Sunday, March 30, 2008

अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन

- ईश्वर दयाल जायसवाल
हमारे मुल्क महान्‌ में अदना चपरासी से लेकर नौकर शाह तक, मजदूर से लेकर उद्योगपति तक, छात्र से लेकर शिक्षाविद् तक, जाति-बिरादरी से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक के अपने-अपने संगठन हैं। जरा-जरा-सी बात पर ''...यूनियन जिन्दाबाद!'' के नारे लगने लगते हैं, हड़तालें होने लगतीं हैं। लेकिन अफसोस! हमारे मुल्क महान्‌ में कवियों-लेखकों का कोई भी, किसी भी प्रकार का संगठन सदियों से आज तक नहीं बना है। इस निरीह विवेकशील प्राणी का कोई भी चाहे जितना शोषण करें, उफ्‌ तक करने वाले नहीं है। यहाँ तक कि इनके अपने ही बिरादरीगण इनका शोषण करते हैं।
नगर के किसी भी मुहल्ले में यदि कोई टुट पुजिया राजनेता टपकता है तो नगर के मुहाने पर ही उसके समर्थक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो जाता है, जिन्दाबाद के नारे लगने लगते हैं और उसको फूल-मालाओं से इतना लादनें लगते हैं कि सभा स्थल तक आते-आते फूल मालाओं का वजन उसके मूल वजन से दो गुना हो जाता है। उसके रूखसती पर एक मोटी रकम चन्दे के रूप में दे दी जाती है।
लेकिन कवि सम्मेलनों के आयोजकों के बुलावे पर कोई कवि जब कवि-सम्मेलन स्थल पर थका-माँदा पहुँचता है तब उसके स्वागत की बात तो दूर, दो-चार श्रोताओं को छोड़कर आयोजकों का कहीं कोई अता-पता नहीं रहता। कवि-सम्मेलन की समाप्ति पर कवियों को अपने पारिश्रमिक के लिए आयोजकों को खोजना पड़ता हैं।
इस निरीह विवेकशील प्राणी के लिए मेरा मन हमेशा से आहत रहा है। इस आहत मन को तब और ठेस पहुँचती है जब कवि सम्मेलनों में कवियों का स्वागत फटे-पुराने जूतों, चप्पलों, सैंडिलों, सड़े-गले फलों-सब्जियों से होता है।
एक टू-इन-वन कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में घटना कुछ ऐसी घटी कि मैं उसी क्षण कवियों-शायरों को संगठित करने हेतु एक मंच बनाने को उतावला हो गया। घटना कुछ इस प्रकार घटी थी -
एक परिस्थितिजन्य क्षीणकाय शरीरधारी कवि ने जैसे ही धीमी गति वाले समाचार उद्घोषक के अंदाज में वीर रस की कविता पढ़ना शुरू किया, बेचारे के भाग्य ने कुछ ऐसा खिलवाड़ किया कि ध्वनि-विस्तारक यंत्रा से आवाज आना बंद हो गयी। जैसे-तैसे माइक वाले ने ध्वनि विस्तारक यंत्रा का वाल्यूम बढ़ाकर आवाज का संचार कर दिया। कवि महाशय के वीर रस के शब्दों ने जब श्रोताओं के कानों को उद्वेलित किया तो श्रोताओं में ओज का ऐसा जोश जगा कि उस जोश के वशीभूत श्रोताओं की ओर से शोर रूपी ध्वनि का धमाका होने लगा जैसे जंगल में जानवरों के विशेष समूह एक स्वर में हुंकार भरते हैं, और उसी जोश में श्रोताओं ने ऐसा आपा खोया कि क्षण भर में ही कवि सम्मेलन मंच रण थम्भौर बन गया। मंच जूतों-चप्पलों, सैंडिलों, सड़ी-गली सब्जियों से पट गया।
बस इसी दृश्य का मेरे मानस पटल पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वहाँ से लौटने के बाद इन निरीह विवेकशील प्राणियों का संगठन बनाने को उतावला हो गया। अगले दिन संगठन का प्रारूप तैयार कर डाला और नामकरण भी कर डाला-अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन
संगठन की नियमावली में जो प्रस्ताव प्रस्तुत किए गये हैं वह इस प्रकार हैं -
देश के सभी कवि-सम्मेलनों, मुशायरों के आयोजक, कवियों-शायरों को पारिश्रमिक धनराशि एक समान दें, साथ ही कवियों के सम्पूर्ण पारिश्रमिक धनराशि मय यात्रा भत्ता के बतौर अग्रिम भेजना होगा। इससे कवियों को यह फायदा होगा कि कवि-सम्मेलन की समाप्ति पर कवियों को अपने पारिश्रमिक के लिए आयोजकों को खोजना नहीं पड़ेगा।
कवियों-शायरों-लेखकों को कवि सम्मेलनों, सेमिनारों में जाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से निःशुल्क यात्रा करने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए वायुयानों, रेलगाड़ियों, रोडवेज की बसों में यात्रा करने के लिए स्थाई रूप से निःशुल्क यात्रा पास जारी करना होगा।
देश में जितने भी समाचार पत्र छपते हैं, उसमें पूरे एक पृष्ठ में नियमित रूप से ऐसे सर्वहारा कवियों-शायरों की रचनाएँ छापी जाएं, जो कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों को उखाड़ने में महारत हासिल किए हैं।
देश के सभी सर्वहारा कवियों-शायरों-लेखकों को सरकार की ओर से एक निश्चित राशि गुजारा भत्ता के रूप में देना अनिवार्य होगा ताकि उनके परिवार का भरण-पोषण होता रहे और कवि, लेखक महाशय अपने घरेलू खर्चों के झंझटों से निश्चिंत होकर दिन-रात अपनी रचना में ही डूबे रहें।
जो सर्वहारा कवि-शायर दूसरों की रचना चुराकर कवि सम्मेलनों-मुशायरों में पढ़ते हैं, उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सरकारी अंगरक्षकों की नियुक्ति की जाए।
कवि सम्मेलनों-मुशायरों में जो भी श्रोता आएं वे या तो नंगे पैर आएं या नए जूते-चप्पल, सैंडिल पहन कर आएं। फलों में केवल संतरे, अंगूर, केले, रसभरी ही लाएं।
प्रायः सभी कवियों, शायरों, लेखकों की प्रसिद्धि में नारी की विशेष भूमिका रही है, (अतीत के कालीदास, तुलसीदास साक्षी हैं)। उनके लेखन में निरन्तर निखार लाने का श्रेय उनकी पत्नियों को है। इस बात को दृष्टिकोण में रखते हुए जब भी किसी कवि, शायर या लेखक को सम्मानित किया जाए तो अंग-वस्त्र के नाम पर शाल, कुर्ता-पायजामा आदि न देकर उनको साड़ी से सम्मानित किया जाए। इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि कविगण जब अपने हाथ में साड़ी को लेकर घर पहुँचेंगे तो उनकी पत्नियां रात्रि भर खर्राटे मारकर सोने के बजाए रात्रि भर जागती रहेंगी और अपने प्रियतम कवि, शायर, लेखक का बेसब्री से इंतजार करती रहेंगी। साथ ही हर पल हर दिन उन्हें लेखन के प्रति पे्ररित करती रहेंगी।
अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन की प्रबन्ध कार्यकारिणी समिति में समर्पित कवियों, शायरों एवं लेखकों को हार्दिक अभिलाषा है कि अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन के अध्यक्ष पद पर हिन्दी साहित्य जगत के अंतर्राष्ट्रीय कवि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, महासचिव पद पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं संरक्षक हमारे मुल्क महान्‌ के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को बगैर उनकी अनुमति एवं सहमति के आजीवन आरक्षित कर दिया जाए।
संयोजक - अदबी विचार मंचमोहल्ला - हयातगंज,टाण्डा, अम्बेडकर नगर, (उ०प्र०)
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2 comments:

विनोद साव said...

हिंदी व्यंग्य की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं इस तरह की रचनाएँ. इनमें न तो अपने समय की पकड़ है और न ही विचारों की जकड है.

- विनोद साव

विनोद साव said...

हिंदी व्यंग्य की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं इस तरह की रचनाएँ. इनमें न तो अपने समय की पकड़ है और न ही विचारों की जकड है.

- विनोद साव