Sunday, March 30, 2008

एक सपना

सीमा सचदेव
कल रात को मैने
एक सपना देखा
भीड़ भरे बाज़ार में
नहीँ कोई अपना देखा
मैने देखा
एक घर की छत के नीचे
कितनी आशांति
कितना दुख
और
कितनी सोच
मैने देखा
चेहरे पे चेहरा
लगाते हैं लोग
ऊपर से हँसते
पर अंदर से
रोते हैं लोग
भूख,लाचारी,बीमारी,बेकारी
यही विषय है बात का
आँख खुली
तो देखा
यह सत्य है
सपना नहीँ रात का
वास्तव में देखो
तो यह कहानी
घर-घर में
दोहराई जाती है
कोई बेटी जलती है तो
कोई बहु जलाई जाती है
कितनो के सुहाग उजड़ते रोज
तो कई उजाड़े जाते है
यह सब करके
भी बतलाओ
क्या लोग शांति पाते हैं ?
कितनी सुहागिने हुई विधवा
कितने बच्चे अनाथ हुए
कितना दुख पाया जीवन में
और ज़ुल्म सबके साथ हुए

********************************

No comments: