Friday, March 21, 2008

मुझे मनुष्य नहीं बनना

- डॉ. सय्यद मशकूर अली
चारों तरफ खून ही खून, चीख-पुकार, लाठी चार्ज, गोली बारी, आगजनी, लूटपाट, छुरेबाजी एवं दंगे-फसाद। लोग जख्मी लोगों को पैरों तले रौंदते हुए चले जा रहे थे, मदद के लिये चिल्ला रहे थे -''हमें सहारा दो, हमें बचा लो।'' पर किसी के पास किसी का हाल सुनने का समय नहीं। जिसे जहाँ जगह मिल रही थी, वहीं सिर छिपा रहा था।
सड़कों पर पड़ी लाशें कफन की फरियाद करतीं, नालियों में बहता खून पानी से भी शर्मिन्दा और मुहल्ले कर्फ्यू के कारण कब्रिस्तान से भी ज्यादा सुनसान। बच्चों के चेहरों पर भय और आँखों में निराशा। भूख से परेशान लोग पूछ रहे थे : ''ऐसा क्यों? कब तक यह जुल्म? कब तक मानवता पर यह अत्याचार? कब तक इंसान के खून से इतिहास के पन्ने भरे जायेंगे? कौन है, यह नरभक्षी? ऐसा क्यों करते हैं? कुछ समझ में नहीं आता।''
एक घंटे के लिये कर्फ्यू में ढ़ील। लोगों ने घरों से निकलकर पागलों की तरह भागना शुरू किया।
इसी भाग-दौड़ में एक कीड़ा अपनी पुश्तैनी नाली वाली जगह से निकला और मनुष्य के पाँव से बचते-बचाते मिट्टी में रेंगना शुरू किया। दूसरी ओर से आते मोटे कीडे ने उसे देखा पूछा : ''अरे भई, क्या हाल है?''
''देखते नहीं यह सब'', पहले कीडे ने जवाब दिया।
''पर, यह सब तो मानव समाज में है'', मोटे कीडे ने कहा । ''कीड़ा समाज में तो ऐसा कुछ भी नहीं ऐसा क्यों?'' उसने पूछा ।
''इसलिए कि शायद भगवान कीड़ा समाज में नेता बनाना भूल गया'', पतले कीडे ने जल्दी से जवाब दिया। ''अभी मुझे जाने दे, फिर मिलेंगे तब बात करेंगे।''
''पर ऐसी भी जल्दी क्या है?'' मोटे कीडे ने उसे रोकते हुए कहा।
''जल्दी! मुझे भय है कि कोई मनुष्य मुझे छू न दे और, न करे नारायण, मैं मनुष्य बन जाऊँ। मैं मनुष्य बनना नहीं चाहता,'' कहकर वह तुरन्त वहाँ से चल दिया ।
मोटे कीडे को भी मानव समाज की दुर्दशा पर रोना आ रहा था।
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