Monday, March 31, 2008

कविता

मूल चन्द सोनकर
तुझे जाने की थी जल्दी ये था बरख़िलाफ़ मेरे
कभी तो बताता क्यों था तू बर ख़िलाफ़ मेरे
करूँ किससे मैं शिकायत है कौन सुनने वाला
सारा जहाँ हुआ है जब बरख़िलाफ़ मेरे
पुरख़ार रास्तों पर किसका करूँ भरोसा
गिरे ही क़दम हुए हैं जब बरख़िलाफ़ मेरे
दुनिया में आने की जब तू न दौड़ जीत पाया
जाने में जीतने को हुआ बरख़िलाफ़ मेरे
तुझे ऐसी क्या थी जल्दी मुँह मोड़ चल दिया जो
अपनों को बख्श देता जो था बरख़िलाफ मेरे
ऐ काश! जान पाता तू मेरी बेबसी को
होता न तब तू शायद यूँ बरख़िलाफ़ मेरे
अल्लाह तेरी रहमत की ये भी बानगी है
मौत-ओ-नफ़स का शज्र : हुआ ख़िलाफ़ मेरे
तेरा लिहाज शायद गिरी बेबसी से हारा
तिरी सीरत-ए-तकल्लुफ किया बरख़िलाफ मेरे
अगर आईना मैं देखूं नजर आये शक्ल-ए-वालिद
बुना क्या कहूंगा क्यों था तू बरख़िलाफ़ मेरे
हूँ गुनाहगार तेरा, पशेमां हूँ बेबसी पर
मुझे तू मुआफ करना ऐ, बरखिलाफ़ मेरे
आऊँगा तुझसे मिलने जब रोज-ए-हश्र को मैं
मिन्नत है तब न होता तू बरखिलाफ़ मेरे
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४८, राज राजेश्वरी, गिलट बाजार, वाराणसी
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1 comment:

seema sachdeva said...

मुझे आपकी कविता समझाने मे कठिनाई हो रही है , उर्दू शब्दावली का ज्यादा प्रयोग है ,इसलिए लेकिन मई जितना समझी ,उसका भाव और लय बहुत अच्छा लगा ,खासतौर पर निम्न पंक्तियां