Tuesday, March 25, 2008

प्याऊ

डॉ० पूरन सिंह
मैं अभी घर में घुसा ही था कि बाबूजी ने आवाज लगाई ''बेटा तुम्हारी कोई किताब आई है डाकिया दे गया है तुम्हारी मेज पर रखी है।''
''जी'' बाऊजी कहकर सीधा मैं कमरे से चला गाय था। कमरे में जाकर देखा तो वहाँ टेबल पर एक साहित्यिक पत्रिाका रखी थी। पत्रिाका को उलट-पुलटकर देखा तो उसमें मेरी रचना छपी थी। मैं तो बेहद खुश हो गया था। भागता-भागता आया और अपने बाऊजी को बताने लगा था। ''बाऊजी इस पत्रिका में मेरी रचना छपी है। देखो न कितनी अच्छी रचना है। यह रचना मैंने दलित वर्ग के लिए ही विशेष रूप से लिखी है। आप सुनोगे तो मैं आपको सुनाऊँ। और हाँ बाऊजी सबसे अच्छी बात तो यह है कि यह रचना ब्राह्मणों की पत्रिाका में छपी है। यह वही, ब्राह्मण है जिनके ग्रन्थों में लिखा है कि शूद्र यदि वेद पुराण सुन ले तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। बाऊजी आज समय कितना बदल गया है। वैसा कुछ भी कहो बाऊजी जाति-पांति और भेदभाव में फर्क तो आया है। आज चाहे ब्राह्मण, बनिया पीछे कुछ भी करे लेकिन मुँह पर कुछ नहीं बोलता है।'' मैं एक ही सांस में सारी बातें बोलता चला गया था। बाऊजी कुछ समझे कुछ नहीं, हाँ इतना तो अवश्य जानता हूँ वे रचना का अर्थ तो कतई नहीं समझे होंगे लेकिन पत्रिाका में मेरे नाम से कुछ छपा है और मैं खुश हूँ इस बात से वे अवश्य खुश हुए थे। दरअसल मेरे बाऊजी पढ़े-लिखे बिल्कुल नहीं हैं। हाँ, उन्होंने हम सभी भाइयों को पढ़ाया-लिखाया और बड़ा आदमी बनाया। वे तब मजदूरी करते थे और मेरी नौकरी लगने तक मजदूरी ही करते रहे। ऐसा नहीं था कि भाइयों ने उन्हें मना नहीं किया लेकिन वे नहीं माने थे अब जरूर उन्होंने मजदूरी करना छोड़ दिया था या तो यह कहें कि उनके हाथ-पाँव साथ नहीं देते इसलिए उनकी विवशता है। खैर जो भी रहा हो।
''फर्क की बात करते हो बेटा'' उन्होंने मेरी बात को बल देते हुए कहा था, ''तो मैं बताता हूँ तुम्हें। फर्क जब से शुरू हो गया था जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे। तब मैं तुम्हारी तरह ही जवान था।'' बाऊजी ने बताना शुरू किया था, ''मैं और शुक्का दोनों काम करके लौट रहे थे। रास्ते में बहुत जोर की प्यास लगी। मैंने शुक्का से कहा पानी पीएंगे भाई प्यास लग रही है बड़ी जोर की। वह कहने लगा कि अभी थोड़ी ही देर में कुछ दूरी पर ठाकुरों का गांव है। वहाँ उन्होंने प्याऊ रखी है वहाँ चलकर पानी पी लेंगे तब तक रोके रख अपने आपको। मैंने उसकी बात मान ली थी। कुछ देर पैदल चलने के बाद, ठाकुरों का गांव आ गया था। प्याऊ पर एक आदमी पानी पिला रहा था। बहुत सारे मटके रखे थे। पीतल के लोटे से वह सभी लोगों को पानी पिला रहा था। मैं भी उसके सामने जाकर पानी पीने के लिए खड़ा हो गया था। वह आदमी मुझे जानता था। जानता इसलिए था बेटा, कि मैंने वही ठाकुरों के गांव में मजदूरी की थी। मैंने उससे कहा, 'पानी पिला दो भइया' 'अभी लो' और वह आदमी एक बड़ा-सा पनारा लेकर आ गया। पनारा तुम जानते हो बेटा, जिसे तुम आज की भाषा में पाइप कहते हो वैसा ही होता था तब, मिट्टी का लम्बा-सा बरतन की तरह। उसने उस पनारे को पकड़ा और उसके एक तरफ से पानी डालना शुरू किया। वह पनारे के एक ओर पानी डालता और कुछ दूर उसके दूसरे सिरे से पानी मेरी अंजुली तक आ जाता था। यह प्रक्रिया मेरे बाऊजी मुझे हाथ से करके भी बताते जा रहे थे। मैं बहुत प्यासा था सो पानी पी गया था। अब शुक्का की बारी थी। उसने पानी तो पी लिया फिर बाद में उस पानी पिलाने वाले से पूछा कि उसने हमें पानी ऐसे क्यों पिलाया और सभी लोगों की तरह क्यों नहीं पिलाया। तो उस पानी पिलाने वाले आदमी ने कहा कि तुम नीच जाति के हो तुम्हें लोटे से पानी पिलाने से लोटा अछूत हो जाता इसलिए मैंने तुम्हें इस पनारे से पानी पिला दिया इसमें बुरा मानने की बात नहीं मैंने तुम्हें पानी तो पिला ही दिया। अब जाओ। 'अच्छा एक बात और बताओ' शुक्का खिसियाने लग गया था, ''अगर तुम लोटे से पिलाते तो लोटा अछूत बन जाता। तो तुम लोटा का क्या करते।' पानी पिलाने वाला बोला कि फेंक देते। फिर तो बेटा, शुक्का बिफर गया उसने पानी पिलाने वाले को छू लिया और छू क्या लिया उसके ऊपर चढ़कर बैठ गया और कहने लगा अब तू अपने आप को फेंक। शुक्का मेहनती तो था ही सो उसका शरीर पहलवानों की तरह बना हुआ था। पानी पिलाने वाला उसका कुछ न कर सका और भाग खड़ा हुआ। तब तक शुक्का ने वहाँ रखे हुए सारे घड़ों को लाठियों से मार-मार कर फोड़ डाला दरअसल लाठियाँ लेकर ही हम लोग काम पर जाते थे और वापिस भी आते थे क्योंकि रात-बिरात कोई जानवर आदि न मिल जाए तो हम उससे बच सकें। फिर क्या हुआ बेटा! पानी पिलाने वाला गांव में भगता हुआ गया और लौटकर पाँच-सात आदमियों को लेकर भागता हुआ ही आया। फिर वहाँ लाठियाँ चलना शुरू हुई। एक तरफ मैं और शुक्का और दूसरी तरफ वे लोग। खूब लाठी चली। हमने और शुक्का ने मारकर पसार दिया उन पाँचों को। ऐसी बात नहीं थी कि हमारे भी न लगी हो। ये जो माथे पर चोट देख रहे हो यह तभी की है। ''और बाऊजी अपना माथा दिखाने लगे थे'' और फिर उन पाँचों को पसार के इकट्ठा कर दिया फिर हम दोनों अपने घरों को वापिस लौट आए थे। कुछ दिनों बाद हमारी चोटें ठीक हो गईं लेकिन जख्म के निशान आज भी है। फिर बाद में हम काम पर जाने लगे थे। हाँ, अब एक बात जरूर थी कि वहाँ प्याऊ नहीं लगती थी। इससे इतना नुकसान तो हुआ था कि प्यासे को पानी आसानी से नहीं मिलता था लेकिन छूत-अछूत की बीमारी का भी किसी को सामना नहीं करना पड़ता था। अब तुम देखो न बेटा प्यास से मर तो जाएंगे नहीं और मर भी जाएं तो कम से कम एक बार ही मरेंगे। लेकिन अपमान से रोज-रोज मरना तो अच्छी बात नहीं है।'' ''हाँ बाऊजी'' मैं सिर्फ इतना ही कह पाया था।
२४०-फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर,
नई दिल्ली - ८
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