Saturday, March 22, 2008

ग़ज़ल

सुरेश कुमार
समय के साथ नया सोचने लगा मैं भी
मुझे भी लगने लगा बेवफ़ा हुआ मैं भी

उदासियों से घिरा चाँद था बुलन्दी पर
तेरे ख़याल की छत पर उदास था मैं भी

उमड़-घुमड़ के वो बादल रहा वहीं का वहीं
झुलसती रेत का एक ख्वाब हो गया मैं भी

पता नहीं उसे किस की तलाश थी मुझमें
तमाम उम्र किसे ढूढता रहा मैं भी

हुनर पे आँच न आये जमीर भी न बिके
इसी उमीद पे बाजार को चला मैं भी
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1 comment:

Alpana Verma said...

समय के साथ नया सोचने लगा मैं भी
मुझे भी लगने लगा बेवफ़ा हुआ मैं भी


bahut khuub!!!
badiya sher kaha hai!!!!