Tuesday, March 18, 2008

माँ

- भवानी सिंह
पिता हमें छोड़ कर गये, उस समय मैं दस वर्ष का था। पिता की पूरी कोशिश रही थी कि हम कम से कम तीन भाई हों, तीन नही तो दो भी चलेंगे। इसी कोशिश के परिणामस्वरूप तीन बहनें आ गयी थीं। यों तो अवान्छित थी बहनें पर मां हमेशा ही अपने गर्भ को बेटे की तरह ही पालती थी। दस महीने तक बड़े जतन से सेया हुआ अण्डा बेटी भी होती तो भी मां को तो प्यारी होती ही ना, पिता जरूर परेशान रहते बताये शुरू में, कुछ दिनों बाद में वे भी ठीक हो जाते। गोरी-चिट्टी बेटी भला अच्छी क्यों नही लगती मां-बाप को। दादी बहनों के होने पर बड़ी दुःखी होती - ''फिर कुलच्छनी ने भाट गेर दी ... पता नहीं इस जलम में पोते का मुंह देख पाऊँगी भी या नहीं, मेरे साथ-साथ बेटे का भी परलोक सुधर जाता भगवान जी एक आस दे-देते तो।''
दादी तरसती हुई कब चली गयी थी मुझे पता नहीं। पर पिता गये उस समय मैं पूरे दस वर्ष का था, बड़ी बहनें बारह, चौदह व सोलह की। बड़की के लिये पिता घर-वर ठीक कर गये थे। देव उठते ही ब्याह-शादी से भी फारिग हो जाते पिता पर भगवान ने देव उठने से पहले ही पिता को उठा लिया था। बहनें तीनों की तीनों खूबसूरत ... लड़का देखने में, मां बताती है, पिता को जरा भी परेशानी नहीं आयी, ससुराल से देखने वाले तीनों बहनों पर मोहित थे। सभी की सगी बहनों को एक ही बार में, एक ही साथ अपने ही गांव ले जाने को तैयार, पर मां बताती है - ''तेरे पिता हरगिज तैयार नहीं थे, देरानी-जिठानी बने बहनें और अपने घरवालों का पक्ष ले-लेकर कलह करं - रात-दिन ...।'' मां बताती है, पिता सबसे ज्यादा भाई बंधुआं से ही डरा करते थे, झगड़ा-टन्टा भाई-बंधु ही तो खड़ा करते हैं ... सुवार्थ भाइयों के ही तो टकरायेंगे, मित्रों-परिचितों के थोड़े ही ना ... मित्रों को चुना जाता है, और चुनाव हमेशा श्रेष्ठ का ही होता आया है, भाई टपकते हैं ऊपर से ... अवांछित, बिना चुना हुआ और अवांछित भला कैसे सुहायेगा ...।
मैं पिता के जाने के बाद मां से दो ही प्रश्न किया करता ... जब भाई-बंधु कलह के वायस होते हैं तो पिता मेरे भाई नहीं होने को लेकर क्यों जीवन भर दुःखी रहे मां, चांद सी बेटियां होने पर भी बेटों के लिये क्यों तड़पते रहे पिता, दूसरी बात - दादी बहनों से प्यार किया करती थी तो फिर हर बहन के जनम पर क्यों रोया करती थी दादी - अबकी बार फिर भाट जन दिया जनमजली ने ...... ।
बहनों के लिये घर-वर ढूंढने में किसी को कोई परेशानी नहीं दी मां ने, तीनों को आराम से निपटा दिया था - बिना दान दहेज के ही ... फिर दादी मेरी चांद सी बहनों को क्यों कोसती रही थी मां। कभी-कभार मां प्रश्नों का उत्तर भी देती - ''बावला है रे छुटकु तू तो, सभी भाई एक से थोड़े ही ना होते हैं, तेरे बाप को अच्छे भाई नहीं मिले इसलिये ही तो कोसते रहे भाइयों को, सचमुच के भाई तो राम-लछमन जैसे होते आये हैं। एक आंख की भी क्या आंख बेटा, पता नहीं कब फूट जाये, हो गये न अंधे के अंधे, एक बेटे का भी भला क्या बेटा होना हुआ ... टूट नहीं पडेंगे अकेले को देखकर दूसरे भाई-बंधु ... पिता इस स्थिति को लेकर जीवंत रहने तक दुःखी रहे ...।
मां मरी जब तक कांप-कांप बताती रही थी ... तेरे पिता को उठते ही कितने जुलम ढाये देवर-जेठों ने हम पर तुझे क्या पता, आंख बंद होते ही जेबें टटोली जाने लगी थी तेरे बापू की ... सारे कागज-पत्र, चाबी-छल्ला ढूंढ-ढूंढ कर ले गये, पता नहीं किस छुपे खजाने की चाबी मिल जावे उनकी जेब में, क्या पता किसी बड़ी लेनदारी की पुरजी मिल जाये जेब में, जिसकी उगाही से वारे-न्यारे हो जायें भाइयों के ... मैं सब कुछ चुपचाप देखती रही थी, तुझे बचाने के लिये, कुछ नहीं बोली, ले जाओ जो भी मिले तुम्हें - चाबी-छल्ला, कागज-पुर्जे ही क्यों, तुम तो टूम-ठेकरी भी ले जाओ, पर मेरे लाल को बस बक्स दो ...।
जबसे मैंने सूरत संभाली, किसी भी ताऊ-चाचा ने कोई हानि नहीं पहुंचाई हमें, पर मां को हमेशा चाचा-ताऊओं द्वारा मुझे नष्ट करने का अंदेशा बना रहता ... चिपका कर सोती ... जितना मुझे याद है, मां हमेशा मेरे कुनमुनाते ही हड़बड़ाकर उठ बैठती, जगने पर हमेशा मैंने मां को जागते हुए ही पाया ..., सूसू लगती तो मां जगी मिलती, हंस कर बोलती - ''जा जा अंदर वाली मोरी पर ही निपटा ले सूसू, बाहर तेरे चाचा-ताऊ बैठे होंगे - घात लगाये ...'' मैं डरता-डरता जाता ... पिता के मरने के बाद तो मैं बउा हो गया था, वरना तो मोरी तक भी मां या पिता पकउ कर ले जाते थे ... ''मैं बड़ा हो गया हूँ अच्छा नहीं लगता री माई तू पास में खड़ी हो .... ''मेरी सख्त मनाही के बाद भी मां ओटक से मुझे सूसू करते देखती ... मैं सूसू करने पर बड़ा और मरद बना, सूसू करने के तुरन्त बाद एकदम से बच्चा और डरपोक धूधू में परिवर्तित हो जाता और मां से चिपक कर सो जाता ....।
यही डर मां के चले जाने के बाद भी बरकरार रहा ... मानसी को बाथरूम जाते समय जगाना पड़ता ... हंसती मानसी - ''अले-अले मां का छोना बिना मां के मूतेगा भी नहीं ...'' ''तू आजा साथ में ...'' ''मैं क्यों आऊँ मैं क्या तुम्हारी मां हूँ...'' मैं उसे बहला-चुपला के घर के बाहर तक लाने में सफल हो जाता ..., नौकरी लगी तो मानसी को साथ लाना ही पड़ा जयपुर ... मानसी कलपती रहती ... मां भी कलपती - ''साथ चली जाइयो बहू अबकी बार छुटकु आवे तो, वह तो बेचारा अकेला तो सूसू भी करने जाता नहीं ...'' मानसी मां को चिड़ाया करती ''मांजी आपने अने लाडले को बड़ा ही कब होने दिया ... अब रहने भी दो कुछ समय अकेलों को ... पर मानसी रहना कहां चाहती थी अकेली ... बस चिड़ाने के लिये ही मां के सामने साथ आने के लिये ना किया करती, मां जानती थी - यह बात सो भेज दिया मानसी को ... मां ने हिदायत दी थी - ''वहाँ गैर मुलक में लड़ना-झगड़ना मत बच्चों की तरह जैसे यहाँ दोनों लड़ते-भिड़ते रहते हो।''
सतरह की ही तो थी मानसी, मैं इक्कीस का था। पर दोनों निरे बच्चे के बच्चे, दोनों खूब लड़ा करते, रात को सूसू कराने का मानसी लाभ उठाना चाहती ..., मनाना ही पड़ता उसको आखिर ... रात को सुलह करनी ही पड़ती ..., और भी कारण होते थे मनाने के ... मानसी मुंह फेर कर सो जाती, मुझे नींद नहीं आती बिना चिपके ..., मां के आगोश में छुप कर सोने की आदत को भला कैसे छोड़ पाता मैं ...। मानसी से चिपक कर सोता, बिल्कुल उसके पहलू में छुप कर, जैसे मुर्गी से चिपक कर बिल्कुल उसके पंखों में छुपकर चूजे रात बिताते हैं, मानसी ताना देती .. अपने बापू का उदाहरण दिया करती मरद बनो मियां मरद, मेरे बापू को देखो, डरना-उरना तो कोसों दूर भूत-प्रेत में तो भरोसा ही नहीं उनको, चोर उचक्कों तक की खबर लेते हैं मेरे बापू ..., ''मरद बनो मिया मरद ...' यह जुमला मानसी कई बार दोहराती और हम लड़ते-झकड़ते ... इसी बात पर दोनों झगड़ पड़ते हर बहस का निष्कर्ष यही निकलता ... मानसी हर समय मुझ में अपने बापू को खोजा करती, और मैं मानसी में मेरी मां को ..., वह हमेशा मां होती भी थी, बस प्रणय के क्षणों में ही मां नही रह पाती थी वह। उस क्षण - उन प्रणय क्षणों में ही, मैं स्वयं में कुछ अलग-अलग सा महसूस किया करता, बस इन क्षणों के बाद फिर वही निरे बच्चे का बच्चा हुआ करता मैं और मानसी पूरी की पूरी मां ...।
एक-दूसरे में मां-बाप की छवि देखने की स्थिति हमारे बच्चे होने तक चली थी। बच्चा होने पर मां के यानि मानसी के आगोश में उसका छोना समा जाता, मुझे अच्छा नहीं लगता मानसी द्वारा अपने छोने को यों छुपाकर सोना, मानसी द्वारा अपने बेटे को इस प्रकार का लाड़ लड़ाना .... मेरा बेटा तो बिल्कुल मरद बच्चा बनेगा - अपने नाना की तरह, पड़-नाना की तरह ..., क्यों, अपने नाना-पड़नाना पर क्यों जाने लगा हमारा बेटा, क्या इसके दादा-परदादा वीर नहीं थे, बांके मरद नहीं थे। ऊँहू, मैंने देखा नहीं आपके बाप-दादा को, वे भी आप जैसे ही रहे होंगे मां के आगोश में दुबक कर सोने वाले। मेरा सिर झन्ना जाता, पर मैं मानसी की ओर देखता तो, उसका परिहास भरा चेहरा देखकर देखकर माफ भी कर देता उसे और एक-दूसरे में मां बाप देखने की कोशिश नहीं किया करते ....। मैं मानसी में मां की छवि देखना बंद कर चुका। इसलिये उसे मां जैसी बनने की हिदायतें नहीं देता था अब या फिर मां जैसा कोई गुण नहीं होने पर मानसी को टोका नहीं करता था मैं, पहले अन्तस में मानसी को हूबहू मां जैसा बनाने का प्रयास हुआ करता मेरा ... और मानसी मुझे उसके बापू सा बनाना चाहती ... हूबहू उसके बापू जैसा ..., मानसी ने अपनी मां तो देखी ही नहीं थी ...।
शुरू-शुरू में बच्चों द्वारा मानसी के आगोश पर कब्जा करना मुझे नहीं सुहाया था, इसलिये बड़े बेटे से मैं घृणा किया करता ... मानसी की चारपायी से बिल्कुल चारपायी सटाकर सोया करता ... मानसी की चारपायी दीवार से सटानी पड़ती, बच्चे को मैं मेरी ओर नहीं लिटाने देता ... फिर मुझे नींद कैसे आयेगी ... मानसी मेरे सिर में अपनी अंगुलियां तब तक घुमाती रहती जब तक मैं सो नहीं जाता था, जिस दिन मानसी मेरे बालों में अंगुलियां नहीं घुमा पाती, मैं सोता ही नहीं ... मां जैसी अंगुलियां घुमाया करती थी मानसी ... अन्य बातों में मानसी मां जैसी नहीं बन पायी थी, परन्तु सिर में अंगुली घुमाने में बिल्कुल मां जैसी ... मैं मां की मौत को उन क्षणों में भूल चुका होता था, जब मानसी की अंगुलियां मेरे बालों में चहल-कदमी करती होती ..., फिर वे अंगुलियां नीचे उतरने लगती, पीठ पर रेंगने लगती ... रेंगती-रेंगती पता नहीं मानसी की अंगुलियां रेंगना बंद कर, कब थपकी देने लगती, बिल्कुल मां जैसी थपकी ... ऐसा करने पर सो जाता मैं ... मानसी हंसा करती ... जब अकेले होते हम - ''राम-राम बीस की उमर में ही दो-दो बच्चों की मां बना दी भगवान जी ने मुझे छुटकू को तो जैसे तैस चूची पिलाकर सुला दो, पर बड़को ... बिना दबेड़े सोने से रहा ...।'' मानसी मुझे मजाक में अपना बड़का बेटा बोलती मैं हंस देता, मानसी की अंगुलियां इस समय रेंगती रहती या फिर थपकी देती होती ...।
लम्बे समय बाद मां में मानसी खोजना बंद सा हो गया था। अन्य जवाबदारियां मुझे बुजुर्ग बनाने लगी थी ..., दफ्तर मुझे बुजुर्ग बनाने लगा था। सैक्सन ऑफीसर बन गया था मैं, बुजुर्गाना अन्दाज तो लाना ही पड़ता ..., धीरे-धीरे लड़कपन छूटता जा रहा था ...। पर मानसी मां ही बनी रहती तब भी, उसका बड़ा बच्चा हुआ करता था तब भी मैं, खिलाने-पिलाने में कभी-कभी आने देती, दो-दो बच्चे होने के बाद भी, मेरी पूरी देखभाल करती - कपड़ों से लेकर हर काम की, बच्चों की तरह देखभाल करती मानसी, मीठे-नमकीन भोजन कराने की आदत बरकरार रही, रूचि के साथ बिल्कुल मां की तरह भोजन कराती रही थी मानसी ...।
मानसी के यों रूचि के साथ चराने-पिलाने की आदत ने और काम-धाम नहीं करने, शारीरिक मेहनत बिल्कुल नहीं करने की आदत ने, शरीर पर खूब चर्बी फैला दी थी। चर्बी को देखकर मैं तो खुश होता ही मानसी भी खिलखिला कर जाती ... चर्बी चढ़ जाने को मानसी सुखी जीवन का परिणाम आंका करती ..., मेरे बापू हमेशा दुबले-पतले रहे, खाने-पीने की कौन गौर करता, मां जो नही रही थी ... बस मानसी अपने बापू के दुबले-पतले रह जाने की कसर को मुझमें पूरा करना चाहती।
चालीस का होते-होते काफी भारी-भरकम हो गया था मैं, एक दिन खादी मेले में तुल ही बैठा था, अठयानवे किलो का था पूरा मैं ... मानसी को बताया तो पहले तो खुश हुई पर फिर चिंतित हो गयी थी - ''जी इतना वजन ठीक नहीं होता सेहत के लिये, छोटे-छोटे बाप-गोपाल हैं मेरे तो, कहीं कुछ हो-हुआ गया आपको तो मैं तो कहीं की भी नहीं रहूंगी...।
बस मोटापे से हम दोनों डरते ही रहे, उसे कम करने के लिये कोई अहतियात नहीं बरता ... जो अंदेशा था वही हो गया एक दिन ... दफ्तर के तनावों से घिरा घर आया तो दस बजे ही दबोच लिया गया ..., बड़ी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, महिनों अस्पताल में रहने के बाद कहीं जिंदा रह जाती ... पेशाब भी नहीं लगता तो डर-डर कर जाती ..., उसके चेहरे पर आया भय मुझे और भी डरा जाता ..., मैंने उसे धमकाया भी - ''थोड़ा-कुछ हो भी आया है तो इतनी जोर से क्यों डर जाती है तू ... मर थोड़े ही ना गया मैं ...'' वह मेरे मुंह पर हाथ रख देती - ''शुभ-शुभ बोलो जी मरे आपके दुश्मन ..., मेरा क्या होगा, मेरे छोटे-छोटे बच्चों को क्या होगा, जीवित ही मर जाऊँगी मैं तो ... और रोने लगती ...। बस पेट पर आया आफरा तक मुझे डरा-डरा कर जाता ... फिर आया अटैक ...। मैं डर के मारे, मानसी से अपनी स्थिति छुपाना चाहता, मानसी डर जाती ... भय उसके चेहरे पर कांप-कांप जाता ... उसके चेहरे पर मेरी मौत की साफ-साफ परछाइ्र नाचती देखता मैं ..., मौत की यह परछाई मुझे अंदर तक हिला-हिला कर जाती, भय आंखों से समाता हुआ हृदय तक पहुंच जाता। डर के मारे हार्ट बीट बढ़ जाती। कन्ट्रोल नहीं रख पाता अपने को मैं। इस डर ने कई बार डमी अटैक कराये, दो-तीन बार तो भरती ही होना पड़ा अस्पताल में ... भला हो मेरे डॉक्टर साब का जो मुझे समझाते, दिलासा देते ... मानसी को भी समझाते ... मेरे साथ-साथ।
मानसी भी थोड़ी संभल गयी है अब, थोड़ी बहुत बैचेनी होने पर डरती नहीं, मुझे हिम्मत दिलाती है ...। पर रात को .... हां रात को जब से अटैक आया है - मानसी फिर से मां में तबदील हो गयी है ..., थोड़ा सा ऊँघते ही अंगुलियां घूमने लगती हैं बालों में ... वे किसकी हैं, मानसी की या मेरी मां की, बस झपकी आते ही अंगुलियां केवल मां की रह जाती हैं। मानसी की अंगुलियां मां की अंगुलियां बन घूमती, रेंगती, थपकियां देने लगती हैं ... इस थपकियों से ही सो पाता हूँ अटैक आने के बाद मैं ..., दो-दो ट्राइका सुलाने में नाकामयाब हो चुकी होती है तब मानसी मेरी बगल में आ, अंगुलियां मेरे बालों में फंसा हिलाना-डुलाना शुरू करती हैं तो नींद की गोलियों के सुरूर में और मां की स्मृतियों में खो जाने पर मानसी की थपकियां सुला देती हैं मुझे मीठी नींद।
जब भी मैं अटैक के डर से डर जाता हूँ मुझे मानसी के आगोश में ही चैन पड़ता है। उस समय मानसी का आगोश, मां का आगोश होता है। मैं तब भी कच्ची नींद में जगता हूँ मां की तरह बाथरूम में सहारा देकर मानसी ही ले जाती है मुझे ... सूसू करने के बाद मैं फिर से मानसी का आगोश मिलने पर ही सो पाता हूँ ... बेटे-बेटी अगर जिस दिन जग जाते हैं और मुझे मानसी के आगोश में समाते देख लें तो ... झिझक जाते हैं हम दोनों ...। फिर ऐसे में नींद कोसों दूर होती है ..., बच्चे भी सहम-सहम जाते हैं - पापा साउण्ड स्लिम नहीं लेंगे तो अटैक आ सकता है दूसरा अटैक ..., अतः दोनों बच्चे जगने पर भी सोने का बहाना किये पड़े रहते हैं, ताकि मानसी की अंगुलियां रेंगती रहे मेरे सिर में, उसकी थपकियां मेरी पीठ में पड़ती रहे ... मानसी मेरे जगने से पहले ही जगी हुई मिलती हैं ... मां याद आ जाती है, मेरे जगने से पहले जगी हुई मां ... मैं पूछ बैठता था उस समय -''मां तुम सोती कब हो ...'' मां प्यार से बोलती इतरा कर ''तेरे उठने से पहले ...'' अब मानसी से मैं जब भी कहता हूँ ... ''मानसी सो भी लिया करो कभी ...'' प्यार से बोलती है मानसी ... ''आप जब नींद में होते हो - गहरी नींद में, तब सोती ही तो हूँ मैं गहरी नींद ...'' बहुत ही आहिस्ता से, प्यार से बोलती है मनसी ...। मानसी का चेहरा मेरी मां के चेहरे में तब्दील हो चुका होता है तब ... और मैं हारा थका मां के आगोश में दुबक कर सो जाता हूँ फिर से ...।
अटैक आ सकता है मुझे फिर से कभी ... नहीं, मां के आगोश में, गहरी नींद सोने वालों के अटैक नहीं आता कभी ...। इस कल्पना को जब कभी मैं मानसी को सुनाता हूँ तो वह आश्वस्त हो जाती है ...। पर अब भी गहरी नींद नहीं सो पाती मानसी ... मैं कहता हूँ - ''मानसी सोया करो भाई ...मेरी तरह तुम भी बीमार पड़ गयी तो कौन संभालेगा घर को ... बच्चों को'' तो मानसी कहती है - ''मां कभी गहरी नींद नहीं सोती ..., कभी नहीं ..., और मैं एक मां हूँ, तीन-तीन बच्चों की मां ...'' सच में मानसी मां है - मेरे दोनों बच्चों के साथ-साथ मेरी भी।
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