Monday, March 17, 2008

क्या फर्क पड़ा?

- डॉ० विवेकी राय
क्वार की कड़ी-खड़ी धूप में रास्ता पकड़े जाते किसी गाँव में नीम की छायावाले खुले हवादार बैठकखाने में क्षणभर सुस्ताने का मौका मिल जाये और वह पूर्व-परिचित निकले, तो उस अनायास मिले शारीरिक मानसिक सुख का क्या पूछना?
याद की परतों को हटाते-हटाते मुझे ज्ञात हुआ, कोई तीस-पैंतीस साल गुजरे, जब मैं इसी प्रकार एक जलते जेठ में यहाँ एक लोटा पानी मांगने आया था। तब से कुछ खास नहीं बदला। सब कुछ तो वही है। याद आया, तब एक बूढ़े बाबा थे, जो मुझे आते देख दूर से ही बोले, आइए महाराज, आइए। कुबेला के ऐसे माहुर धाम में रास्ता नहीं चलना चाहिए। बैठिए, आराम से बैठिए।
जान-न-पहचान और ऐसी आत्मीयता! और वह बातों में ही क्यों? तुरन्त पानी आया, पंखी आयी। हाथ-मुंह धोते-धोते एक बाल्टी में शरबत आ गया। इतना ही नहीं। जब फूल के गिलास में उदारता के साथ ढाला जाने लगा, तो शरबत से पहले दही की मोटी-मोटी साढ़ी गिलास में छल-छल गिरने लगी। होठों से शरबत छुआ, तो लगा, चीनी-गोरस के अतिरिक्त इस रस-पानी में और भी किसी स्वाद की मिठास है, जिसकी व्याख्या असंभव है।
चारपाई पर बैठते ही गांव के मौलिक स्वाद-गंध में मन डूब गया। सब कुछ वैसा ही दीख रहा है। कुछ नहीं बदला। हां, उसी प्रकार अब भी चारपाइयों की कतारें हैं। एक ओर लाठियां खड़ी हैं। सामने चरन है, बैल बंधे हैं। वैसे ही हल रखे हैं। तब से कुछ खास नहीं बदला। हां, द्वार पर लुंगी पहने जो एक लड़का बैठा था, वह अपराध कथा को हाथों में लिये हुए हमारे आने के बाद भीतर चला गया और काफी देर बाद एक उससे बड़ा लड़का ट्रांजिस्टर बजाता आया, तो काफी देर तक उसने पूछताछ की कि कहां घर है? कैसे आया हूँ? कहाँ जाना है? आदि और फिर चला गया तो मेरा ध्यान गया कि द्वार के चारों ओर ऐसी मजबूत चारदीवारी तब नहीं थी। अब माल-मवेशी सब घेरे में आ गये हैं, लोहे के फाटक में बंद। फाटक के, दोनों ओर यूकिलिप्टस के पेड़ खड़े हो गये हैं, नीम से ऊँचे। मगर, नीम की शोभा कुछ और है। उसके नीचे उसी प्रकार ईख पेरने वाला कोल्हू पड़ा है। एक ओर चौकी पड़ी है। उसके नीचे कुत्ता बैठा है। क्या फर्क पड़ा? सब तो वैसा ही है। लेकिन नहीं, कुछ तो फर्क पड़ा ही है।
जिस चौकी पर उस बार शरबत की बाल्टी रखी गयी थी, उसी पर पानी की गहरी प्रतीक्षा के बाद एक लड़के ने लाकर चाय की करिखाई केतली ठक से रख दी। दूसरा लड़का पीछे से प्याला - प्लेट लिये पहुंचा, चाय डाली जाने लगी, तो उसमें से स्वराज्य, जमींदारी-उन्मूलन, चुनाव, राजनीति, विकास, मंहगाई, चकबन्दी, शिक्षा-प्रसार, वर्ग-विद्वेष, नयी खेती, नयी हवा, लूट-खसोट और बदले गांव के नये स्वाद की नयी और तेज ग्राम-गंध निकलने लगी। चाय तो बस एक बहाना बनी।
अहा, ग्राम्य जीवन भी क्या है के प्रणेता को नमनकर अब मैं जगमग नगरों से दूर सुरम्य प्रकृति की मुक्त गोद में बसे भोले-भाले अपने किसानों के उस प्यारे गांव के उस नये स्वाद-गंध पर कुछ लिखने चला हूँ, तो क्यों वह अनजाने विकृतियों का नरकनामा बन जाता है?
क्या सचमुच आज गाँव में गाँव नहीं रहा? क्या उसकी अपनी परंपरागत सांस्कृतिक पहचान पूर्णतः खोने-खोने जैसे बिंदु पर पहुंच गयी? बाहर-बाहर से तो ऐसा नहीं लगता है। वे ही खेत-पात हैं, वे ही बाग-बगीचे हैं। वही छानी-छप्पर, जिस पर लौकियां चढ़ीं, सांझ-सवेरे उठता धुआं, कच्ची-पक्की बखरियां, धूल-धक्कड़ में खेलते नंग-घड़ंग लड़के, फटी बिवाइयों वाले नंगे पांव, माटी के लोग, बांस की लाठियां, बैल-बछिया, काली चौरा, डीह बाबा और चमरटोल ... सब तो वही है। तब वह क्या कि हम कहते हैं, उसकी पहचान खो गयी है? क्या है उसकी अपनी वास्तविक पहचान? क्या है उसका स्वभाव? मामला भीतर का है। स्वभाव की थाह लगाना बाहर से असंभव है, व्यक्ति के भी और गांव के भी। गांव के भीतर जो गांव है, गांव का भाव है वही, ठीक वही, एकदम आंतरिक, उसके खून में रचा-बसा उसकी संस्कृति-उसी के सहारे उसकी पहचान की पड़ताल हो सकती है। जिसमें गांव का आदमी अपने लिए नहीं, पूरे गांव के लिए जीता होता है। कदम-कदम पर कोई क्या कहेगा का अंतरानुशासन होता है। लोक-लाज, भाईचारा, हुक्का-पानी, अतिथि-सत्कार, भजन-रामायन, सामाजिक मर्यादा का भाव आदि के साथ लोक-कथा, लोकगीत और लोक-परंपरा नियंत्रित एक सहज-प्रवाही जीवन होता है तथा होता है की भाषा में और भी बहुत कुछ होता है, होता आया है। बाप-दादे से, स्वतः - स्फूर्त, अनियंत्रित। उसकी लीक इतनी गहरी है कि अलीक होकर भी लगता है, बना हुआ है। सब कुछ खत्म हो जाने के बाद भी लगता है, सब कुछ बना है। कठिन है

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