Tuesday, March 18, 2008

अंतिम दशक के आंचलिक उपन्यासों में नारी विमर्श

- डॉ० गिरीश काशिद
वर्तमान युग में नारी विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही है। राजनीति, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, कला आदि क्षेत्रों में वह सक्रिय है। लेकिन यह प्रगति देश की औसत नारी की नहीं है। आज नगर, महानगर की नारी जहाँ प्रगति की सीढ़ियाँ लाँघ रही है वहाँ गाँव, अंचल की नारी मात्र आज भी पूर्णतः शोषण की मध्ययुगीन सामंती परंपरा से मुक्त नहीं हो पाई है। पिछड़े गाँव तथा अंचलों में निरक्षरता, आर्थिक परवशता, रूढ़िवादिता, रूग्ण मान्यताएँ आदि नारी की प्रगति में बाधा बने हैं। वहाँ नारी की ओर देखने का नजरिया भी नहीं बदला है। वह पूरी निष्ठा से चारदीवारी में रहकर भारतीय परंपराओं का निर्वाह कर रही है। दूसरी ओर नगर में नारी पाश्चात्य अंधानुकरण के पीछे बेतहाशा दौड़ लगा रही है अर्थात्‌ समग्र भारतीय नारी जीवन में विषमता है। एक ओर रुग्ण परंपराओं के कारण अभिशप्त जीवन है तो दूसरी ओर अंधानुकरण के कारण वह अपनी पहचान खो रही है। ग्रामीण, आंचलिक नारी का जीवन विभिन्न अंतर्विरोधों से घिरा है। उसका दाम्पत्य जीवन नगरीय नारी की तुलना में काफी संतोषप्रद है लेकिन वह बाह्‌य शक्तियों की शिकार बन रही है। वैसे बाह्‌य शक्तियाँ नगरीय जीवन में भी नारी का दोहन कर रही हैं। समग्रतः भारतीय नारी की दशा संतोषप्रद कही नहीं जा सकती। डॉ० आशारानी व्होरा का मत द्रष्टव्य है, ''भारत की औसत नारी आज भी सामाजिक दृष्टि से उतनी ही पिछड़ी है। इसलिए या तो वह अपने हितों और हकों से अनभिज्ञ हैं या हित-स्वार्थ में नए प्राप्त हकों का दुरुपयोग करने लगी है।''१ नगर में नारी आत्मनिर्भर बनने के बावजूद सुरक्षित है ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। बीसवीं सदी का अंतिम दशक बीतने के बाद यह स्पष्ट एहसास हो गया है कि आम महिलाओं की रोजमर्रा की जिंदगी बदतर अर्थात्‌ असुरक्षित बन गई है। घर में अपनी अस्मिता के लिए संघर्षरत नारी बाहर मात्र खुलेआम पुरुषों के अत्याचारों का शिकार बन रही है। ''भले ही भारतीय महिलाएँ ब्रह्‌माण्ड सुंदरी तथा विश्व सुंदरी का खिताब जीतकर राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री से हाथ मिलाने लगी हैं, लेकिन औसतन पूरे देश की महिलाओं के खिलाफ अत्याचार बढ़ रहे हैं ... भारत के दूर-दराज के गाँवों में मोटे तौर से आज भी हालात ऐसे हैं कि यदि आप एक दलित हैं, उस पर भी औरतजात तो प्रताड़ना और उत्पीड़न आपके जीवन का अनिवार्य हिस्सा बनते चले जाते हैं।''२
बीसवीं सदी का उत्तरार्ध अधिक जटिल बनता नजर आता है। आए दिन बढ़ती व्यावहारिकता, प्रदर्शनप्रियता, दिशाहीनता और संवेदनहीनता आज की मूल चिंता है। मीडिया की चकाचौंध नारी देह का शोषण कर रही है। श्लील-अश्लीलता के निकष बदल रहे हैं। नारी संक्रमण की पीड़ा से गुजर रही है। अंतिम दशक ने कईं नई समस्याएँ प्रदान की हैं। इससे संपूर्ण जनमानस उद्वेलित हो गया है। परिवर्तन के एक पक्ष ने जहाँ उन्नति के शिखर पर पहुँचाया वहाँ दूसरे पक्ष ने चहुमुखी विघटन की विभीषिका बहाल की है। एक तरह से ''बीसवीं सदी का अंतिम दशक तीव्र राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलावों के बीच संघर्षरत भारतीय मनुष्य की आहत अदमनीय जिजीविषा का दशक भी रहा है। इसी कालखंड में जहाँ स्त्रियाँ और दलित वर्ग अपने हक की लड़ाई में सामने आए वहीं बाजारवाद, उपभोक्तावाद, भूमंडलीकरण और उत्तर आधुनिकता की चुनौतियाँ भी सामने आईं।''३ इन बदलते संदर्भों के तहत भारतीय जनमानस संक्रमण से गुजर रहा है। हिंदी उपन्यासों में इन बदलते संदर्भों को समेटने की पर्याप्त कोशिश मिलती है। विशेषतः यहाँ आकर नारी विमर्श केन्द्र में आ गया है। प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा, चित्रा मुद्गल, नासिरा शर्मा, अलका सरावगी, गीतांजलि श्री, कृष्णा सोबती आदि महिला लेखिकाओं ने इस विमर्श को अधिक तल्ख बनाया है इसमें संदेह नहीं।
हिंदी के आंचलिक उपन्यासों ने पिछड़े अंचलों का यथार्थ अंकन किया है। इन उपन्यासों में विशुद्ध नारी विमर्श ढूँढ़ना निरर्थक है लेकिन उन्होंने नारी को अनदेखा भी नहीं किया है। पचास बरस की यात्रा में 'रतिनाथ की चाची' (१९४८), 'कब तक पुकारुँ' (१९५८), 'सूरज किरन की छाँव' (१९५९), 'गोपुली गफूरन', 'हिरना साँवरी' (१९६२), 'आठवीं भँवर' (१९६९), 'कगार की आग' (१९७६), 'पिंजरे में पन्ना' (१९८१), 'वनतरी' (१९८६), 'शैलूष' (१९८९), 'उस चिड़िया का नाम' (१९८९) जैसे कई उपन्यास नारी केंद्रित मिलते हैं और इन उपन्यासों में आंचलिक नारी की व्यथा को यथार्थ वाणी मिली है। अंतिम दशक के आंचलिक उपन्यासों में नारी विमर्श के परिप्रेक्ष्य में मिथिलेश्वर का 'यह अंत नहीं' (२०००) और मैत्रेयी पुष्पा का 'अल्मा कबूतरी' (२०००) उपन्यास उल्लेखनीय हैं। वैसे रामदरश मिश्र के 'बीस बरस' (१९९६) तथा संजीव के 'जंगल जहाँ शुरू होता है' (२०००) उपन्यासों में भी नारी जीवन है लेकिन केंद्रीय नहीं।
मिथिलेश्वर का 'यह अंत नहीं' उपन्यास नारी विमर्श की अनोखी पहल है। भूमिहीन दलित परिवार की चुनिया इस उपन्यास के केंद्र में है। लेखक ने चुनिया का जुझारूपन, हिम्मत, आत्मबल, साहसिकता, निर्भीकता और जीवटपन का मनोयोग से चित्रण किया है। उसका व्यक्तित्व लोमहर्षक ही नहीं अपितु उसमें अपराजेय जीवन शक्ति मौजूद है। उपन्यासकार ने चुनिया के चरित्र को महाकाव्यात्मक गरिमा दी है या कहें कि वह नारी चेतना में पौरूष का अन्वेषण करता है। चुनिया ग्राम जीवन की एक ऐसी जुझारू नारी है जो संघर्ष का व्यष्टि दायरा लाँघकर समष्टि तक पहुँचती है। वह व्यापक दृष्टि और सामाजिक सरोकार से ओतप्रोत है। वह स्वयं के अस्तित्व हेतु नहीं, स्वयं की जाति हेतु नहीं अपितु संघर्ष द्वारा जातीय दीवारें पाटने की पहल करती है। उसमें अकाट्य साहस है। अपने पति जोखू का अपहरण होने पर वह घर में बैठकर रोती नहीं, उसकी खोज हेतु निकलती है - गाँव के बंधन, मर्यादाओं को खूँटी पर टाँगकर। अंततः वह साहस के साथ अपहरणकर्ताओं के चंगुल से पति जोखू की रिहाई करती है। उसका साहस देखकर मुखिया घमाडी राय यहाँ तक कहता है, ''ई तो शेरनी है, शेरनी! असली छत्रानी!''४ चुनिया का संघर्ष रचनात्मक है। उसके संघर्ष में गाँव को बचाने की चिंता है। उपन्यासकार इस चरित्र को आदर्श पर रेखांकित करता है, लेकिन चुनिया यथार्थ से बेखबर भी नहीं है। उपन्यास का शीर्षक इसी को उजागर करता है। इस उपन्यास के संदर्भ में राकेश कुमार का मत समीचीन है - ''यह अंत नहीं' की प्रमुख चरित्र है अनपढ़ चुनिया जो पुरुष वर्चस्व के मिथक को उसके समस्त पौरूष और प्रज्ञा को ध्वस्त कर देती है। चुनिया के संघर्ष, धीरज, जीवट और अपराजेय जिजीविषा की अनोखी दास्तान है यह उपन्यास।''५ उपन्यासकार ने चुनिया के माध्यम से ग्रामीण दलित नारी में अनोखी अस्मिता का अन्वेषण किया है। वह उसे परंपरागत कटघरे से बाहर निकालकर विविध मोर्चे पर कार्यप्रवण बनाता है। कुछ अपवादों को छोड़कर इस उपन्यास में नारी अस्मिता का यथार्थ अंकन हुआ है।
मैत्रेयी पुष्पा ने 'अल्मा कबूतरी' उपन्यास में जनजातीय नारी के माध्यम से नारी चेतना और अस्मिता की सशक्त अभिव्यक्ति की है। झूरी, कदमबाई और अल्मा जैसे नारी चरित्र इस उपन्यास की महत्‌ उपलब्धि है। अल्मा में जनजातीय नारी के लक्षणों के साथ परिवर्तित विचार भी मौजूद हैं। वह आपत्तियों का डटकर मुकाबला करती है। संघर्ष की आग को बुझने नहीं देती, भटकन के बावजूद हार नहीं मानती। अल्मा लेखिका की संवेदना है। उसी के माध्यम से नारी चेतना और विमर्श उजागर हुआ है। लेखिका ने अल्मा के चरित्र को परिपूर्ण बनाने हेतु कोई कोताही नहीं बरती है। लेखिका को इसमें सफलता भी मिली है लेकिन अल्मा की स्वाभाविकता बाधित हुई है। अल्मा कठपुतली-सी बनी है। अल्मा का मंत्री पद तक का सफर मात्र अविश्वसनीय ही नहीं अपितु आरोपित लगता है। इसी कारण डॉ० सत्यकाम 'अल्मा कबूतरी' को अर्थपूर्ण रचना मानने के बावजूद लिखते हैं, 'अल्मा कबूतरी में अल्मा कबूतरी की कहानी ही सबसे कमजोर हो गई है। यह चटक है, मजेदार है, मसालेदार, रोमांचक है, परंतु नकली है। इसकी कथा में हल्कापन भी है। उपन्यास के इस अंश को पढ़कर गुलशन नंदा के उपन्यास की याद आती है।'६ लेखिका ने नैतिक दबावों की मात्र धज्जियाँ उड़ा दी है। वह नारी की स्वाभाविक शक्ति को उजागर करती है। अल्मा का राणा को पुरुष बनना इसका उदाहरण है। दूसरी ओर धीरज पर पुरुष द्वारा रचाया बलात्कार पुरुष की शोषित और बहशी मानसिकता उजागर करती है। अल्मा अंततः सफल हुई ऐसा कहा नहीं जा सकता है। यदि कहा भी जाए तो उसकी सफलता लेखिका की है। ''अल्मा महत्त्वपूर्ण तो बनी है पर छोटे से तंबू से निकल बड़े तंबू में डैने पसार कलाबाजि+याँ दिखाने वाले परिंदे की ही नियति तक पहुँची है।''७ वैसे देखा जाए तो अल्मा का मूल झूरी में है जो कदमबाई से विकसित होता हुआ अल्मा में परिवर्तित हुआ है। तीनों में अस्मिता और विद्रोह है लेकिन संघर्ष की अपनी राहे हैं। कदमबाई शोषित और अपने तथा बाह्‌य समाज से प्रताड़ित है। उसमें अकाट्य साहस और जिजीविषा है। कदमबाई के माध्यम से जातीय जिंदगी का अन्वेषण हुआ है। उसकी तुलना में अल्मा कमजोर है। जिस ढंग से 'कब तक पुकारुँ' की करनट प्यारी और कजरी का चरित्र विकसित हुआ है वैसे अल्मा का नहीं हो पाया है। 'शैलूष' की सब्बो से मात्र वह अलग बनी है।
अन्य उपन्यासों में नारी चरित्र हाशिए पर मिलते हैं बावजूद अपनी पहचान बनाते हैं।'डूब' की लुहारन गोराबाई के माध्यम से ग्रामीण नारी की एक अनूठी तसवीर उजागर हुई है। 'पार' की तेजस्विनी पति रामदुलारे के कंधे से कंधा मिलाकर संरचनात्मक योगदान देती है। 'बीस बरस' की पवित्रा और वंदना गाँव के जीवन में पनपनेवाली नई नारी अस्मिता की प्रतीक है। वंदना अपनी अस्मिता के लिए ही नहीं गाँव की नारी अस्मिता के लिए संघर्षरत मिलती है। शिक्षित दलित पवित्रा गाँव के शोहदों को सबक सिखाती है। उनके साहसी कारनामों से दामोदर तक सोचता है, ''मुझे लगा कि इस गाँव के भीतर एक और गाँव जन्म ले रहा है।''८ 'जंगल जहाँ शुरू होता है' उपन्यास में मलारी का चरित्र अपनी पहचान बनाता है। वह पुलिस, डाकू आदि की वासना का शिकार बनती है। बावजूद एस.पी. कुमार उसकी नैतिक धाक से डाँवाडोल होता है। दूसरी ओर इन उपन्यासों में नारी शोषण की अधिकता पाई जाती है। 'डूब', 'पार', 'जंगल जहाँ शुरू होता है', 'गगन घटा घहरानी', 'अल्मा कबूतरी' इन उपन्यासों में जनजातीय नारी पुलिस और सामंती शक्तियों द्वारा शोषित पाई जाती है। इस शोषण का न अंत है न कहीं सुनवाई। वे घुट-घुटकर इसे सहने को अभिशप्त है। विरोध करने वाली एखाद का ही चुनिया या हीरामनी मिलती है। अन्यथा अक्कल कदम, झूरी, मलारी जैसी कई नारियाँ इसे नियति मानकर सहती है।
आंचलिक उपन्यासकारों ने नारी चेतना और नारी शोषण दोनों का यथार्थ अंकन किया है। बावजूद आज भी अंचल का नारी जीवन पूर्णतः उजागर नहीं हो सका है। 'कब तक पुकारुँ' में रांगेय राघव ने करनट नारी की चेतना को जिस बारीकी से आँका है, 'कगार की आग' में हिमांशु जोशी ने गोमती के द्वारा जिस जीवट पहाड़ी नारी को प्रस्तुत किया है, पंकज विष्ट ने 'उस चिड़िया का नाम' में लोकतत्त्व द्वारा पहाड़ी नारी की व्यथा को जिस प्रकार उजागर किया है या मणि मधुकर ने 'पिंजरे में पन्ना' में पन्ना और रम्या में जिस चेतना को पिरोया है उसका अभी तक पूर्ण विकास नहीं हो पाया है। नारी विमर्श के इस दौर में ग्रामीण, पहाड़ी, जनजातीय, आंचलिक नारी आज भी उपेक्षित है। वह हाशिए पर ही है। महज कृष्णा अग्निहोत्री, मैत्रेयी पुष्पा जैसी चंद महिला लेखिकाओं को छोड़ इस नारी की व्यथा को समेटने वाली महिला लेखिकाओं का पूर्णतः अभाव है। अधिकतर महिला लेखिकाएँ मध्यवर्ग और उच्चमध्यवर्ग की होने से ग्रामीण आंचलिक नारी के बुनियादी सवालों पर न वे लिख रही हैं न लिख सकती हैं। रोटी की चिंता से ग्रस्त संघर्षमय जीवन जीनेवाली नारी कहाँ उभर रही है? वहाँ 'मनोविज्ञान', 'सेक्स' या 'प्रेम त्रिकोण' जैसी समस्याएँ कोई माने नहीं रखती है। उसका जीवन भूख के लिए संघर्षरत है अस्मिता दूर की बात है। बावजूद इस नारी के पास अपना जीवन दर्शन है जो किसी वाद या संगठन से आरोपित नहीं है। परिवेश ने उसे बहाल किए अनौपचारिक संस्कार और प्रकृति ने दी हुई दुर्दम्य जिजीविषा उसकी अनूठी शक्ति है। बाह्‌य शक्तियाँ मात्र उसका चौतरफा दोहन कर रही है। नारी लेखन इसके प्रति चुप्पी लगाए बैठा है। समग्रतः उत्तरशती के उत्तरार्ध में नारी विमर्श ने कई मात्रा में आश्वस्त किया है बावजूद वह संतोषप्रद नहीं है। भारतीय आम नारी की व्यथाएँ अभी पूर्णतः उजागर नहीं हो पाई हैं। लीक से हटकर नए प्रयोग हो रहे हैं फिर भी इस लेखन ने संपूर्ण दृष्टि पाई है ऐसा नहीं कहा जा सकता। अभी भी इसका एक व्यापक क्षेत्र अछूता और उपेक्षित है। पूर्वलेखन से आज नारी विमर्श में अपेक्षातीत विस्तार हुआ है। चिंतन के नए स्वर उभर रहे हैं। नारी के प्रति देखने की दृष्टि में भी परिवर्तन हुआ है। इस लेखन में संख्यात्मक ही नहीं तो गुणात्मक वृद्धि भी पाई जाती है। फिर भी वर्जित क्षेत्रों की अनेक अभिशप्त कहानियाँ अंधेरे में हैं और उन्हें उजागर किए बिना समग्र नारी विमर्श का दावा एकांगी होगा।
संदर्भ संकेत
१. डॉ० आशारानी व्होरा, भारतीय नारी : दशा और दिशा, अपनी बात, पृ० १३
२. मृणाल पांडे, परिधि पर स्त्री, पृ० ४०
३. (सं०) कैलाशचंद्र पंत, अक्षरा, मार्च-अप्रैल २००३, संपादकीय
४. मिथिलेश्वर, यह अंत नहीं, पृ० २७४
५. (सं०) प्रभाकर श्रोत्रिय, वागर्थ, दिसंबर - २०००, पृ० १०५ (नारी चेतना की महागाथा, राकेश कुमार सिंह)
६. (सं०) गोपाल राय, समीक्षा, जनवरी-मार्च, २००१, पृ० ३१ (अल्मा कबूतरी : एक रोमांचक कथा, सत्यकाम)
७. (सं०) आग्नेय, साक्षात्कार, जुलाई, २००३, पृ० ११४ (चीखते सपने का सफर, महेश कटारे)
८. डॉ० रामदरश मिश्र, बीस बरस, पृ० १०३
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