Sunday, March 30, 2008

समाज के पहरेदार

सीमा सचदेव
समाज के पहरेदार ही,
लूटते हैं समाज को
करते हैं बदनाम फिर ,
रीति रिवाज को कूरीतिओं को यही लोग,
देते हैं दस्तक हो जाते हैं जिसके आगे,
सभी नत्मस्तक
झूठी शानो शोकत का,
करते हैं दिखावा
पहना देते हैं फिर उसको,
रंगदार पहनावा
अधर्मी बना देते ये फिर,
धरम के ठेकेदार को
समाज के.....................................................
लोगों के बींच करते हैं,
बड़े बड़े भाषण
दूसरों को बता देते हैं,
सामाजिक अन्नुशासन
अपनी बारी भूलते हैं,
सब क़ायदे क़ानून
इन्हीं में झूठी रस्मों का ,
होता है जुनून
ताक पर रख देते हैं,
ये शर्म औ लाज को
समाज के..............................................
लालची हैं भेडियी हैं,
भूखे हैं ताज के
किस बात के पहरेदार हैं ,
ये किस समाज के
अंदर कुछ और बाहर कुछ,
क्या यही सामाजिक नीति है?
लाहनत है कुछ और नहीं,
क्या रिवाज क्या रीति है
क्या है क़ानून ?जो दे सज़ा,
एसे दगाबाज़ को
समाज के................

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