Sunday, March 23, 2008

कुशा और तापसी

- सावित्री रांका
'तापसी' कहते हुए कुशा ने उसके दोनों हाथ थाम लिए।
अरे, ऐसे क्या देख रही हो, मैं हूँ तुम्हारी कुशा।
कुशा, तुम यहाँ?
क्यों नहीं, तुम सम्मानित हो रही हो, पेपर में पढ़ा और फौरन चली आई अभिनन्दन करने। खिलखिला कर हँस दी वह।
हास-विलास, परिधान कितना बदल गयी हो। कैसे जान पाती कि तुम कुशा ही हो।
पर भूल भी कैसे सकती हो। बचपन से ही तुम्हारे आस-पास मंडराती रही हूँ।
आजकल कहाँ व्यस्त है हमारी कुशाजी।
तुम जानती हो मॉडलिंग और अभिनय दो ही चहेते हैं अपने। बस इन्हीं को अर्पित हूँ। अब अपनी कहो।
यहाँ नहीं, कल घर आओ, वहीं इत्मीनान से बात करेंगे। यह रहा मेरा कार्ड, तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगी।
जरूर आऊँगी, जब तक दिल्ली में हूँ, तुम्हारे ही पास रहूगी।
अन्धा क्या चाहे, दो आँखें। तुम आओगी तो लगेगा जैसे बचपन लौट आया।
अगले दिन होटल का कमरा खाली कर कुशा तापसी के घर आ गई। किसी प्रकार की औपचारिकता का प्रश्न ही नहीं था। साफ स्पष्ट शब्दों में अपने-अपने जीवन का इतिहास खोलकर बैठ गई दोनों। पहल तापसी ने की।
हिन्दू कॉलेज से एम.ए. कर रही थी, तभी मानव से दोस्ती हुई। दोस्ती प्रेम में बदली और प्रेम की निष्पत्ति विवाह में हुई। कॉलेज में प्राध्यापिका का पद मिला तो पूरी निष्ठा से उसमें लग गई। मानव की अतिव्यवस्ता के कारण दिन-रात ऊबाऊ लगने लगे तो मैंने श्रीमती तिवारी का हाथ थाम लिया। अनेक प्रकार के सामाजिक कार्य उनके संरक्षण में चल रहे थे। मैं भी उन्हीं में लग गई। आगे तुम देख ही रही हो।
देख रही हूँ, तापसी नाम सार्थक कर रही हो। ठीक रास्ता चुना तुमने। मुझे तो अभिनय की दुनिया लुभाती थी। कई कम्पनियों के लिए अच्छी मॉडल सिद्ध हो रही थी मैं। माँग बढ़ रही थी, पर मेरा लक्ष्य तो अभिनय था। एक आर्ट फिल्म में मैं हीरोइन भी बनी थी। बड़ा इन्टरस्टिंग रोल था। 'जमींदार के घर में काम करने वाली दलित महिला उसके द्वारा किए शोषण से परेशान होकर पुरुषों से भरी पंचायत में उसे लांछित कर न्याय की गुहार करती है।' उस चरित्र के मेरे संवाद अभिनय इतना सशक्त रहा कि उसके बाद कई फिल्मों में अच्छे रोल मिले। आज रुपया, पैसा, बंगला, गाड़ी, नौकर-चाकर दुनिया के सभी वैभव हैं मेरे पास।
सब तुम्हारी योग्यता और परिश्रम की देन है, कुशा। तुम बुरा न मानो तो एक बात जरूर पूछूँगी।
साधिकार पूछो।
सब कुछ होते हुए भी अभी तक विवाह क्यों नहीं किया तुमने?
सोचने का समय ही नहीं मिला, या समझो मन का मीत नहीं मिला। फिर दिन-रात के अभिनय के साथ पति, गृहस्थी और सबसे ऊपर मेरा मनमानापन मेल खाता क्या? सूखी हँसी हँस दी वह।
कुछ हद तक तुम्हारी बात ठीक है कुशा। सोलह आना सही तो नहीं कहूँगी।
तुम्हारी और मेरी दुनिया अलग है तापसी। तुम्हारे पास परिवार है, समाज है। मुझे हर बात के लिए दूसरों का रूख देखना पड़ता है। फिर ज्यों-ज्यों उमर बढ़ रही है, अच्छे रोल भी अब कम मिलने लगे हैं। अकेलापन अखरने सा लगा है।
इतनी निराश क्यों होती हो कुशा। तुम्हारा अतीत कितना शानदार रहा। अपने गौरवशाली अतीत को भूलना और वर्तमान को नकारना दोनों में ही समझदारी नहीं है बहना। रही विवाह की बात तो तुम अब भी कर सकती हो।
नहीं तापसी अब नहीं। आज तुम्हारे सामने हृदय का वह गुप्त गवाक्ष जरूर खोलूगीं जिसे मैंने बहुत निर्ममता से बंद कर रखा है।
कहो कुशा, आश्वस्त करते हुए तापसी ने उसके सिर पर प्रेम भरा हाथ रख दिया।
एक छोटा-सा सुन्दर-सा घर बसाने की बहुत तमन्ना थी मन में। जिस कम्पनी के उत्पादों की मॉडलिंग मैं कर रही थी उसी का मालिक था प्रचेता स्वामी। हम दोनों एक दूसरे को चाहने लगे थे। एक दूसरे का हाथ थामने की पूरी तैयारी कर चुके थे, बिल्कुल फिल्मी कहानी की तरह। एक दिन सोलह श्रृंगार किए मैं उस निष्ठुर प्रियतम की प्रतीक्षा करती रही। मेरे घर की दीवालें, फूलों से महकते परदे फूल-पत्ते मेरी ही तरह उसके स्वागत के लिए आतुर थे। बहुत प्रतीक्षा की। रात आँखों में निकल गई, पर वह नहीं आया।
उसके न आने का कोई कारण रहा होगा।
लाख कोशिशों के बावजूद मैं पता नहीं कर पाई। हाँ अभिनय छोड़ना उसकी शर्त थी जिसे मैंने पहले ही सहर्ष स्वीकार कर लिया था।
थोड़ा रूक कर वह खिलखिला उठी। प्रचेता छूट गया, पर जो मेरा अपना था, वह बना रहा। बस मैं अभिनय में डूब गई, सारे सपने बिखर गए, तापसी। और अब तो मुम्बई का बनावटी जीवन, मॉडलिंग की चमचमाती दुनिया की थोथी, सारहीन सी लगने लगी है। मेरे समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की तुम कल्पना नहीं कर सकती। यहाँ धोखा है, व्याभिचार है, रोमांस का अभिनय मात्रा है। यह एक ऐसी दुनिया है, जहाँ एक पल में स्वर्ग तो दूसरे पल में नरक दिखाई देता है। दूसरी ओर तुम्हें पूर्णता की ओर बढ़ते देख अच्छा लगता है, सोचती हूँ सब छोड़-छाड़ कर तुम्हारा ही हाथ थाम लूँ मैं भी।
कुशा सब नजरियें की बात है। तुम्हें जो अच्छा लगा, तुमने किया। मेरे मन की संवेदना ने मुझे समाज के उपेक्षित वर्ग की ओर मोड़ दिया। परिस्थितियाँ ऐसी ही बनती गई, फिर तुम मेरे साथ रहोगी तो अपना काम मैं दुगनी शक्ति से कर सकूँगी। एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं, यह कहावत झूठ तो नहीं है। तो मैं आज से ही तुम्हारे साथ हूँ।
सहसा किसी महिला का चीत्कार सुन चौंककर दोनों बाहर आईं।
अरे, अरे यह आप क्या कर रही हैं, क्या अपराध है इस बेचारी का।
बीस वर्ष की सुन्दर सलोनी युवती को परिवार की महिलाएँ बाल पकड़कर घसीटती हुई बाहर धकेल रही थीं।
आप बीच में मत आइए। दो वर्ष में दो बेटियों को जन्म दे चुकी है यह कुलच्छनी। एक महिला चिल्लाई। इसमें इसका क्या अपराध है? कहते हुए तापसी ने उसे सम्भाला। हैल्थ सेन्टर पहुँचाया। कच्चे शरीर में दी गई यातना वह सह न पाई और दो दिन बाद ही चल बसी।
इस दर्दनाक घटना से सहम गई कुशा। तापसी के साथ काम करते हुए उसने महिला के कोमल और वीभत्स दोनों ही रूप देखे। एक ओर पति और पुत्रा की मंगलकामना करती महिला का सौम्य रूप था तो दूसरी ओर तांत्रिाकों के चक्रव्यूह में फँसी परमेसरी नाम की महिला से भी वह मिली। जिसे बांझ होने का कलंक मिटाने के लिए पड़ोसिन के तीन वर्षीय बालक की हत्या कर उसका रक्तपान किया था। इस दारूण अपराध के लिए अब जेल के सींखचों में बंद कठोर कारावास भोग रही थीं।
तापसी तुम्हारी सहनशक्ति को दाद देती हूँ, तुम कितना कुछ देख सुन रही हो, और दूसरों की पीड़ा में डूबकर उन्हें उबारने का काम भी कर रही हो। सच्चाई को साक्षात्‌ सहना और उसका अभिनय करना दोनों बहुत अलग हैं। मैंने केवल अभिनय किया है, तुम वास्तविकता को सह रही हो, स्पष्ट देख रही हो। तुम्हारे उद्योग केन्द्रों में प्रशिक्षण लेने वाली महिलाओं में स्वाभिमान जीवन के प्रति आशा जागृत हो रही है।
कुशा, अगले सप्ताह मैं बनारस जा रही हूँ।
मैं भी चलूँगी तुम्हारे साथ। कोई जरूरी काम है क्या?
हाँ, बहुत जरूरी। तुम्हें याद होगा, अपने कॉलेज में पढ़ती थी तूलिका बनर्जी।
वही लम्बे बालों वाली लड़की?
हाँ, वही।
क्या हुआ उसे?
वही जो बंगाल में अधिकांश महिलाओं के साथ होता है। अनमेल विवाह, वैधव्य फिर काशी प्रवास। निश्चित तिथि पर दोनों बनारस पहुँची।
भक्ति रस की सात्विक धारा में आकंठ निमग्न काशी नगरी बहुत आकर्षक लगी उन्हें। मंदिरों में गूँजता हरि नाम का स्वर कितना आनन्द देता है, तापसी।
इस सरिता को प्रवाहित करने वाली महिलाओं की असलियत जानकर तुम स्तम्भित रह जाओगी कुशा। बड़ी ही दर्दनाक स्थिति में जी रही हैं ये। आधा पेट भोजन, शारीरिक-मानसिक शोषण यही नियति है इनकी। परिवार के लोलुप, स्वार्थी लोग अगले जन्म में मोक्ष प्राप्ति का झाँसा दे घर-परिवार छुड़ाकर इन्हें यहाँ छोड़ जाते हैं।
नारी को पूजने वाले देश में नारी के साथ इतना धोखा, ऐसा अत्याचार। तापसी प्रचेता की विश्वासघात ने मुझे तोड़ दिया था, मैं इसे अपने साथ किया गया बहुत बड़ा अन्याय मान रही थी परन्तु जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं तक से वंचित इन नारियों के लिए क्या कहा जाए?
कुशा तुम बहुत भावुक हो। अभिनय की चमचमाती दुनिया ही देखी है तुमने। वास्तविकता चलचित्रा से बहुत भिन्न होती है मेरी बहना।
ठीक कहती हो। नारी शोषण की इस सत्य स्थितियों को भी एक दिन फिल्माना चाहूँगी मैं।
किस शोषण को फिल्माओगी रानी। सदियों से इतिहास के पन्ने चीख-चीख कर नारी अन्तर्वेदना की कथा अलाप रहे हैं। महाराज ययाति की पुत्री माधवी की कथा याद होगी तुम्हें।
इतिहास की नहीं तापसी मैं तो आँखों देखी त्रासदी को फिल्माऊँगी, ताकि समाज के कर्णधार वास्तविकता समझ सकें।
यह सब तुम ही सोच सकती हो कुशा।
क्योंकि मैं स्वयं आहत हूँ। 'घायल की गति घायल जाने' कितना ठीक कहा है मीराबाई ने।
तुम्हें बहुत सोच समझकर कदम उठाना होगा।
आखिर क्यों?
क्योंकि परम्पराओं को छोड़ना बड़े साहस का काम होता है, कुशा।
मैं ऐसा नहीं मानती। मैंने देखा है, लोग बदलना चाहते हैं। जोंक की तरह चिपटी रूढ़ियों से छूटना चाहते हैं। सब बदलेगा एक दिन कुछ विकृत होगा, कुछ नवीन होगा। बस एक रहनुमा की जरूरत है।
और वह रहनुमा मेरी कुशा बनेगी। हँसकर कहा तापसी ने। तुम पग-पग पर मुझे सहायक पाओगी। इतनी ही भूमिका के योग्य हूँ मैं।
अभिनय क्षेत्रा में मेरे संपर्क गहरे हैं, मित्रों सहयोगियों की टीम है मेरे साथ। इसलिए ऐसा सार्थक कदम मैं जरूरी उठाऊँगी।
कुशा एक बार गंभीरता से सोच लो, इस काम की पूर्णता के लिए तुम्हें कई मंजिलें पार करनी पड़ेगी।
सब सोचकर ही कह रही हूँ।
फिल्म की दिशा निश्चित हो जाने के बाद कुशा ने सीधा मुम्बई का रास्ता पकड़ा। साथियों को अपने मिशन की जानकारी दी। अभिनेता तो बिना पारिश्रमिक के काम करने के लिए तैयार हो गए। अब समस्या दूसरे विभिन्न कामों की थी। तरह-तरह की दारूण परिस्थितियों को फिल्माने के लिए वैसा ही वातावरण, आवश्यक सामान। सैट का प्रबन्ध बहुत खर्चीला पड़ रहा था। अपना सारा बैंक बैलेंस लगाकर भी कुशा उसका प्रबन्ध नहीं कर पाई थी। हताश दिल्ली लौट आई।
तापसी लगता है मैं अपने मंतव्य में सफल नहीं हो पाऊँगी, जो बात अभिनय के द्वारा कहना चाहती हूँ कह नहीं पाऊँगी।
इतनी निराश क्यों हो कुशा, एक सोची समझी योजना को इस तरह छोड़ना ठीक नहीं। कहो मैं क्या कर सकती हूँ।
सबसे बड़ी समस्या फाइनेंस की है तापसी।
चिन्ता मर करो, मैं जानती थी। इस बारे में मानव से बात हो गई है वह पूरी तरह सहायता के लिए तैयार है।
तुम्हारी तपस्या के बिना मेरा अभियान सफल नहीं हो सकता तापसी।
कुशा मुम्बई लौट गई और फिल्म की तैयारी में व्यस्त हो गई। उत्साहित मन कभी हताश होता तो साथी सहारा देते। सारा प्रबन्ध जुटाने में लगभग एक वर्ष बीत गया।
इस बीच कुशा गहरे अन्तर्द्वन्द्व में से गुजरी थी। कभी अपने निश्चय पर स्वयं को ही कोसती, कभी चोट खाए व्यक्ति की तरह समाज में पनपते अनाचार को प्रदर्शित करने के लिए उत्साहित हो, अपने काम में लग जाती। कर्मयात्रा कठिन थी पग-पग पर कठिनाइयाँ थीं, कहीं गहरी खाइयाँ और कहीं दुस्ह पर्वत थे। हतोत्साहित हो बैठ जाना इस कर्मयात्री के स्वभाव में नहीं था, फिर तापसी जो थी। थैली का मुँह खुला रखने का आश्वासन मानव ने दिया था। अभिनेता साथी पूर्ण सहयोग के लिए तत्पर थे। फिल्म के केन्द्र में परिवार था, नारी शोषण के विविध आयाम थे। परम्पराओं को झकझोरते कई प्रश्न थे। दहेज के लिए प्रताड़ित नववधू थी। शिक्षा से संचित निरीह कन्या, भूख से व्याकुल हो संतान को तथाकथित साधुओं के हाथ बेचती माँ थी। इन सभी दृश्यों को कुशा ने तापसी की संवेदना, सहनशीलता को पुट देकर इस खूबी से फिल्माया था कि फिल्म की सफलता में किसी को सन्देह नहीं हुआ।
गाँवों में, नगरों में, जहाँ-जहाँ 'आज की नारी' फिल्म दिखाई गई, नई सोच, स्त्री के प्रति सम्वेदना का संचार हुआ। बेटा-बेटी एक समान का नारा घर-घर में चरितार्थ होने लगा। दुख और विडम्बना के बीच हिचकोले खाती, कातरता की प्रतिमूर्ति नारी का सशक्त रूप भी फिल्म में उभरकर आया था।
सखी की कार्य प्रणाली से अभिभूत तापसी उसे गले लगाकर कहने लगी, 'कुशा जो काम मैं इतने वर्षों में नहीं कर पाई थी, तुम्हारी सोच ने अल्प समय में ही कर दिखाया। मेरे अभियान को गति देकर मेरा काम बहुत आसान कर दिया है तुमने।'
सब तुम्हारी मौन तपस्या और त्याग का परिणाम है तापसी।
नारी के शोषण की जड़ें पाताल लोक तक गहरी हैं। उन्हें पहचानने, उखाड़ने में बहुत समय और शक्ति लगेगी, कुशा।
हमने अपना दायित्व पूरा कर दिया है, आगे की चिन्ता कालक्रम स्वयं करेगा।
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इंटरनेशनल रांका एण्ड कम्पनी
१-गा-४, जवाहर नगर, जयपुर-३०२००४
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