर बढ़वाने के लिए उन्हें क्या जोड़-तोड़ करनी पड़ी। उनका दावा था कि इतने निकम्मे को बिना छदाम खर्च किए यहाँ तक पढ़ा देना उन जैसे पिता का ही बूता है। बड़ी शान से देर तक वे बताते रहे कि कब-कैसे ड्राइवरों-कंडक्टरों से दोस्ती गाँठकर फोकट में दूर-दूर तक का सफर कर आए हैं और रेलवे के स्टाफ को पटाकर कैसे दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई तक घूम आए हैं। उन्हें दुख था तो यह कि दुनियाँ भर की हथफेरी करके, अपना पेट काटकर औलाद को वे कुछ बनाना चाहते हैं, पर औलाद है कि उनकी हर बात इधर से सुनकर उधर निकाल देती है। बीबी से उन्हें इस बात की शिकायत थी कि वह हमेशा बेसुरा राग ही अलापती रहती है। जो वे कहेंगे, हमेशा उसका उल्टा करेगी। यह बताते समय उनका गर्व छिप नहीं रहा था कि कितने ही लड़की वाले जब-तक उनकी देहरी पर नाक रगड़ते रहते हैं। इधर-उधर का दबाव डलवाते हैं और चार-पांच लाख की बात से अपनी शुरुआत करते हैं। बड़े रहस्यपूर्ण अंदाज में बहुत धीमी आवाज+ के साथ उन्होंने अपनी एक बुद्धिमानी की तारीफ मुझसे भी करानी चाही थी। 'अगर मैं आज लड़के का रिश्ता तय कर लूं तो वह इंटर पास ही तो कहलाएगा। बी०ए० में दाखिले के बाद तय होगा तो दस जगह यह कहने की गुंजाइश रहेगी कि उस-उसके कम्पटीशन में बैठने का इरादा है लड़के का ...!'
सारी ऊब और उखड़ाव के बावजूद उन्हें सुनते रहना मेरी विवशता थी! घर के अंदर से आती आवाजें भीतर की उकताहट-अकुलाहट की सूचना दे रही थीं। इतनी देर बाद तक उनके आने का साफ उद्देश्य मेरी समझ में नहीं आ पा रहा था। अंजू चाय-नाश्ता ले आई थी। इससे पहले कि मैं उनसे चाय लेने के लिए कहता, वे प्लेट से लड्डू उठाकर मुँह तक पहुँचा चुके थे। लड्डू को दबाते-चबाते उसके स्वाद की उन्होंने खूब तारीफ की थी। तारीफ करते-करते एक-एक कर वे चारों लड्डू गटक चुके थे। बिल्कुल ऐसे जैसे कोई जादूगर लोहे के गोलों को एक-एक कर उदरस्थ करता जाता है। चाय का प्याला हाथ में थामे वे अपने बेटे की चर्चा की ओर मुड़े - लाख समझाया कि बुलंदशहर दाखिला मत ले। अपने चाचा के पास चला जा। उसके होते तुझे किसी बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। किताब-कापी का इंतजाम वो करा देगा। फीस-वीस माफ हो जाएगी। घर से रोज आना-जाना हो जाएगा। जाड़े, गर्मी, बरसात - जब जरूरत पड़े-तो चाचा का घर है ही। आजकल के ये लड़के अपने आगे सबको बेवकूफ समझते हैं। किसी की मानें तब न! नहीं माने, चले गए बुलंदशहर। शाम को ही आ खड़े हुए मेरे सामने थोबड़ा लटकाए। रोने लगे कि नम्बर कम हैं, दाखिला नहीं हुआ। बीस बार समझाया कि चाचा से मिल आ। मेरा नाम सुनते ही दाखिला कराएगा तेरा! पर उनकी तो नाक कटती है किसी से कुछ कहने में! आ तो मैं तुम्हारे कॉलिज ही रहा था। पर सोचा कि वहाँ क्यों तंग करूँ। शनिवार को गाँव आओगे ही, तभी बात कर लूंगा। अब जैसे भी हो, तुम्हें देखना है सब! तुमसे कह दिया, मेरी चिंता खत्म हुई ...!''
यदि मैं पहले से सावधान न होता तो मेरी प्रतिक्रिया भिन्न रही होती। मैं उनसे तंग आ चुका था। लग रहा था कि वे अपनी बातों के लपेटे में बड़ी कुशलता से मुझे लपेटते-कसते जा रहे हैं। जकड़न ऐसी कि दम घुटता लगा। फिर भी आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए मैंने उनके बेटे के नम्बर पूछे। सोचा कि कम प्रतिशत की बात कहकर अभी किस्सा खत्म करता हूं। बेटे द्वारा प्राप्त अंकों का विषयवार ब्यौरा उन्होंने इतने तपाक से दिया जैसे परीक्षा उन्होंने ही दी हो! - केवल अड़तीस प्रतिशत! तब तो दाखिला हो पाना एकदम मुश्किल है!' यह सुनकर पहली बार उनका बोलना थोड़ी देर के लिए रुका। चेहरा बुझ-सा गया। पर उन्होंने इतनी जल्दी हार मानना सीखा ही नहीं था। अगले ही क्षण वे पूरे दम-खम के साथ शुरू हो गए थे - मुश्किल क्यों है? बेटे के चाचा की प्रोफेसरी फिर किस काम आएगी? नम्बर अच्छे होते तो फिर रोना ही किस बात का था? तब किसी के पास मुझे आना क्यों पड़ता?
बेटा लौट आया था। बड़ी तेजी से, झपटते हुए से उन्होंने पान-सिगरेट को लड़के के हाथ से अपने कब्जे में ले लिया था। पान को मुँह में दबाया, सिगरेट सुलगाकर होठों के बीच दबाई और माचिस व बची सिगरेटों को अपनी जेब के हवाले किया। लम्बा कश खींचा और वे फिर शुरू हुए - देखना तो अब तुम्हीं को है भैया! गाँव-नाते से तुम्हारा इतना फजर् तो बनता ही है। तुम्हारे भतीजे के भविष्य का सवाल है। जो अपने भाई-भतीजों के काम न आ सके ऐसे रौब-रुतबे से क्या फायदा? ऊँची जाति वालों को तो वैसे ही कहीं पूछ-गछ नहीं है। गाँव-नाते, जाति-बिरादरी का लिहाज तो क्या नेता, क्या अफसर-सब रखते हैं। फिर हम-तुम तो एक गाँव, एक बिरादरी, एक घर के ठहरे!'
घर के लोगों की उकताहट-झल्लाहट रह-रहकर बाहर आ रही थी। फिलहाल टालने, पीछा छुड़ाने को हड़बड़ी में कह बैठा - पहले यह फार्म तो लाकर भरे! बाकी सब उसके बाद ही तो होगा! मैं चौंका कि वे एकदम उछल-से क्यों पड़े! ऐसे बोले जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई हो - यही तो मैं भी कब से कह रहा हूँ इससे! अक्ल में बैठे तब न! फार्म भर देगा तभी तो तुम कुछ कर पाओगे! सौ बार कह लिया, पर फार्म आज तक नहीं आ पाया। अब भी भला ये क्या खाक फार्म लाएंगे? इन्हें लेने भेजो-बीस रुपये बस के - पैदल चलेंगे नहीं सो बीस रिक्शे के, और बीस-तीस ऊपर से और। इतने पर भी फार्म आने की गारंटी नहीं। ऐसे ही होते तो फिर रोना किस बात का था? इसीलिए तो कहता हूँ कि भैया फार्म तुम्हीं भेज देना। यहाँ घर से यह ले जाएगा। यही सोचकर साथ लाया हूँ आज इसे। तुम भी देख लोगे, इसकी भी झिझक निकल जाएगी!'
उन्हें उठकर खड़ा होते देख बड़ा चैन मिला। फार्म के भेजने या न भेजने के बारे में मैं न ना कह पाया था न हाँ! चलते-चलते आदेश देते-से वे बोले - एक-दो दिन में ही भिजवा देना याद करके! आखिरी तारीख निकल गई तो इनके उर्द पर तो सफेदी भी नहीं आनी! मरना हमारा-तुम्हारा ही है हर तरह! मैं बेफिक्र होकर जा रहा हूँ! अब जिम्मेदारी तुम्हारी है।
मुझे कुछ कहने-समझा सकने का अवसर वे दे ही नहीं रहे थे। बेशर्म-सी बेहूदगी के साथ थोपी जा रही इस जिम्मेदारी को मैं पचा नहीं पा रहा था। ऊपर से बिना पैसे दिए फार्म मँगा लेने की उनकी धूर्ततापूर्ण चालाकी! अपनी उत्तेजना और चिड़चिड़ाहट को काबू में रखना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा था। वे किसी गलत फहमी या अँधेरे में न रहें, यह सोचकर बड़े धीमे, मुलायम स्वर में मैं इतना भर ही कह पाया था - देख लें फार्म भरवाकर! पर दाखिले की मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं दिख रही ...। जैसे ये शब्द न हों, शोले हों! पता नहीं क्या हुआ कि उनका रूप-रंग एकदम बदल गया। वे आग-बबूला हो उठे - अरे, सीधे-सीधे क्यों नहीं कह देते कि तुम्हें दाखिला कराना नहीं है। तुम क्यों चाहोगे कि हम जैसों के बेटे-बेटी पढ़-लिखकर तुम जैसे हो जाएँ ...!
उसके बाद सब कुछ इतनी तेजी और ऐसे जादुई ढंग से हुआ कि मैं सन्न रह गया सुन्न हुआ-सा मैं वहां होकर भी जैसे वहाँ नहीं था। सब कुछ देखते-सुनते हुए भी जैसे कुछ देख-सुन नहीं रहा था। पलक झपकने से भी कम की देरी में उन्होंने अपने बेटे को बालों से पकड़कर खींचा था। एक झटके में उसे जमीन पर पटक लिया था। लात-घूँसे चलाते-बजाते वे हौं-हौंकर हाँफ रहे थे। घर जैसे अखाड़ा हो और वे बड़े मातबर पहलवान! रोने-चिल्लाने की आवाजों ने घर को कट्टीघर बना दिया था। धूम-धड़ाक और चीख-पुकार सुनकर घर के लोग वहाँ आ घिरे थे। सब कुछ इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि हैरान खड़ा मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। चकराए-से पिताजी उन्हें कंधों से पकड़कर मुश्किल से चारपाई पर बिठा पाए थे। पुचकारते-फटकारते उन्हें शांत होने के लिए मनाने में जुटे थे। वे थे कि अपने हालात और औलाद के कारण हुई बेइज्जती का रोना रोए जा रहे थे। घबराई-सी माँ उनके बेटे को दुलारने-पुचकारने में लगी थीं। न उनकी गालियाँ थम रही थीं, न बेटे का रोना-सुबकना!
अब तक मैं अपने आप में लौट आया था। मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूँ-करूँ! पर क्या, कैसे? इतनी जल्दी यह तय ही नहीं कर पाया। तभी दिखा कि पिताजी उन्हें अपनी बाहों में लिए-लिए चारपाई पर बैठ गए हैं। पिताजी की आवाज में बुजुर्गों वाला प्यार भी था, अधिकार भी - बच्चे पर हाथ क्यों उठाया तूने? अरे, ये तो सोचा होता कि अपने इस छोटे भाई पर तेरा भी तो अधिकार है। इतना परेशान होने की क्या जरूरत थी? फार्म भेजने को उसने मना तो नहीं किया। दाखिले को भी कोई-न-कोई रास्ता ये निकालेगा! भरोसा तो रख! बाद में इससे मैं भी बात कर लूंगा!' पिताजी-और हाँ, माँ में भी, आए परिवर्तन को देख मैं स्तब्ध था! पिताजी के इस आश्वासन ने मुझे चिंतित भी किया था और दुखी भी! पिताजी से यह सुनकर उनके चेहरे पर यकायक एक चमक दिखाई दी। अंगोछे को सिर पर लपेटते हुए वे उठ खड़े हुए। चाचा-चाचा की रट लगाते वे पिताजी के सामने झुके-झुके जा रहे थे। पलभर को लगा जैसे घर में अभी कोई जादू का खेल होकर चुका हो। जादूगर भी तो ऐसा ही कुछ करता है। साथ लाए जमूरे को देखते-देखते भीड़ सामने गायब कर दे, उसके शरीर के टुकड़े कर दे, उसे फिर से जोड़कर दिखा दे। सम्मोहित भीड़ खूब तालियाँ पीटे, पैसे फैंके, घरों से खाना-कपड़ा लाकर दे। जादूगर तालियाँ, माल-पानी बटोरे और अपने करतब से सही सलामत किए जमूरे के साथ अगले ठिकाने की तलाश में आगे बढ़ जाये। दर्शकों की भीड़ में खड़े चकित, गद्गद् व्यक्ति की तरह पिताजी उन्हें सामर्थ्य भर देकर संतुष्ट दिख रहे थे। पर मैं था कि दृश्य की भयावहता से अवसन्न, एक भीत बच्चे की तरह चुप, जड़वत खड़ा हुआ था। न तालियाँ बजा पा रहा था, न कुछ दे पाने का साहस जुटा पा रहा था।
वे अपने सुबकते बेटे की ओर बढ़े। हाथ पकड़कर खींचते हुए उसे खड़ा किया और उसे बाहर की तरफ धकेलते-से बोले - क्यों टसुए बहाए जा रहा है औरतों की तरह? कोई तोप तो नहीं दागी मैंने। किसी काम को करा लेना इतना आसान है क्या? इतने पर भी दाखिला हो जाए, तेरा भविष्य बन जाए, तब भी बहुत सस्ता है। कुछ तो सीख ले इस घर की! सबकी औलादें तेरी तरह ही तो नहीं हैं। ये चाचा-चाची की औलाद है। श्रवण कुमार से राई-रत्ती कम नहीं। अपने पिता का कहना टाल ही नहीं सकती कभी! निसा खातिर रह तू ...!
गर्दन झुकाए उनके पीछे-पीछे चुपचाप सड़क पर जाते उनके बेटे को पहली बार मैंने इतने गौर से देखा था। तब भी वह मुझे उनका बेटा नहीं, जमूरा ही लगा था। पहली बार उसके वर्तमान पर मुझे अफसोस हुआ। इस जमीन, इस हवा, पानी और रोशनी के साथ वह जमूरे से अधिक और हो भी क्या सकता है! उसके ही नहीं उसके पिता के भविष्य को लेकर मुझे चिंता हुई। पहली बार उसके लिए मेरे मन में कुछ उमड़ा। मन हुआ उसे आवाज दूँ, रोकूँ। उससे कुछ कहूँ। पर उसके साथ उसके पिता आकर फिर से अपनी जादूगरी के करतब दिखाना शुरू न कर दें इसलिए चुप खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रहा।
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