Friday, March 14, 2008

ग़जल

डॉ० अनिल गहलौत
एक वो चाँद इस तरह इन निगाहों में
जैसे अमराई ने आकाश भरा बाहों में
एक खामोशी हौले से कभी गुजरी थी
कोई आवाज गूँजती है अब भी राहों में
रेतों में अब भी गुलाबों के फूल खिलते हैं
कोई करिश्मा है जरूर तेरी चाहों में
आगे शायद ये बबूल भी न मिल पाएँ
हमसफर आओ कि सुस्ता लें इन्हीं छाँहों में
दौड़ा है इधर-उधर देर तलक, दूर तलक
आ बैठा दिल उन्हीं दर्द की पनाहों में
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