Sunday, March 30, 2008

मुझे जीने दो

सीमा सचदेव
मुझे
जीना है
मुझे जीने दो

हे जननी
तुम तो समझो
मुझे दुनिया में आने तो दो

तुम
जननी हो माँ
केवल एक बार तो
मान लो मेरा भी कहना

नहीं
सह सकती मैं
और बार-बार अब
और नही मर सकती मैं

कोई
तो मुझे
दे दो घर में शरण
अपावन नही हैं मेरे चरण

क्यों
हर बार मुझे
तिरस्कार ही मिलता है?
मेरा आना सबको ही खलता है

हे जनक
मैं तुम्हारा ही तो बोया हुआ बीज हूँ
नहीं कोई अनोखी चीज़ हूँ

बोलो
मेरी क्या ग़लती है?
क्यों केवल मुझे ही
तुम्हारी ग़लती की सज़ा मिलती है?

कब तक
आख़िर कब तक
मैं यह सब सहूंगी?
दुनिया में आने को तड़पती रहूंगी?

क्या
माँ का गर्भ ही
है मेरा सदा का ठिकाना?
बस वहीं तक होगा मेरा आना जाना?

क्या
नही खोलूँगी मैं
आँख दुनिया में कभी?

क्यों
निर्दयी बन गये हैं माँ बाप भी?

कहाँ तक
चलेगी यह दुनिया
बिना बेटी के आने से?

बेटी बन कर
मैने क्या पाया जमाने से?

मैं
दिखाऊंगी नई राह
दूँगी नई सोच ज़माने को

मुझे
दुनिया में आने तो दो

मैं जीना चाहती हूँ
मुझे जीने तो दो

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