Sunday, March 23, 2008

ग़ज़ल

भानुमित्र
भूल गया हूँ तेरा चहरा जिस को देखा पहली बार
रोता था या हँसता था या अब जैसा था पहली बार

वायु वही है अग्नि वही है वो ही जल और वो ही धूप
आज भी अनुभव वैसा ही है जैसा हुआ था पहली बार

बाहों में हो या गोदी में माँ की छूअन रहती थी
जिस दिन मैंने चलना सीखा आँचल छूटा पहली बार

जिस दिन फल को गिरते देखा मैंने माँ से कह डाला
मेरे मरने तक तुम जीना ये क्यों बोला पहली बार

अपने बच्चों को ये दुनिया क्यों व्यापार समझती है
आखिर में घाटा होगा जो निवेश करेगा पहली बार

आया हूँ मैं कर्ज चुकाने जो भी है वह सब ले लो
अन्तिम बार यहाँ आया हूँ मित्र ये कहता पहली बार
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