Sunday, March 16, 2008

एक शरीर के अंग

- डॉ0 सूर्यदीन यादव
सिर ने कहा,
मुझे बैठने की थोड़ी जगह दो
पैर सहर्ष बोला,
आइए
बैठने की जगह - अरे!
हम आप के लिए सारा जहाँ
असीम आकाश दे देंगे
मैं आधार कहाँ
आप मेरे क्षितिज
अन्यथा यह धरा गगन को
रज कण से कैसे छूती!
झुककर
बच्चे को गोद में उठाकर
उसे आकाश बनाती
धरती माँ
लंबे सिर को दबाकर गोल
और टेढ़े कमजोर कर-पैर खींचकर
सीधा-सहजोर बनाती
और समझाती,
एक ही भारत माँ की संतानों
लड़-झगड़कर मटियामेट न हो
सिर-पैर कोई ब्राह्मण-शूद्र नहीं होते
हाथ-पेट कोई क्षत्रिय-वैश्य नहीं
धरती-आकाश की तरह और सूर्य-चंद्र जैसे
हिन्दु-मुस्लिम या सिक्ख-इसाई
कहीं न कहीं मिले लाल-श्वेत रक्त कणिकाएँ
अटूट रूप से जुड़े हुए
एक शरीर के अंग

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