Tuesday, March 11, 2008

अनुप्राणित

- एम. हनीफ मदार
शाम पूरी तरह उतर चुकी थी। गहराते अंधेरे एकान्त में जहाँ-तहाँ छिटके हुए चमकते जुगनू टूटते तारों से दिखते थे। हरी घास, जो स्याह अंधेरे में बिल्कुल काली दिख रही थी। घास में छिपे चमकते जुगनुओं को देख लगने लगा मानो आसमान जमीन पर उतरा हो। कालीन-सी बिछी घास पर, अंधेरे कोने में, उसकी छुअन से तन ही नहीं, मन झंकृत होता रहा। अब जब चौंतीसवाँ सावन भी जा रहा है, उसकी स्पर्शीय ऊष्मा मन के किसी कोने में स्थिर है, जो अभी तक पुलकित कर रही है, गुदगुदा रही है, मेरे भीतर कोई गर्म एहसास भर रही है। सपनों की वह आस्था, जो वर्षों से मेरी स्पंदन गति को तीव्र करती रही है, किन्तु एक बिखरे वजूद के साथ भोर के संगीत-सी, शबनम की तरह जो घास के तने हुए सीने पर मोती-सी चमकती है, किन्तु सूरज की पहली किरण के सामने शरमाती-सी अपने वजूद के साथ पिघलती हुई कहीं विलीन हो जाती है। अंधेरे की वह तीक्ष्ण रश्मि, सपनों से कहीं दूर, अपने ठोस अस्तित्त्व के साथ मेरी धड़कन को अपनी साँसें देती रही और मुझे उस तत्त्व से परिचित कराती रही जिसमें संपूर्ण स्त्री समाहित है। स्वर्गीय जीवन जीने के निश्छल सपनों और कथित सामाजिक मर्यादाओं की झंझावत से जद्दोजहद में जुटी आस्था के बदन की सिहरन मेरे भीतर कहीं सिमट रही थी। मेरे हाथों का दबाव, उसके मध्यम उरोजों से सज्जित वक्ष के उत्थान-पतन की गति को तीव्र करता रहा था। उसके हाथों का हल्का-सा कंपन, मेरे संपूर्ण अस्तित्त्व को टटोल रहा था। उसके भीतर की पुलकन एवं जीवन के वास्तविक सुख को भोगने की स्वतंत्र लालसा के बाद भी उसका अधूरा समर्पण, उसके भीतर समाए किसी अनचाहे डर को इंगित करता रहा था। मेरा स्पर्श, बौना और शायद खोखला लगा था उसे, जबकि उसके खिले हुए चेहरे पर, झील की तरह खुदी हुई आँखें, आनंद से बोझिल हो रही थी। युवा मन की तरुण तरंगे नशे में थिरक रही थीं तब आनंद में डूबा उसका चेहरा, मुझे सुख के चरम पर ले जा रहा था। उसकी गर्म सांसे, मेरे मन के भीतर समा कर कहीं आंधी का रूप ले रही थीं और मेरे अन्तःकरण की रेत को उड़ा कर उस कृति को नंगी कर रही थी, जो मेरे मन के मरुस्थल में कहीं दबी थी, जिसे मैं वर्षों से तराशता रहा हूँ, उसे आकार देता रहा हूँ, गुम-सुम कहीं खोकर, सोते-जागते, चलते-फिरते, खाते-पीते, उठते-बैठते, हँसते-गाते, हर समय मेरे साथ, मेरे भीतर, मेरे मानस पर सजती रही है, मेरे शब्दों से, एहसासों से। उसके सजीव आलिंगन की मेरी छटपटाहट, उसके खिलखिलाने पर झड़ते अक्षरों को समेट कर शब्दों की माला गूँथ उसे पहनाती रही है। कल्पनाओं की वह आस्था, संवरती रही बसंत की तरह, पेड़ों की पोरों से निकली नई-नई पत्तियों के रंग की साड़ी में, बदल कर खिलते हुए फूलों-कलियों से सजी चोली में, बाँहों पर जैसे हरे रंग की बेल उतर आई हो। आस्था आधी खुली बांहों को, बार-बार ढँकने की कोशिश कर रही हो जिससे उसकी मोहक महक अन्दर ही रहे बाहर न फैल सके। आज उस महक ने उस अंधेरे कोने को, पूरा महका दिया जहाँ सजीव हो रही मेरी कृति खुद इस महक से परिचित हो रही थी, जैसे हिरणी को कस्तूरी मिली हो और उसे खोजने की थकन में, बढ़ती सांसों के साथउस महक में खो गई हो। यह, शहर के बाहर, पुराने कब्रगाह के चबूतरे के नीचे, मैदान में कोमल घास की बिछावन थी। ऊपर छत के रूप में नीला आकाश, जो अंधेरे से घबराकर काला दिख रहा था। उस आसमान के नीचे, आस्था मेरे स्पर्श से चाँद की तरह जीवित हो गई थी। मेरे अस्तित्त्व से बाहर, मेरी कल्पनाओं से आगे की आस्था, एक चंचल कहानी की तरह, हंसती खिलखिलाती व्यंग्य की तरह, किसी शायर की ग़जल-सी, किसी महाकाव्य की गंभीर उदारता या प्रकृति का सौंदर्य समेटे हुए कविता की तरह, जैसे संपूर्ण साहित्य उसमें समाया हो। वह मेरे ऊपर झुक-सी गई थी लगभग बोझिल-सी। उसने झुर-झुरी के साथ एक गहरी सांस भरी जैसे सीधा होने को ढेर-सा ऑक्सीजन बटोरा हो मानो उसके अंग से बेतरतीबी से जुड़ा हर शब्द, करीने से सधा हुआ हो और वह बोल पड़ी, सुरेन्द्र आप और क्या खोजना चाहते हो? जबकि, वह खुद भी वही खोज रही थी, जो मैं चाहता था। मैं उसके हर अंग को स्पर्श नहीं करना चाहता था, पर शायद हर अंग को पूरा टोह लेना चाहता था। उस अंधेरे में एक अजीब-सा सन्नाटा पसर गया था, कहीं कुछ एक होने का सन्नाटा। मेरी छुअन से उसके भीतर कहीं कुछ जीवित हो रहा था और शायद, मेरा प्रतिकार भी कर रहा था जिससे मेरे शब्दों की जुंबिश शिथिल हो रही थी। मेरी बांहें उसे लपेटने को हवा में फैल गईं, लेकिन, वह दूर खड़ी थी - किसी वीणा की तरह, जिसके तार किसी कलाकार की अंगुलियों ने छेड़ दिये हों और उन तारों में अभी तक स्पंदन हो रहा हो।'' कितनी खुश थी मैं, भीतर के लेखक मन के गुदगुदाते एहसासों में, भावनाओं के बिछोने पर, सपनों और यादों के कोमल स्पर्श के बीच निश्छलता की दुनिया में, क्यों जिंदा किया इस कब्रिस्तान में? जहाँ चारों ओर बस कब्रें ही कब्रें हैं, जैसे कब्रों का जंगल हो, डरावना, वीरान। मुझे लग रहा है जैसे मैं इस वीरान जंगल में खोती जा रही हूँ। उसके यह शब्द मेरे भीतर कहीं फूट रहे थे जो रात में घुले हवा के सन्नाटे को तोड़ रहे थे। मैं सोचने लगा, यह कब्रें नहीं बल्कि, इंसानी रूहें हैं जो सो रही हैं और हमें देखकर भी अनदेखा कर रही हैं, जैसे कह रही हों - अब कुछ मत सोचो! नहीं तो, तुम्हारी सुन्दर कल्पनाओं का यह किला ढह जाएगा, इसलिए, मन जो चाहता है उसे करने दो! वही होने दो जो होना है, जो होता है, और जो हमेशा होगा। जाने कैसे, दूर खड़े रहकर भी उसने मेरे मन के शब्दों को सुन लिया। वह दूर रहकर भी, मेरे हृदय के कितना करीब थी। मैंने उसे सीने से चिपका लिया और उसके चेहरे पर उतर आई उसके जिस्म की संपूर्ण सिहरन को चूम लिया। वह मेरे सीने में अपने चेहरे को छुपाए कह रही थी - तुम झूठ बोलते हो इन कब्रों में इंसानी रूहें नहीं हैं, बल्कि, वे तमाम छोटी-बड़ी कहानियाँ सिसक रही हैं, जो मेरी तरह स्त्री के रूप में आदमियों के बीच उतरी थीं, सोलहवें बसंत के बदलाव में, नाजुक कलियों की तरह महकती खुशबू के साथ, खुले आसमान में पंख फैलाए जीवन जीने की लालसा लिए। इन कब्रों पर फड़फड़ाते ये पंख, उन कहानियों के हैं, जो इस जमीन में बेपर के जमींदोज हैं। लेकिन, बाहर तुम भी पुरुष ही हो! वही कठोरता दम्भ और पुरुषत्त्व का लबादा ओढ़े हुए। तुम इन कहानियों की सिसकियाँ नहीं सुन पा रहे हो। तुम्हारी तो जिद रहती है नई-नई कहानियों की जीवित करने की। देखो! उनके भीतर के दरकते आइने की वे टेढ़ी-मेढ़ी किरचें, जो सहमकर जुड़ रही हैं, लेकिन कितनी दरारें शेष रहती हैं जिन्हें तुम नहीं भर सकते। इस आइने की दुनिया कितने टुकड़ों में दिखाई देती है और यह सब कथित पुरुषत्त्व का नतीजा है। और ... न जाने कब, मेरे सीने में उसकी भावनाओं के बादल फूट पड़े। मैं, उसके हृदय के संपूर्ण खारेपन को सोख लेना चाहता था अपने खुश्क हो रहे होठों से, उतारना चाहता था मैं उस खारेपन को अपने भीतर की जमीन की अनंत गहराइयों में, जो उसकी आँखों में उतर आया था एक सवाल बनकर। देखो सुरेन्द्र! इन नुचे हुए पंखों को देखो, इनके ऊपर से अंधे त्रिशूलों एवं बेरहम फतवों के निशान अभी मिटे नहीं जो इन बचे हुए पंखों को अब भी खुली हवा में उड़ने से रोक रहे हैं, और तुम, यूँ सांसें रोके देख रहे हो एक सपने की तरह, कब तक? आखिर, कब बाहर आओगे इस सपने से, यथार्थ के धरातल पर, कब तोड़ोगे इस आदमखोर सन्नाटे को? इस बार मेरी बांहें उसे अपने वजूद से समेटना चाह रही थीं। उसके जिस्म की सौंधी गंध, मुझे उसके जिस्म की पोर-पोर में समा जाने को विवश कर रही थी। न जाने तेज बह रही हवा से किसने कह दिया, जो रुककर दूर खड़े होकर हमें देखने लगी। मैं आस्था के शब्दों को छेड़ना चाह रहा था, मगर वह छिटककर दूर हो गई। तुम जिन्दगी से भाग रही हो। क्यों दूर कर रही हो खुद को, मन के स्वच्छंद युवा होते सपनों से। नहीं चाहती तुम हवाओं का रुख बदलना। मैंने उसकी आत्मा में उतरते हुए अपनी बेबशी से पल्ला झाड़ते हुए कहा था। उसकी खुली हुई आंखों में हवा का पूरा वेग समा गया था। उस हवा के पीछे से उसके कोमल सपने मायूसी से झांक रहे थे। उसने अपनी पलक झपकी तो हवा बाहर आकर कब्रों पर फैले पंखों को हड़काने लगी, आस्था देर में बोल पाई - इन हवाओं का कोई भरोसा नहीं है सुरेन्द्र, कब कौन-सी हवा हमारे बीच एक और बम का धमाका कर देगी और हमारी जुड़ी हुई कल्पनाओं के पंख उखड़ जाएँगे। सुरेन्द्र, मेरे भीतर कुछ मर रहा है, मैं इस कब्रिस्तान से दूर जाना चाहती हूँ, खुले आसमान में, दूर परियों के देश से आती हवाओं में जो मुझमें कहीं बसा है। वहाँ रहकर भी मैं तुममें रहूँ, तुम्हें महसूसती और तुम्हारे लिए ही सोचती और जीती रहूँ। हवा हमारे चारों ओर एक घेरा बना रही थी और उसके यह शब्द बाहर जाने का रास्ता खोजने के लिए हवा के बनाए उस घेरे को टटोल रहे थे। इन बने बनाए परम्परावादी रास्तों से चलकर क्या तुम इन हवाओं के चक्रवाद से दूर जा सकती हो? इन रास्तों पर चलने वाले वापस ही आते रहे हैं। इन अंधेरे पहाड़ों को तराशकर रास्ते बनाने वाले पैर कभी वापस नहीं होते। मैं धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा था। जंगली हवाएँ मेरे सीने से टकराकर मुझे रोकने का भरपूर प्रयास कर रही थीं। इन्हीं हवाओं के बीच से एक शीतल-सा झोंका धुर एहसासों के साथ मुझमें समाता चला गया, सामने खड़ी आस्था कहीं विलीन हो गई।

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