Sunday, March 30, 2008

शहर को डर है

- डॉ० तारिक असलम
सुबह हो गई है। सड़कों, गलियों और मुहल्लों में लोगों का आना-जाना शुरू हो गया है। लोग अपने आस-पड़ौस के लोगों से बोल-बतिया रहे हैं। अपनी दिनचर्या की चर्चाएँ कर रहे हैं। जिंदगी बिल्कुल सामान्य दिख रही है।
अमर घर से निकलकर मुख्य सड़क मार्ग पर आकर खड़ा होता है, उसे माटाडोर की प्रतीक्षा है, यद्यपि उसके आसपास दो थ्री व्हीलर चक्कर काटते हुए बैठने का इशारा करते हैं और एक कहता है, ''बस। साहब जी। एक और पैसेंजर आ जाए तो चल दूंगा। आप जान ही रहे हैं पैट्रोल कितना महंगा हो गया है। एक सवारी लेकर चलने की हिम्मत नहीं होती, जाने आगे कोई पैसेंजर मिलेगा भी या नहीं? फिर माटाडोर वाले आगे आकर उठा लेते हैं सबको।''
उस थ्री व्हीलर चालक की बातों को अनसुना करते हुए, वह बराबर पश्चिम दिशा की ओर देखता रहा, जिधर से सवारी गाड़िया आती थीं। उसे कोई जल्दी नहीं थी, फिर वह भी अपने एक रुपये अधिक व्यय करने का इच्छुक नहीं था। माटाडोर वाले एक तो कम ही मोड़ों और चौराहों पर रुकते थे, दूसरे फुलवारी शरीफ इमली मोड़ से भाड़ा भी एक रुपये कम लेते थे। आखिरकार, एक गाड़ी आ ही गई। वह शट से अन्दर घुस गया।
दिन के ग्यारह बज चुके थे, फिर भी दुकानें बन्द थीं और ठेले पर यहाँ-वहाँ सामान बेचने वाले भी नदारद थे। चलो, उनकी मर्जी उसे उनसे कुछ खरीदना है ही नहीं फिर चिंता क्यों? ऐसे भी स्साले डंडी मारने में काफी माहिर हैं। पैसे पूरे दो या कम। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। सबसे बड़ा धोखा यह होता है। आप सेब हो या अमरूद चुनकर देते हैं और लिफाफा घर ले जाकर खोलते हैं तो माथा पिट लेते हैं। वे चीजें अधिकतर सड़ी गली निकलती हैं। जिसके के शिकार बनते हैं। आमतौर से गरीब और देहाती लोग। ''अचानक उसे याद आता है? इन बातों से उसे क्या लेना? उसे तो फिर गाड़ी बदलनी है, ''साब, जी जीपीओ स्टैंड आ गया? आप उतरेंगे नहीं था?'' चालक ने मुड़कर कहा तो वह उतरकर नीचे खड़ा हो गया। उसे पैसे दिये और महावीर मंदिर मोड़ की ओर पैदल ही चल पड़ा। एएक बार फिर वह थ्री व्हीलर पर ड्राइवर की सीट के बगल में बैठा था। दरअसल, उसे अपने साथ बैठने का इशारा उसी ने किया था। वह बैठ भी गया किन्तु यह कहने से नहीं चूका, ''भाई मेरे, जब भाड़ा बढ़ाना होता है तो तेल की महंगाई का रोना लेकर बैठ जाते हो। कमाई नहीं होती और न जाने क्या-क्या बहाने बनाते हुए। ट्रैफिक पुलिस की पकड़ धकड़ के नाम पर कुछ दिन आगे नहीं बिठाते किसी को, फिर वही पुराना धंधा चालू? इस बीच पैट्रोल का दाम घट भी जाय तो क्या फर्क पड़ता है। मारी जाती है जनता बेचारी। वह भी चारों तरफ से।'' अमर के ऐसा कहने पर ड्राइवर केवल मुस्कुरा कर रह गया, जबकि कई दूसरे लोगों ने सहमति व्यक्त की। जिन मार्ग से गाड़ी गुजरती गई। उन मार्गों पर भी अनेकानेक दुकानें पूर्णतया बन्द दिख रही थीं। सड़कों के कहीं किनारे तो कहीं बीचों-बीच कूड़े का अम्बार लगा था। सड़कों पर वाहनों और पैदल चलने वालों की तादाद भी कम दिख रही थी, अलबत्ता लवारिश कुत्ते, गाय और भैंसें पूरी न्मियता से कूड़ेदान के बाहर पड़े कचरे में मुंह मारने में जुटी थीं, जिससे उसकी भूख का अंदाजा लगाया जा सकता था।
जानवरों और पशुओं को यह सुविधाएं सभय और सुशिक्षित नागरिकों ने उपलब्ध करायी थी। आलीशान अपार्टमेंट और इन्कलेव और एन्कलेव से निकल कर अपने कमरों का कचरा कूड़ेदान में डालने की बजाये बाहर ही फैंक कर जा चुके थे। जब साब और ममेसाब कचरे को सड़क पर डालते मिलेंगे, फिर भला नौकर-चाकर क्यों सही जगह पर डालेंगे? यही सोचता हुआ वह वाहन से उतरकर प्रेस की ओर चल दिया।
नाला रोड मोड़ पर ढेर सारी गाड़ियां खड़ी थीं किन्तु वहां पर भी चहलपहल कम थी। कई एक चालक अपनी गाड़ियों के बीच वाली सीट पर उकडू लेते थे। सवारियां भी कम तादाद में पहुंच रही थीं। वहां भी एक ओर कूड़े का ढेर का उसने सामना किया, फिर वह आर्य कुमार रोड की ओर मुड़ गया। अब उसकी नजरों के समक्ष नगर निगम कार्यालय के अलावा सफाई कर्मियों की बस्ती थी, जिसके अगल बगल में आलीशान इमारतें खड़ी थीं और सड़कों पर सूअरों का जमावड़ा था। एक बड़े क्षेत्रा में नाले की सड़ांध वाली गंदगी पसरी थी और उस गन्दे पानी के ऊपर से लोगों का आवागमन जारी था।
''यह है हमारी राजधानी'' उसके मुंह से अचानक निकला - उसने जब से होश संभाला था। इन दृश्यों में रत्ती भर फर्क नहीं देखा था उसने। सिवाये इसके शहर के कुछ एक हिस्से की सड़कें चौड़ी हो गई थीं। कुछ एक स्थानों पर लम्बे-चौड़े पुल बन गए थे। मगर शहर के हृदयस्थली की गंदगी कभी दूर नहीं हो पायी।
अमर ने प्रेस कार्यालय में कदम रखा तो उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि स्वामी जी उपस्थित थे। प्रेस के अन्य स्टाफ नदारद थे और हॉल में पूरी तरह खामोशी व्याप्त थी। ''क्या बात है स्वामी जी? आफिस में कामधाम नहीं हो रहा है? मेरे काम का क्या हुआ? सब ठीकठाक तो है ना?
''सर जी। आपको पता नहीं है क्या? आज माले वालों ने बन्द का आयोजन किया है। इसलिए कोई नहीं आया काम पर? पर आपका काम हो गया है।''
''फिर आप क्यों आफिस खोलकर बैठे हुए हैं?''
''यह स्थान सुरक्षित है सर जी। जो लोग रंगदारी लेते हैं? वे किस दिन हमें सुरवा देंगे? आपने देखा नहीं न?... जरा खिड़की से बाहर झांक कर देखिए। कई छोकरे बैठे हुए हैं सबकी खबर लेने के लिए। इधर कोई बन्द कराने नहीं आने वाला।'' यह कहते हुए एक विचित्रा से सुखानुभूति अनुभव की स्वामी जी ने। ''तो अब जनता के जानो माल की रक्षा रंगदार और शोहदे करेंगे स्वामी जी। और हत्यारे - लुटेरे अपने बचाव के लिए चुनाव लड़ेंगे, जीतेंगे या यो कहें कि लोग ही उसकी जीत को पक्की करेंगे और उनकी सुरक्षा का भार पुलिस वाले उठायेंगे? स्वामी जी ऐसी न्यायिक व्यवस्था तो किसी और देश में नहीं उपलब्ध हो सकेगा? जहां संवैधानिक नियम कानून ही इतना लचर दिखता हो। जहां कोई अपराधी राजनीति में सफलता पाने के बाद अपने आरोपों को रफा दफा करने में सक्षमता प्रदर्शित कर पाये?''
अमर के इस तल्ख टिप्पणी पर स्वामी जी मुस्कुराये फिर निश्चल हंसी बिखरते हुए कहने लगे, ''आपको देश की चिंता है सर जी। आप लिखने-पढ़ने वाले आदमी हैं, मगर जब तक आम आदमी को यह सब समग्र में नहीं आएगा? इस देश का भविष्य नहीं सुधरने वाला है। मैं तो यही कह सकता हू... यह रही आपकी छपी सामग्री... यह कहते हुए उन्होंने एक पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। ऊसर ने रुपये दिये और बाहर आ गया। जहां पूरे इलाके में प्रेस वर्क जोर-शोर से चल रहा था।
एक बार फिर वह नाला रोड मोड़ चौराहे पर खड़ा था। उसे लगा कि एक थ्री व्हीलर में कुछ सवारियां बैठी हैं, इसलिए वह भी बीच की किनारे वाली सीट पर जा बैठा। उसका बैठना था कि एक सवारी धीरे से उतर गई। तब उसे समझ में आया कि वह भी किसी वाहन का चालक है जो महज पब्लिक को फांसने के लिए बैठा था कि दूसरे यही समझें। उस गाड़ी की सवारियां पूरी हो गई हैं, किन्तु सच्चाई यह थी कि उस गाड़ी में बैठने वाला अमर एकमात्रा यात्री था... उसे यह अनुभव बड़ा कष्टप्रद लगा। उसे कोफ्त हुई। ''लगता है एक आध घंटे बैठने पड़ेंगे?'' वह मन ही मन बुदबुदाया। पास ही खड़े चालक के कानों में आवाज पहुंची। उसने पूछा, ''सर कुछ कहा आपने?'' ''नहीं। मगर तुम लोग इस तरह बैठे थे कि में धोखा खा गया? यह अच्छी बात नहीं है? अब न जाने और कितनी देर प्रतीक्षा करवाओगे?''
''बस। एक दो सवारी आते ही चल दूंगा... आज तो मालिक का खर्चा भी नहीं निकल पाएगा। पांच बजे के बाद कुछ लोग निकलेंगे तो एक दो चक्कर डालूंगा नहीं तो गैराज में ले जाकर गाड़ी खड़ी कर दूंगा। यह रोज-रोज के रेले, हड़ताल, बन्द ने तो पेट पर पत्थर बांधने को मजबूर कर दिया है। हमको कोई शौक है? आपको यों बैठायें रखूं? मगर सर। हम भी क्या करें?'' उसने अपनी सीख प्रकट की। उसे लगा यह तो पहले से ही दुखी लगता है, चलो चुपचाप बैठे रहो...।
कुछ मिनटों के बाद एक बुजुर्ग किस्म के व्यक्ति आये। ''भई पटना जंक्शन ही जाओगे न? ''कहते हुए बगल की सीट पर बैठ गए।
''आपको कहां जाना है?'' उस बूढ़े व्यक्ति ने अमर से समय काटने की गर्ज से पूछा। ''जहां आप जाना चाहते हैं?'' उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
कुछ पल की खामोशी के बाद, ''मुझे क्या पता था कि आज पटना बंद का किसी ने आयोजन किया है? में कल ही औरंगाबाद से आया हूं अपनी आंख दिखाने लोगों ने कहा। आज तो सब कुछ बंद होगा, फिर भी वह जगह देख लेना चाहता हूं, इसलिए किदवईपुरी जाना चाहता हूं। यह देखिये पता है मेरे पास।'' यह कहते हुए उस व्यक्ति ने एक पर्ची निकालकर दिखाई। उस पर एक चर्चित नेत्रा रोग विशेषज्ञ का पता दर्ज था। अमर ने वह पर्ची उनकी ओर बढ़ा दी तो पूछने लगे, ''आप इधर के ही रहने वाले हैं क्या?''
''नहीं इधर तो में कुछ काम से आया था।''
''आपको तो पता होगा कि इधर आसपास में आंख के कौन से अच्छे डाक्टर हैं?''
''मैं एक ही ऐसे डाक्टर को जानता हूं, जिस पर मेरा पूरा परिवार की बात करता है। वह कमलकान्त ठाकुर हैं। तीन नम्बर रोड में उनका क्लीनिक है। रोगियों को समय देते हैं। उनकी परेशानियां भी सुनते हैं। भले आदमी हैं। अमर ने अपनी जानकारी और विश्वास के आधार पर उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया। किन्तु उनके इस प्रश्न ने उसे झिंझोड़कर रख दिया, ''यह किस जाति के हैं? आपको तो यह मालूम होगा?'' उसने कातर दृष्टि से उस वृद्ध व्यक्ति के चेहरे को देखा।
''जी। यह जाति के हजाम हैं? क्या हजाम अच्छे डाक्टर नहीं बन सकते?'' उसके इस प्रश्न पर व्यक्ति कुछ सकसकाया, जैसे उसकी चापेरी जग जाहिर हो गई हो। ''नहीं.....नहीं.....ऐसी कोई विचारधारा नहीं है। मैं जातपात में विश्वास नहीं करता, बस यों ही पूछ लिया। अब तो यही लोग हर जगह आगे हैं।'' यह बताते हुए उस व्यक्ति की आवाज धीमी पड़ती गई। जैसे आवाज गले में घुटकर रह जाय। चेहरे पर कुछ निराशा के भाव उभर आये थे। उसे यथास्थिति समझते देर नहीं लगी।
कुछ क्षणों की गहरी चुप्पी के उपरान्त वह फिर बतियाने के मुड में आ गये। ''सरकार को ऐसे बंद के आयोजनों पर कठोरतापूर्वक रोक लगानी चाहिए। इससे कितने लोगों को दो वक्त की रोजी रोटी छिन जाती है। कितने लोग अपने स्थान पर पहुंचने से वंचित रह जाते हैं। कारोबार ठप्प हो जाता है। कितने लोगों को समय पर इलाज संभव नहीं हो पाता। वे जान से हाथ धो पैठते हैं। दवा की दुकानें तक नहीं खुली हैं। वे अपनी कठिनाइयों को दृष्टिगत रखते हुए कहते गए।
बाबा। दुकानें लोग अपने जान-माल की सुरक्षा को ध्यान में रखकर कर देते हैं। आज से चालीस वर्ष पहले भी बंद के आयोजन होते थे, तब लोग बड़ी शालीनता से कह जाते। अब तो बंद कराने के नाम पर मारामारी और लूटपाट शुरू हो जाता है। दुकानदारों से कई दूसरे हिसाब भी चुकाये जाते हैं, जोकि उसने मुफ्त में दवा क्यों नहीं दी? रंगदारी क्यों नहीं चूकता किया? नेताजी ने यहां पैरवी क्यों करने गया? पूजा या दूसरे उत्सवों के अवसर पर मन मर्जी के अनुसार चंदा देने से क्यों इंकार किया? ऐसी स्थिति में लोग बंद नहीं करेंगे तो फिर क्या करेंगे?'' वह एक ही सांस में सब कुछ कह गया था।
''बाबा उसकी ओर देखते रहे, सब सुनते रहे।'' सरकार और प्रशासन चाहे तो इन स्थितियों पर नियंत्रण पा सकती है। उसके लिए क्या कठिन है...।''
''बहुत कठिन है बाबा प्रशासन के लिए ऐसा करना। यदि पुलिस वाले ऐसे मामलों में न्याय देने लगें तो उनकी गर्दन नापने की मुहिम राजनेता शुरू कर देते हैं और उसे उत्तरदायित्व से मुक्त कर विद्यालय के किसी अप्रभावी विभाग की कमान थमा दी जाती है। ऐसे अनेक जिला अधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक शहर में आये और अपनी निष्पक्ष छवि के लिए जनता के बीच चर्चित होने लगे। उन्हें स्थानान्तरण की मार खेलनी पड़ी। कुछ ने अपनी गतिशील वैचारिकता की ऊर्जा को बनाये रखने के सरकारी उच्च पदों से इस्तीफा तक दे दिया, क्योंकि वे नेताओं के जाहिलपन को पचा पाने में सर्वथा असमर्थ सिद्ध हुए थे।''
आप तो बहुत कुछ जानते हैं। अपने शहर के बारे में। अच्छा लगा आपसे बातें करके। अब वह वृद्ध व्यक्ति आश्वस्त दिखने लगा था न जाने क्यों? शायद वह सोच रहा हो। कोई गलत आदमी तो उसकी बगल में नहीं बैठा हुआ है?
इस बीच थ्री वहीलर स्टैंड से चल पड़ी थी। एक बड़ी सी ''स्वीट हाउस'' पर उनकी दृष्टि पड़ी, बोल पड़े, ''इसकी हिम्मत देखिए। कैसी दुकान खोल रखी है?''
यह सुनकर अमर हंसने लगा, ''बाबा यह दुकान किसी नेताजी की, उनके परिवार की या फिर किसी बड़े पहुंच वाले की होगी और नहीं तो बेचारे समय पर रंगदारी टेक्स जमा कर देते होंगे। डर के मारे आम आदमी तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।''
''आपकी बात जंचती है। ठीक ही कहा आपने।''
''बाबा आपने संभवतः समाचार पत्रा में पढ़ा हो। शिल्पी हत्या कांड के बारे में। उसकी सच्चाई किसे नहीं मालूम? राजनेता, पुलिस, प्रशासन और छुटभैये नेता सब की मिली भगत का ही परिणाम है कि केस किसी नतीजेर पर नहीं पहुंची। मेरी समय से न्यायालय को भी सब कुछ पता है, इसलिए जब तक कठोर टिप्पणियां करती है..... किन्तु वह कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर सकती तो नतीजा शून्य ही निकलता है। यहां रोज ही अपहरण, हत्या, गेंगवार, डकैती, बलात्कार होते हैं, पर क्या फर्क पड़ता है किसी को? महज अखबार की एक खबर बनकर रह जाती हैं घटनाएं। अभी हाल में ही एक दुकान में चकाचौंध रोशनी से भरे, भीड़ भरे बाजार की एक दुकान में गुंडों ने घुस कर महिला सेल्समेन से सामूहिक बलात्कार किया। उनको कई लोगों ने पहचाना पर जुबान बंद रखी, क्योंकि यह क्षतिग्रस्त या अस्त व्यस्त नहीं हुए थे, फिर चिंता की कोई बात ही नहीं बनती....। बाबा हम ने प्रगति की जो सीढ़ियां चढ़ी हैं ना। यह देशी नहीं बल्कि विदेशी संसाधनों से बनी हैं। जिससे हम मर्याहत नहीं होते और ना ही संवेदनाओं में हलचल होती है। संज्ञाशून्य होकर रह गए हैं हम लोग।''
अमर की इस बात पर बाबा ने उसके काधे को थपथपाया। रुंआसे से हो गए। फिर भी कहा, ''धैर्य रखना है। एक न एक दिन स्थितियां अवश्य बदलेंगी। नहीं तो दुनिया इतनी नहीं बदलती.... यह परिवर्तन अभी और गहरा होगा... उसके लिए लड़का होगा, जैसे हम लड़े आजादी के लिए....'' और अमर के साथ ही वे भी उतर गये, थ्री व्हीलर स्टैंड में पहुंच चुकी थी। वह आगे बढ़ चुका था और बाबा उसे भीड़ में गुम होते हुए देखते रहे थे और न जाने किन विचारों में खो गए थे।
६/२, हारून नगर, फुलवारी शरीफ, पटना-८०१५०५

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