Thursday, March 13, 2008

हिन्दी-उर्दू कहानी : कितनी निकट कितनी दूर

शमोएल अहमद
आजादी की लड़ाई में उर्दू ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया लेकिन आजादी के बाद उर्दू अपने ही घर में पराई हो गयी, कारण यह कि पाकिस्तान में उर्दू को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया गया जिससे ये मुसलमानों की भाषा समझी गयी। उत्तर प्रदेश में जब इसे क्षेत्रीय भाषा का दरजा दिया जाने लगा तो नामवर सिंह को बासी भात में खुदा का साझा नजर आया। हैरत है कि वामपंथी सोच ऐसी भी हो सकती है? लेकिन जनवादी संगठन ने उर्दू के समर्थन में वक्तव्य जारी किये। बेचारी उर्दू जिसके गेसू पंडित रतन नाथ सरशार और ब्रज नारायण चकबस्त ने संवारे और बेदी और कृष्ण जिसकी जुल्फों के असीर हुए अपने ही मुल्क में पराई हो गयी। शायद कुछ ऐसे ही तत्त्व हैं कि उर्दू समाज असुरक्षा के भाव से ग्रसित हुआ। उर्दू रचनाकारों के अवचेतन में असुरक्षा का भाव आकाश में शब्द की तरह व्याप्त है लेकिन यही इनके सृजन का बिन्दु भी है और मूल स्रोत भी।
सन्‌ १९३० के दशक में उर्दू में रूमानवाद का दौर था। हिन्दी में भी कमोबेश यही स्थिति थी। सज्जाद जहीर और कुछ दोस्तों ने रूमानवाद से अपनी ऊब का इजहार किया और समाज की विसंगतियों को निशाना बनाते हुए नये शिल्प में तीखी कहानियाँ लिखीं और इन्हें 'अंगारे' के नाम से संकलित किया। अंगारे ने अंगारे का काम किया। सरकार ने इसकी प्रतियाँ जब्त की लेकिन तरक्की पसंद अदब की नींव पड़ गयी और उर्दू में समाजी हकीकत निगारी का दौर शुरू हुआ। १९३६ में प्रेमचंद की अध्यक्षता में तरक्की पसंदों का सम्मेलन हुआ और प्रेमचंद ने कहानी 'कफ़न' लिखी। सन्‌ ३५ के आसपास भुवनेश्वर ने अनूठे शिल्प में कहानी 'भेड़िये' लिखी जिसमें नई कहानी की तमाम संभावनाएँ मौजूद हैं। शैली रचनात्मक है और कहानी प्रतीक में चलती है। भेड़िया व्यवस्था के जब्र और अराजकता का प्रतीक है जिससे लड़ाई नस्ल दर नस्ल जारी रहती है। पहले बाप भेड़िये से लड़ते हुए उसका कोपभोजन बनता है और अब बेटा लड़ाई के लिए कमर कसता है। कहानी अभी भी प्रासंगिक है और इसे पढ़ते हुए नवीनता का एहसास होता है। भले ही कफ़न से कहानी में यथार्थवाद का दौर शुरू होता हो लेकिन नई कहानी तो भेड़िये से ही शुरू होती है। नयी कहानी पर विवेचन करते हुए राजेन्द्र यादव कहते हैं कि इसकी एक विशेषता ये है कि इसमें पात्रों के नाम नहीं होते! नाम के स्थान पर 'वो' से संकेत किया जाता है। मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि 'भेड़िये' में भी लड़ने वाले पात्र का नाम नहीं है। यहाँ भी 'वो' से संकेत किया गया है। एक जगह वो अगली पीढ़ी का संकेत है जिसे भेड़िये ने निगल लिया और कहानी के अंत में वो नई पीढ़ी का संकेत है जो लड़ाई जारी रखती है। अगर ये विशेषता नई कहानी की है तो स्वीकारना होगा कि हिन्दी की नई कहानी भेड़िये से शुरू होती है। भुवनेश्वर जवानी में ही गुजर गये इसलिए भी चर्चे में नहीं रहे।
स्वाधीनता के आस-पास हिन्दी और उर्दू में यथार्थवाद का दौर शुरू होता है जो रचनाकार उभरकर सामने आये उनकी सूची लम्बी है। कुछ पहले से भी लिख रहे थे, कुछ ने लिखना तर्क कर दिया। इस दौर में अहमद नदीम कासमी और यशपाल की पीढ़ी ने सामाजिक विसंगतियों की तरफ इशारा किया। यशपाल की कहानी 'धर्मयुद्ध', अहमद नदीम कासमी की 'जूते', विष्णु प्रभाकर की 'धरती अब भी घूम रही है', चन्द्रगुप्त विद्यालंकार की 'वापसी', सुहेल अजीम आबादी की 'अलाव', अली अब्बास हुसैनी की 'मेला घूमनी', अमृतलाल नागर की 'पढ़े-लिखे बराती', गुलाम अब्बास की 'आनन्दी', अमृतराय की 'गीली मिट्टी', भैरवप्रसाद गुप्त की 'चाय का प्याला', हसन असकरी की 'चाय की प्याली', रांगेय राघव की 'गदल', हयातुल्ला अंसारी की 'आख़िरी कोशिश' और बहुत-सी दूसरी कहानियों के नाम लिए जा सकते हैं। यहाँ हिन्दी और उर्दू कहानियाँ साथ-साथ चलती नजर आती हैं। जैनेन्द्र और मुमताज मुफ्ती की कहानियों का आधार मनोवैज्ञानिक रहा है। जैनेन्द्र तो प्रेमचंद के जमाने से ही लिख रहे थे। जैनेन्द्र और मुफ्ती के शिल्प में नवीनता थी। दोनों के यहाँ प्रेम और परिवार का मार्मिक चित्रण मिलता है। जैनेन्द्र की कहानी 'पत्नी' और मुफ्ती की 'आपा' में शिल्प की नवीनता देखी जा सकती है। बल्कि आपा तो इतनी मशहूर हुई कि मुफ्ती सारी उम्र आपा से दामन नहीं छुड़ा सके।
सन्‌ ५५ के करीब यानी छठे दशक के अंत में तरक्की पसंद अदब का असर फ़ीका पड़ने लगा और जदीदियत अंगड़ाईयाँ लेने लगी। नामवर सिंह ने भी हिन्दी में नयी कहानी की तलाश की। जदीदियत में समाज की जगह फर्द ने ले ली। फर्द, फर्द की जात, जात की तनहाई, तनहाई का कर्ब और कर्ब का इजहार जदीद कहानी का स्वर बना। कहानी से पात्र गायब होने लगे और घटना की जगह महसूसात ने ले ली और पात्र अपनी जात के खोल में सिमट गये। जदीद अफसाना निगारों ने भाषा और शिल्प के स्तर पर प्रयोग किये और कहानी को मूर्त्त शक्ल देने की कोशिश की। जदीदियत के दौर में उर्दू कहानी हिन्दी कहानी से अलग खड़ी नजर आती है।
जदीदियत का तनहा आदमी नामवर सिंह को निर्मल वर्मा की कहानियों में नजर आया। निर्मल वर्मा की कहानी 'परिन्दे' से नामवर सिंह हिन्दी की नई कहानी की शुरुआत मानते हैं। लेकिन निर्मल के यहाँ आदमी का अकेलापन अभिशाप से ज्यादा वरदान है, इनके पात्र अकेलेपन का रस लेते हुए यादों में जीते हैं और अकेलेपन को अकेलेपन से ख़त्म करते हैं।
नामवर सिंह ने नई कहानी की जिस बहस को जन्म दिया उसे कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और मोहन राकेश ने आगे बढ़ाया और यथार्थ को नये कोण से देखने की कोशिश की। नई कहानी की इस तिगड़ी ने अपनी पिछली पीढ़ी का निषेध किया और भोगे हुए यथार्थ और यथार्थ की प्रामाणिकता पर जोर दिया कि कहानी में यथार्थ का विचार नहीं यथार्थ का अनुभव चाहिए। हिन्दी कहानी ने नई कहानी का दौर स्वर्ण दौर कहा जाएगा। पाकिस्तान में इंतजार हुसैन और अनवर सज्जाद और हिन्दुस्तान में सुरेन्द्र प्रकाश और बलराज मेनरा जदीद अफसाना निगारों में नुमायां हुए। इंतजार हुसैन ने दास्तानी शैली को जन्म दिया, सुरेन्द्र प्रकाश ने प्रतीक का सहारा लेकर कहानी को मूर्त्त बनाया, मेनरा और अनवर सज्जाद ने फोटो तकनीक का कहानियों में इस्तेमाल किया। इनकी कहानियों का हिन्दी रूपान्तर सारिका और दूसरी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ। कुछेक हिन्दी कथाकारों पर जदीदियत का असर देखा जा सकता है। कृष्ण बलदेव वैद्य की कहानी 'उस चीज की तलाश' एक जदीद कहानी है। नवीन सागर 'अंधेरा प्रहसन' और दूसरी कहानियों में सुरेन्द्र प्रकाश के बहुत नजदीक नजर आते हैं। रमेश उपाध्याय जैसे यथार्थवादी ने भी हवा, पानी, मिट्टी को लेकर चार कहानियों की श्रृंखला दास्तानी शैली में लिखी। कमलेश्वर पर इंतजार हुसैन का असर देखा जा सकता है। कमलेश्वर 'राजा निर्बसिया' में लोक कथा के पसमंजर में निम्न मध्य वर्ग की कहानी कहते हैं जिसमें शिल्प की नवीनता है। कमलेश्वर ने अपने उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' में मिथ को भी शैली का हिस्सा बनाया है लेकिन ये चीज उनके यहाँ ओढ़ी हुई लगती है जबकि इंतजार हुसैन के यहाँ कहानी अपने समय का यथार्थ लिए मिथ की गहराइयों से उभरती है। सत्तर के दशक में उर्दू कहानी जदीदियत के शिकंजे से मुक्त होती नजर आती है। जदीद कहानी की सबसे बड़ी समस्या कम्युनिकेशन की थी। कहानी ने मूर्त्त रूप धारण किया था और पाठक से कट कर रह गयी थी। सत्तर की पीढ़ी ने अपने समय की कथा सेन्सिबिलिटी को महसूस किया और कहानी को मुख्यधारा से जोड़ा। साजिद रशीद, सलाम, समद, हुसैन, शफ़क, अशरफ, अनीस रफी, ग़जनफर और तारिक वगैरा इस दौर के अहम्‌ अफसाना निग़ार हुए। हिन्दी कहानी में छुटपुट आन्दोलन होते रहे हैं। रविन्द्र कालिया ने अकहानी की मुहिम चलाई और कहानी के स्वीकृत आधार को नकारने की कोशिश की। कालिया इसे कोई मंच नहीं प्रदान कर सके और जल्द ही इससे अलग हो गये। डॉ. महीप सिंह ने सचेतन कहानी का झमेला खड़ा किया लेकिन सचेतन कहानी में रचनात्मकता का संकट पैदा हुआ। नई कहानी के बाद कमलेश्वर ने आम आदमी का नारा उछाला और समानान्तर कहानी की मुहिम चलाई। ड्राइंगरूम में कालीन पर बिछे सोफे पर धंसे हुए आप आम आदमी के बारे में सोच सकते हैं लेकिन उसकी कहानी नहीं लिख सकते।
आम आदमी की कहानी लिखने के लिए कालीन से निकल कर आम आदमी होना पड़ता है और फिर कहानी तो आम आदमी की ही होती है भले ही निर्मल वर्मा अभिजात वर्ग का दुःख उकेरते हों लेकिन कहानी की धूरी में आम आदमी हमेशा मौजूद रहा है। कमलेश्वर सारिका से अलग हुए तो समानान्तर कहानी की बहस भी खत्म हो गयी। हिन्दी कहानी में शायद यथार्थ का संकट हमेशा मौजूद रहा है। प्रेमचंदी यथार्थ एक आदर्श यथार्थ है जो प्रेमचंद समाज में देखना चाहते थे। नई कहानी भोगे हुए यथार्थ पर जोर देती है। जनवादी यथार्थ कुछ अलग किस्म का यथार्थ है जिसमें समस्या का समाधान जरूरी है। लेकिन एक यथार्थ वो भी है जो नजर नहीं आता अपितु हमेशा निगाहों से ओझल रहता है। उर्दू कहानी ऐसे यथार्थ को महत्त्व देती है। ऐसा लगता है कि हिन्दी कहानी प्रेमचंदी घेरे से बाहर आना चाहती है लेकिन आलोचक ऐसा होने नहीं देते।
मधुरेश मानते हैं कि हिन्दी कहानी की मुख्य धारा जनवादी यथार्थवादी कहानी की धारा है जो अपना सम्बन्ध प्रेमचंद की जनवादी यथार्थवादी परम्परा से जोड़ती हैं। कलावाद और उत्तरआधुनिकतावाद जनवादियों को पसंद नहीं है। इन्हें शिकायत है कि यथार्थवाद के विरुद्ध कलावाद और जनवाद के विरुद्ध उत्तर आधुनिकतावाद को खड़ा करने की कोशिश की गयी है। फिर भी अज्ञेय और निर्मल वर्मा प्रेमचंद की जमीन से अलग खड़े नजर आते हैं। नयी पीढ़ी के उदय प्रकाश ने अपनी कहानियों का घोल पाश्चात्य साहित्य से तैयार किया है। इतिहास के गर्भ से भी वो कामयाब कहानी रचने की कुदरत रखते हैं लेकिन 'तिरिछ' में जो शिल्प गढ़ा वो 'पीली छतरी वाली लड़की' तक आते-आते उनके हाथ से फिसल चुका है। उदय बहुत सूक्ष्म में कहीं आर.एस.एस.वाद से प्रभावित नजर आते हैं। उनकी कहानी 'और अंत में प्रार्थना' का डॉक्टर आर.एस.एस.वादी है। कहानी में व्यवस्था की विषमताओं पर आक्रमण करते हुए डॉक्टर का आदर्श चरित्र पेश किया गया है। क्यों नहीं समझा जाए कि उदय आज की व्यवस्था में फैली बीमारियों का इलाज आर.एस.एस.वाद में ढूँढ़ रहे हैं? असल में वैचारिक पक्षधरता को एकदम से स्थगित कर देना रचनाकार के लिए मुश्किल है। हिन्दी कहानी का एक बड़ा संकट ये है कि हम किसी भी रचना को राजनैतिक नीतियों से तय करना चाह रहे हैं। प्रतिबद्ध रचनाकारों के साथ कठिनाई है कि वे अपने सांगठनिक आग्रह से छुटकारा नहीं पा सकते और किसी भी रचना के मूल्यांकन के समय पहले अपनी असहमति के बिन्दु का पता लगाते हैं, रचना अगर उनके वैचारिक धरातल से मेल खाती है तो ठीक है वरना फिजूल है ...उसे रद् करना चाहिए। साहित्य में ऐसी प्रवृत्ति रचनाशीलता के लिए घातक है। देखना चाहिए कि अपने वैचारिक आग्रह में रचनाकार कहाँ तक ईमानदार है और स्थिति की अनिवार्यता को उसने किस खूबसूरती से पेश किया है। उर्दू कहानी ने हमेशा रचनाशीलता पर नजर रखी है। हिन्दी और उर्दू कहानी में बुनियादी फ़र्क ये है कि हिन्दी कहानी कन्टेंट पर जोर देती है और उर्दू कहानी आर्ट पर। जनवादी कहानी का संकट कहानी को औजार बनाने का संकट भी है लेकिन एक हद तक ही हम कहानी से हथियार का काम ले सकते हैं क्योंकि कहानी एक आर्ट भी है। इसकी अपनी सीमाएँ हैं। साम्प्रदायिकता का विषय उर्दू कहानी में एक अहम्‌ रूझान की सूरत गालिब रहा है।
सन्‌ ४७ का फसाद पहला दर्दनाक अनुभव था जिसकी प्रतिक्रिया में बेशुमार कहानियाँ लिखी गयी। लेकिन ज्यादातर कहानियों में दर्द का इजहार भावनात्मक सतह पर हुआ है रचनात्मक सतह पर नहीं। मसलन कृष्ण चन्द्र ने पेशावर एक्सप्रेस में सरहद के आर-पार मरने वालों का ब्यौरा तमाम होलनाकियों के साथ दिया है। अजीज अहमद 'काली रात' में फसाद का वहश्तनाक मंजर बयान करते हैं। हयातुल्ला अंसारी ने 'शुक्रगुजार आँखों में' सहानुभूति बटोरने की कोशिश की है। भीष्म साहनी की कहानी 'अमृतसर आ गया है' में क्रिया के जवाब में प्रतिक्रिया है। कृष्ण का मसला है कि कितने हिन्दू और मुसलमान मरे। मन्टो का मसला है कि कितने लोग मरे? कहानी 'सहाय की मौत'। कृष्ण और भीष्म साहनी ने फसाद को फिरके की नजर से देखा लेकिन मन्टो ने फसाद को आदमी की निगाह से देखा। बेदी और अज्ञेय इसे इन्सानी रुह में रिश्ते नासूर की तरह देखते हैं। इस्मत ने इसका हल अपनी जमीन में पेवस्त तहजीबी जड़ों में ढूंढ़ा है। अशफाक अहमद इसे धार्मिक त्रासदी के रूप में देखते हैं। लेकिन समय के बदलते यथार्थ में आज साम्प्रदायिक फसाद का स्वरूप भी बदल गया है। आज ये घटना नहीं है जो घटित होती है। आज फसाद एक योजना है जो कार्यान्वित होती है। आज भारतीय राजनीति का बीजमंत्र है फसाद ... एक अवधारणा ...एक विचारधारा की सत्ता में रहना है तो फसाद कराओ ... सत्ता से किसी को बाहर करना है तो फसाद कराओ। इसलिए आज कहानियों में इजहार का ढंग बदल रहा है। पहले जानोमाल के लुटने का गम था। आज अपनी विरासत से महरूम होने का अंदेशा है। पहले फसाद की वहश्तनाकियों का जिक्र होता था। आज फसाद की राजनीति और उससे जन्मी समस्याओं का चित्रण होता है। सिख दंगे पर पुन्नी सिंह की कहानी 'शोक' कांग्रेसी नेता को बेनकाब करती है। स्वयं प्रकाश की कहानी 'क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है', वीर राजा की 'अर्थी', हृदयेश की 'अफवाह', मृदुला गर्ग की 'अगली सुबह' और तेजेन्दर की 'मेरा अपना चेहरा' का जिक्र भी किया जा सकता है।
उर्दू के नये रचनाकारों ने भी फसाद के बदलते स्वरूप की कहानियाँ लिखी है। फसाद पर भीष्म साहनी की 'सलमा आपा', 'झुटपुटा', 'जहूरबख्श' और 'सरदारिनी' जैसी कहानियों की सार्थकता है कि इनमें मानवीय रवईये कायम है लेकिन 'अमृतसर आ गया है' समय बदलते संदर्भ में अपनी सार्थकता खो चुकी है। ये अच्छी कहानी है लेकिन आज दूषित हो चुकी है। इसमें एक आदमी का दुष्कर्म दूसरे समुदाय के आदमी से प्रतिक्रिया पैदा करता है। ऐसी कहानी आज साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देगी। कृष्ण चन्द्र की कहानी 'पेशावर एक्सप्रेस' का भी यही हाल है। सेक्स का विषय उर्दू कहानियों में तरक्की पसंद रूझान समझा गया है। लेकिन मन्टो की कहानियों में सेक्स एक माध्यम है जिससे वे अन्दर के आदमी को उजागर करता है। 'ठंडा गोश्त' इसकी मिसाल है। इस्मत ने भी इस विषय पर रचनात्मक कहानियाँ लिखी है। पुरानी पीढ़ी के हिन्दी कथाकार यश्पाल और अश्क की कुछ कहानियों में सेक्स का रंग है। हिन्दी की जनवादी पीढ़ी इसे अछूत समझ कर कतराती रही है। फिर भी मृदुला गर्ग के यहाँ एक बोल्डनेस है। बल्लभ सिद्धार्थ, काशीनाथ सिंह, प्रियंवद और लवलीन की कहानियों में इसका रंग देखा जा सकता है। उर्दू की नई पीढ़ी ने भी इससे दामन बचाया है लेकिन अनवर कमर, समद और तारिक की हालिया कहानियों में इसकी झलक मिलती है। शाहिद अख्तर के यहाँ इसका रंग कुछ गहरा है। स्त्री लेखन की सतह पर हिन्दी और उर्दू कहानियाँ बहुत पास-पास नजर आती है। कर्रतुलऐन हैदर, हाजरा मसरूर, कृष्णा सोबती और ममता कालिया से लेकर जकिया मशहदी, गजाला जैग़म और मनीषा कुलश्रेष्ठ तक औरत की कुन्ठा वही है। कृष्णा सोबती और मृदुला गर्ग के यहाँ इस्मत जैसी बोल्डनेस है। फिर भी स्त्री आन्दोलन की झलक इनकी तहरीरों में नहीं मिलती। स्त्री विमर्श इन दिनों चर्चे में है। रमेश उपाध्याय के शब्दों में स्त्री विमर्श खाये अघाए निठल्ले लोगों का शगल है। रमेश स्त्री आन्दोलन की बात करना चाहते हैं और कहते हैं कि स्त्री विमर्श तो स्त्री आन्दोलन के बाद आया और स्त्री आन्दोलन को बेकार करने के लिए आया। सन्‌ ५० के दशक में सारिका और दूसरी पत्रिकाओं में उर्दू कहानियों के अनुवाद प्रकाशित हुए तो नामवर सिंह ने आपत्ति जताई थी। अपने आलेख 'आज की हिन्दी कहानी' में लिखते हैं कि 'तीन-चार साल पहले उर्दू कहानीकार कृष्णचन्द्र की कहानियों के हिन्दी अनुवाद के फलस्वरूप हिन्दी के नये कहानीकारों में जो एक लहर आई थी वे सौभाग्य से जल्द ही समाप्त हो गयी।'' उर्दू कहानियों के अलावा अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के अनुवाद भी हिन्दी में छपते रहे हैं। लेकिन उनकी लहरों पर नामवर क्या सोचते हैं मुझे नहीं मालूम। मैं नामवर जी से कहना चाहता हूँ कि लहर हमेशा खत्म होने से पहले अपना काम कर चुकी होती है और अगर उर्दू से इतनी ही एलर्जी है तो इसका क्या किया जाए कि उनका अस्तित्व ही उर्दू से दीप्तमान है। नामवर उर्दू शब्द है जो फ़ारसी तरकीब से बना है। क्या वे अपने नाम से 'नामवर' को खरोच कर 'नामचीन' करना चाहेंगे? किसी भी भाषा में दूसरी भाषा के शब्द चुपके-चुपके से आते हैं कि पता नहीं चलता। ये उसके जीवित रहने की पहचान है और उसकी समृद्धि भी। हिन्दी और उर्दू दोनों ने एक दूसरे का असर कबूल किया है और खुद को समृद्ध किया है। हो सकता है आलोचक भाषा का भेदभाव करते हों लेकिन रचनाकार नहीं करते। रचनाकार अपने रचना संसार का खुदा होता है और खुदा बेनियाज है। गिरिराज किशोर ने 'आकार' का उर्दू विशेषांक निकाला। कमला प्रसाद ने 'वसुधा' का उर्दू अंक निकाला। 'कथादेश' और दूसरी पत्रिकाओं ने भी उर्दू कथा विशेषांक प्रकाशित किया है। 'उद्भावना' ने पाकिस्तान के उर्दू अदब का अंक प्रकाशित किया। दिल्ली से छपने वाली पत्रिका 'एवाने उर्दू' ने हिन्दी अदब पर विशेषांक प्रकाशित किया है। पाकिस्तानी पत्रिका 'आज' ने तो अपने को हिन्दी कहानी के लिए वक्फ़ कर दिया है। इंतजार हुसैन कहते हैं कि उनके एक बगल में अलिफ लैला है और दूसरे में कथासरित्सागर। इंतजार हुसैन हिन्दू मिथ की गहराइयों में गोता लगाते हैं और नित्‌ नये रत्न ढूँढ़ कर लाते हैं। हम जिस दौर में जी रहे हैं वे क्षय का दौर है। इस बीच सब कुछ टूट-फूट गया। गरीबी हटाओ का सपना बिखर गया। समाजवाद का सपना चोरी हो गया। धर्मनिरपेक्षता को आंच आ गयी। स्वर्ण मंदिर का सीना गोलियों से छलनी हुआ। मस्जिद की मीनार गिरी। चर्च की दीवारें खून से रंगीन हुईं। इतिहास की छाती पर फासीवाद ने अपने पंजे पेवस्त किये। राजनीति में अपराध दूध में शक्कर की तरह घुल गया। साम्प्रदायिक घृणा बढ़ी। संस्कार जड़ीभूत हुए। आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जिसका कोई भविष्य नहीं है। आज लेखक पर सामाजिक दायित्व के अलावा राजनीतिक दायित्व भी आन पड़ा है। अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए उसे अपनी रचनात्मकता को भी बचाए रखना है। हिन्दी और उर्दू की सन्‌ ७० की पीढ़ी ने इस चुनौती को स्वीकार किया है और अपनी कहानियों में सशक्त प्रोटेस्ट दर्ज किया है। इस क्रम में समद की 'होनी-अनहोनी', हुसैन की 'अंजामकार', शफ़क की 'नीला खौफ़', अशरफ की 'आदमी', सलाम की 'एकलव्य', तारिक की 'बाग का दरवाजा', ग़जनफर की 'खतना', साजिद की 'मकड़ी', अली इमाम नक्वी की 'बंगाल हाउस की मुन्नी', शाहिद अख्तर की 'बर्फ़ पर नंगे पांव', उदय प्रकाश की 'पालगोमड़ा का स्कूटर', स्वयं प्रकाश की 'पार्टीशन', संजीव की 'जो एही पद का अरथ लगावे', तेजेन्द्र की 'अपना चेहरा', शिवमूर्ति की 'तूरिया चरित्र', अरूण प्रकाश की 'मंझधार किनारे', प्रदीप पंथ की 'महामहिम', असगर वजाहत की 'मैं हिन्दू हूँ', अखिलेश की 'चिट्ठी', संजय की 'कामरेड का कोट प्रेम कुमार मणी की 'इमलियां' मार्मिक कहानियाँ हैं। इन कहानियों के तेवर तीखे हैं। आज सामाजिक विषमताओं पर तीखा वार करती हुई उर्दू और हिन्दी कहानियाँ कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रही है।

2 comments:

alen anita said...


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