Skip to main content

डॉ0 वी0 के0 अग्रवाल के पाँच हाइकू

दम्भ
काहे को दम्भ
जाये कुछ ना संग,
अच्छे हों ढंग।

थोड़ा
थोड़ा ही थोड़ा
धन अपार जोड़ा,
बना ही रोड़ा।

थैला
सँभाले थैला,
मन ना करें मैला,
यश ही फैला।

कंजूस
बना कंजूस,
लेता ही रहा घूस,
बना भी हूस।

दमड़ी
बनी दमड़ी,
उतार ले चमड़ी
बात बिगड़ी।

Comments

very good sir



rahulkyonki6291.blogspot.com

Popular posts from this blog

सवाल उर्दू का -राही मासूम रज़ा

चित्र पर क्लिक करें और पढ़े ।

हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं संभावनाएँ

डॉ. हरेराम पाठक हिन्दी की आधुनिक गद्य विधाओं में ‘साक्षात्कार' विधा अभी भी शैशवावस्था में ही है। इसकी समकालीन गद्य विधाएँ-संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, आत्मकथा, अपनी लेखन आदि साहित्येतिहास में पर्याप्त महत्त्व प्राप्त कर चुकी हैं, परन्तु इतिहास लेखकों द्वारा साक्षात्कार विधा को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाना काफी आश्चर्यजनक है। आश्चर्यजनक इसलिए है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा साक्षात्कार विधा ही एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी साहित्यकार के जीवन दर्शन एवं उसके दृष्टिकोण तथा उसकी अभिरुचियों की गहन एवं तथ्यमूलक जानकारी न्यूनातिन्यून समय में की जा सकती है। ऐसी सशक्त गद्य विधा का विकास उसकी गुणवत्ता के अनुपात में सही दर पर न हो सकना आश्चर्यजनक नहीं तो क्या है। परिवर्तन संसृति का नियम है। गद्य की अन्य विधाओं के विकसित होने का पर्याप्त अवसर मिला पर एक सीमा तक ही साक्षात्कार विधा के साथ ऐसा नहीं हुआ। आरंभ में उसे विकसित होने का अवसर नहीं मिला परंतु कालान्तर में उसके विकास की बहुआयामी संभावनाएँ दृष्टिगोचर होने लगीं। साहित्य की अन्य विधाएँ साहित्य के शिल्पगत दायरे में सिमट कर रह गयी...

aadaba