Thursday, March 27, 2008

मैंने कहा ना मैं तुलाराम नहीं हूँ

जाबिर हुसेन
तुलाराम अपने घर की तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर था कि उसके दिमाग़ में बाप की कही बात दोबारा कौंधी-
'कल से, उन्हीं में से किसी एक गोदाम में जाकर बैठा कर, घर आने की जरूरत नहीं। वहीं बीड़ियां बना कर अपना पेट पालने की सोच। आज से तेरे लिए इस घर के दरवाजे बंद।'
तुलाराम को बाप की कहीं बात और उसके धक्के याद आते ही यह ख्याल भी आया कि उसने सीढ़ियां उतरने से पहले अपनी मां से भेंट नहीं की। बल्कि उस दालान की तरफ़ देखा तक नहीं, जहां उसकी मां हर वक्त किसी काम में उलझी रहती है।
एक लम्हे के लिए तुलाराम ने सोचा, उसे सीढ़ियां दोबारा चढ़कर मां से आख़िरी बार जरूर मिल लेना चाहिए। आख़िर इसमें उसकी मां का क्या क़सूर ? क़सूर तो सारा तुलाराम का ही है। वही तो अपनी मर्जी से स्कूल का बस्ता पटक कर हर रोज कोई किताब या मैगजीन लिए गोदाम पहुंच जाता है। घर के लोग समझते हैं कि वो खेलने-कूदने निकला है, और घंटे-भर बाद लौट आएगा।
एक दिन, देर शाम, घर लौटने पर, रोटियां परोसते वक्त मां को तुलाराम के कपड़ों से तंबाकू की बू आती महसूस हुई तो उसने तुलाराम को टोका -
'तंबाकू की बू आ रही है, तेरे कपड़ों से। कहां गया था, बोल किन के साथ उधम मचा कर आया है।'
झूठ बोलने के सिवा कोई चारा नहीं था, तुलाराम के पास। वो जानता था, सच बोलने का मतलब होगा बाप के हाथों पिटाई, जिसके बारे में सोच कर ही वो एकदम से डर जाने लगा था। 'खेलते वक्त कूड़े के ढेर पर गिर गया था, वहीं तंबाकू का बुहारन पड़ा था।'
तुलाराम ने सफ़ाई के साथ जवाब दिया और रोटियां जल्दी-जल्दी मुंह में डालने लगा। दालान के एक तरफ़, उसके सवाल-जवाब से बेख़बर, बाप की नजरें अख़बार के पन्ने पर जमी रहीं।
अगले दिन, और एक किताब उसके हाथ लग गई, जिसके कुछ हिस्से तो उसने स्कूल में टिफ़िन की घंटी के बीच ही पढ़ डाले। कारख़ाना मजदूरों की लड़ाई से भरी थी वह किताब, जिसमें उन पर होने वाले जुल्म और कारख़ाना-मालिकों के ख़िलाफ चलने वाली लड़ाइयों की तफ़सील बयान की गई थी। पुलिस की जोर-जबरदस्ती का ब्यौरा था।
गोदाम में उस रोज मामूल से ज्यादा भीड़ थी। सिराज मियां के गोदाम के मजदूर भी अपना काम ख़त्म करके कहानी सुनने वहीं आ गए थे।
गोदाम में पेट्रोमैक्स की रोशनी फैली हुई थी और गहरा सन्नाटा था। बीच-बीच में, किसी के खांसने की आवाज और तेज-तेज चलने वाली सांसें जरूर सुनाई दे जाती थीं, जिससे गोदाम का सन्नाटा कुछ लम्हों के लिए भंग हो जाता था।
किताब दिलचस्प थी। किताब के हीरो की तक़रीरों में सिहरन पैदा करने वाली तासीर थी। तुलाराम के पढ़ने के ड्रामाई अंदाज से कहानी में जान आ गयी थी।
एक अध्याय, दो अध्याय, तीन अध्याय!
तुलाराम किताब पढ़ता गया, किताब के पन्ने उलटते गए। गोदाम के मजदूरों की उंगलियां तेजी से चलती रहीं। पत्ते काटती, तंबाकू भरती, धागे लपेटती उंगलियों के नुकीले नाखुन का बढ़ता पीलापन देखने की फुर्सत किसी को नहीं थी।
गोदाम में जलने वाले पेट्रोमैक्स का तेल ख़त्म होने को नहीं आ जाता तो शायद तुलाराम का पाठ कहानी ख़त्म होने तक इसी तरह जारी रहता।
तुलाराम और दिनों के मुक़ाबले, कुछ ज्यादा ही वक्त गुजार कर उस दिन घर लौटा। इसलिए सब की नजर में उसका आ जाना स्वाभाविक था। घर में दाख़िल होते ही, सबसे पहले टोकने वाली उसकी मां थी -
'कहां था, इतनी देर? किसके साथ था?'
तुलाराम को मालूम था कि उसकी मां इस बात से ज्यादा चिंतित रहती है कि वो घर से बाहर किसके साथ अपना वक्त गुजारता है। इसलिए वो हर दम मां के संतोष के लायक़ जवाब तैयार रखता था -
'मौसी के घर चला गया था, वहीं देर हो गई। मौसी ने खाने के लिए रोक लिया था।'
मौसी से मां के बहुत ही गहरे रिश्ते थे। मौसी मां की सबसे कमजोर नब्ज थी। उसका जि+क्र आते ही मां का गुस्सा शांत हो जाया करता। बल्कि, उसका नाम सुनते मां की आंखों में बूंदें छलक आतीं।
'मौसा घर में थे? कोई हंगामा तो नहीं हो रहा था? शराब पीकर तो नहीं आए थे? मौसी खुश तो लग रही थी ना?'
तुलाराम मां के इन सवालों के लिए तैयार नहीं था।
'मौसी ने कल फिर बुलाया है, कल सब कुछ देखकर आऊंगा।'
तुलाराम मां को टाल गया।
हाथ-मुंह धोकर खाने को बैठा तो तुलाराम को बाप की खोजी आंखें अपनी तरफ़ घूरती महसूस हुईं। पहला निवाला ही जैसे मुश्किल से गले उतरा।
'परीक्षा में थोड़े दिन रह गए हैं। कल से स्कूल के बाद सीधे घर आना है, खेल-कूद बंद।'
तुलाराम को बाप के शब्द सीसे की तरह कान के पर्दों पर टपकते महसूस हुए। खेल-कूद बंद और स्कूल से सीधे घर आना हुआ, तो गोदाम में किताब का बाकी हिस्सा पढ़कर कौन सुनाएगा।
तुलाराम गहरी सोच में डूब गया।
अगले दिन, स्कूल की दो घंटियां उसने किसी तरह पूरी कर लीं। तीसरी घंटी में, उसका दिल उसे बेचैन करने लगा। तुलाराम क्लास से निकल कर टीचर के पास गया, पेट में अचानक दर्द की शिकायत की और बस्ता संभाले स्कूल से बाहर आ गया।
गोदाम वाली गली की तरफ़ मुड़ते वक्त अपने जानते अच्छी तरह देखकर तुलाराम ने इत्मीनान कर लिया कि आस-पास कोई उसके इस तरह स्कूल से भाग आने की शिकायत उसके बाप से करने वाला मौजूद नहीं है।
सीलन-भरे गोदाम में, काम पर जुटे मजदूरों ने वक्त से पहले तुलाराम को वहां देखकर हैरत और खुशी जताई।
'स्कूल में छुट्टी हो गई। वो था ना रामू, काफी दिन से बीमार था। आज सुबह मर गया। इसीलिए छुट्टी हो गई।'
तुलाराम को बहाना तलाशने में महारत हालिस थी।
दिन का सारा वक्त तुलाराम ने उस रोज गोदाम में ही बिताया। सारे अध्याय किताब के उसने मजदूरों को पढ़ सुनाए। आख़िरी अध्याय, जिस में हीरो की मौत के साथ मजदूरों की जीत का जिक्र था, मजदूरों ने दोबारा पढ़वा कर सुने। हीरो की मौत, लेकिन मजदूरों की जीत!
किताब का अंत मजदूरों को रास नहीं आया। तंबाकू के पत्ते काटते-काटते उनकी उंगलियां रुक गईं।
किसी कोने से शिकायत-भरी आवाज उभरी -
'क्यों मारा कहानीकार ने हीरो को? जिसने मजदूरों को जीत दिलाई, उसे ही क्यों मार डाला?' सबने इस एतराज का समर्थन किया।
तुलाराम के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। खुद उसकी आंखें भी हीरो की मौत से भीग गई थीं।
हीरो की लाश कारख़ाने के मुख्य द्वार पर पड़ी है, खून में लथपथ लाश। चेहरा भी मुश्किल से पहचान में आता है। दूसरी तरफ़, कारख़ानेदार की आवाज माईक पर सुनाई दे रही है -
'मजदूर हमारे मालिक हैं। हमें उनकी सारी मांगें मंजूर हैं। कल से कारख़ाना खुल जाएगा। किसी को कोई सजा नहीं मिलेगी। कल ही बढ़ी दर पर बक़ाया मजदूरी का भुगतान भी हो जाएगा। सारी मांगे मान ली गई हैं। अब कोई झगड़ा नहीं रहा।'
तुलाराम ने किताब की आख़िरी पंक्तियां पढ़ीं, जिनमें कारख़ाने पर मजदूरों के झंडा फहराने की बात लिखी थी, मगर जहां हीरो की ख़ून में लथपथ लाश का कोई जिक्र नहीं था।
तुलाराम के पास हालांकि घड़ी नहीं थी, मगर वो इतना जरूर अंदाज से जान गया था कि स्कूल का वक्त ख़त्म हो गया है, और अब उसे सीधे घर पहुंचना है।
गोदाम से निकलते वक्त भी तुलाराम ने झांककर गली में देख लिया। जान-पहचान को कोई आदमी उसे गली में आता-जाता दिखाई नहीं दिया।
लेकिन तेज क़दमों से भागता तुलाराम जैसे ही शेरगंज की चौड़ी सड़क पर आया, उसकी नजर कोने वाली शराब की दुकान से बाहर निकल रहे मौसा जी पर पड़ी। नजर पड़ते ही, तुलाराम को मां के तीखे सवाल याद हो आए। अपने घर लौटने की बजाय, तुलाराम मौसी के घर की तरफ़ मुड़ गया।
मौसी ने उस दिन सचमुच तुलाराम को खाने पर रोक लिया।
घर लौटते-लौटते उसे फिर देर हो गई। घर की सीढ़ियां चढ़ते ही उसे बाप की गरजदार आवाज सुनाई दी -
'भला हो मदनजीत बाबू का कि उनने लौंडे को गोदाम से निकलते देख लिया, अपनी आंख से, वरना मैं तो अंधेरे में ही पड़ा रहता।'
तुलाराम सकते में आ गया। मदनजीत बाबू, यानी मौसा जी, जिन्हें उसने अपनी आंख से सड़क के कोने वाली शराब की दुकान से निकलते देखा था!
तुलाराम को समझते देर नहीं लगी। मौसा जी ने ही उसके बीड़ी गोदाम जाने की शिकायत बाप तक पहुंचा दी थी।
तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर खड़े तुलाराम को एक झटके में सारी बातें कचोके के साथ याद हो आयीं। तुलाराम ने सोचा, बाप ने धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया तो क्या हुआ। बाप है, तो क्या इतना भी नहीं कर सकता! मुझे लौटकर मां को जरूर बताना चाहिए कि मौसा जी ने आज फिर शराब पी है। और यह भी कि मौसा जी ने आज फिर मौसी की जमकर पिटाई की है।
तुलाराम तंग सीढ़ियां तय करके अपने घर लौट गया है।
लेकिन मैं?
मैं तो अब भी तुलाराम का नाम ओढ़े उसके घर की तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर ही खड़ा हूं!
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