Saturday, March 22, 2008

सुख की नींद

- ध्रुव जायसवाल
देशराम के दरवाजे पर एक मुस्टंड और माफिया किस्म का व्यक्ति आया। उसके पीछे-पीछे काफी लोग बंदूक लेकर आये।
देशराम उस मुस्टंड व्यक्ति को देखकर सहम गया। उसने मुस्टंड से कहा, ''आपके बिठलाने के लिये मेरे पास आपके योग्य कोई आसन या कुर्सी नहीं है। इसी टूटे तख्त पर बैठ जाइये। वैसे मैंने दशहरे के दिन कहीं मैदान में देखा है।''
मुस्टंड हँसा और बोला, ''तुमने ठीक पहचाना। मैं कुम्भकरण राजा रावण का ही भ्राता हूं। लेकिन अब मात्र याचक रह गया हूं।''
देशराम बोला, ''प्रभु, वह आपकी राक्षसी काया नहीं। बस आपकी बड़ी-बड़ी मूंछे और आंखें आज भी डराने वाली लगती हैं। यह खद्दर का कुर्ता यह खद्दर की टोपी आप पर बहुत बेमेल सी लगती है। वैसे मैं आपसे उस नींद की गोलियों के बारे में जरूर पूछूंगा। जिसे खाकर आप साल-साल भर सुख की नींद सोते रहते थे। मुझे बहुत टेंशन रहता है। समस्यायें इतनी रहती हैं कि नींद नहीं आती है।''
कुम्भकरण हँसा और बोला, ''उन नींद की गालियों का नाम लिखवा दूगा। मैं इस वक्त एक याचक बनकर तुम्हारे पास आया हूं। मैं चुनाव लड़ रहा हूं। तुम्हें मुझे वोट देना है।''
देशराम बोला, ''हम सब जाति धर्म के नाम पर पार्टी के व्यक्ति होते हैं फिर उसी के लिहाज से अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं।''
मुस्टंड ने मूंछों पर ताव देते हुये गरजती और धमकाने की आवाज में कहा, ''हमारी कोई पार्टी, पार्टी नहीं है। अवसर पाकर हम उनके आफर को देखते हुये उनकी पार्टी में शामिल हो जाते हैं। सभी पार्टी वाले मेरे चरणों पर बिछे रहते हैं। वे हमसे गिड़गिड़ा कर कहते हैं कि आप मेरी पार्टी में आ जाइये। मैं बड़े सम्मान के साथ पार्टी में बड़ा ओहदा दूंगा, यदि सत्ता में आया तो वरिष्ठ विभाग वाला मन्त्री बना दूंगा। तुम यदि मुझे वोट इस याचना को स्वीकार करके देते हो तो ठीक, नहीं तो मेरे पीछे बंदूकधारियों की जो फौज है वह तुमसे वोट दिलवा देगी।''
चुनाव के दिन देशराम बूथ पर पहुँचा, देखा कुम्भकरण अपनी मूंछों पर ताव देता हुआ खड़ा था। देशराम ने कुम्भकरण को देखकर बहुत विनम्रता के साथ नमन किया और बोला, ''प्रभु, मैं आपको ही वोट दूंगा। अरे यही क्या कम है कि आप इस मामूली नागरिक के दरवाजे पर वोट मांगने आये। बस कभी-कभी हमारे गाँव इसी तरह आते रहियेगा। या फिर..........।''
कुम्भकरण ने डपटते हुये पूछा, ''या फिर क्या।''
देशराम बोला, ''कहीं आप अपनी कुम्भकरणीय प्रवृत्ति में न आ जाइयेगा।''
कुम्भकरण ने पूछा, ''क्या मतलब।''
देशराम ने सहमते हुये कहा, ''आप आज वोट के दिन और चुनाव जीतने के बाद आप सो जायेंगे फिर आप पांच वर्षों तक सोते ही रहेंगे। पहले आप वर्ष में एक दिन जगते थे और अपना पूरा आहार लेकर फिर सो जाया करते थे।''
कुम्भकरण बोला, ''पूर्ण आहार तो मैं अब भी लूंगा और फिर सुख की नींद सोता रहूंगा।''
देशराम ने धीमे स्वरों में कहा, ''प्रभु, आपने वायदा किया था कि मुझे उन नींद की गोलियों का नाम लिखवा देंगे। आज अभी मुझे वह नाम लिखवा दीजिये ताकि मैं सभी समस्याओं से मुक्त होकर सोता रहूं।''
कुम्भकरण ने हंसते हुये कहा, ''क्या करोगे उन गोलियों का नाम लिखकर। परिवार नियोजन वालों की टीम मेरे चुनाव क्षेत्र में जायेगी और आज इस मतदान के दिन के बाद कोई भी नागरिक या मतदाता जगता नहीं मिले, वे सब उन नागरिकों को नींद की गोलियां बांट रहे हैं। आप सब पांच वर्षों तक मेरी तरह सुख की नींद सोते रहियेगा। आप सब सभी टेंशन से मुक्त होकर पांच सालों तक सोते रहियेगा, सुख की नींद।''
देशराम कुम्भकरण के चरणों पर गिरता हुआ बोला, ''धन्य हो प्रभु, आप भी पांच वर्षों तक खर्राटा भरकर सुख की नींद में सोइयेगा। और हम नागरिक लोग भी पांच वर्षों तक सभी टेंशन और सभी समस्याओं से जैसे मुक्त होकर सोते रहेंगे। न आपको अपने वायदे याद रहेंगे और हम भी आप के सारे वायदों को भूल जायेंगे। आजकल पल्स पोलियो वाले भी दरवाजे-दरवाजे जाकर पोलियो ड्राप पिला रहे हैं, उसी तरह हम सभी सुख की नींद लेने वाले दो-दो बूंद का ड्राप्स पिलवा दीजियेगा। जय हो प्रभु। जैसे राजा सुखी वैसी ही प्रजा सुखारी रहेगी।''
टांडा (अम्बेडकर नगर) उ०प्र०
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