Saturday, March 15, 2008

खोज सूरज की

डॉ0 आलोक गुप्त
बड़ी विकलता थी
देखने की
सूरज को उगते हुए
कुछ तो ठीक से
सोये भी नहीं थे
जगा दिया गया था उन्हें भी
भिनसारे ही पहुँच गए थे
ईडरिया गढ़ पर
खोज कर रहेंगे
उगते सूरज को
देखेंगे कि
कैसे तोड़ता है वह
रात का इन्द्रजाल
कैसे-कैसे परिवर्तन होते हैं
क्षितिज में
पहली किरन के जादू को
देखना चाहते थे हम
खोज रहे थे ऐसी जगह
देख सकें जहाँ से
उगते हुए सूरज को
वह जो हमारे आँखों में था
देखना चाहते थे
उगते हुए
दौड़ रहे थे सभी साथी
कहीं देर न हो जाए
और सूरज निकल जाए
तभी दिखाई दिया
एक आदमी
चला जा रहा था
अपने में खोया हुआ
सुनो भाई!
हमने आवाज दी
सूरज किधर उगेगा
पता नहीं
उसने अच्छी तरह
सुना या नहीं
चलते-चलते ही बोला
पूरब में
नहीं रहा गया हमसे
हममें से एक
पूछ ही बैठा
पूरब किधर है
अब चौंकने की बारी उसकी थी
तभी पहाड़ी की ओर से
अचानक
हँस पड़ा सूरज
बिखराकर किरनीली हँसी
बोला -
खोज रहा था मैं भी तुम्हें
चलती रहती है
यह खोज
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