Sunday, March 16, 2008

वो थका हुआ मेरी बाँहों में.......-बशीर बद्र


वो थका हुआ मेरी बाँहों में ज़रा सो गया था क्या हुआ
अभी मैंने देखा है चाँद भी किसी शाख-ए-गुल पे झुका हुआ

जिसे ले गई है अभी हवा वो वर्क था दिल की किताब का
कहीं आसुओं से मिटा हुआ कहीं आसुओं से लिखा हुआ

कई मील रेत को काट कर कोई मौज फूल खिला गई
कोई पेड़ प्यास से मर रहा है नदी के पास खड़ा हुआ

मुझे हादसों से सजा सजा के बहुत हसीं बना दिया
मेरा दिल भी जैसे दुल्हन का हाथ हो मेह्दियों से रचा हुआ

वही ख़त की जिसपे जगह जगह दो महकते होटों के चाँद थे
किसी भूले बिसरे से ताक पर तह-ए-गर्द होगा दबा हुआ

वही शहर है वही रास्ते वही घर है और वही लान भी
मगर उस दरीचे से पूछना वो दरख्त अनार का क्या हुआ

मेरे साथ जुगनू है हमसफ़र मगर इस शहर की बिसात क्या
ये चिराग कोई चिराग है न जला हुआ न बुझा हुआ

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3 comments:

Devi Nangrani said...

Dr. Ahmed Feroz ji
Is manchpar har vidha par apni man pasand rachnayein padhne ko mili aur saath mein yeh sur mein saje shabdon ko sunna sone pe suhaga hai. Sahity ko aage le jaane ke prayas mein yeh safal kadam hai
Basheer ji vaise hi manpasand shayaron mein se hai. Unko sunna...!!
shubhkamnaon sahit

Junaid Iqbal said...

awesome!! Basheer sahab ka andaaz hi juda hai:)

Anonymous said...

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