Friday, March 21, 2008

डॉ० असगर वजाहत से आशिक बालौत और मेराज अहमद की अन्तरंग बातचीत

मेराज अहमद : आपने लेखन कब प्रारम्भ किया और क्यों?
असगर वजाहत :देखिए लेखन कब प्रारम्भ किया ये तो बता सकता हूँ। मैंने लेखन चौंसठ-पैंसठ के आस-पास शुरू किया और क्यों शुरू किया ये सवाल थोड़ा टेढ़ा है। इसके कई कारण हो सकते है। शायद मेरा ख्याल ये हैं कि अभिव्यक्ति या अपनी बात कहने और जो कुछ हमारे आस-पास हो रहा है इसका एक तरह से विरोध करने का जो कलात्मक तरीका हो सकता है या लोगों के बदलने और लोगों के अन्दर कुछ इच्छाएँ जगाने की कोशिश की जा सकती है , उसके लिये लोग अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। इसके लिये मैंने लेखन को अपनाया तो शायद इसका यही कारण हो सकता है।
आशिक बालौत :जहाँ तक मेरी जानकारी है कि आपने लेखन काव्य रचना के माध्यम से किया फिर बाद में आप कहानी की तरफ झुके। इस सन्दर्भ में आप क्या कहना चाहेंगे?
असगर वजाहत :देखिए इस सन्दर्भ में यह कहना चाहूँगा कि काव्य रचना जो है वो कहानी की तुलना में कठिन काम है। कहा जाता है कि कविता करना अनंत पुण्य का फल है। यानि आपने बहुत पुण्य के काम किये हैं तभी आप कवि हो सकते हैं अन्यथा कवि नहीं हो सकते तो इसमें ये भी एक बात है कि कविता करना और वो भी अच्छी कविता करना किसी भी आदमी, किसी भी रचनाकार का एक बहुत बड़ा एम्बिशन होता है। उदाहरण के लिये पिछले दिनों नाटक के क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त व्यक्ति से पूछा गया कि ख्याति, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के बाद आपके मन में क्या इच्छा बची है जो पूरी नहीं है और आप चाहते हैं पूरी हो तो उन्होंने कहा, दरअसल मेरे मन में एक इच्छा बाकी है वह यह कि मैं कवि होना चाहता हूँ कविता करना चाहता हूँ। तो कविता एक इतनी बड़ी चुनौती है जिसको की शायद कुछ ही लोग स्वीकार करते हैं और उसके बाद उनके पास कोई रास्ता नहीं बचता है तो वो गद्य में आ जाते हैं, तो मेरे विचार से जो असल कवि है वो ही गद्यकार बनते हैं ।
आशिक बालौत :लेकिन कथाकार बनने के लिये भी बहुत व्यापक अनुभवों की जरूरत है?
असगर वजाहत :हाँ देखिए, ये एक तरह से अपनी-अपनी पसन्द, अपनी-अपनी च्वाइस, अपना एक तरह का टेम्परामेन्ट, अपना-अपना मिजाज होता है जिस के हिसाब से आदमी विधा को चुनता है। यह लोगों की अपनी-अपनी समझ अपनी-अपनी क्षमता पर निर्भर करता है। तो इसको इस रूप में देखा जा सकता है।
आशिक बालौत :आपने एक कहानीकार के रूप में अपनी पहचान बनाई फिर आप नाटक की ओर क्यों उन्मुख हुए?
असगर वजाहत :नहीं-नहीं ऐसा नहीं हुआ। मैंने नाटक और कहानी एक साथ लिखना शुरू किया। सन्‌ ६६-६७, में मेरा एक नाटक कल्पना में छपा। उसका नाम बेताज शहंशाह था। तो कहानी और नाटक का सिलसिला बराबर से चलता रहा। ये जरूर है कि नाटक मैंने काफी अन्तराल के बाद लिखे जैसे दो साल बाद और तीन साल के बाद और नाटक में यह होता भी है। क्योंकि नाटक आप लगातार नहीं लिख सकते हैं। अन्तराल उसमें जरूरी होता हैं।
आशिक बालौत :आज आप रचनात्मकता के ऊपर कौन से दबाव महसूस करते हैं। नाटक उन दबावों के विरूद्ध कितना सार्थक है?
असगर वजाहत :देखिए, दबाव से आपका अगर अभिप्राय ये है कि समाज में जो कुछ हो रहा है उसके बारे में कोई टिप्पणी करना। उसमें ये है कि निश्चित रूप से नाटक ही एक ऐसी विधा है जो सीधे लोगों से जुड़ी हुई है और नाटक के माध्यम से जो कुछ आप कहते हैं, वो सीधे लोगों तक पहुँचता है और कविता या कहानी की तुलना में उसके जो रिसपांसेज है, वो सीधे आते हैं। इसलिये आप देखेंगे कि जितना खतरा रंगकर्मियों के ऊपर रहता है उतना खतरा और किसी रचनाकार के ऊपर नहीं रहता। हत्यायें भी हुई हैं, मारे भी गये हैं, पीटे भी गये हैं। इसलिये कि वे लोगों से सीधे जाकर जूझते हैं। तो इस माने में नाटक जो है वो सीधी कार्यवाही करता है। जबकि कविता है, कहानी है, उपन्यास है जो बहुत ही अन्दर जाकर उस मानसिकता में बदलाव लाने की कोशिश करता है, जो बहुत ही कलात्मक और बहुत अदृश्य किस्म का होता है लेकिन होता है अवश्य।
आशिक बालौत :असगर साहब साम्प्रदायिकता को लेकर आपने जो कहानियाँ नाटक और नुक्कड नाटक लिखे हैं उन पर आरोप है कि नाटक फार्मूलाबद्धता से ग्रसित है। इस विषय में आप क्या कहना चाहेंगे?
असगर वजाहत :देखिए ऐसा तो मेरे ख्याल से नहीं है। उदाहरण के लिये मेरा जो नया नाटक है जिन लाहौर नहीं देख्याँ उसमें आप देखेंगे कि जितने फार्मूले होते हैं, उनमें से कोई फार्मूला उस पर लागू नहीं होता और उसमें धर्म के ऐसे रूपों की चर्चा की गयी है जो मानवीय हैं यानी धर्म के माध्यम से साम्प्रदायिकता की चुनौती का सामना करना, ये तो फार्मूला नहीं है।
आशिक बालौत :लेकिन कुछ नाटक में सीधे-सीधे साम्प्रदायिक दंगे कुछ राजनीतिक कराते हैं जबकि हमें लगता है कि साम्प्रदायिकता की जड़ें कहीं गहरी हैं?
असगर वजाहत :देखिए ऐसा है कि रचना में अगर ये कोशिश करें कि पूरे सत्य की तलाश की जाये तो यह सम्भव नहीं है तो उसमें रचना बिल्कुल बिगड़ जायेगी। देखिए, आप को बताऊँ दंगा साम्प्रदायिक लोग नहीं कराते नेता नहीं कराते बल्कि शासक कराते हैं शासक भी नहीं कराते बल्कि उसको मल्टीनेशनल कराते हैं। मल्टीनेशनल भी नहीं साम्राज्यवादी कराते हैं तो अब आप ऐसा नाटक लिखिए जिसमें साम्प्रदायिकता पर सब बातें आते-आते आ जायें कि साहब अमरीकी साम्राज्यवाद दरअसल इसके लिये जिम्मेदार हैं। लेख में कहिए, लेख लिखिए, लेकिन रचना के माध्यम से उतनी बात नहीं आ सकती है। मेरा ख्याल है कि रचना से लोग बहुत उम्मीद करते हैं। जैसे एक रचना से उम्मीद करते हैं कि वह सबके बारे में सब कुछ बता दे, तो वह रचना न हुई ये हो गयी हर सोल्यूशन का हल रचना ऐसा नहीं करती रचना आप को संकेत देती है। उसके बाद लोगों की समझ को विकसित करने का काम तो और तरीकों से भी होता है। आप भाषण दीजिए। लेख लिखिए। जाइये समझाइये साम्प्रदायिकता के बहुत से पहलुओं को स्पष्ट कीजिए ये सारा काम है जो सब रचना कैसे कर देगी।
आशिक बालौत :साम्प्रदायिकता पर आज कल बहुत कुछ लिखा जा रहा है लेकिन कुछ रचनाओं को छोड़कर हम दोनों वर्गों को लाते हैं पंडित आयेगा, तो मुल्ला आयेगा हिन्दू ज्यादती करेगा तो मुसलमान करेगा। मेरठ में दंगा हो रहा मुसलमान बस्ती में हो रहा है हिन्दुओं के घरों पर हमला हो रहा है, तो ज+रूरी नहीं कि वहाँ हिन्दू भी दंगे में शामिल हो रहे हैं। वास्तव में क्या सच्चाई नहीं अभिव्यक्त की जा सकती है? उपन्यास है 'शहर में कर्फ्यू' उसमें एक पक्ष को लिया गया है, जो दंगों में सम्मिलित है। रचनाकार इसी तरीके से लिखे तो उसकी ईमानदारी और निर्पेक्षता में क्या बाधा आयेगी?
असगर वजाहत :देखिए, ऐसा है कि साम्प्रदायिकता जो है कि निश्चित रूप से दो सम्प्रदायों के बीच का जो तनाव है उसके कारण उत्पन्न होती है, कम तनाव को हम किस तरह किस रूप में कैसे हम सामने लायें? अगर हम मान लीजिए कि ऐसी रचना लिखते हैं कि जिसमें यह होता है कि, साम्प्रदायिकता जो है वह स्वतः जनित है। इसको किसी ने पैदा नहीं किया है । एक कम्युनिटी साम्प्रदायिक गिरफ्त में आ गई। निश्चित रूप से ऐसा तो नहीं है। मान लीजिए आज भारत में कई सम्प्रदाय न होते तब साम्प्रदायिकता का रूप क्या होता तो शायद जातियों के बीच में हो उनके भी कुछ निहित स्वार्थी लोग होंगे जो दो कम्युनिटी होंगे और एक दूसरे की साम्प्रदायिकता को भड़काएँगे और बढ़ाएगें। जब आप उसको समग्रता में देखते हैं तो निश्चित रूप से ये आवश्यकता पड़ती है कि आप समग्र रूप से चित्र दें। ये अलग-अलग रचनाओं पर निर्भर करता है कि उनके कथानक की माँग क्या है? लेकिन निश्चित रूप से ये है कि साम्प्रदायिकता के बारे में अगर आप जो लिखे तो फार्मूला बन्द नहीं होना चाहिए लेकिन यह भी होना चाहिए कि उसका निश्चित स्वरूप क्या है।
मेराज अहमद : साहित्यकार साम्प्रदायिकता के विरूद्ध तमाम मोर्चो पर कार्यरत है, जैसे सेमीनारों और मीटिंग, भाषणों इत्यादि के द्वारा, लेकिन हम देखते हैं कि नुक्कड़ नाटकों के अतिरिक्त अब भी जनसाधारण जो साम्प्रदायिकता से सर्वाधिक प्रभावित है वही उनसे नहीं जुड़ पाता तो फिर इसकी क्या उपयोगिता या क्या सार्थकता है?
असगर वजाहत :देखिए उपयोगिता तो ये है कि कोई भी विचार जनमानस से ही शुरू नहीं होते, जैसे राष्ट्रीय आन्दोलन को लें तो उनमें बडे सेठ थे बैरिस्टर थे कान्फ्रेस होटल में होती हैं लेकिन उसके बाद जन साधारण कांग्रेस में जाने लगा तो साम्प्रदायिकता के बारे में जो आज आपको लगता है वह है नहीं, विरोध बुद्धिजीवियों से शुरू होकर जनता तक जायेगा और ये प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी है। इस तरह से लोग अब पब्लिक मीटिंग भी कर रहे हैं। रामचरित मानस के ऊपर सी.पी.आई. वालों ने एक बड़ी मीटिंग कराई। जलसये मीलादुन्न नबी कराया कुछ प्रगतिशील लोग हैं इस आन्दोलन को लोगों के बीच लाने के प्रयास शुरू होकर। मार्च ले लीजिए। शबाना आज+मी और स्वामी अग्निवेश मार्च कर रहे हैं ये लोग धीरे-धीरे जनता तक पहुँचेगे। एक दिन में काम नहीं हो सकता।
आशिक बालौत :असगर साहब आजकल जो कहानियाँ लिखी जा रही हैं। इनमें व्यापक यथार्थ की झलक नहीं मिलती। विशेष रूप से जो कहानियाँ रचनाएँ ग्रामीण जीवन से सम्बन्धित है? क्या हमारा रचनाकार अपनी जड़ों से कटा हुआ भी है?
असगर वजाहत :देखिए ऐसा है इस पर तो आप को उदाहरण देने पडेगे और वो कहानियाँ मुझे भी पढ़नी होंगी और आप को भी पढ़नी होंगी।
आशिक बालौत :जो गाँव पर अधिकांश कहानियाँ लिखी जा रही हैं वह बहुत सतही कहानियाँ हैं जैसे अब से पहले प्रेमचन्द, शिव प्रसाद सिंह, भैरव प्रसाद गुप्त, शेखर और नागार्जुन तथा रेणु लिख रहे थे। आज जो लिख रहे थे इनका गाँव से जुड़ाव वैसा नहीं है ?
असगर वजाहत :पुन्नी सिंह ने आदिवासी के जीवन पर अच्छी कहानियाँ लिखी हैं। या मिथिलेश ने गाँव के ऊपर लिखा है और बहुत से राजस्थान के लेखक हैं जो गाँव के ऊपर लिख रहे हैं। फिर ऐसा आज कल दबाव भी नहीं है। आप शहर पर या गाँव पर कहानियाँ लिखें आप किसी भी विषय पर कहानियाँ लिख सकते हैं कहानी अच्छी होनी चाहिए।
आशिक बालौत :शहरी मध्यवर्ग पर भी इतनी अच्छी नहीं लिखी जा रही हैं जैसे हमारे नये कहानी आन्दोलन के कहानीकार लिख रहे थे। जितनी मजबूत उनकी पकड़ थी अब नहीं है। आप हंस ही जैसे कि देख लें चार कहानियों के अतिरिक्त पिछले तीन चार वर्षों में बहुत क्या है?
असगर वजाहत :देखिए हंस से हिन्दी कहानी के बारे में नहीं पता लगा सकते। उनके दूसरे दबाव हैं व्यावसायिक दबाव होते हैं पत्रिका को बिकना भी है। लोगों को पंसद भी आये तो हंस से आप ये अनुमान नहीं लगा सकते। और सारी पत्रिकाओं को भी शामिल करना पडेगा तब ये पता चलेगा कि शहर के जीवन पर कैसी कहानियाँ लिखी जा रही हैं। पहले सवाल क्या आपका था?
आशिक बालौत :गाँव के जीवन पर जो कहानियाँ लिखी जा रही हैं उसमें व्यापक यथार्थ नहीं आ पाता है?
असगर वजाहत :नई कहानी के दौरान भी रेणु ने गाँव पर बहुत अच्छी कहानियाँ लिखी। उसके बाद ये है कि मार्कण्डेय ने भी बहुत अच्छी कहानियाँ लिखीं। वह सवाल ये है कि जिसे गाँव का अनुभव है वो गाँव पर अच्छी कहानियाँ लिखेगा और जिसको अनुभव नहीं है वह घटिया कहानी ही लिखेगा। इसमें ऐसी कोई बात नहीं है।
मेराज अहमद : मेरा सवाल है कि जितनी भी कहानियाँ हैं हिन्दी में वे या तो ग्रामीण क्षेत्र को लेकर या मध्यवर्ग को लेकर लिखी जा रही हैं। जबकि हमारे जीवन का अनुभव क्षेत्र और भी है। जैसे सैनिक हैं, पायलट है, वैज्ञानिक या रेलवे का कर्मचारी है। इनका भी एक न एक संसार है तो इनसे सम्बन्धित कहानियाँ क्यों नहीं लिखी जा रही हैं?
असगर वजाहत :देखिए, अभी एक उपन्यास आया शिखर और सीमाएँ। वो जो बार्डर रोड बनाते हैं उनके ऊपर लिखा गया है। कोयला खद्यान पर भी अच्छी कहानियाँ लिखीं गई हैं।
मेराज अहमद : और जो विषय हैं, जैसे साईन्स, कम्प्यूटर, इनके बारे में नहीं लिखा जा रहा है। जिससे कि हमारी जानकारी में वृद्धि हो। बस यही मध्य वर्ग और उनकी परेशानियाँ और शोषण बस ?
असगर वजाहत :कहानी का माध्यम है उसका पूरा अनुभव क्षेत्र बढ़ रहा है, लेकिन ये बात जरूर है कि जिस रफ्तार से आप चाहते होंगे उस रफ्तार से नहीं बढ़ रहा है। क्योंकि आज जो हिन्दी के लिखने वाले हैं आप ये देखिए कि वो कहाँ कहाँ रहते हैं। अब से पचास साल पहले देखिए तो आपको लगेगा कि दो शहर थे बनारस या इलाहाबाद और लखनऊ था और तीन-चार शहर थे जहाँ हिन्दी लेखक था। आज हिन्दी लेखक राजस्थान के किसी धुर इलाके में रहता है। तो निश्चित रूप से जहाँ वो रहता है वहाँ की परिवेश आयेगा। जैसे आप स्वयं प्रकाश की कहानियाँ पढ़ें संजीव की कहानियाँ और उपन्यास पढ़िये ये जो आपको बताया शिखर और सीमाएँ। मतलब जो विषय हिन्दी कहानी उपन्यास में नहीं आये वो अब आने शुरू हो गये हैं।
मेराज अहमद : हिन्दी भाषा के अध्ययन और अध्यापन में या बहुत हुआ तो पत्रकारिता से जुड़े हुए लोग ही हिन्दी साहित्य क्षेत्र में हैं। जबकि और भी बहुत से पेशे हैं जैसे समाज विज्ञान, राजनीति, तकनीकी का इससे जुडे हुए लोग साहित्य में क्यों नहीं आये और हिन्दी साहित्य पढ़ा भी नहीं जा रहा है?
असगर वजाहत :इसका तो यह है कि हिन्दी-प्रदेश का जो सांस्कृतिक और साहित्यिक स्तर है वो बड़ा निम्न है। आज मराठी या बंगला से हिन्दी की तुलना करें तो इसकी स्थिति बड़ी दयनीय है। यदि आप किसी गुजराती परिवार के यहाँ जायें जिसको साहित्य से कुछ नहीं लेना-देना है उसके घर भी पुस्तकें मिलेंगी। लेकिन हिन्दी-प्रदेश में आप किसी डॉक्टर या इंजीनियर के यहाँ जायें तो आपको एक भी हिन्दी की पुस्तक नहीं मिलेगी। तो पूरा सांस्कृतिक परिवेश इतना कमजोर है इस कारण लोगों का ये रूचि नहीं है। और जब रूचि नहीं है तो निश्चित रूप से इसमें लिखने का कोई सवाल ही नहीं पैदा होता।
मेराज अहमद : इसमें भाषा की समस्या भी रेखांकित की जा सकती है। जैसे यहाँ का इंजीनियरिंग और टैक्नोलोजी का आदमी है तो वह भाषा के ऐतबार से बहुत परिपक्व नहीं होता। न वह अंग्रेजी बहुत अच्छी जानता, न हिन्दी अच्छी जानता क्या यह कारण नहीं हो सकता कि भाषा की ही कमी हो इसमें?
असगर वजाहत :बंगाल में इंजीनियर, डॉक्टर कितनी भाषा पढ़ता है। लेकिन उसके घर में साहित्य है। यह वातावरण पर निर्भर करता है कि भाषा का संस्कार कैसा है।
मेराज अहमद : हिन्दी भाषा भाषी क्षेत्रों में जो सांस्कृतिक जड़ता है उसे तोड़ने के लिये आप सांस्कृतिक कर्मियों के सम्मुख अपना क्या कार्यक्रम रखेंगे?
असगर वजाहत :देखिए कार्यक्रम है खासतौर पर युवा लोगों के लिये जैसे कि आप लोग हैं या छात्र हैं तो छात्र जो हैं अपने तक सीमित ना रहे। अपने आस-पास निकलें और विविध प्रकार के सांस्कृतिक आंदोलन की शुरूआत करें। जो लोग ऐसे जिनकी साहित्य में रूचि नहीं है उनकी साहित्य में रूचि जगाने की कोशिश करें और पुस्तकें छापें, पत्रिकायें निकालें और जो विभिन्न स्तरों का साहित्य है उसे विभिन्न स्तरों के लोगों तक पहुँचायें। हमारे यहाँ संकट क्या है कि अगर आप मनोरंजन के लिये साहित्य हिन्दी में कुछ ढूँढें तो आपको नहीं मिलेगा। मिलेगा तो वो एक दम चीप टाईप का है या एक दम साहित्यिक। बीच का नहीं मिलेगा। तो ये जो बीच का गैप है उसको भरने की कोशिश की जाये और लोगों के बीच आप जायें और उनके अन्दर भाषा और साहित्य की भावनाओं को जगायें। तब ये काम हो सकता है। लेकिन ऐसा है कि हमारे प्रदेश में ऐसा नहीं हुआ, जैसे मान लीजिए कि मराठी लेखकों का एक सम्मेलन होता है तो वो इतना बड़ा सम्मेलन होता है कि हिन्दी के लेखकों में तो कभी भी इतने लोग जमा नहीं हुए। उसमें लाखों लोग जमा होते हैं। उसमें केवल साहित्यकार ही नहीं, तीन दिन का होता है। उसमें पुस्तक प्रदर्शनी होती है, नाटकों का प्रदर्शन होता है फिल्म शो होता है। साहित्यकारों के ऊपर बहसें होती हैं। तो वह एक बहुत बड़ा आयोजन है । कहानी भी पढ़ी जाती है कहने वाली परम्परा में। आप हिन्दी में कर सकते। अलीगढ़ में करिए।
आशिक बालौत :गोर्वचोध के पेरोस्त्राई का और ग्लास्तनोत के उदारवादी दृष्टिकोण के कारण सोवियत संघ और यूरोप के वामपंथी दलों को तेजी के साथ हुए परिवर्तनों के कारण कुछ लोगों का कहना है कि अब मार्क्सवाद असफल हो गया क्या वास्तव में मार्क्सवाद असफल हो गया। इस संदर्भ में आपका क्या दृष्टिकोण है?
असगर वजाहत :ऐसा है कि मेरे ख्याल से असफल नहीं हुआ बल्कि सफल हो गया। मेरा कहना उलटा है और सफल इस तरीके से हो गया है कि वहाँ मार्क्सवाद था ही नहीं, समाजवादी व्यवस्था थी ही नहीं। लोग उसके नाम पर एक व्यवस्था चला रहे थे और कह रहे थे कि वह समाजवाद है। जबकि वह वास्तव में समाजवाद था ही नहीं। जब वो समाजवाद था ही नहीं तो उसका असफल होना क्या सिद्ध करता है। तो इस तरह से जो छद्म मार्क्सवादी हैं वो असफल हो गये। तो ये मार्क्सवाद के लिये अच्छी बात है।
मेराज अहमद : आप जनवादी लेखक संघ की स्थापना के समय से उससे जुडे हुए हैं।इधर जनवादी लेखक संघ की गतिविधियाँ कुछ कम होती जा रही हैं और जो गोष्ठियाँ हो रही हैं वे उत्सवधर्मी अधिक हैं ऐसा कुछ लोगों का कहना है। इस संदर्भ में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
असगर वजाहत :देखिए, किसी भी आन्दोलन के इतिहास में उतार चढ़ाव आते रहते हैं और वे उतार चढ़ाव निश्चित रूप से सहज होते हैं। जिस चीज की स्थापना होती है, जैसे मान लीजिए एक बच्चा पैदा होता है शुरू-शुरू में आप बहुत उसकी देखभाल करते हैं छोटा भी होता है। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है वैसे-वैसे उसे आप आजाद छोड़ना शुरू कर देते हैं। आपको एक स्तर पर लगता है कि उसकी गतिविधियाँ कम हुई हैं, लेकिन दूसरे स्तर पर आप देखेंगे कि जो उसकी शाखाएँ हैं जहाँ-जहाँ उसका विस्तार हुआ है तो वह पहले नहीं था। पहले कम जगह था वह। अब बहुत जगह हो गया है वो। इस माने में देखें तो उसका फैलाव हुआ है। दूसरे माने में देखें तो निश्चित रूप से दस साल उसके पूरे हो गये है। तो दस साल में जो स्थिति होती है वह अपने पैरों के ऊपर खड़ा हो गया है और पैरों पर खडे हुए व्यक्ति की फ्रिक दूसरे लोग नहीं करते हैं। वह अपने आप चलना शुरू करता है। अब संगठन अपना स्वयं मोड लेगा। अपनी शक्ल स्वयं निर्धारित करेगा और चूँकि उससे इतने लोग जुडे हैं तो निश्चित रूप से वह बेहतर स्वरूप ग्रहण करेगा। इसलिये आशा की जानी चाहिए।
मेराज अहमद : आप फिल्म लेखन और टी.वी. से भी जुडे हुए हैं। क्या कारण है कि प्रायः हमारी फिल्में और टी.वी. सीरियल हमारे समाज की सही तस्वीर पेश करने में नाकाम हैं और न ही समाज को सही दिशा दे रहे हैं?
असगर वजाहत :ऐसा है कि फिल्मों का, टी.वी. सीरियलों का अधिकतर सीरियलों का जो उद्देश्य है वह एक तरह का व्यवसाय है। बिजनेस में जो प्राथमिकता दी जाती है वो ये कि लोगों को पसन्द आये। लोगों को पसंद आने के लिये ये आवश्यक है कि लोगों की जो रूचि है उससे उनको संतुष्ट हो सकें। जैसे आपने बचपन में ही प्रेम कहानियाँ पढ़ी हैं तो टी.वी. आप प्रेम कहानियाँ देंखेंगे तो आपको अच्छा लगेगा और वो आपको पंसद आयेगा। लेकिन अगर आपको प्रेम देखने को नहीं मिला तो आप कहेंगे कि कोई इसमें मजा ही नहीं आया। असफल रही। तो वो चाहे कितना ही अच्छा हो तो वो प्रायोजक की नजर में और व्यवसाय की नजर में असफल हो जायेगा। उसका आधार तो लोगों की रूचि से है। लोगों को रूचि बड़ी विकृत हो गई है। आप अमिताभ बच्चन की फिल्में देखेंगे तो वह यथार्थ से कहाँ जुड़ी मिलेंगी?
मेराज अहमद : फिल्म लेखन से एक सवाल और साहित्यकार विशेष रूप से हिन्दी साहित्यकार फिल्म लेखन को सम्मानजनक नजर से नहीं देखता ऐसा क्यों। क्या वाकई में सम्मानजनक नहीं या फिर कोई दूसरा कारण है?
असगर वजाहत :देखिए ऐसा है, चूँकि एक तो हमारी फिल्मों पर व्यावसायिकता पर दबाव है। ऐसे अवसर आपको नहीं मिले जो व्यवसायिकता के दबाव से मुक्त हों। कुछ फिल्म में बनाई हैं एन.एफ.डी.सी. ने, उसमें हिन्दी के बहुत अच्छे लेखक हैं निर्मल वर्मा, उन्होंने लिखा है । राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, और मोहन राकेश की कहानियाँ रेणु की कहानी। रेणु ने भी पटकथाएँ लिखीं ये सब लोग फिल्म लेखन से जुड़े। तो निश्चित रूप से हिन्दी लेखकों में ये धारणा होती कि ये निम्नकोटि की कोई की चीज है ये गलत है उससे न जुड़ें।
मेराज अहमद : जुड़ें तो वापिस चले आयें?
असगर वजाहत :सुनिये तो वापस आने से आपका क्या मतलब है? वह वहीं रह जायें। आपको पटकथा पसंद है तो लिखते हैं जैसे कि आप उपन्यास या नाटक लिखते हैं यह थोडे ही हैं कि आप प्रोफेशनल लेखक हो गये जैसे सलीम जावेद हैं। तो आप जायेंगे तो ये देखेंगे विशेष रूप यूरोप में बहुत से लेखक हैं जो अपने जीवन में एक दो पटकथाएँ ज+रूर लिखते है। अच्छा लगता है विषय तो लिख देते है। ऐसी बात नहीं कि हमको फिल्मों में ही लिखना है या फिल्म में जाकर रह जाना है उसको सहज रूप से लेते है। हमारे यहाँ बहुत स्वच्छन्द रूप से इसे इसलिये नहीं ले पाते कि व्यावसायिकता का दबाव है। सोचते हैं कि हम जायेंगे लिखने। आप जायेंगे क्यों। कोई बुलाये तो जाईये। न बुलाये तो न जाईये। अगर आपको विषय अच्छा लगता है तो लिखिए। न अच्छे लगे तो न लिखिए। दूसरी बात ये है कि अच्छा विषय है और आप लिखना चाहते हैं तो कोई गलत काम नहीं है।
आशिक बालौत :एक अन्तिम सवाल। आप साहित्य की सामाजिक भूमिका और उद्देश्य के संदर्भ में अपने विचार रखिए?
असगर वजाहत :आपने बड़ा लम्बा सवाल पूछ लिया। देखिए सामाजिक जिम्मेदारी तो समाज को ऊँचा उठाना है और सामाजिक भूमिका के बारे में एक कवि है नासिर काजमी उनका कहना ये था ''वो अस्पताल में लेटे हुए और मरने वाले थे उन्होंने टी.वी. रिपोर्टर से कहा-देखो कवि का काम क्या? शायर का काम क्या है? कलाकार का काम क्या है? ये कुछ उस आदमी के काम की तरह है जो रेलवे का फाटक खोलता और बन्द करता है। जब टे्रन जा रही होती है तो वह फाटक बन्द कर देता है कि टे्रफिक इधर से न गुजरें और जब टे्रन निकल जाती है तो वह फाटक खोल देता है। यही काम कलाकार करता है।'' उसको पता होना चाहिए कि कब फाटक खोलना बन्द करना चाहिए।

1 comment:

Sunil Deepak said...

असगर वजाहत जी से इस मुलाकात और दिलचस्प साक्षात्कार के लिए बहुत धन्यवाद.
सुनील