Wednesday, March 26, 2008

इश्क का चक्कर

- डॉ० सन्त कुमार टण्डन
मैंने लम्बे समय तक चप्पल ही पहनी, जूते नहीं। बचपन से विद्यार्थी जीवन, यूनिवर्सिटी लेविल तक। चप्पल कम्फर्टेबिल रहती हैं। पैंट-शर्ट, सूट के साथ भी पैरों को कसे जूतों में डालना मुझे बुरा लगता था। जब सर्विस में आया, आफिस जाने लगा, तो भी चप्पल-प्रेमी बना रहा। लेकिन जब अधिकारी के पद पर पहुँचा, तो मेरे पदों पर चोट लगी। चप्पल छोड़ जूते पहिनना पड़ा। एक विवशता और रोज शेव करना। दोनों मुझे कष्टकर था, पर करना पड़ा।
मुझे पच्चीस साल बाद राहत मिली, जबरदस्त राहत, जब मैं ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुआ। दाढ़ी सप्ताह में दो बार बनने लगी और मैं रिटायर होते ही चटपट चप्पल खरीद लाया। बड़ा सुख, बड़ी चैन। लगा मुक्ति मिली। ये दोनों मुक्तियाँ सर्विस भी मुक्ति से कम सुख-चैन-दायिनी न थीं।
अमूमन मैं अपने पदत्राण बंद रहने वाली (विदाउट लॉक) आलमारी में रखता हूँ। आज भी रखता हूँ, बजाय किसी खुले स्थान के। सो जूते मैं अपनी एक्सट्रा अलमारी में रख दिए-सदा-सर्वदा के लिए। चप्पल भी वहीं, उसी आलमारी में, उसी खाने में रखने लगा। जहाँ जूता-देव विराजमान थे। जूते और उनके ठीक बगल में चप्पलें।
मैंने सुना हुआ था, पढ़ा भी था, देखा भी है कि दो विषमलिंगी जब आस-पास होते हैं, खासकर एकांत में तो उनमें कुछ खुसुर-पुसुर चल पड़ती है। जवान या हम उम्र हों तो यह लाजमी है। शास्त्रों में भी यह कहा गया है कि फूस और आग आस-पास न हों और स्त्री-पुरुष का एकान्त-सेवन सब कुछ करा सकता है।
एक दिन मेरे सामने सब प्रत्यक्ष घटित था। यूँ तो जूते-चप्पल अगल-बगल, सटे-से रहते थे। एक दिन मैंने उन्हें अनुचित अवस्था में देख लिया। मैं अवाक्‌। चप्पल नीचे, जूता ऊपर, एक नहीं जोड़ी के दोनों। जूते तो बूढ़े थे यानी पुराने सालों के, चप्पलें नई नवेली जवान थीं। इस बेमेल उम्र में भी उनमें इश्क हो गया। फिर इश्क में तो यह होना ही था। इश्क जो कराए वह थोड़ा। शास्त्रों में कही गई बात, अब मुझे प्रमाणित और सत्य लगी। तभी मैंने जूते उठाकर नौकर को दे दिए कि वह पहन डाले। मैंने राहत अनुभव की।
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५३५/१-आर, मीरापुर,
इलाहाबाद-२११००३
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