Sunday, March 30, 2008

आदर्शवादी

सीमा सचदेव
एक्सिक्यूटिव चेयर पर बैठे हुए जनाब हैं
उनके आदर्शों का न कोई जवाब है
एनक लगी आँखों पर,उँचे -उँचे ख्वाब हैं
उपर से मीठे पर अंदर से तेज़ाब हैं
बात उनको किसी की भी भाती नहीँ
शर्म उनको ज़रा सी भी आती नहीँ
दूसरों के लिए बनाते हैं अनुशासन
स्वयं नहीँ करते हैं कभी भी पालन
इच्छा से उनकी बदल जाते हैं नियम
बनाए होते हैं उन्होंने जो स्वयं
इच्छा के आगे न चलती किसी की
भले ही चली जाए जिंदगी किसी की
स्वार्थ के लोभी ये लालच के मारे
करें क्या ये होते हैं बेबस बेचारे
मार देते हैं ये अपनी आत्मा स्वयं ही
यही बन जाते हैं उनके जीवन करम ही
गिरते हैं ये रोज अपनी नज़र में
हर रोज,हर पल,हर एक भवँर में
आवाज़ मन की ये सुनते नहीँ
परवाह ये रब्ब की भी करते नहीँ
आदर्शवाद का ये ढोल पीटते हैं
जीवन में आदर्शों को पीटते हैं
जीवन के मूल्‍यों को करते हैं घायल
जनाब इन घायलों के होते हैं कायल

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