Sunday, March 23, 2008

नियुक्ति

- सरला अग्रवाल
सुबह के कामों से निबट कर हेमा ने समाचार patra उठा लिया। सदैव भी भांति सर्वप्रथम आवश्यकता है के कॉलम पर उसकी निगाहें टिक गईं। सचमुच ही स्थानीय इंजीनियरिंग कॉलेज में उसी के विषय इक्नोमिक्स के लिए लेक्चरर की आवश्यकता थी। विज्ञप्ति निकली थी। एक क्षण के लिए उसके नेत्रों में चमक आ गई, पर पिछली बातें याद करते ही वह तुरन्त बुझ भी गई।
पिछली बार भी तो उसने इसी कॉलिज में आवेदन पत्र भेजा था, साक्षात्कार के लिए भी गई थी, पर हुआ क्या? वही ढाक के तीन पात! पिछली बार की बातें स्मरण करके उसके नेत्र गीले हो आये... कब से कोशिश कर रही है वह... कितने वर्ष हो चले हैं पर कहीं पर भी नौकरी का सरंजाम नहीं जुट पाता.... इतनी पढ़ाई-लिखाई सब बेकार हो गई। क्या इस बार भी उसका यही हश्र होना है? उसने सोचा।
पर यह तो ऐसा लड्डू है जो न खाते बनता है और न ही उगलते! आवेदन पत्र तो उसे भेजना ही होगा और बुलावा आने पर जाना भी होगा... साक्षात्कार देते-देते वह अब थक चुकी है... किन्तु नौकरी के लिए प्रयास तो जारी रखने ही होंगे, फल तो ईश्वर के हाथ है। पर ईश्वर को भी दोष क्यों दिया जाये? आज के जमाने में तो फल नगदनारायण के हाथ है। पिछली बार भी तो उसके साथ यही घटित हुआ था। उसका साक्षात्कार तो खूब ही अच्छा हुआ था... उसे तो पूरा विश्वास था कि वह ही चुनी जायेगी। साक्षात्कार लेने वालों में से दो एक्सपर्ट्‌स कॉलिज के बाहर उसे देखकर बोले थे कि उसने बहुत ही अच्छे उत्तर दिये थे। तब वह बेहद पुलकित हो उठी थी... वैसे भी उसकी सही उच्चारण की बढ़िया अंग्रेजी, भव्य व्यक्तित्त्व और विषय के अच्छे ज्ञान से प्रभावित हो जाते थे... पर फिर भी तो!
कई दिनों तक भी नियुक्ति पत्र न पाकर उसे विस्मय हुआ था... वह स्वयं ही कॉलेज चली गई थी। एक परिचित लेक्चरर ने उसे बताया, अरे हेमा जी आपका तो अपॉइन्टमेंट लैटर तक तैयार हो गया था, पर शायद वह पोस्ट नहीं किया गया। सुनते हैं इस पोस्ट के लिए प्रिंसिपल साहब के पास ऊपर से फोन आ गया था... वह हेमा से सहानुभूति जताने लगे थे...।
आरंभ में हेमा को लगा था कि वह उसकी नियुक्ति की बात कह रहे हैं... उसका हृदय बल्लियों उछलने लगा और व्यवस्था के प्रति विश्वास भी दृढ़ होने लगा, किन्तु पूरी बात सुनने के पश्चात्‌, जब उसने उस पर पूरा ध्यान दिया तो लगा कि पैरों के नीचे से धरती ही खिसकी जा रही है... और ऊपर से आसमान उसके ऊपर गिर पड़ा है... वह उनकी ओर ताकती अवाक्‌ खड़ी रह गई। क्या सचमुच इस बार भी उसको नौकरी नहीं मिली? कितनी बेकरारी, कितनी आशाओं और विश्वास के साथ वह प्रतीक्षा कर रही थी...।
तभी सुनने में आया कि वह स्थान वहीं पर पहले से कार्यरत एक विधवा लाइब्रेरियन को दे दिया गया था जो एडहोक में कार्य कर रही थी... उसे न ही इससे पूर्व कहीं और पढ़ाने का अनुभव था और न ही पूरी क्वालिफिकेशनस्‌ ही थीं... सभी हैरान थे। आवेदन पत्र में दी गई शर्तों पर भी वह खरी नहीं उतरती थी... न ही उसे साक्षात्कार देने के लिए बुलाया गया था। यह कि प्रकार घटित हुआ प्रभू ही जाने।
पर फिर यह आवेदन पत्रों को आमंत्रित करने की और साक्षात्कार लेने की बवायद कराने की आवश्यकता ही क्या थी? आवेदन पत्र भर कर भेजना और इसका भारी भरकम शुल्क जमा करा पाना क्या आसान है, अभ्यार्थी के लिए? फिर साक्षात्कार की तैयारी करते समय हाथ में लिए सब कार्यों को एक ओर समेट कर पूरा ध्यान केवल साक्षात्कार की तैयारी पर ही तो केन्द्रित करना पड़ता है... कितनी चिन्ता, भय और आशंका के सर्प साक्षात्कार देने और परिणाम आने की बीच में तनाव के फन फैलाये खड़े रहते हैं सो अलग! ख़ैर, जो है सो है... यह सब तो झेलना ही पड़ेगा... झेलती आ ही रही है वर्षों से वह... हेमा ने अपने को संभालते हुए अपने पर छाते अवसाद को दिल से निकालना चाहा।
और अब? उसे भी कुछ तो करना ही होगा। स्वर्णपदक लेकर प्रथम श्रेणी में एम०ए० और पी०एच०डी० करने के पश्चात्‌ पांच वर्ष का अध्यापन का अनुभव होने पर भी आज वह इस आयु तक चप्पलें फटकारती घूम रही हैं... जहां देखो जैक लगाने वाले माल उड़ा ले जाते हैं। स्थानीय प्राइवेट कॉलिज अभी तक थे ही कहां यहां पर, अब साल दो साल से खुले हैं तो वे देते ही कितना हैं? न ही यू०जी०सी० ग्रेड के अनुसार वेतन और न ही जितना पेपर पर दिखाया जाता है, उतना हाथ में... अरे हस्ताक्षर जितने पर कराते हैं उससे आधा भी यदि दे दे तो गनीमत! हर जगह शोषण और पक्षपात की स्टैनगनें धड़ल्ले से चलाई जा रही हैं। न अपाइन्टमेंट लैटर देते हैं और न ही रजिस्टर पर नित्य हाजरी के लिए हस्ताक्षर ही करवाये जाते हैं। जिसे पेट में दो रोटी चाहिए वह आयेगा ही... सच में फिर भी लेकच्ररर्स की लाइनें लगी ही रहती हैं।
कितना कठिन हो गया है सरकारी नौकरी पाना अब। वह कितने सालों से लगातार कोशिश करती आ रही है... एक उसके पापा हैं जो कभी किसी से कुछ कहना ही नहीं चाहते... सदैव कहते हैं मैरिट्स पर आओ, मैं कभी किसी बच्चे के लिए किसी से भीख नहीं मागूंगा... मैंने अपने लिए ही कभी किसी से नहीं कहलवाया। वह यह नहीं सोच पाते कि आज के समय में मैरिट्स को पूछता ही कौन है! सोच में पड़ी हेमा न जाने कब से घुटती रही थी कि द्वारबैल घनघना उठी... हेमा ने उठकर तत्परता से द्वार खोल दिया... देखा तरुण कार्यालय से वापस आ गये हैं... उसने घड़ी की ओर देखा, शाम के छः बज रहे थे। दोनों बच्चे उसके पास ही गहरी नींद में सोये हुए थे।
अरे सुनो हेमा, एक बड़े काम की बात बताऊं... तुम्हारे उच्च शिक्षा मंत्री जी की सहोदर देवकान्त हमारी ही कंपनी में काम करता है, पलंग के किनारे पर बैठ अपने जूतों के तस्में खोलते हुए तरुण ने जोर से उत्साहपूर्वक कहा।
''क्या सच?'' हेमा खुश हो आई, ''आपको किसने बताया?''
''लो, यह भी क्या कोई छिपाने वाली बात है, सभी लोग जानते हैं।''
''तो फिर आपने इतने दिनों से बताया क्यों नहीं था?'' हेमा ने अचरज जताया।
''ओफ्फो! कभी जरूरत ही नहीं समझी... आज तो वह फैक्टरी के किसी काम से मेरी सीट पर खुद ही आया था... बातों ही बातों में मंत्री जी का जिक्र आ गया... बोला कोई काम हो तो बताना मैं करा दूंगा।'' तरुण ने स्थिति स्पष्ट की।
''तो आपने क्या कहा फिर?'' हेमा के चेहरे पर प्रसन्नता लहराने लगी, मानों बिल्ली के भाग से छींका टूटा हो... उसकी निगाहें एकटक तरुण के चेहरे पर जा टिकीं।
''कहना क्या था भई तुम्हारे पहले वाले इन्टरव्यू तथा अब जो होने वाला है, दोनों के बारे में सारी बातें विस्तार से बता दीं उसे मैंने सोचा अब तो पानी सिर से ऊंचा हो गया है।''
''हूं! क्या जवाब दिया उन्होंने फिर?'' हेमा ने चुन्नी का पल्लू दोनों हाथों में लेकर लपेटते हुए कुछ चिन्ता से पूछा।
''ओफ्फो! तुम कितने सारे सवाल-जवाब करती हो हेमा! वह और क्या कहता भला? बोला, आप किसी भी प्रकार की चिन्ता न करें अब, समझिए कि बस काम हो गया आपका! मुझे हेमा जी का बायोडेटा और सारे डिटेल्‌स दे दीजिए बस। जब जयपुर जाऊंगा... अभी एक दो दिन में जा ही रहा हूं... तब भाई साहब जी से सब बता दूंगा, मेरी बात वह कभी नहीं टालते, समझे आप! हां, आज का यह काम जरा जल्दी से करवा दीजिए।''
मैंने तो उनका काम हाथों हाथ करवा दिया है, अपने विभाग के दो लड़कों को लगाकर। बेचारे मेरे कारण दो घण्टे अधिक रुके... चार बजे तक की शिफ्ट है उनकी... तभी तो मुझे भी छः बज गये हैं आज!
हेमा तरुण की बात सुनकर प्रसन्न नहीं हुई। मन ही मन बुझ सी गई कितने सीधे स्वभाव के हैं बेचारे तरुण... मानव स्वभाव का मनोविज्ञान समझते ही नहीं हैं... तनिक भी नखरा नहीं किया, न ही कुछ समय तक प्रतीक्षा ही करवाई देवकान्त जी से... ''वह धीरे-धीरे रसोईघर में पहुंच गई और चाय बनाने में व्यस्त हो गई। तब तक दोनों बच्चे भी सोकर उठ चुके थे, उसने बच्चों के लिए भी नाश्ता और दूध तैयार कर लिया।
''तुमने आवेदन पत्रा भरकर भेज दिया है न?'' तरुण ने हेमा के पास आकर पूछा।
''हाँ'', हेमा ने चाय कपों में छानते हुए उत्तर दिया। और घर के कार्यों में व्यस्त हो गई।
कुछ ही दिनों की प्रतीक्षा के पश्चात्‌ हेमा के पास इंजीनियरिंग कॉलेज में 'ह्यूमेन्टीज' विषय के लिए प्राचार्य की नौकरी के साक्षात्कार का बुलावा-पत्र आ गया। इस बार साक्षात्कार उनके अपने शहर में न रखा जाकर राजस्थान की राजधानी जयपुर में रखा गया था। इससे पूर्व दो बार साक्षात्कार का पत्र आया तो जरूर था पर बाद में कैंसिल हो गया था। पूछने पर पता लगा कि इस पद के लिए पर्याप्त आवेदन पत्र न आने के कारण ऐसा करना पड़ा। पर अब साक्षात्कार जयपुर में रखा गया था मानों वहां पर इस पद के लिए पदालिभाषियों की भीड़ लगने की संभावना हो।
पर चलो इसी बहाने मंत्री जी से स्वयं भेंट कर पाने का अवसर भी मिलेगा, यह सोचकर हेमा मन ही मन आश्वस्त हो आई और पूरे जोर-शोर के साथ साक्षात्कार के लिए अध्ययन-मनन एवं मानसिक रूप से स्वयं को तैयार करने में लग गई। तरुण समय-समय पर देवकान्त से मिलता रहा था, उसी ने हेमा तरुण को जयपुर में साक्षात्कार से पूर्व एक बार मंत्री जी से मिलाने का और सारी बातें खुद ही बताने का प्रस्ताव दिया था। तरुण ने देवकान्त के कानों में यह बात भी डाल दी थी कि यदि वह आवश्यकता समझे तो बता दे, जेब गर्म करने की सामग्री भी तैयार रहेगी... पर उसे कब और किस प्रकार सही स्थान तक खिसकाया जाना है इसका अनुमान उन्हें नहीं हैं।
साक्षात्कार वाले दिन हेमा और तरुण देवकान्त को साथ लेकर शिक्षामंत्री जी की कोठी पर पहुंच गये। देवकान्त अन्तःपुर में चले गये थे। अन्दर से हेमा के लिए बुलावा आ पहुंचा। तरुण बाहर ही बैठे रहे। हेमा अन्दर कमरे में गई। शिक्षामंत्री जी बैठे थे उनके अगल-बगल कई फोन, मोबाइल आदि रखे थे। उसी गद्दे पर एक ओर हेमा उनके संकेत पर पर बैठ गई। हेमा की मंत्री जी से खुलकर बातें हुईं। सारे सर्टिफिकेट, अनुभव पत्र, स्वर्णपदक आदि हेमास ने उन्हें दिखाये। उन्होंने हेमा की बातें बहुत ही ध्यान से सुनीं और उसकी व्यथा को समझा। उसके समस्त सर्टिफिकेट और गोल्डमैडल को उलट-पुलट कर देखा और उसे शाबाशी दी... पापा-मम्मी … अन्य भाई-बहिनों के हाल-चाल पूछे। नौकर को कहकर तरुण को वहीं पर बुलवा लिया। उनके लिए मिठाई तथा कोल्डड्रिंक मंगवा कर मनुहार के साथ खिलाया-पिलाया और चलते समय उसे साक्षात्कार के लिए मंगल कामनाएं भी प्रदान की... फोन उठा कर दो बार किसी से बातें की... कहा ''यह सारी बदमाशी कपूर (प्रिंसिपल) की है वह वहां पर अपने आदमियों को तरजीह देता है... मैंने कह दिया है, अब तुम तनिक भी चिन्ता मत करो, इस बार साक्षात्कार के आधार पर न्याय ही होगा।''
कमरे से बाहर निकलते समय हेमा का हृदय बल्लियों सा उछल रहा था, मंत्री जी की शालीनता और सद व्यवहार के प्रति उसके हृदय में आह्‌लाद और कृतज्ञता का अन्त ही न था। लोग व्यर्थ ही मंत्रियों के विषय में इतनी उल्टी-सीधी बातें किया करते हैं, उसने सोचा।
साक्षात्कार दूसरी जगह पर था। तरुण और हेमा वहां समय पर पहुंच गये। केवल दो ही पदाभिलाषी वहां आये थे। एक हेमा स्वयं थी दूसरी एक अन्य लड़की थी... हेमा को भय हुआ कि कहीं इस बार भी साक्षात्कार कैंसिल न हो जाये... पर नहीं। साक्षात्कार हुआ... काफी कोशिश थी पूरे पैनल की हेमा को अलग ढंग के प्रश्न पूछ-पूछकर घेरने की... पर हेमा को लगा कि उसने सभी उत्तर संतुलित रूप से सही दिये थे। हेमा के पश्चात्‌ उस लड़की को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था।... वह केवल पांच सात मिनट में ही बाहर आ गई थी जबकि हेमा से तो आधा घण्टे से भी अधिक समय तक प्रश्न पूछते रहे थे वे लोग। हेमा ने उसके विषय में बाहर आकर पता किया, विदित हुआ कि उस लड़की ने उसी वर्ष एम०ए० पास किया था, वह भी अच्छी सैकेंड डिविजन में, प्रथम में नहीं...। हेमा मन ही मन आश्वस्त हो आई...। प्रभु इस बार तो कृपा करना... प्रथम श्रेणी, पी०एचडी०, गोल्ड मैडल धारा प्रवाह अंग्रेजी और पांच वर्ष का पढ़ाने का अनुभव, फिर मंत्री जी का जैक!
कॉलिज खुल गया था... अगस्त का महीना चल रहा था, हेमा बेसब्री के साथ अपने अपॉइन्टमेंट लैटर की प्रतीक्षा करती रही थी। आशाओं की कलियां फूल बन कर खिलने लगी थीं... बार-बार मंत्री जी के साथ हुई भेंट उसे अह्‌लाद से भर जाती... साक्षात्कार में हुई बात-चीत को अपने अंतर में दोहराती-तौलती वह आश्वस्त हो उठती। सब कुछ ठीक हो रहा था इस बार! वह एक दिन तरुण से बोली, ''आज आप जाकर इंजीनियरिंग कॉलिज में पता तो करिए कि क्या हुआ, काफी समय हो गया है, अब तक तो नियुक्ति हो ही जानी चाहिए, कॉलिज का सैशन आरंभ हो गया है। विद्यार्थियों की पढ़ाई का हर्जा नहीं होना चाहिए।''
दिनभर हेमा के हृदय में उत्कण्ठा बनी रही। वह हर पल तरुण के आगमन की प्रतीक्षा करती रही... दो बार फोन करके कार्यालय में तरुण को याद दिलाया कि लंच के बाद छुट्टी लेकर उन्हें कॉलिज जाना है। पूरे दिन वह बेहद खुश और चुस्त-दुरस्त रही... बच्चों के साथ खेली, उनका होमवर्क बिना डांटे और बिना मारे करवाया। शाम के नाश्ते में बच्चों के लिए हलुवा बनाया। वह तैयार होकर बैठी ही थी कि द्वार बैल घनघना उठी... बड़े बेटे आलोक ने दौड़ कर दरवाजा खोला... 'पापा आ गये... पापा आ गये' कहते दोनों बच्चे उनकी टांगों से लिपट गये।
मन चीता शुभसंदेश सुनने के लिए हेमा ने मुस्कराते हुए तरुण की ओर देखा... मुंह लटका हुआ था... कुछ आशंका तो हुई कि तरुण के साथ कुछ अप्रत्याशित घटा है, पर अपने विषय में नहीं। उसने अपनी संवेदनशील दृष्टि तरुण पर टिका कर पूछा ''क्या बात है?'
'बात क्या होनी है? वही हुआ जिसका मुझे जयपुर में भय था। वह लड़की जो जयपुर में साक्षात्कार के लिए आई थी, उसी की नियुक्ति यहां हो चुकी है, उसने तो यहां आकर ज्वाइन भी कर लिया है परसों।'
''क्या?'' हेमा की आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गईं। ''यह कैसे हो सकता है?'' सकपकाते हुए उसके मुंह से निकला...।'' उसकी आशाएं, उसका विश्वास सब अचानक आये, भूचाल से भरभरा कर ढह गये। हेमा को लगा जैसे आकाश उसके ऊपर गिर पड़ा हो, वह कराह उठी, लगा जैसे उसकी देह का सारा रक्त किसी ने निकाल लिया हो... इतने समय से मात्रा इसी आशा पर तो वह अपना संतुलन बनाये हुई थी... उसकी आंखे डबडबा आईं, वह धम्म से जमीन पर ही बैठ गई।
''सुनते हैं लड़की के पिता ने अच्छी तरह से सबकी जेबें गर्म कर दी हैं, वह जयपुर के बहुत बड़े उद्योगपति हैं। आगे चुनाव भी तो आ रहे हैं... ''
''पर शिक्षामंत्री जी ने तो कहा था -''
''अरे हेमा, तुम बड़ी भोली हो। नेताओं की कथनी और करनी एक ही होती तो क्या देश की आज यह दुर्गति होती! सब कुछ उन्हीं का तो करा-धरा है... प्रिंसिपल के हाथों में कुछ भी नहीं है।''
''पर हमने भी तो देवकान्त जी से इस विषय में कह दिया था... हम भी तो देने के लिए तैयार थे।''
''ओफ्फो! तुम्हारी क्या तुलना हो सकती है एक बड़े उद्योगपति से?'' फिर तुम्हारे पिता के साथ वह अपने आरंभिक जीवन में काफी घनिष्ट रहे हैं, तुम्हारे पिता सदैव अपनी ईमानदारी और अख्खड़पन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं, ऐसे अपने बाल्यसखा की पुत्री से कुछ लेने पर क्या सम्पूर्ण समाज में उनकी छवि विकृत न हो जाती?''
जब वे लोग जयपुर में मंत्री जी के निवास पर उनसे मिलने के लिए गये थे तो तरुण बाहर के रिसेप्शन रूप में बैठे रहे थे। वहां पड़े सोफों पर मंत्री जी के कुछ चमचे और विश्वासपात्रा लोग बैठे मंत्री जी के पी०आर०ओ० से बतिया रहे थे। पूछे जाने पर तरुण ने पी०आर०ओ० को बता दिया था कि मंत्री जी उसकी पत्नी हेमा के पिता के बचपन के सहपाठी और मित्रा रहे हैं। हेमा जिस कार्य से मिलने आई है उसके विषय में भी उसने सब स्पष्ट बता दिया था। तभी उसने खिड़की से पोर्च में आकर खड़ी हुई एक शानदार इम्पोर्टिड गाड़ी को देखा था, जिसके पीछे के द्वार उसके शौफर ने उतर कर खोले थे... तो उसमें से उतर कर एक सुन्दर सी नवयौवना को उसने एक भव्य व्यक्तित्व के वृद्ध से व्यक्ति के साथ-साथ कोठी के अन्दर जाते देखा था। तरुण की आंखों के सम्मुख वह सारा दृश्य घूमने लगा, वह प्रगट में बोला...
''अरे, मैंने तो जब जयपुर में मंत्री जी के निवास पर उस बड़ी सी शानदार कार से उतरकर उस छोटी सी लड़की को अपने पिता या दादा के साथ अन्दर जाते देखा था तभी मेरा माथा ठनक गया था... न जाने क्यों मुझे तब कुछ दाल में काला सा लगने लगा था। वहां बैठे लोग भी एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कराये थे और आंख दबाकर आंखों ही आंखों में बाते करते रहे थे। सब कुछ पहले से ही तय था... तुम्हें तो केवल दिखाने भर के लिए स्नेह-प्रदर्शन करके अच्छे बन गये वे।''
''नहीं, नहीं, ऐसा नहीं हो सकता... अपने क्षूद्र से स्वार्थ के लिए क्या वह समस्त छात्रों की शिक्षा को धूल चटा देंगे और एक योग्य व्यक्ति का जीवन यूं बलिदान चढ़ा देंगे?''
''चढ़ा देंगे? चढ़ा दिया-कहो''... तरुण ने हाथों को उसी भाव में हिलाते हुए कहा ''हेमा यथार्थ को स्वीकारो... स्थितियों को बदलने का दमखम है तो आगे बढ़ कर बदलो... वरना शान्त रह कर झेलो!'' और तरुण वहां से उठकर बाहर चल दिये।
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''आस्था'' ५-बी-२०, तलवंडी,
कोटा-३२४००५ (राजस्थान)
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