Monday, March 17, 2008

आज की कहानियाँ

- डॉ० मीरा चन्दा
आज हिन्दी कहानी ने एक सदी की अपनी ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर ली। इस सुदीर्घ यात्रा में हिन्दी कहानी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विभिन्न स्थितियों, मनोवृत्तियों, प्रवृत्तियों, से होकर गुजरी है। वह अपने समय और समाज के साथ परिवर्तित होती रही है। कहानी एक रचनात्मक विधा है जिसकी पृष्ठभूमि में खुद का यथार्थ और सामाजिक संदर्भ होता है, हर भाषा और समाज की अपनी कहानी होती है। उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द्र के समय से ही कहानी भारतीय समाज के यथार्थ को गहरी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करने का उपक्रम करती आ रही है। आज कहानियों के वर्तमान के बदलते यथार्थ और संदर्भ की दृष्टि से परखना उचित होगा।
छठे दशक की कहानियों ने जीवन और मूल्यगत संघर्षों को आन्तरिक और वाह्य दोनों तरह की चुनौतियों से संघर्ष करने का सत्य रचा। इस प्रक्रिया में कहानी की दो धाराएँ बनीं। पहली वह जो अपने अंचल और परिवेश विशेष से जुड़ी थी। उन्होंने वहाँ की समस्याओं को स्वस्थ मानवीय संवेदना के माध्यम से समूचे परिवेश से अनुभव एकत्र कर जीवन को व्यापक संदर्भ में रेखांकित किया और दूसरी वह जिसने अपने अनुभव-जगत्‌ से व्यक्तिगत यथार्थ और संघर्ष को समष्टि के व्यापक परिपेक्ष्य में देखा। अस्सी और नब्बे का दशक जीवन और समाज के हर सोपान पर बदलाव का समय था। सामाजिक मूल्यों का अवमूल्यन, नैतिकता का हृास, अत्याधुनिकता का रंग, राजनीतिक उठा-पटक, आपातकाल, केन्द्र में काँग्रेस के वर्चस्व का अंत, दलित और पिछड़े वर्गों का उदय और विस्तार, महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, इलैक्ट्रानिक मीडिया, उपभोक्तावाद साम्प्रदायिकता, दिशाहीनता आदि ने कहानी-विधा को अपने पुनर्मूल्यांकन की प्रेरणा दी। कथाकारों ने आज के संदर्भ में कहानी को परखने और सँवारने का बीड़ा उठाया। अभिजात-वर्ग के दाँव-पेंच एवं दिखावटी जीवन मूल्यों के खोखलेपन पर उनकी लेखनी जम कर चली।
वर्तमान युग में फैली बेरोजगारी और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार धर्म-विरोध से जन्में आतंक, अन्यायी न्याय-व्यवस्था, आर्थिक अभाव के शिकंजे में छटपटाते लोगों की त्रासदियों को इस नयी पीढ़ी ने अपनी कहानियों के माध्यम से, पूर्व पीढ़ी की छद्म तटस्थता का जहाँ एक ओर पर्दाफाश किया वहीं दूसरी ओर सामाजिक यथार्थ से सीधा संबंध जोड़ा, उदाहरणार्थ - 'चल खुसरो घर आपने' (सुरेन्द्र कुमार), 'चीर हरण के बाद' (आलम खान), 'गुमनाम' (बीर राजा), 'पहचान' (जितेन्द्र भाटिया), 'अतिथि देवो भव' (अब्दुल बिस्मिल्लाह) आदि सभी कहानियाँ विडम्बनाओं पर सीधा प्रहार करती है। इस समय की कहानियों में स्पष्टवादिता के साथ कलात्मक परिपक्वता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है। जैसे - संजीव की 'पिशाच', प्रियंबद की 'बूढ़ा काकून फिर उदास है', नर्मदेश्वर की 'पहाड़' इस बात के पुष्ट प्रमाण है।
आज आदमी निजी स्वार्थों से जुड़कर जीवन मूल्यों की अवमानना करता जा रहा है। कहानीकार भी इसी समाज का प्राणी है वह भी प्रभावित हो रहा है। नारी-पुरुष का नवीन संबंध, पारिवारिक संबंधों का विघटन, विवाहेत्तर सम्बन्ध को आज जिस तरह हमारा समाज अत्याधुनिकता के नाम पर धीरे-धीरे आत्मसात्‌ करता जा रहा है, हमारे कहानीकार भी उससे अछूते नहीं हैं। अशोक मित्र ने अपनी कहानी 'भाई' में मानवीय मूल्यों को अर्थहीन एवं नारी देह की भूख को सर्वोपरि रूप में रेखांकित किया। नंगे यथार्थ मूल्यों को सीमित परिवेश में चित्रित करने में आज कथाकार अधिक सफल है। आज कथाकार को व्यवस्था से जो मिल रहा है उसे उसी तरह समाज को वह लौटा रहा है। पर साहित्यकार का कर्त्तव्य सिर्फ यथार्थ चित्रण करना नहीं। साहित्य समाज का दर्पण है तथा पथ प्रदर्शक भी। अतः साहित्यकार का लेखन-कर्म अपने अतीत के मूल्यों का अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालना तथा नए सामाजिक, नैतिक आदर्शों एवं संवेदनाओं को रेखांकन करना है। प्रभु नारायण वर्मा का यह कथन सत्य है - ''पहले के लेखक हमसे कहीं ज्यादा प्रतिबद्ध एवं समर्पित थे। हमारे दौर के लेखक ज्यादातर शौकिया हैं।'' यही कारण है कि आज अधिकतर कहानियां समाज को प्रभावित नहीं कर पा रही हैं। लेखन-कर्म फैशन मात्र बनकर रह गया है। आज लेखक लिखने से ज्यादा छपने की चिन्ता में अपनी ऊर्जा समाप्त कर रहा है। इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देने में मीडिया का बहुत बड़ा हाथ है। मीडिया की चमक-दमक, रातों-रात शोहरत और पैसा कमाने की ललक ने इस प्रवृत्ति को और हवा दी है। रायपुर में हुई 'कथा-विमर्श' गोष्ठी के उद्घाटन भाषण में डॉ० प्रभाकर श्रोत्रिय ने मीडिया प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए कहा -''जो कुछ हमारे समय में ध्वस्त हो चुका है उसके खिलाफ केवल सर्जक ही खड़ा हो सकता है और कुछ नया रच सकता है। भाषा के साहित्य को हमने ही बहुत दरिद्र बनाया है। आज मीडिया जिन चीजों को ढँकने में व्यस्त है शब्द को वहाँ पहुँचाना चाहिए। आज मीडिया दिखा कुछ रहा है और रच कुछ रहा है।''इस दिखाने और रचने के बीच साहित्य खड़ा है।'' दूरदर्शन के सीरियल में अधिकतर सम्पत्ति के झगड़ों, दूसरे के माल हथियाने के अपराध कथाओं, अत्यन्त गतिवान जासूसी कथानकों का इन्द्रजाल फैला हुआ है। गाँव, कस्बों के सामाजिक संघर्ष, हाशिये पर पड़े किसान-मजदूर के जीवन की त्रासदियाँ प्रायः वहाँ नहीं मिलतीं, जो हमारे समाज की सच्चाई है। इस सबके साथ यह बात भी सत्य है कि सम्पादकीय उदासीनता, प्रतिष्ठित लेखक-वर्ग का नयी पीढ़ी को प्रोत्साहन न देना, नयी आर्थिक उपभोक्तावादी नीतियाँ, जब आदमी के महत्त्व को निगल रही हों तो लेखक इनसे अछूते कैसे रह सकते हैं।
इन सबके बावजूद कतिपय लेखक अपनी रचनाओं में नई दृष्टि और लेखन क्षमता में परिष्कृत है। इस वर्ष की चर्चा के मुख्य केन्द्र में चार कहानियाँ रहीं जिनमें विद्या नौटियाल की 'खच्चर फ्रगणू नहीं होते', सत्येन्द्र कुमार की 'नेशन खां विरयान', राजेन्द्र यादव की 'हासिल' और मैत्रेयी पुष्पा की 'गोमा हँसती है' प्रमुख हैं। जिन कथाकारों द्वारा शिल्प, भाषा-विन्यास में नए प्रयोग किये जा रहे हैं उनमें नगेन्द्र नामदेव का नाम भी महत्त्वपूर्ण है। संवेदना और आत्मीयता उनकी लगभग सभी कहानियों का मेरूदंड है। उन्होंने पतनशील समाज के विभिन्न चित्र, अंतरंग अनुभूतियों से भरे कथ्य को व्यक्तिगत अनुभवों की दृष्टि से रेखांकित किया है। प्रियंबद के कहानी-संग्रह 'खरगोश' की कहानियाँ भी कस्बाई माहौल और मानसिकता को चुस्त भाषा-शैली एवं जादुई वातावरण के माध्यम से उभारती हैं। कथा पात्रों व कथा-स्थितियों के बीच से स्वतः स्फुरित होकर वहाँ की त्रासदियों, गुत्थियों को बड़ी सहजता से रेखांकित करती है। सारा राय की कहानियाँ भी कथा-भाषा व कथा-अनुभव की नयी संभावनाएँ निर्मित करने में पूर्ण सक्षम हैं। उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ से सीधा साक्षात्कार नहीं होता। सामाजिक-सांस्कृतिक दबावों के मूर्त-अमूर्त रेखांकन का उनका अपना ढंग है। इनके कहानी-संग्रह'आबाबील की उड़ान' की कहानियाँ इसके उदाहरण है।
दसवें दशक में संजय, प्रेमकुमार मिश्र, रघुनन्दन त्रिवेदी, संजय खाती, अलका सारावगी जैसे लेखकों ने अपनी प्रारम्भिक रचनाओं के द्वारा अपने प्रौढ़ लेखन एवं विचारों की स्पष्ट अभिव्यक्ति से विस्मित किया है और नई संभावनाओं की ओर संकेत दिया है। इस श्रृंखला में अगला नाम संजय सहाय का है जिन्होंने अपने कहानी-संग्रह 'सुरंग' के माध्यम से ग्रामीण-शहरी जीवन, उत्पीड़ित एवं अभिजात वर्ग तथा मध्यमवर्ग की चेतना का बहुरंगी संसार रचा है। इन कहानियों के यथार्थ से सीधा सर्जनात्मक संबंध बनाते हुए कथा को केन्द्र में रखकर उसके परिप्रेक्ष्य में विचारधाराओं का मूल्यांकन किया गया है। उनका सर्जनात्मक एवं आलोचनात्मक अनुशासन ही उनकी कहानियों की विशेषता है। इस वर्ष कई अच्छे कहानी-संग्रह और आये। ममता कालिया का'बोलने वाली औरत', मंजुल भगत का'बूँद', गोविन्द मित्र का 'हवाबाज', नासिरा शर्मा का 'खुदा की वापसी' और नये कथाकारों में जयशंकर का 'मरूथल' प्रमुख हैं।
सदी के अन्त में जिस तरह तेजी से यथार्थ का स्वरूप बदल रहा है उसे कभी यथार्थवाद और कभी प्रकृतवाद का नाम देकर रेखांकित किया जा रहा है उससे हमें बचना होगा। सही अर्थों में हम आज शुद्ध यथार्थ की अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को पकड़ ही नहीं पा रहे हैं पर यह बात भी उतनी ही सच है कि आज के कहानीकारों की पीढ़ी विभिन्न धरातल पर प्रौढ़ गद्य भाषा में नए अनुभव एवं संवेदना से पूर्ण नई कहानियों के लिए प्लेटफार्म बना रहे हैं। आज लघु-कथा विधा का बड़ी तीव्रता से कथा-साहित्य में प्रवेश हुआ है। यह विधा आज की दौड़ती-भागती जिंदगी की माँग भी है। इन कथाओं का कथ्य छोटा पर कसा हुआ एवं धारदार होता है, जिसके कारण इसका प्रभाव त्वरित और स्थायी होता है। संवेदना को झिझोड़ने वाली, सीधा मर्म को छूने वाली कहानियाँ होती हैं।
आज की हिन्दी कहानी ने कथ्य और शिल्प दोनों दृष्टियों से नई संभावनाओं के द्वार खोले हैं। फिर भी उसे नये शब्दों को तलाशना है, कथ्य को भाव जगत पर और माँजना है क्योंकि भविष्य के गर्भ से निकलने वाला संसार कम्प्यूटर, इंटरनेट, जीन थेरेपी, क्लोनिंग, स्पेस साइंस, नाभकीय ऊर्जा द्वारा बदला उसका स्वरूप, उसकी समस्याएँ पूरी तरह भिन्न होंगी। इसीलिए बदले हुए दबावों के आधार पर विकसित अन्तर्विरोधों से घिरे समाज का यथार्थ और उसकी त्रासदियों को रेखांकित करने वाला साहित्य भी उसके अनुरूप विकसित करना होगा। हमें रचनाओं को और उद्देश्यपूर्ण बनाना होगा। लेखक को और मुखर होना पड़ेगा।

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