Saturday, March 15, 2008

लोग

रवीन्द्र कुमार ‘राजेश'
ऐसे लमहात बहुत खबते हैं।
लोग जब बेवफ़ा निकलते हैं॥
किसको अपना कहें ज़माने में,
आस्तीनों में साँप पलते हैं।
वह है बेदर्द, दर्द क्या समझें,
संगे दिल कब कहाँ पिघलते हैं।
बात पहले सी नहीं रिश्तों में,
वक्त के साथ ये बदलते हैं।
लोग ताकत के ज़ोम में अक्सर,
बात-बेबात पर उछलते हैं।
उसने शीरीं, जुबान बख्शी है,
आप फिर आग क्यों उगलते हैं।
अपनी हर रोज़ ईद-होली है,
सबसे ‘राजेश' गले मिलते हैं।
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