Saturday, March 22, 2008

द्वार-पटल

डॉ० समर सिंह सिसौदिया
कुछ कहता हूं,
पर, बहुत कुछ -
अनकहा रह जाता है,
जैसे,
मन की कुटिया का -
द्वार बंद हो जाता है!
यादों की बरसात सदृश
दृग रोते हैं,
पाने की हसरत में,
कुछ खोते हैं,
जैसे, चपते-चपते,
ठोकर लगने पर,
अनचाहे,
पैर ठिठक जाता है।
मन की कुटिया का -
द्वार बंद हो जाता है।
जब सोते में,
आँखें खुल जाती हैं,
पिछली रातों में देखा सपना,
भाव-भाव के,
अक्षर-अक्षर बन,
ढल जाता है!
मन की कुटिया का -
बंद द्वार खुल जाता है!

राजकीय कॉलोनी, हाथरस

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