Tuesday, March 18, 2008

अनचाहा बीच

- डॉ० जगदीश व्योम
''राजू को आज जाने क्या हो गया है?... वह टॉयलेट के बेण्टीलेटर पर रखे गोरैया के घोंसले को फेंकने जा रहा है। गोरैया तो उड़ गई, पर राजू उसके बच्चों को मार डालेगा ... देखिये आकर! ....'' - शीला ने अपने पति सोमेश से कहा और उल्ले पाँव लोट गई। सोमेश अधूरा चित्र छोड़कर घर पहुँचा।
''राजू बेटे! क्या बात है? गोरैया के बच्चों को क्यों मार रहे हो? ... तुम्हीं ने तो गोरैया को घोंसला रखने दिया था। तुम तो इन बच्चों को बहुत प्यार करते हो। फिर इन्हें मार क्यों रहे हो? ... इन्होंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा? - सोमेश ने राजू को समझाते हुए कहा।
''गोरैया ने मेरा खिलौना तोड़ डाला है। मैं इसके बच्चों को जिन्दा नहीं छोडूँगा। इन्हें मारूँगा...मारूँगा...मारूँगा। - कहते हुए राजू ने बेण्टीलेटर पर तड़ातड़ तीन-चार डण्डे मारे। गुस्से से राजू का मुँह लाल हो रहा था।
''तुम्हारा खिलौना गोरैया ने तोड़ा है, उसके बच्चों को क्यों मार रहे हो? ... ये तो बेचारे उड़ भी नहीं सकते .....।''
''मारूँगा, आपको इससे क्या?'' - राजू ने चीखते हुए कहा। शीला ने राजू को पकड़ना चाहा तो उसने शीला के ही झण्डा जड़ दिया। किसी तरह शीला ने राजू को पकड़ा।
सोमेश भारी कदमों से लौट आया। उसका मन अब चित्र बनाने में नहीं लग रहा था। सोचने लगा - ''कहाँ से आ गया इतना आक्रोश राजू में? ...कितना आक्रामक लग रहा था उसका चेहरा ... कहाँ से प्रेरणा मिली है उसे निरीह बच्चों से बदला लेने की? ... दूरदर्शन पर …के दृश्य देख-देखकर .... अखबारों से .... परिवेश से .... या .... या .... वंशानुक्रम से ....? सोमेश सोचते-सोचते चिंतन की अतल गहराई में पहुँ चुका था।
वह सोच रहा था कि भावी पीढ़ी को समाज क्या दे रहा है? ... राजू वही तो कर रहा है, जो हम और हमारा समाज उसे अप्रत्यक्ष रूप में दे रहे हैं। देश का समूचा आतंकवाद सोमेश की आँखों के आगे घूमने लगा।
.... कैसे निकल सकेगा बालमन से आतंकवाद का यह अनचाहा बीज ...? इसी दुश्चिन्ता में सोमेश शून्य में हल खोजने का प्रयास करते-करते न जाने कहाँ खो गया।
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