Monday, March 31, 2008

विकास दर विकास

- डॉ० वी०के० अग्रवाल
विकास दर विकास,
मानव मूल्यों का हृास।
गरीब और मेहनतकश की
रोजी-रोटी और अमन चैन
सभी का सभी, माफिया,
भ्रष्टों और गुण्डों का ग्रास,
विकास दर...।
नाले में पड़ी चील-कउओं और
कुत्तों की खायी नवजात शिशु की लाश...
आप कहते हैं विकास,
मैं कहता हूँ विनाश...।
विनाश दर विनाश...।
मानवता बदहवास...।
विनाश दर विनाश...।
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अध्यक्ष-वाणिज्य विभाग
पी०सी० बागला (पी०जी०) कालेज, हाथरस
२०४१०१ (उ०प्र०)
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कविता

मूल चन्द सोनकर
तुझे जाने की थी जल्दी ये था बरख़िलाफ़ मेरे
कभी तो बताता क्यों था तू बर ख़िलाफ़ मेरे
करूँ किससे मैं शिकायत है कौन सुनने वाला
सारा जहाँ हुआ है जब बरख़िलाफ़ मेरे
पुरख़ार रास्तों पर किसका करूँ भरोसा
गिरे ही क़दम हुए हैं जब बरख़िलाफ़ मेरे
दुनिया में आने की जब तू न दौड़ जीत पाया
जाने में जीतने को हुआ बरख़िलाफ़ मेरे
तुझे ऐसी क्या थी जल्दी मुँह मोड़ चल दिया जो
अपनों को बख्श देता जो था बरख़िलाफ मेरे
ऐ काश! जान पाता तू मेरी बेबसी को
होता न तब तू शायद यूँ बरख़िलाफ़ मेरे
अल्लाह तेरी रहमत की ये भी बानगी है
मौत-ओ-नफ़स का शज्र : हुआ ख़िलाफ़ मेरे
तेरा लिहाज शायद गिरी बेबसी से हारा
तिरी सीरत-ए-तकल्लुफ किया बरख़िलाफ मेरे
अगर आईना मैं देखूं नजर आये शक्ल-ए-वालिद
बुना क्या कहूंगा क्यों था तू बरख़िलाफ़ मेरे
हूँ गुनाहगार तेरा, पशेमां हूँ बेबसी पर
मुझे तू मुआफ करना ऐ, बरखिलाफ़ मेरे
आऊँगा तुझसे मिलने जब रोज-ए-हश्र को मैं
मिन्नत है तब न होता तू बरखिलाफ़ मेरे
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४८, राज राजेश्वरी, गिलट बाजार, वाराणसी
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विरासत

विमलेश कुमार चतुर्वेदी
जैसे ही चुनाव आया,
मैंने -
दौरे का प्लान बनाया।
गाँव-गाँव, घर-घर जाकर
हर गरीब को समझाया।
भाया!
जब जब मैं आया,
तुमने....
हमारा मान बढ़ाया है;
इलेक्शन जिताया है।
हम...तुम्हें समझते हैं,
तुम्हारी गरीबी के लिए लड़ते हैं।
गरीब दास!
गरीबी...
तुम्हारी विरासत है
तुम्हारी भाषा है,
हम इसे बचाएंगे;
तुम्हें याद दिलाएंगे।
तुम्हारे पूर्वज
जंगलों में रहते थे,
आधे बदन कपड़ा पहनते थे,
जानवरों सा रहते थे,
उन्हीं की तरह खाते थे;
और....
अपनी गरीबी
संजोते
मर जाते थे।
पिछले चुनाव में
मैंने
एक सर्वेक्षण कराया था,
...गरीबी के स्तर को -
एक मानक दिलाया था,
योजनाएं बनवाईं थीं;
आर्थिक सहायता दिलाई थी।
...खुशी हुई कि आप -
गरीबी रेखा के ऊपर जा रहे हैं,
धीरे-धीरे
अपने को....
खुशहाल पा रहे हैं।
मगर
डरता हूँ कि लोग -
कल जब तुम्हें
गरीब दास...
कहने से कतराएंगे,
कोई और नया नाम
लेकर बुलाएंगे,
तो.....
तुम्हारा अपनापन
गरीब दास का गरीबपन
कहीं खो न जाए।
इसलिए
मैंने -
फिर से
सर्वेक्षण कराया है,
गरीबी के स्टेटस्‌ को
और ऊपर बढ़वाया है,
इससे
तुम उसी....
गरीबी रेखा में आ जावोगे;
फिर
अपने आपको..
अपनी संस्कृति से अविभूत पावोगे।
गरीब दास!
गरीबी
...तुम्हारी धरोहर
इसे बचाना होगा,
तुम्हारी झोपड़ियों को...
नाम
दिलाना होगा।
झोपड़ी-संस्कृति पर
मैं...
बहस करवाऊँगा;
डब्ल्यू.एच.ओ. से भी....
तुम्हारी गरीबी को -
पुरातात्विक धरोहर में
संरक्षित करवाऊँगा।
कल्प-कुटीर, २५४०-शिवपुरी, सुल्तानपुर-२२३००१
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Sunday, March 30, 2008

मुझे जीने दो

सीमा सचदेव
मुझे
जीना है
मुझे जीने दो

हे जननी
तुम तो समझो
मुझे दुनिया में आने तो दो

तुम
जननी हो माँ
केवल एक बार तो
मान लो मेरा भी कहना

नहीं
सह सकती मैं
और बार-बार अब
और नही मर सकती मैं

कोई
तो मुझे
दे दो घर में शरण
अपावन नही हैं मेरे चरण

क्यों
हर बार मुझे
तिरस्कार ही मिलता है?
मेरा आना सबको ही खलता है

हे जनक
मैं तुम्हारा ही तो बोया हुआ बीज हूँ
नहीं कोई अनोखी चीज़ हूँ

बोलो
मेरी क्या ग़लती है?
क्यों केवल मुझे ही
तुम्हारी ग़लती की सज़ा मिलती है?

कब तक
आख़िर कब तक
मैं यह सब सहूंगी?
दुनिया में आने को तड़पती रहूंगी?

क्या
माँ का गर्भ ही
है मेरा सदा का ठिकाना?
बस वहीं तक होगा मेरा आना जाना?

क्या
नही खोलूँगी मैं
आँख दुनिया में कभी?

क्यों
निर्दयी बन गये हैं माँ बाप भी?

कहाँ तक
चलेगी यह दुनिया
बिना बेटी के आने से?

बेटी बन कर
मैने क्या पाया जमाने से?

मैं
दिखाऊंगी नई राह
दूँगी नई सोच ज़माने को

मुझे
दुनिया में आने तो दो

मैं जीना चाहती हूँ
मुझे जीने तो दो

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नारी शक्ति

सीमा सचदेव
हे विश्व की सँचालिनी
कोमल पर शक्तिशालिनी
प्रणाम तुम्हें नारी शक्ति
क्या अद्भुत है तेरी भक्ति
तू सहनशील और सदविचार
चुपचाप ही सह जाती प्रहार
तुझसे ही तो जग है निर्मित
परहित के लिए तुम हो अर्पित
तुमने कितने ही किए त्याग
दी अपने अरमानों को आग
जिन्दा रही बस दूसरों के लिए
नि:स्वार्थ ही उपकार किए
खुशियाँ बाँटी बेटी बनकर
माँ-बाप हुए धन्य जनकर
अर्धांगिनी बनकर किए त्याग
समझा उसको भी अच्छा भाग
माँ बन काली रातें काटीं
बच्चे को चिपका कर छाती
जीवन भर करती रही संघर्ष
चाहा बस इक प्यारा सा घर
नहीं पता चला बीता जीवन
हर बार ही मारा अपना मन
....................
....................
ऐसी ही होती है नारी
वही दे सकती जिन्दगी सारी
उस नारी के नाम इक नारी दिवस
खुश हो जाती है इसी में बस
नहीं उसका दिया जाता कोई पल
नारी तुम हो दुनिया का बल
तुझमें ही है अद्भुत हिम्मत
तेरी शक्ति के आगे झुका मस्तक।

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मृग-तृष्णा

सीमा सचदेव
एक दिन
पड़ी थी
माँ की कोख में
अँधेरे में
सिमटी सोई
चाह कर भी कभी न रोई
एक आशा
थी मन में
कि आगे उजाला है जीवन में
एक दिन
मिटेगा तम काला
होगा जीवन में उजाला
मिल गई
एक दिन मंजिल
धड़का उसका भी दुनिया में दिल
फिर हुआ
दुनिया से सामना
पड़ा फिर से स्वयं को थामना
तरसी
स्वादिष्ट खाने को भी
मर्जी से
इधर-उधर जाने को भी
मिला
पीने को केवल दूध
मिटाई उसी से अपनी भूख
सोचा,
एक दिन
वो भी दाँत दिखाएगी
और मर्जी से खाएगी
जहाँ चाहेगी
वहीं पर जाएगी
दाँत भी आए
और पैरों पर भी हुई खड़ी
पर
यह दुनिया
चाबुक लेकर बढ़ी
लड़की हो
तो समझो अपनी सीमाएँ
नहीं
खुली हैं
तुम्हारे लिए सब राहें
फिर भी
बढ़ती गई आगे
यह सोचकर
कि भविष्य में
रहेगी स्वयं को खोजकर
आगे भी बढ़ी
सीढ़ी पे सीढी भी चढ़ी
पर
लड़की पे ही
नहीं होता किसी को विश्वास
पत्नी बनकर
लेगी सुख की साँस
एक दिन
बन भी गई पत्नी
किसी के हाथ
सौप दी जिन्दगी अपनी
पर
पत्नी बनकर भी
सुख तो नहीं पाया
जिम्मेदारियो के
बोझ ने पहरा लगाया
फिर भी
मन में यही आया
माँ बनकर
पायेगी सम्मान
और
पूरे होंगे
उसके भी अरमान
माँ बनी
और खुद को भूली
अपनी हर इच्छा की
दे ही दी बलि
पाली
बस एक ही
चाहत मन में
कि बच्चे
सुख देंगें जीवन में
बढ़ती गई
आगे ही आगे
वक़्त
और हालात
भी साथ ही भागे
सबने
चुन लिए
अपने-अपने रास्ते
वे भी
छोड़ गए साथ
स्वयं को छोड़ी जिनके वास्ते
और अब
आ गया वह पड़ाव
जब फिर से हुआ
स्वयं से लगाव
पूरी जिन्दगी
उम्मीद के सहारे
आगे ही आगे रही चलती
स्वयं को
खोजने की चिंगारी
अन्दर ही अन्दर रही जलती
भागती रही
फिर भी रही प्यासी
वक़्त ने बना दिया हालात की दासी
मीदों से
कभी न मिली राहत
और न ही
पूरी हुई कभी चाहत
यही चाहत
मन में पाले
इक दिन दुनिया छूटी
केवल एक
मृग-तृष्णा ने
सारी ही जिन्दगी लूटी

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झोंपड़ी में सूर्य-देवता

सीमा सचदेव
पुल के नीचे
सड़क के बाजु में
तीलो की झोंपड़ी के अंदर
खेलते..............
दो बूढ़े बच्चे
एक नग्न और
दूजा अर्ध-नग्न
दीन-दुनिया से बेख़बर
ललचाई नज़रों से
देखते.........
फल वाले को
आने-जाने वाले को
हाथ फैलाते.....
कुछ भी पाने को
फल, कपड़े, जूठन, खाना
कुछ भी.........
सरकारी नल उनका
गुस्लखाना और रेलवे -लाइन.....पाखाना
चेहरे पर उनके केवल अभाव
सर्दी-गर्मी का उन पर
नहीँ कोई प्रभाव
अकेले हैं बिल्कुल
कुछ भी तो नहीँ
उनके अपने पास
नहीँ करते वे किसी से
हस्स कर बात
और झोंपड़ी से
झाँकता सूर्य देवता
मानो दिला रहा हो
अहसास........
कोई हो न हो
लेकिन
मैं तो हूँ
और हमेशा रहूँगा
तुम्हारे साथ
तब तक............
जब तक है
तुम्हारा जीवन
यह झोंपड़ी
और ग़रीबी का नंगा नाच

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वह सुंदर नहीँ हो सकती

सीमा सचदेव
अपनी ही सोचों में गुम
एक
मध्मय-वर्गीय परिवार की लड़की
सुशील
गुणवती
पढ़ी-लिखी
कमाऊ-घरेलू
होशियार
संस्कारी
ईश्वर में आस्था
तीखी नाक
नुकीली आँखें
चौड़ा माथा
लंबा कद
दुबली-पतली
गोरा-रंग
छोटा परिवार
अच्छा खानदान
शौहरत
इज़्ज़त
जवानी
सब कुछ...........
सब कुछ तो है उसके पास
परंतु
परंतु, वह सुंदर नहीँ हो सकती
क्यों?
क्योंकि..........................
वक्त और हालात के
थपेड़ों के
उसके चेहरे पर निशान हैं

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एक सपना

सीमा सचदेव
कल रात को मैने
एक सपना देखा
भीड़ भरे बाज़ार में
नहीँ कोई अपना देखा
मैने देखा
एक घर की छत के नीचे
कितनी आशांति
कितना दुख
और
कितनी सोच
मैने देखा
चेहरे पे चेहरा
लगाते हैं लोग
ऊपर से हँसते
पर अंदर से
रोते हैं लोग
भूख,लाचारी,बीमारी,बेकारी
यही विषय है बात का
आँख खुली
तो देखा
यह सत्य है
सपना नहीँ रात का
वास्तव में देखो
तो यह कहानी
घर-घर में
दोहराई जाती है
कोई बेटी जलती है तो
कोई बहु जलाई जाती है
कितनो के सुहाग उजड़ते रोज
तो कई उजाड़े जाते है
यह सब करके
भी बतलाओ
क्या लोग शांति पाते हैं ?
कितनी सुहागिने हुई विधवा
कितने बच्चे अनाथ हुए
कितना दुख पाया जीवन में
और ज़ुल्म सबके साथ हुए

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समाज के पहरेदार

सीमा सचदेव
समाज के पहरेदार ही,
लूटते हैं समाज को
करते हैं बदनाम फिर ,
रीति रिवाज को कूरीतिओं को यही लोग,
देते हैं दस्तक हो जाते हैं जिसके आगे,
सभी नत्मस्तक
झूठी शानो शोकत का,
करते हैं दिखावा
पहना देते हैं फिर उसको,
रंगदार पहनावा
अधर्मी बना देते ये फिर,
धरम के ठेकेदार को
समाज के.....................................................
लोगों के बींच करते हैं,
बड़े बड़े भाषण
दूसरों को बता देते हैं,
सामाजिक अन्नुशासन
अपनी बारी भूलते हैं,
सब क़ायदे क़ानून
इन्हीं में झूठी रस्मों का ,
होता है जुनून
ताक पर रख देते हैं,
ये शर्म औ लाज को
समाज के..............................................
लालची हैं भेडियी हैं,
भूखे हैं ताज के
किस बात के पहरेदार हैं ,
ये किस समाज के
अंदर कुछ और बाहर कुछ,
क्या यही सामाजिक नीति है?
लाहनत है कुछ और नहीं,
क्या रिवाज क्या रीति है
क्या है क़ानून ?जो दे सज़ा,
एसे दगाबाज़ को
समाज के................

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आदर्शवादी

सीमा सचदेव
एक्सिक्यूटिव चेयर पर बैठे हुए जनाब हैं
उनके आदर्शों का न कोई जवाब है
एनक लगी आँखों पर,उँचे -उँचे ख्वाब हैं
उपर से मीठे पर अंदर से तेज़ाब हैं
बात उनको किसी की भी भाती नहीँ
शर्म उनको ज़रा सी भी आती नहीँ
दूसरों के लिए बनाते हैं अनुशासन
स्वयं नहीँ करते हैं कभी भी पालन
इच्छा से उनकी बदल जाते हैं नियम
बनाए होते हैं उन्होंने जो स्वयं
इच्छा के आगे न चलती किसी की
भले ही चली जाए जिंदगी किसी की
स्वार्थ के लोभी ये लालच के मारे
करें क्या ये होते हैं बेबस बेचारे
मार देते हैं ये अपनी आत्मा स्वयं ही
यही बन जाते हैं उनके जीवन करम ही
गिरते हैं ये रोज अपनी नज़र में
हर रोज,हर पल,हर एक भवँर में
आवाज़ मन की ये सुनते नहीँ
परवाह ये रब्ब की भी करते नहीँ
आदर्शवाद का ये ढोल पीटते हैं
जीवन में आदर्शों को पीटते हैं
जीवन के मूल्‍यों को करते हैं घायल
जनाब इन घायलों के होते हैं कायल

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आँसू

सीमा सचदेव
आँसू इक धारा निर्मल,
बह जाता जिसमें सारा मल
धो देते हैं आँसू मन,
कर देते हैं मन को पावन
हो जाते हैं जब नेत्र सजल,
भर जाती इनमें अजब चमक
बह जाएँ तो भाव बहाते हैं,
न बहें तो वाणी बन जाते हैं
उस वाणी का नहीं कोई मोल,
देती ह्रदय के भेद खोल
उस भेद को जो न छिपाता है,
वह कलाकार कहलाता है
उस कला को देख जो रोते हैं ,
अरे,वही तो आँसू होते हैं

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हुआ क्या जो रात हुई

सीमा सचदेव
हुआ क्या जो रात हुई,
नई कौन सी बात हुई
दिन को ले गई सुख की आँधी,
दुखों की बरसात हुई
पर क्या दुख केवल दुख है?
बरसात भी तो अनुपम सुख है
बढ़ जाती है गरिमा दुख की,
जब सुख की चलती है आँधी
पर क्या बरसात के आने पर,
कहीं टिक पाती है आँधी
आँधी एक हवा का झोंका,
वर्षा निर्मल जल देती
आँधी करती मैला आँगन,
तो वर्षा पावन कर देती
आँधी करती सब उथल-पुथल,
वर्षा देती हरियाला तल
दिन है सुख तो दुख है रात,
सुख आँधी तो दुख है बरसात
दिन रात यूँ ही चलते रहते ,
थक गये हम तो कहते-कहते
पर ख़त्म नहीं ये बात हुई,
हुआ क्या जो रात हुई

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अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन

- ईश्वर दयाल जायसवाल
हमारे मुल्क महान्‌ में अदना चपरासी से लेकर नौकर शाह तक, मजदूर से लेकर उद्योगपति तक, छात्र से लेकर शिक्षाविद् तक, जाति-बिरादरी से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक के अपने-अपने संगठन हैं। जरा-जरा-सी बात पर ''...यूनियन जिन्दाबाद!'' के नारे लगने लगते हैं, हड़तालें होने लगतीं हैं। लेकिन अफसोस! हमारे मुल्क महान्‌ में कवियों-लेखकों का कोई भी, किसी भी प्रकार का संगठन सदियों से आज तक नहीं बना है। इस निरीह विवेकशील प्राणी का कोई भी चाहे जितना शोषण करें, उफ्‌ तक करने वाले नहीं है। यहाँ तक कि इनके अपने ही बिरादरीगण इनका शोषण करते हैं।
नगर के किसी भी मुहल्ले में यदि कोई टुट पुजिया राजनेता टपकता है तो नगर के मुहाने पर ही उसके समर्थक कार्यकर्ताओं का जमावड़ा हो जाता है, जिन्दाबाद के नारे लगने लगते हैं और उसको फूल-मालाओं से इतना लादनें लगते हैं कि सभा स्थल तक आते-आते फूल मालाओं का वजन उसके मूल वजन से दो गुना हो जाता है। उसके रूखसती पर एक मोटी रकम चन्दे के रूप में दे दी जाती है।
लेकिन कवि सम्मेलनों के आयोजकों के बुलावे पर कोई कवि जब कवि-सम्मेलन स्थल पर थका-माँदा पहुँचता है तब उसके स्वागत की बात तो दूर, दो-चार श्रोताओं को छोड़कर आयोजकों का कहीं कोई अता-पता नहीं रहता। कवि-सम्मेलन की समाप्ति पर कवियों को अपने पारिश्रमिक के लिए आयोजकों को खोजना पड़ता हैं।
इस निरीह विवेकशील प्राणी के लिए मेरा मन हमेशा से आहत रहा है। इस आहत मन को तब और ठेस पहुँचती है जब कवि सम्मेलनों में कवियों का स्वागत फटे-पुराने जूतों, चप्पलों, सैंडिलों, सड़े-गले फलों-सब्जियों से होता है।
एक टू-इन-वन कवि सम्मेलन एवं मुशायरे में घटना कुछ ऐसी घटी कि मैं उसी क्षण कवियों-शायरों को संगठित करने हेतु एक मंच बनाने को उतावला हो गया। घटना कुछ इस प्रकार घटी थी -
एक परिस्थितिजन्य क्षीणकाय शरीरधारी कवि ने जैसे ही धीमी गति वाले समाचार उद्घोषक के अंदाज में वीर रस की कविता पढ़ना शुरू किया, बेचारे के भाग्य ने कुछ ऐसा खिलवाड़ किया कि ध्वनि-विस्तारक यंत्रा से आवाज आना बंद हो गयी। जैसे-तैसे माइक वाले ने ध्वनि विस्तारक यंत्रा का वाल्यूम बढ़ाकर आवाज का संचार कर दिया। कवि महाशय के वीर रस के शब्दों ने जब श्रोताओं के कानों को उद्वेलित किया तो श्रोताओं में ओज का ऐसा जोश जगा कि उस जोश के वशीभूत श्रोताओं की ओर से शोर रूपी ध्वनि का धमाका होने लगा जैसे जंगल में जानवरों के विशेष समूह एक स्वर में हुंकार भरते हैं, और उसी जोश में श्रोताओं ने ऐसा आपा खोया कि क्षण भर में ही कवि सम्मेलन मंच रण थम्भौर बन गया। मंच जूतों-चप्पलों, सैंडिलों, सड़ी-गली सब्जियों से पट गया।
बस इसी दृश्य का मेरे मानस पटल पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि वहाँ से लौटने के बाद इन निरीह विवेकशील प्राणियों का संगठन बनाने को उतावला हो गया। अगले दिन संगठन का प्रारूप तैयार कर डाला और नामकरण भी कर डाला-अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन
संगठन की नियमावली में जो प्रस्ताव प्रस्तुत किए गये हैं वह इस प्रकार हैं -
देश के सभी कवि-सम्मेलनों, मुशायरों के आयोजक, कवियों-शायरों को पारिश्रमिक धनराशि एक समान दें, साथ ही कवियों के सम्पूर्ण पारिश्रमिक धनराशि मय यात्रा भत्ता के बतौर अग्रिम भेजना होगा। इससे कवियों को यह फायदा होगा कि कवि-सम्मेलन की समाप्ति पर कवियों को अपने पारिश्रमिक के लिए आयोजकों को खोजना नहीं पड़ेगा।
कवियों-शायरों-लेखकों को कवि सम्मेलनों, सेमिनारों में जाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से निःशुल्क यात्रा करने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए वायुयानों, रेलगाड़ियों, रोडवेज की बसों में यात्रा करने के लिए स्थाई रूप से निःशुल्क यात्रा पास जारी करना होगा।
देश में जितने भी समाचार पत्र छपते हैं, उसमें पूरे एक पृष्ठ में नियमित रूप से ऐसे सर्वहारा कवियों-शायरों की रचनाएँ छापी जाएं, जो कवि सम्मेलनों एवं मुशायरों को उखाड़ने में महारत हासिल किए हैं।
देश के सभी सर्वहारा कवियों-शायरों-लेखकों को सरकार की ओर से एक निश्चित राशि गुजारा भत्ता के रूप में देना अनिवार्य होगा ताकि उनके परिवार का भरण-पोषण होता रहे और कवि, लेखक महाशय अपने घरेलू खर्चों के झंझटों से निश्चिंत होकर दिन-रात अपनी रचना में ही डूबे रहें।
जो सर्वहारा कवि-शायर दूसरों की रचना चुराकर कवि सम्मेलनों-मुशायरों में पढ़ते हैं, उनकी सुरक्षा व्यवस्था में सरकारी अंगरक्षकों की नियुक्ति की जाए।
कवि सम्मेलनों-मुशायरों में जो भी श्रोता आएं वे या तो नंगे पैर आएं या नए जूते-चप्पल, सैंडिल पहन कर आएं। फलों में केवल संतरे, अंगूर, केले, रसभरी ही लाएं।
प्रायः सभी कवियों, शायरों, लेखकों की प्रसिद्धि में नारी की विशेष भूमिका रही है, (अतीत के कालीदास, तुलसीदास साक्षी हैं)। उनके लेखन में निरन्तर निखार लाने का श्रेय उनकी पत्नियों को है। इस बात को दृष्टिकोण में रखते हुए जब भी किसी कवि, शायर या लेखक को सम्मानित किया जाए तो अंग-वस्त्र के नाम पर शाल, कुर्ता-पायजामा आदि न देकर उनको साड़ी से सम्मानित किया जाए। इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि कविगण जब अपने हाथ में साड़ी को लेकर घर पहुँचेंगे तो उनकी पत्नियां रात्रि भर खर्राटे मारकर सोने के बजाए रात्रि भर जागती रहेंगी और अपने प्रियतम कवि, शायर, लेखक का बेसब्री से इंतजार करती रहेंगी। साथ ही हर पल हर दिन उन्हें लेखन के प्रति पे्ररित करती रहेंगी।
अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन की प्रबन्ध कार्यकारिणी समिति में समर्पित कवियों, शायरों एवं लेखकों को हार्दिक अभिलाषा है कि अखिल भारतीय सर्वहारा कवि संगठन के अध्यक्ष पद पर हिन्दी साहित्य जगत के अंतर्राष्ट्रीय कवि भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, महासचिव पद पर पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं संरक्षक हमारे मुल्क महान्‌ के राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को बगैर उनकी अनुमति एवं सहमति के आजीवन आरक्षित कर दिया जाए।
संयोजक - अदबी विचार मंचमोहल्ला - हयातगंज,टाण्डा, अम्बेडकर नगर, (उ०प्र०)
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सर्दी की एक रात

विकेश निझावन
एकाएक सर्दी बढ़ आई थी।शायद कहीं आसपास बर्फ पड़ने लगी है।ईश्वर ने खिड़की के ऊपर पड़ी तिरपाल को खिड़की के आगे पलट दिया।इमली हंस पड़ी।बोली- तेरी इस तिरपाल से सर्दी कम हो जाएगी क्या?
-कम क्यों न होगी! ईश्वर जरा गुस्से से बोला- सर्दी कम करने के लिए आदमी और क्या कर सकता है। ओढ़न ही तो ओढ़ सकता है।
-वही तो मैं कह रही हूं।जल्दी से लिहाफ में आ जा।इस वक्त बाहर निकलने का मौसम नहीं है।ओढ़न ओढ़नी है तो अपने ऊपर ओढ़।जरा ठंड ने पकड़ लिया तो यों ही अकड़ जाएगा।
–तुझे भी कुछ न कुछ बोलने की आदत हो गई है।बेमतलब बात करती हो।
-मेरी बातों के मतलब बाद में निकालना।पहले रजाई ओढ़ ले।
ईश्वर सच में कांप रहा था।झट से रजाई में घुस सिकुड़ सा गया।काफी देर तक इमली कुछ न बोली तो उसे ही बोलना पड़ा- अरी इस उम्र में आकर भी तू मेरी बातों पर गुस्सा होने लगती है।
-कैसी बात करते हो! गुस्सा मैं करती हूं या तुम? मैं तो तुम्हारा गुस्सा देखती हुई चुप हो गई।
-तू ठीक कहती है।मुझे सच में अब कभी-कभी बहुत गुस्सा आने लगता है।याद है पिछली बार जब डाक्टर को दिखाया था तो उसने कहा था ब्लड-प्रेशर ज्यादा होने के कारण गुस्सा आने लगता है।
-तुम्हारा डाक्टर तो पागल है जी। ब्लड-प्रेशर बढ़ने से गुस्सा नहीं आया करता।गुस्सा करने से ब्लड-प्रेशर बढ़ता है।इमली ने तर्क किया।
- तू कब से डाक्टरनी बन गई? ईश्वर ने भी सवाल रख दिया।
-जब से तुम मरीज बने हो।इमली खिसिया दी।ईश्वर सब समझता है।इमली आजकल जानबूझ कर उसे तंग करती है।वैसे कभी-कभी ईश्वर को अच्छा भी लगता है।अगर इस बुढ़ापे में इमली खिजियाने वाली स्वभाव की हो जाती तो जीना दूभर हो जाता।ईश्वर तनिक इमली की ओर खिसकता हुआ बोला- तू भी रजाई अच्छी तरह से ओढ़ ले।कहीं फिर सारी रात कल की तरह हाय-हाय करती रह जाए।
-कहां जी वो तो टांग की नस पे नस चढ़ आई थी इसीलिए कराहती रह गई।अब ठीक हूं मैं।
-ठंड से दौबारा नस चढ़ गई तो?
-नहीं अब नहीं चढ़ने की।सबेरे मंगो ने तेल से मालिश कर दी थी।
-शुक है तू ठीक हो गई।नहीं तो रोशन और लाडी को खबर करनी पड़ती।
-खबर काहे की! मैं भला मरने वाली थी क्या?
-अरी इस उम्र में किसी का कोई भरोसा नहीं।लोग तो हंसते-हंसते चल निकलते हैं।तू तो अब सत्तर से ऊपर की होने को आ रही।
-मैं सत्तर से ऊपर की हो रही तुम तो मेरे से सात बरस बड़े हो।
-तो तू सोचती है पहले मैं...
-राम-राम! कैसी बात करते हो जी। मैंने तो ऐसा न कहा न सोचा। जाऊंगी तो पहले मैं ही।पर अभी नहीं।
-जीवन से इतना मोह रखा हुआ है क्या?
-मोह तो रहता ही है।वो भी अपने लिए थोड़े न! बच्चों को कैसे छोड़ सकते हैं हम।और आगे बच्चों के बच्चे...!
इमली दबे से हंसी। उसकी हंसी में कोई खनक न थी।एकाएक ईश्वर बोला- जब बच्चों ने हमें छोड़ दिया तो हम उन्हें क्यों नहीं छोड़ पा रहे? ईश्वर की बात को इमली ने जैसे अनसुना कर दिया। बोली -याद है उस रोज़ छुटकी क्या कह रही थी?
-क्या कह रही थी?
-दोनों बेटियों के संग बड़ी खुश है।
-खुश तो होगी ही। बेटियां जो हैं उसकी।
-उसने एक बात और भी याद दिलाई थी।
-वो क्या?
-कहने लगी जब मैं छोटी थी न अम्मा तू जब भी मुझे बाजार से गुड़िया लेकर देती थी तो मैं अड़ जाती थी कि मुझे एक नहीं दो गुड़ियां चाहिएं।एक हंसने वाली और एक रोने वाली।बस भगवान ने मेरी वही बात सुन ली।अब देखो न अम्मा जब एक हंसती है तो दूसरी रोने लग जाती है।
– अभी बच्चियां जो हुईं।
– हां वही तो। उसकी सास भी बहुत खुश है।
-तो?
अब इमली फिर चुप! ईश्वर फिर परेशान हो आया।अब भला क्या हुआ इसे? उसने कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं कहा।
-तू कुछ सोच रही है क्या? ईश्वर ने ही चुप्पी तोड़ी।
-हां!
-क्या भला?
-अपनी भी तो पहली दो बेटियां ही हुई थीं।
-सो तो!
-तुम्हारी मां ने कैसा विलाप किया था।
-वो जमाना और था।
-हो सकता है! पर शुक परमात्मा का तीसरा श्रवण हो गया।वरना मुझे तो घर निकाला मिल गया होता।और आज यहां पर तुम किसी दूसरी के साथ बैठे इस सर्दी को ताप रहे होते। इस बार इमली की हंसी में खनक थी।
ईश्वर हंस पड़ा।बोला- कितना अच्छा होता एक जन्म में दो मिल जातीं।
-अपने होते तो नहीं आने देनी थी मैंने।इमली जरा कड़क होती बोली।
-तुम्हारे बाद आ जाती।
-फिर मेरे लिए टेसु बहाते होना था तुमने।
ईश्वर समझ नहीं पा रहा था आज इमली कहां की ले बैठी।सहसा बोला- तू ठीक कहती है।पर एक बात तो बता?
-क्या भला?
-तू सोचती है श्रवण के आने से हम सुखी हो गए?
-सुख का तो पता नहीं।खुशी तो हुई थी।अम्मा भी श्वास छोड़ते समय ढेरों बलइयां दे गई थीं।
एकाएक इमली गम्भीर हो आई- कहीं तुमने श्रवण का दिल से तो नहीं लगाया हुआ?
-दिल से लगा कर क्या करूंगा।जब तक जान है तब तक आस है।कभी थोड़ा समय निकाल कर आ जाए तो आंखों को ठंडक मिल जाएगी।
-इमली जैसे पिघल सी गई। बोली- एक बार कह कर तो देखो उसे।
-तू क्या सोचती है मैंने कहा नहीं उसे।ईश्वर तनिक रूआंसा हो आया- पिछले महीने दो बार टैलीफोन पर कह चुका हूं।कहने लगा अब मैं बच्चा नहीं हूं बाऊजी।कितने झमेले हैं मेरे को आप क्या जानें।
ईश्वर खी-खी करके हंसने लगा फिर जैसे अपने आप से ही बोला- कम्बख़त कहता है मैं अब बच्चा नहीं हूं।इतना नहीं समझता बच्चे तो मां-बाप के लिए हमेशा ही बच्चे रहते हैं।
-इस बार देखना मैं कहूंगी तो दौड़ा चला आएगा।इमली ने रिरियाती सी आवाज़ में कहा।
-हांऽऽ! खाक़ दौड़ा चला आएगा।वह तो सिर्फ उसी दिन दौड़ा चला आएगा जिस दिन कोई उसे ख़बर करेगा कि हममें से कोई एक हमेशा के लिए विदा ले गया।
-कैसी बात करते हो जी।अगर मां-बाप बच्चों का सोचते हैं तो बच्चे भी मां-बाप का बराबर सोचते हैं।बस कुछ मजबूरियां होती हैं उनकी।
-मजबूरियां! ईश्वर की आवाज ज़रा दब सी गई थी- कैसी मजबूरियां? ईश्वर अंधेरे में ही अपनी बुझी-सी आंखों से इमली की ओर देखने लगा।
आजकल लड़कों को नौकरी से फुर्सत कहां मिलती है।और फिर लड़के तो बंट जाते हैं न।एक तरफ मां-बाप दुसरी तरफ उनकी अपनी गर-गृहस्थी।किसकी सुनें किसकी न सुनें।
-क्या हम इस दौर से नहीं गुज़रे? ईश्वर की आवाज पूरी तरह से टूटी हुई थी।
-तब जमाना ओर था। अब जमाना बदल गया है।
-जमाना बदला है इन्सान तो वही है।
-इन्सान बदलता है तो जमाना बदलता है न जी।आजकल औरत की भी झेलनी पड़ती है।अंग्रोजी पढ़ी-लिखी औरत होगी तो उसकी माननी तो पडेग़ी न! बस यही सब है अपने श्रवण के साथ। जैसे है चलने दो उन्हें।अपने में वे दोनों खुश हैं।
ईश्वर के पास इस वक्त न कोई सवाल था न कोई जवाब।बस इतना ही कहा- तू इतना अच्छा कैसे सोच लेती है सब?
इमली कुछ नहीं बोली।लेकिन ईश्वर की बात पर कहीं भीतर तक खिल आई थी।
ईश्वर ने जरा करवट बदली- तेरा नाम इमली किसने रखा था?
-अब मैं क्या जानूं! मां-बाप ने ही रखा होगा।
-लेकिन इमली क्यों रखा?
-वही बात आ गई न जी! लड़कियों का पैदा होना तो किसी के गले न उतरता था। बस मैं भी उन्हें गले की फांस ही लगी हूंगी ।
-वैसे तेरा नाम तो बर्फी होना चाहिए था।
-बर्फी! क्यों?
-इमली तो खट्टी होती है न।
-तो मैं क्या मीठी हूं?
-हां!
-छोड़ो न! इस उम्र में ऐसी बातें!
-सर्दी कितनी है बातों से थोड़ी गर्मी आ जाएगी।ईश्वर ने पुनथ इमली की ओर मुंह फेर लिया।रजाई में पूरी तरह से दुबकता सा बोला- लगता है आसपास कहीं बर्फ जोरों से गिरने लगी है। इमली कुछ नहीं बोली। उस पर भी सर्दी का बराबर असर हो रहा था।उसने भी लिहाफ पूरी तरह से ओढ़ लिया।
... ... ...



पुलिस ग्राउंड के सामने अम्बाला शहर-१३४००३ हरियाणा



शहर को डर है

- डॉ० तारिक असलम
सुबह हो गई है। सड़कों, गलियों और मुहल्लों में लोगों का आना-जाना शुरू हो गया है। लोग अपने आस-पड़ौस के लोगों से बोल-बतिया रहे हैं। अपनी दिनचर्या की चर्चाएँ कर रहे हैं। जिंदगी बिल्कुल सामान्य दिख रही है।
अमर घर से निकलकर मुख्य सड़क मार्ग पर आकर खड़ा होता है, उसे माटाडोर की प्रतीक्षा है, यद्यपि उसके आसपास दो थ्री व्हीलर चक्कर काटते हुए बैठने का इशारा करते हैं और एक कहता है, ''बस। साहब जी। एक और पैसेंजर आ जाए तो चल दूंगा। आप जान ही रहे हैं पैट्रोल कितना महंगा हो गया है। एक सवारी लेकर चलने की हिम्मत नहीं होती, जाने आगे कोई पैसेंजर मिलेगा भी या नहीं? फिर माटाडोर वाले आगे आकर उठा लेते हैं सबको।''
उस थ्री व्हीलर चालक की बातों को अनसुना करते हुए, वह बराबर पश्चिम दिशा की ओर देखता रहा, जिधर से सवारी गाड़िया आती थीं। उसे कोई जल्दी नहीं थी, फिर वह भी अपने एक रुपये अधिक व्यय करने का इच्छुक नहीं था। माटाडोर वाले एक तो कम ही मोड़ों और चौराहों पर रुकते थे, दूसरे फुलवारी शरीफ इमली मोड़ से भाड़ा भी एक रुपये कम लेते थे। आखिरकार, एक गाड़ी आ ही गई। वह शट से अन्दर घुस गया।
दिन के ग्यारह बज चुके थे, फिर भी दुकानें बन्द थीं और ठेले पर यहाँ-वहाँ सामान बेचने वाले भी नदारद थे। चलो, उनकी मर्जी उसे उनसे कुछ खरीदना है ही नहीं फिर चिंता क्यों? ऐसे भी स्साले डंडी मारने में काफी माहिर हैं। पैसे पूरे दो या कम। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता। सबसे बड़ा धोखा यह होता है। आप सेब हो या अमरूद चुनकर देते हैं और लिफाफा घर ले जाकर खोलते हैं तो माथा पिट लेते हैं। वे चीजें अधिकतर सड़ी गली निकलती हैं। जिसके के शिकार बनते हैं। आमतौर से गरीब और देहाती लोग। ''अचानक उसे याद आता है? इन बातों से उसे क्या लेना? उसे तो फिर गाड़ी बदलनी है, ''साब, जी जीपीओ स्टैंड आ गया? आप उतरेंगे नहीं था?'' चालक ने मुड़कर कहा तो वह उतरकर नीचे खड़ा हो गया। उसे पैसे दिये और महावीर मंदिर मोड़ की ओर पैदल ही चल पड़ा। एएक बार फिर वह थ्री व्हीलर पर ड्राइवर की सीट के बगल में बैठा था। दरअसल, उसे अपने साथ बैठने का इशारा उसी ने किया था। वह बैठ भी गया किन्तु यह कहने से नहीं चूका, ''भाई मेरे, जब भाड़ा बढ़ाना होता है तो तेल की महंगाई का रोना लेकर बैठ जाते हो। कमाई नहीं होती और न जाने क्या-क्या बहाने बनाते हुए। ट्रैफिक पुलिस की पकड़ धकड़ के नाम पर कुछ दिन आगे नहीं बिठाते किसी को, फिर वही पुराना धंधा चालू? इस बीच पैट्रोल का दाम घट भी जाय तो क्या फर्क पड़ता है। मारी जाती है जनता बेचारी। वह भी चारों तरफ से।'' अमर के ऐसा कहने पर ड्राइवर केवल मुस्कुरा कर रह गया, जबकि कई दूसरे लोगों ने सहमति व्यक्त की। जिन मार्ग से गाड़ी गुजरती गई। उन मार्गों पर भी अनेकानेक दुकानें पूर्णतया बन्द दिख रही थीं। सड़कों के कहीं किनारे तो कहीं बीचों-बीच कूड़े का अम्बार लगा था। सड़कों पर वाहनों और पैदल चलने वालों की तादाद भी कम दिख रही थी, अलबत्ता लवारिश कुत्ते, गाय और भैंसें पूरी न्मियता से कूड़ेदान के बाहर पड़े कचरे में मुंह मारने में जुटी थीं, जिससे उसकी भूख का अंदाजा लगाया जा सकता था।
जानवरों और पशुओं को यह सुविधाएं सभय और सुशिक्षित नागरिकों ने उपलब्ध करायी थी। आलीशान अपार्टमेंट और इन्कलेव और एन्कलेव से निकल कर अपने कमरों का कचरा कूड़ेदान में डालने की बजाये बाहर ही फैंक कर जा चुके थे। जब साब और ममेसाब कचरे को सड़क पर डालते मिलेंगे, फिर भला नौकर-चाकर क्यों सही जगह पर डालेंगे? यही सोचता हुआ वह वाहन से उतरकर प्रेस की ओर चल दिया।
नाला रोड मोड़ पर ढेर सारी गाड़ियां खड़ी थीं किन्तु वहां पर भी चहलपहल कम थी। कई एक चालक अपनी गाड़ियों के बीच वाली सीट पर उकडू लेते थे। सवारियां भी कम तादाद में पहुंच रही थीं। वहां भी एक ओर कूड़े का ढेर का उसने सामना किया, फिर वह आर्य कुमार रोड की ओर मुड़ गया। अब उसकी नजरों के समक्ष नगर निगम कार्यालय के अलावा सफाई कर्मियों की बस्ती थी, जिसके अगल बगल में आलीशान इमारतें खड़ी थीं और सड़कों पर सूअरों का जमावड़ा था। एक बड़े क्षेत्रा में नाले की सड़ांध वाली गंदगी पसरी थी और उस गन्दे पानी के ऊपर से लोगों का आवागमन जारी था।
''यह है हमारी राजधानी'' उसके मुंह से अचानक निकला - उसने जब से होश संभाला था। इन दृश्यों में रत्ती भर फर्क नहीं देखा था उसने। सिवाये इसके शहर के कुछ एक हिस्से की सड़कें चौड़ी हो गई थीं। कुछ एक स्थानों पर लम्बे-चौड़े पुल बन गए थे। मगर शहर के हृदयस्थली की गंदगी कभी दूर नहीं हो पायी।
अमर ने प्रेस कार्यालय में कदम रखा तो उसे यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि स्वामी जी उपस्थित थे। प्रेस के अन्य स्टाफ नदारद थे और हॉल में पूरी तरह खामोशी व्याप्त थी। ''क्या बात है स्वामी जी? आफिस में कामधाम नहीं हो रहा है? मेरे काम का क्या हुआ? सब ठीकठाक तो है ना?
''सर जी। आपको पता नहीं है क्या? आज माले वालों ने बन्द का आयोजन किया है। इसलिए कोई नहीं आया काम पर? पर आपका काम हो गया है।''
''फिर आप क्यों आफिस खोलकर बैठे हुए हैं?''
''यह स्थान सुरक्षित है सर जी। जो लोग रंगदारी लेते हैं? वे किस दिन हमें सुरवा देंगे? आपने देखा नहीं न?... जरा खिड़की से बाहर झांक कर देखिए। कई छोकरे बैठे हुए हैं सबकी खबर लेने के लिए। इधर कोई बन्द कराने नहीं आने वाला।'' यह कहते हुए एक विचित्रा से सुखानुभूति अनुभव की स्वामी जी ने। ''तो अब जनता के जानो माल की रक्षा रंगदार और शोहदे करेंगे स्वामी जी। और हत्यारे - लुटेरे अपने बचाव के लिए चुनाव लड़ेंगे, जीतेंगे या यो कहें कि लोग ही उसकी जीत को पक्की करेंगे और उनकी सुरक्षा का भार पुलिस वाले उठायेंगे? स्वामी जी ऐसी न्यायिक व्यवस्था तो किसी और देश में नहीं उपलब्ध हो सकेगा? जहां संवैधानिक नियम कानून ही इतना लचर दिखता हो। जहां कोई अपराधी राजनीति में सफलता पाने के बाद अपने आरोपों को रफा दफा करने में सक्षमता प्रदर्शित कर पाये?''
अमर के इस तल्ख टिप्पणी पर स्वामी जी मुस्कुराये फिर निश्चल हंसी बिखरते हुए कहने लगे, ''आपको देश की चिंता है सर जी। आप लिखने-पढ़ने वाले आदमी हैं, मगर जब तक आम आदमी को यह सब समग्र में नहीं आएगा? इस देश का भविष्य नहीं सुधरने वाला है। मैं तो यही कह सकता हू... यह रही आपकी छपी सामग्री... यह कहते हुए उन्होंने एक पैकेट उसकी ओर बढ़ा दिया। ऊसर ने रुपये दिये और बाहर आ गया। जहां पूरे इलाके में प्रेस वर्क जोर-शोर से चल रहा था।
एक बार फिर वह नाला रोड मोड़ चौराहे पर खड़ा था। उसे लगा कि एक थ्री व्हीलर में कुछ सवारियां बैठी हैं, इसलिए वह भी बीच की किनारे वाली सीट पर जा बैठा। उसका बैठना था कि एक सवारी धीरे से उतर गई। तब उसे समझ में आया कि वह भी किसी वाहन का चालक है जो महज पब्लिक को फांसने के लिए बैठा था कि दूसरे यही समझें। उस गाड़ी की सवारियां पूरी हो गई हैं, किन्तु सच्चाई यह थी कि उस गाड़ी में बैठने वाला अमर एकमात्रा यात्री था... उसे यह अनुभव बड़ा कष्टप्रद लगा। उसे कोफ्त हुई। ''लगता है एक आध घंटे बैठने पड़ेंगे?'' वह मन ही मन बुदबुदाया। पास ही खड़े चालक के कानों में आवाज पहुंची। उसने पूछा, ''सर कुछ कहा आपने?'' ''नहीं। मगर तुम लोग इस तरह बैठे थे कि में धोखा खा गया? यह अच्छी बात नहीं है? अब न जाने और कितनी देर प्रतीक्षा करवाओगे?''
''बस। एक दो सवारी आते ही चल दूंगा... आज तो मालिक का खर्चा भी नहीं निकल पाएगा। पांच बजे के बाद कुछ लोग निकलेंगे तो एक दो चक्कर डालूंगा नहीं तो गैराज में ले जाकर गाड़ी खड़ी कर दूंगा। यह रोज-रोज के रेले, हड़ताल, बन्द ने तो पेट पर पत्थर बांधने को मजबूर कर दिया है। हमको कोई शौक है? आपको यों बैठायें रखूं? मगर सर। हम भी क्या करें?'' उसने अपनी सीख प्रकट की। उसे लगा यह तो पहले से ही दुखी लगता है, चलो चुपचाप बैठे रहो...।
कुछ मिनटों के बाद एक बुजुर्ग किस्म के व्यक्ति आये। ''भई पटना जंक्शन ही जाओगे न? ''कहते हुए बगल की सीट पर बैठ गए।
''आपको कहां जाना है?'' उस बूढ़े व्यक्ति ने अमर से समय काटने की गर्ज से पूछा। ''जहां आप जाना चाहते हैं?'' उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
कुछ पल की खामोशी के बाद, ''मुझे क्या पता था कि आज पटना बंद का किसी ने आयोजन किया है? में कल ही औरंगाबाद से आया हूं अपनी आंख दिखाने लोगों ने कहा। आज तो सब कुछ बंद होगा, फिर भी वह जगह देख लेना चाहता हूं, इसलिए किदवईपुरी जाना चाहता हूं। यह देखिये पता है मेरे पास।'' यह कहते हुए उस व्यक्ति ने एक पर्ची निकालकर दिखाई। उस पर एक चर्चित नेत्रा रोग विशेषज्ञ का पता दर्ज था। अमर ने वह पर्ची उनकी ओर बढ़ा दी तो पूछने लगे, ''आप इधर के ही रहने वाले हैं क्या?''
''नहीं इधर तो में कुछ काम से आया था।''
''आपको तो पता होगा कि इधर आसपास में आंख के कौन से अच्छे डाक्टर हैं?''
''मैं एक ही ऐसे डाक्टर को जानता हूं, जिस पर मेरा पूरा परिवार की बात करता है। वह कमलकान्त ठाकुर हैं। तीन नम्बर रोड में उनका क्लीनिक है। रोगियों को समय देते हैं। उनकी परेशानियां भी सुनते हैं। भले आदमी हैं। अमर ने अपनी जानकारी और विश्वास के आधार पर उन्हें आश्वस्त करने का प्रयास किया। किन्तु उनके इस प्रश्न ने उसे झिंझोड़कर रख दिया, ''यह किस जाति के हैं? आपको तो यह मालूम होगा?'' उसने कातर दृष्टि से उस वृद्ध व्यक्ति के चेहरे को देखा।
''जी। यह जाति के हजाम हैं? क्या हजाम अच्छे डाक्टर नहीं बन सकते?'' उसके इस प्रश्न पर व्यक्ति कुछ सकसकाया, जैसे उसकी चापेरी जग जाहिर हो गई हो। ''नहीं.....नहीं.....ऐसी कोई विचारधारा नहीं है। मैं जातपात में विश्वास नहीं करता, बस यों ही पूछ लिया। अब तो यही लोग हर जगह आगे हैं।'' यह बताते हुए उस व्यक्ति की आवाज धीमी पड़ती गई। जैसे आवाज गले में घुटकर रह जाय। चेहरे पर कुछ निराशा के भाव उभर आये थे। उसे यथास्थिति समझते देर नहीं लगी।
कुछ क्षणों की गहरी चुप्पी के उपरान्त वह फिर बतियाने के मुड में आ गये। ''सरकार को ऐसे बंद के आयोजनों पर कठोरतापूर्वक रोक लगानी चाहिए। इससे कितने लोगों को दो वक्त की रोजी रोटी छिन जाती है। कितने लोग अपने स्थान पर पहुंचने से वंचित रह जाते हैं। कारोबार ठप्प हो जाता है। कितने लोगों को समय पर इलाज संभव नहीं हो पाता। वे जान से हाथ धो पैठते हैं। दवा की दुकानें तक नहीं खुली हैं। वे अपनी कठिनाइयों को दृष्टिगत रखते हुए कहते गए।
बाबा। दुकानें लोग अपने जान-माल की सुरक्षा को ध्यान में रखकर कर देते हैं। आज से चालीस वर्ष पहले भी बंद के आयोजन होते थे, तब लोग बड़ी शालीनता से कह जाते। अब तो बंद कराने के नाम पर मारामारी और लूटपाट शुरू हो जाता है। दुकानदारों से कई दूसरे हिसाब भी चुकाये जाते हैं, जोकि उसने मुफ्त में दवा क्यों नहीं दी? रंगदारी क्यों नहीं चूकता किया? नेताजी ने यहां पैरवी क्यों करने गया? पूजा या दूसरे उत्सवों के अवसर पर मन मर्जी के अनुसार चंदा देने से क्यों इंकार किया? ऐसी स्थिति में लोग बंद नहीं करेंगे तो फिर क्या करेंगे?'' वह एक ही सांस में सब कुछ कह गया था।
''बाबा उसकी ओर देखते रहे, सब सुनते रहे।'' सरकार और प्रशासन चाहे तो इन स्थितियों पर नियंत्रण पा सकती है। उसके लिए क्या कठिन है...।''
''बहुत कठिन है बाबा प्रशासन के लिए ऐसा करना। यदि पुलिस वाले ऐसे मामलों में न्याय देने लगें तो उनकी गर्दन नापने की मुहिम राजनेता शुरू कर देते हैं और उसे उत्तरदायित्व से मुक्त कर विद्यालय के किसी अप्रभावी विभाग की कमान थमा दी जाती है। ऐसे अनेक जिला अधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक शहर में आये और अपनी निष्पक्ष छवि के लिए जनता के बीच चर्चित होने लगे। उन्हें स्थानान्तरण की मार खेलनी पड़ी। कुछ ने अपनी गतिशील वैचारिकता की ऊर्जा को बनाये रखने के सरकारी उच्च पदों से इस्तीफा तक दे दिया, क्योंकि वे नेताओं के जाहिलपन को पचा पाने में सर्वथा असमर्थ सिद्ध हुए थे।''
आप तो बहुत कुछ जानते हैं। अपने शहर के बारे में। अच्छा लगा आपसे बातें करके। अब वह वृद्ध व्यक्ति आश्वस्त दिखने लगा था न जाने क्यों? शायद वह सोच रहा हो। कोई गलत आदमी तो उसकी बगल में नहीं बैठा हुआ है?
इस बीच थ्री वहीलर स्टैंड से चल पड़ी थी। एक बड़ी सी ''स्वीट हाउस'' पर उनकी दृष्टि पड़ी, बोल पड़े, ''इसकी हिम्मत देखिए। कैसी दुकान खोल रखी है?''
यह सुनकर अमर हंसने लगा, ''बाबा यह दुकान किसी नेताजी की, उनके परिवार की या फिर किसी बड़े पहुंच वाले की होगी और नहीं तो बेचारे समय पर रंगदारी टेक्स जमा कर देते होंगे। डर के मारे आम आदमी तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।''
''आपकी बात जंचती है। ठीक ही कहा आपने।''
''बाबा आपने संभवतः समाचार पत्रा में पढ़ा हो। शिल्पी हत्या कांड के बारे में। उसकी सच्चाई किसे नहीं मालूम? राजनेता, पुलिस, प्रशासन और छुटभैये नेता सब की मिली भगत का ही परिणाम है कि केस किसी नतीजेर पर नहीं पहुंची। मेरी समय से न्यायालय को भी सब कुछ पता है, इसलिए जब तक कठोर टिप्पणियां करती है..... किन्तु वह कोई बड़ा उलटफेर नहीं कर सकती तो नतीजा शून्य ही निकलता है। यहां रोज ही अपहरण, हत्या, गेंगवार, डकैती, बलात्कार होते हैं, पर क्या फर्क पड़ता है किसी को? महज अखबार की एक खबर बनकर रह जाती हैं घटनाएं। अभी हाल में ही एक दुकान में चकाचौंध रोशनी से भरे, भीड़ भरे बाजार की एक दुकान में गुंडों ने घुस कर महिला सेल्समेन से सामूहिक बलात्कार किया। उनको कई लोगों ने पहचाना पर जुबान बंद रखी, क्योंकि यह क्षतिग्रस्त या अस्त व्यस्त नहीं हुए थे, फिर चिंता की कोई बात ही नहीं बनती....। बाबा हम ने प्रगति की जो सीढ़ियां चढ़ी हैं ना। यह देशी नहीं बल्कि विदेशी संसाधनों से बनी हैं। जिससे हम मर्याहत नहीं होते और ना ही संवेदनाओं में हलचल होती है। संज्ञाशून्य होकर रह गए हैं हम लोग।''
अमर की इस बात पर बाबा ने उसके काधे को थपथपाया। रुंआसे से हो गए। फिर भी कहा, ''धैर्य रखना है। एक न एक दिन स्थितियां अवश्य बदलेंगी। नहीं तो दुनिया इतनी नहीं बदलती.... यह परिवर्तन अभी और गहरा होगा... उसके लिए लड़का होगा, जैसे हम लड़े आजादी के लिए....'' और अमर के साथ ही वे भी उतर गये, थ्री व्हीलर स्टैंड में पहुंच चुकी थी। वह आगे बढ़ चुका था और बाबा उसे भीड़ में गुम होते हुए देखते रहे थे और न जाने किन विचारों में खो गए थे।
६/२, हारून नगर, फुलवारी शरीफ, पटना-८०१५०५

खूबसूरत शहर

- मो. इकबाल
स्वराज नाइट शिफ्ट कर के जब काम लौटा तो सुबह के सात बज रहे थे। घर से लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर उसने एक बहुत बड़ी बेचैन भीड़ को देखा, जो पुलिस वालों से बहस कर रही थी। और उन झुग्गियों की तरफ़ इशारे कर रही थी, जिनमें उसका भी घर था, क़रीब आया तो देखा कि जहां कल तक जिन्दगी से भरपूर एक बस्ती थी, वहां से ऊँचे धूल के बादल उठ रहे थे। बुल्डोजर चलने की गड़गड़ाहट और गिरती-चरमराती हुई झुग्गियों का शोर उभर रहा था। सारी बस्ती एक मल्बे के चटियल मैदान में बदलती जा रही थी। जैसे उसमें जिन्दगी का कोई अंश भी बाक़ी न हो। हर तरफ तबाही ही तबाही थी। भीड़ में अनगिनत चेहरे उसके जानने वालों और पड़ोसियों के थे। उन्हें देखकर वह भी बेचैन हो उठा और इस तोड़-फोड़ का कारण जानने की कोशिश करने लगा। कुछ ही क्षणों में उसे पता चला कि झुग्गी कॉलोनी जिसमें वो रहता है कोर्ट के आर्डर के कारण तोड़ी जा रही है। ये सुनकर उसका दिमाग़ चकराने लगा और उसको अपनी जवान बेटी और नन्ही-सी नतनीं की फिक्र सताने लगी।
स्वराज की समझ में ये नहीं आ रहा था कि पिछली रात नौ बजे जब वह ड्यूटी करने के लिए झुग्गी से निकला था तो सब कुछ नॉर्मल था। उसकी बेटी अन्जू जिस पर उसके शराबी पति के मर जाने के बाद मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था, अपनी तीन बरस की बच्ची को सुलाने की कोशिश कर रही थी। पड़ोस से बच्चों के रोने, बरतनों के खड़खड़ाने और जोर-जोर से बातें करने की प्रतिदिन की तरह आवाज आ रही थी। सब कुछ रोज जैसा ही था। अब सुबह को इस भीड़ में रहकर उसकी समझ में ये नहीं आ रहा था कि रात में ऐसा क्या हुआ कि सब कुछ उजड़ गया। पुलिस फोर्स बिल्कुल दीवार की तरह सबको रोके हुए खड़ी थी और झुग्गियों की तरफ़ जाने की किसी भी कोशिश को पूरी ताक़त से, डंडों और लाठियों की सहायता से नाकाम बना रही थी। उसने इस भीड़ में अपनी बेटी अन्जू और नन्हीं अनीता को तलाश करने की पूरी कोशिश की। पड़ोसी और अन्य झुग्गी कॉलोनी वाले जो भी मिले उनसे उन दोनों के बारे में जानकारी प्राप्त करने की कोशिश की लेकिन कोई उसकी मदद न कर सका। सबने ये बताया कि जब तीन बड़े-बड़े बुल्डोजर तेजी से इलाके की तरफ़ आते हुए दिखाई दिए तो उनकी आवाज सुनकर बहुत लोग नींद से जाग गए और बाहर निकलकर ये देखने आए कि मामला क्या है। ये प्रातःकाल का समय था। मगर हजारों पुलिस वाले और सरकारी कर्मचारी झुग्गी कॉलोनी को अपने घेरे में ले चुके थे। कुछ ही मिंटों में लाउडस्पीकर पर सरकारी अफसरों ने ये ऐलान करना शुरू कर दिया कि'' कुछ ही क्षणों में इस गैरक़ानूनी झुग्गी कॉलोनी को हाईकोर्ट के आदेशानुसार तोड़ दिया जाएगा। आप सब लोगों को हुक्म दिया जाता है कि कॉलोनी तुरन्त ख़ाली कर दें'' पहले तो किसी की समझ में कुछ भी नहीं आया। लेकिन लोगों को हालत समझने में देर न लगी। एक भगदड़-सी मच गई और प्रत्येक व्यक्ति ने अपने घर का सामान और बच्चों को लेकर निकलने की कोशिश की। लेकिन वक्त इतना कम था और घबराहट इतनी ज्यादा कि बहुत कुछ वहीं रह गया। कुछ लोगों ने इस कार्रवाई को लड़कर या बुल्ड़ोजरों के सामने लेट कर रोकने की भी कोशिश की। औरतों ने अपनी भड़ास गालियों और कोसनों से निकाली। मगर पुलिस की ताक़त इतनी ज्यादा थी कि उनकी लाठियों के सामने कुछ भी शक्तिहीन साबित हुआ। पुलिस ने किसी को नहीं छोड़ा जिस ओर से भी हस्तक्षेप करने की कोशिश की गई उसे जबरदस्त शक्तियों से कुचल दिया गया। पुलिस ने गालियों का जवाब लाठियों से और पत्थरों का जवाब हवाई फ़ायर से दिया। जिन लोगों ने जत्था बनाकर और रूकावटें लगाकर बाधा डालने की कोशिश की उन्हें पुलिस ट्रक और जीपों के नीचे कुचल देने की धमकियाँ देकर और भरपूर पिटाई करके रास्ते से हटा दिया गया। पुलिस के पास शक्तियाँ इतनी जबरदस्त थीं कि उन लाचार, निहत्थे और बिखरे लोगों के लिए घुटना टेकने के अलावा कोई रास्ता न था।
स्वराज को सुबह की इन सारी बातों को सुनने के बाद अंजू और अनीता की और भी फ़िक्र हुई। वह परेशान था कि उस तोड़-फोड़ में अंजू इतनी छोटी सी बच्ची को लेकर कहाँ गई होगी और उसकी झुग्गी में जो रोज काम आने वाला जरूरी सामान था, उसका क्या हुआ। वह इसी उधेड़-बुन में था कि भीड़ से आवाज आई -''पुलिस से पंगा लेना बेकार है आओ नेता जी के पास चलते हैं। वही हमारी मदद करेंगे।'' बाक़ी लोगों ने भी इसका समर्थन किया और ये तय किया कि नेता जी से ही मदद मांगी जाए - ''हमने पिछले इलेक्शन में न केवल उनको वोट दिये थे बल्कि पूरे क्षेत्रा में उनके लिए प्रचार का काम भी मिलजुल कर किया था। क्या वो हमारे इस आड़े वक्त में काम नहीं आएंगे?''
ये सारी गुफ्तुगू सुनकर स्वराज के दिमाग़ में एक उमीद की किरण पैदा हुई। वह पिछले दस सालों से नेताजी को जानता था। पहले वो पास की पक्की बस्ती में एक छोटे से मकान में रहते थे और साइकिल की मरम्मत की दुकान चलाते थे, किसी जानने वाले के द्वारा उनकी पहुँच इलाके के एम.एल.ए. तक हुई और उन्हें एम.एल.ए. का कार्यकर्ता बनने में फायदा नजर आया। कुछ ही दिनों में वह पार्टी वर्क़र बन गए और पार्टी की ''नीतियों के समर्थक'' जबकि वास्तव में, उनकी समझ में न तो पार्टी की नीतियाँ ही आती थीं और न ही उनका कारण। उन दिनों नेताजी राम प्रकाश, स्वराज के बहुत निकट रहे। उन्होंने बहुत कोशिश की कि स्वराज भी पार्टी का सदस्य बन जाता। वो पार्टी के एजेण्डे और पॉलीसी के अनुसार मंदिर आन्दोलन में लोगों को एक जुट करने का काम करते थे। मगर एक काम के लिए वह स्वराज को राजी नहीं कर पाये क्योंकि उसके सवालों का जवाब नेताजी के पास नहीं था। स्वराज ये कहता था कि - ''रामजी के लाखों मंदिर हिन्दुस्तान के हर हिस्से में मौजूद हैं एक और मंदिर बना लेने से देश का क्या भला हो सकता है। दूसरी बात ये कि भगवान तो मन में बसते हैं, मंदिरों में नहीं ...'' राम प्रकाश को ये सब बातें नागवार लगती थी। लेकिन उनके पास कोई जवाब नहीं था। वो ख़ामोश हो जाते। वैसे भी स्वराज से झगड़े का कोई कारण नहीं था। क्योंकि दोस्ती और अपनेपन में वह राम प्रकाश की बात टालता नहीं था और राम प्रकाश के लिए भी ये फ़ायदे का सौदा था।

मंदिर आन्दोलन में जज्बात को उभारकर पार्टी ने भरपूर राजनीतिक लाभ उठाया। पार्टी आगे बढ़ी तो राम प्रकाश की भी क़िस्मत जागी। वह जल्द ही इलाके की पार्टी का अध्यक्ष बन गया और आने वाले चुनाव में, उसे चुनाव लड़ने का मौका भी मिला, जो उसने पार्टी के जज्बाती नारों की मदद से सरलतापूर्वक जीत लिया। उसकी इस सफलता में पुराने साथियों और दोस्तों का बड़ा हाथ था।
एम.एल.ए. बनने के बाद राम प्रकाश को बड़ी सरकारी कोठी मिली और वह इलाक़ा छोड़कर उसमें चले आये। अब वह एक सफ़ल और व्यस्त नेता थे। उसके पास इलाके की छोटी-छोटी समस्याएं और प्रतिदिन होने वाली परेशानियों को हल करने के लिए समय नहीं था। अब वह इलाके में तब ही आते थे जब उनके सम्मान में कोई सभा की जाती या केन्द्रीय पार्टी के किसी बड़े लीडर की रैली के लिए भीड़ इकट्ठी करनी होती।
इन सारी सच्चाइयों से स्वराज अच्छी तरह परिचित था लेकिन ये यक़ीन जरूर था कि राम प्रकाश इतनी बड़ी मुसीबत में पुराने सम्बन्धों के आधार पर उसकी मदद जरूर करेगा।
भीड़ का एक बड़ा हिस्सा जिसमें औरतें भी शामिल थीं, स्वराज और चार-पाँच दूसरे लोगों की अगुआई में नेताजी राम प्रकाश के घर पर जाने का फैसला किया। ये सभी लोग अलग-अलग बसों में बड़ी मुश्किल से नेताजी की कोठी पर पहुँचे। उस समय सुबह के दस बज रहे थे। सिक्युरिटी गार्ड ने बताया कि इस समय नेताजी किसी से नहीं मिलेंगे। उन्हें इसेम्बली पहुँचने की जल्दी है। आप लोग शाम को आइयेगा। यदि उन्हें फुर्सत होगी तो आप को बुला लेंगे। ये सुनकर स्वराज जैसे फट पड़ा - ''नेता जी से कहो, स्वराज उनसे मिलने आया है।''
शोर सुनकर कोठी के अंदर से दो नौकर निकल आए और जोर से बोले - ''आप लोग धीरे बोलें, नेताजी नाराज हो रहे हैं।''
स्वराज की बात सुनकर सिक्युरिटी गार्ड पर कोई असर न हुआ। भीड़ बेचैन होने लगी। सबको उमीद थी स्वराज की बात को नेताजी तक पहुँचाया जायेगा। लेकिन नेताजी के स्टाफ के लिए प्रतिदिन जैसी बात थी। प्रतिदिन कई-कई लोग आते थे और नेताजी से अपने रिश्ते की गहराई बयान करके उनसे तुरन्त मिलने की इच्छा प्रकट करते थे। इस पृष्ठभूमि में स्वराज और उसके साथ भूखी नंगी भीड़ की क्या औक़ात थी। नेताजी से मिलने की उमीद ख़त्म होने से भीड़ में बेचैनी बढ़ गई और इसी दौरान एक नौजवान ने पत्थर उठाकर खिड़की के शीशे पर फेंका और शीशा चकनाचूर हो गया। इत्तेफाक़ से ये नेताजी राम प्रकाश का अपना कमरा था। जहाँ पर वो एसेम्बली जाने के लिए तैयार हो रहे थे। पत्थर और टूटते शीशे के अचानक शोर ने उनके पारे को आसमान पर पहुँचा दिया और वो आपे से बाहर होकर अपने स्टाफ पर चिल्लाने लगे। कुछ ही क्षणों में घर का नौकर भागा हुआ आया। भीड़ और उसके रवैये के बारे में एक छोटी सी रिपोर्ट दी। ये सुनकर नेताजी का गुस्सा और बढ़ गया। और वो चिल्लाते हुए बाहर आए। सामने स्वराज और दूसरे जाने माने चेहरों को देखकर एक क्षण ठिठके और अपनी आवाज+ को धीमी करते हुए कहा कि - ''ये कोई वक्त और तरीक़ा है आने का'' पिछले कुछ घंटों के हालात और रात भर जागने के कारण स्वराज का दिमाग हांडी की तरह उबल रहा था। उससे राम प्रकाश का रवैया बर्दाश्त न हुआ और चिल्ला कर बोला -
''हमारे लिए ये जिन्दगी और मौत की घड़ी है और आपको आने का वक्त और तरीके की शिकायत है। क्या हमने हर अच्छे-बुरे वक्त में आपका साथ नहीं दिया था? अपने दिन-रात की अथक मेहनत हमने बिना किसी परिश्रमिक के की। जो आपकी सफलता की इसी सीढ़ी तक पहुँचाने के लिए जिम्मेवार है। आज जब हम बेघर कर दिये गये हैं। हमारे घरों को तोड़ दिया गया है। हमारी बस्ती को उजाड़ दिया गया है। हमारे बच्चे लापता हैं और हमारा सब कुछ लुट चुका है और पुलिस ने हमारे ऊपर जुल्म ढाए हैं। क्या आप हमारी मदद नहीं करेंगे?''
ये सुनकर राम प्रकाश ने धीमी आवाज में कहा - ''स्वराज अपने दो-तीन साथियों के साथ मेरे ऑफिस में बैठो और बाकी भीड़ बंगले से बाहर जा के सड़क पर इंतजार करे।''
ये सुनकर नौकर ने ऑफिस का दरवाजा खोला, स्वराज और उसके तीन साथियों को ऑफिस में बैठा दिया गया। सिक्युरिटी गार्ड ने डण्डे के इशारे से बाक़ी लोगों को बंगले के गेट से बाहर निकल जाने का इशारा किया। नेताजी अन्दर चले गए। स्वराज और उसके साथी लगभग पन्द्रह-बीस मिनट तक बेचैनी से नेताजी के आने का इंतजार करते रहे। हर लम्हे का इंतजार उनके लिए बहुत भारी था। लेकिन ये क्या कर सकते थे। लगभग आधे घंटे के बाद इंतजार ख़त्म हुआ और अन्दर वाले दरवाजे पर नेताजी देखे गए। नेताजी के चेहरे पर गुस्सा, झुंझलाहट और बेबसी के मिले-जुले भाव नजर आ रहे थे। उन्होंने कुर्सी पर बैठते हुए पूछा - ''बताइये मैं आप लोगों के लिए क्या कर सकता हूँ? जो कुछ भी आप लोगों के साथ हुआ है उसका सम्बन्ध हमारी केन्द्रीय सरकार और उसके प्रशासन से नहीं है ये तो हाईकोर्ट के ऑर्डर के अनुसार हुआ है। जिसको रोकना या इस बारे में कुछ कर पाना हमारी पार्टी के बस से बाहर है, क्योंकि सरकार हमारी पार्टी की नहीं है और ये सब कुछ कांग्रेस की जनविरोधी पॉलीसियों के कारण हो रहा है। इस मामले में हमारे हाथ पूरी तरह बंधे हुए हैं। इस कार्रवाई को रोका नहीं जा सकता। मैं अगर आप लोगों की किसी और तरह से मदद कर सकूं तो बताइये।''
नेताजी का ये भाषण सुनकर उन चारों का दिमाग घूमने लगा और चारों ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देने लगा। इसी बेबसी की हालत में स्वराज ने धीमी आवाज में कहा-''मेरी बेटी अंजू और नतनी लापता है। मैंने उन्हें ढूंढने की बहुत कोशिश की मगर तलाश नहीं कर सका...
राम प्रकाश ने उसे सांत्वना देते हुए कहा - ''फ़िक्र मत करो, मिल जाएंगे। मैं इलाके के ए.सी.पी. से बात करता हूँ। शाम तक कुछ न कुछ पता चल ही जाएगा।''
स्वराज के तीनों साथी जो बिना किसी हल के मीटिंग का अंत होता देख रहे थे उनकी बेचैनी बढ़ गई। रमेश ने अंदेशे से पूछा - ''मगर हमारे घरों का क्या होगा? हम कहाँ जायेंगे? ये कैसा लोकतंत्रा है कि आप लोग वोट माँगने के बजाये अपनी जिन्दगी संवारते हैं...?''
ये सुनकर नेताजी बोले - ''देखो भाई मैं तुम्हारे बीच से ही आया हूँ और तुम्हारी समस्याएं और परेशानियों को अच्छी तरह जानता हूँ मगर क्या किया जाये, हर साल लाखों लोग दिल्ली की ओर प्रस्थान करते हैं और दिल्ली शहर देश की राजधानी होने के बावजूद गंदगी, प्रदूषण और भीड़-भाड़ से बरबाद हुआ जाता है। हमारी सरकार और पार्टी ने अरबों रुपये खर्च करके दिल्ली शहर को खूबसूरत और दुनिया भर के लिए नमूना बनाने की भरपूर कोशिश की। मगर हम लोग इसमें सफल तब ही हो सकते हैं जब आप लोग हमारी मदद करें...''
सुरेन्द्र ये सुनकर आक्रोश और तेज स्वर में बोला - ''आप लोग दिल्ली शहर को सुन्दर बनाने की बात तो करते हैं मगर लाखों आवाम उसका सुख भोगने के बजाये अपनी रोजी और सर पर की छत तक गवां देती हैं।
स्वराज जो अभी तक ये गुफ्तुगू ख़ामोशी से सर झुका कर सुन रहा था। लगभग उखड़े हुए स्वर में बोला - ''नेताजी, आपको मालूम है मेरा नाम स्वराज क्यों है...?'' जवाब का इंतजार किये बिना अपने ही विचारों में मगन बोलता ही रहा - ''मेरे पिताजी बस्ती जिला के एक छोटे से गांव में अपनी थोड़ी सी जमीन जोता करते थे। जब गाँधी जी ने देश की स्वतंत्राता के लिए आन्दोलन चलाया तो अनपढ़ और ग़रीब होने के बावजूद गाँधी जी की आवाज पर आजादी की लड़ाई अर्थात्‌ आन्दोलन में शामिल हो गए थे। लाठियाँ खाई थीं और जेल भी गए थे। सम्पूर्ण स्वराज का सुन्दर सपना उनके लिए इतना मीठा था कि उसी दौरान आजाद हिन्दुस्तान की इतनी खूबसूरत तस्वीर खींचा करते थे और पास पड़ोस के सभी लोग उस सुन्दर सपने के पूरा होने का बेचैनी से इंतजार करते थे। जब मैं ये सब कुछ याद करता हूँ और आजादी के ५६ साल बाद अपनी हालत पर नजर डालता हूँ तो अपने पिताजी की सादगी और कम बुद्धि पर बहुत दुख होता है। उनके उस समय के सपनों और आज की वास्तविकता के बीच का फ़ासला शायद उतना ही है जितना स्वर्ग और नर्क के बीच का।''
नेताजी ने स्वराज की बात काटते हुए कहा - ''आप लोग धोखा खा गए, ये सब दूसरी समयवादी पार्टियों की ५० साल की ग़लत पॉलीसियों का परिणाम है। उसने आवाम को धोखा दिया। देश का बंटवारा कराया और मुसलमानों को खुश रखने के लिए हिन्दुओं के साथ कट्टरपन की नीति अपनाई। इस देश में बहुसंख्यक होने के बावजूद हिन्दू असुरक्षित है और मुसलमान बदमाशी पर उतारू रहते है। जब उन्हें पाकिस्तान मिल गया था तो इस देश की करोड़ों नौकरियों पर उनको कब्जा जमाने की इजाज+त क्यों दी गई। आप लोग हमारी पार्टी का साथ दें तो हम हिन्दुओं का सम्मान और पहचान के साथ गौरव की जि+न्दगी बिताने का मौका देंगे।''
रमेश बोला-''क्यों धोखा देते हैं। मस्जिद तोड़ने में हमने आपका भरपूर साथ दिया। इस बात को ग्यारह साल हो गये। आपने अपना कौन सा वायदा पूरा किया? छः साल से तो केन्द्र में आपकी ही सरकार है। हमारी जिन्दगी के हालात पहले से कहीं ज्यादा ख़राब हैं। अगर सड़कें बनी हैं तो हम उस पर चलाने के लिए गाड़ी कहाँ से लाएं? अगर टेलीफोन की संख्या देश में कई गुना बढ़ी है तो उससे हमें क्या फायदा? हमारे पास तो दो वक्त की रोटी और सर पर छत का इंतजाम करने के लिए भी पैसा नहीं है। कम्प्यूटर हमारे किस काम का?''
नेताजी इस बात पर नाराज हुए और बोले - ''आप लोग बहुत स्वार्थी हैं। सिर्फ अपना सोचते हैं, अरे भाई कुछ देश का भी सोचो। इस तरक्की से दुनिया में भारत का गौरव कितना बढ़ा है। आप लोगों को क्या मालूम। भारत की तरक्क़ी के दुनिया में हर तरफ़ चर्चे हैं। अटल जी की जय-जयकार हो रही है।''
स्वराज ये गुफ्तुगू सुनकर जल-भुन गया और चिढ़ कर बोला - ''आपका मतलब है कि बाइस ग़रीब बेसहारा औरतों को एक साड़ी के लिए अपनी जान गंवानी पड़ती है, शायद यही भारत की महानता को उजागर करता है। देश के प्रधानमंत्री इतने समय से इस इलाके से चुने जा रहे हैं यदि वहाँ पर जनता की बदहाली की ये स्थिति है तो देश में क्या हो रहा होगा? यदि देश की राजधानी में पुलिस हमारे ऊपर इतनी अत्याचार कर सकती है तो बाक़ी देश का तो ऊपर वाला ही मालिक है। नेताजी आप से केवल इतना कहा है कि ये बड़ी-बड़ी बातें जो हम बरसों से सुनते आ रहे हैं इसे छोड़कर छोटी-छोटी मौजूदा समस्याओं का हल तलाश करने की कोशिश करें। इस समय जो समस्या हमारे सर पर छत और हमारी बुनियादी जीवन की आवश्यकताऐं हासिल करने और पाने की है, और मेरे लिए तो मेरी बच्ची और नतनी की उसके लिए क्या करूं? हमें आपकी मदद चाहिए। भगवान के लिए हमारा साथ दें।''
नेताजी जो अब तक बुनियादी समस्याओं पर गुफ्तुगू करने से बचने की कोशिश कर रहे थे। इतने सीधे सवाल सुनने के बाद उन्हें अपने दिन की व्यवस्तता को याद कराने में ही टालने का रास्ता नजर आया, बोले - ''भाई! एसेम्बली में मेरी बहुत ही महत्त्वपूर्ण मीटिंग थी जिसके लिए आप लोगों के कारण मैं डेढ घंटा लेट हो चुका हूँ। अभी आप लोग चलें, मैं शाम तक आप लोगों के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।''
नेताजी उन लोगों को भेजने के बाद अपनी कुर्सी पर आँखें बंद कर के हालात का जाइजा लेने लगे। उनके राजनीतिक दिमाग़ में बहुत जल्दी वाक़िये से जुड़े हुए फायेदे और नुक़सान का हिसाब क्षणों में लगा लिया था। इन हालात का फ़ायदा उठा कर वह पार्टी और अपनी राजनीतिक पोजीशन को मजबूत कर सकते थे और जेब भरने के रास्ते भी निकाल सकते थे। लेकिन इन नाजुक वक्त में अपनी राजनीतिक बिसात पर सोच समझकर चालें चलने का वक्त था। वर्ना साले विरोधी पार्टी वाले सारी मलाई ले उडेंगे। इन हालात में उन्होंने पुलिस और अफ़सर शाही से मिलकर मौके से फायदा उठाने की योजना बनानी शुरू कर दी।
नेताजी राम प्रकाश ने दिन की दूसरी व्यस्तता को रद्द करके अपना समय इस मामले से जुड़ी राजनीतिक बिसात पर लगाने के लिए सोचा। इन हालात में इलाके के पार्टी वर्करों से बात करना फिजूल नजर आया। इसलिए सबसे पहले उन्होंने हालात की तफसील जानने के लिए इलाके के थाने के एस.एच.ओ. को फोन किया। उससे हालात जानने और दूसरे पार्टी के प्रोग्राम की तफ़सील प्राप्त करने के बाद उनका अंदेशा कई गुना बढ़ गया। उन्होंने तुरन्त राज्य के पार्टी अध्यक्ष से बात करने की कोशिश की। परन्तु वह शहर में नहीं थे। इसके बाद ऐसेम्बली में अपने पार्टी के लीडर को टेलीफोन करके हालात की जानकारी दी और तुरन्त कुछ करने की जरूरत पर जोर दिया। लेकिन पार्टी के लीडर की इस मामले में ज्यादा दिलचस्पी न पाकर वह निराश हो गए। उन्होंने अपनी पार्टी के कई दूसरे एम.एल.ए. को फोन करके स्थिति से अवगत कराया और पार्टी की दिलचस्पी न लेने की शिकायत की, साथ ही ये समझाने की कोशिश भी की कि ऐसी स्थिति में उन सबकी पोजीशन भी अपने-अपने इलाके में खराब हो सकती है। शाम तक वह अपने पाँच साथी एम.एल.ए. को इस बात पर राजी करने में सफल हो गए कि वो एक टीम बनाकर केन्द्रीय शहरी-विकास मंत्री महोदय से मिलेंगे परन्तु जब पता चला कि वह विदेश छुट्टी मनाने गए हैं तो उनकी झुंझलाहट देखने के क़ाबिल थी।

स्वराज और सुरेन्द्र आदि नेताओं के बंगले से निकल कर जब बाहर आए तो उनके चेहरे लटके हुए थे और बाहर इंतजार करती हुई भीड़ को सुनाने के लिए उनके पास कोई अच्छी रिपोर्ट न थी। इस परेशानी की हालत में वापस अपने इलाके में जाने का और अपने बाक़ी साथियों से विचार विमर्श करने का फैसला किया। जब ये लोग वापस पहुँचे तो दोपहर हो चुकी थी। वहाँ पहुँचने पर उन्हें हालात कुछ बदले-बदले नजर आए। पुलिस पहले की ही तरह इलाके को घेरे खड़ी थी और टूटी हुई झुग्गियों के पास किसी को जाने की इजाजत न थी। मगर दूसरी पार्टी वालों ने बाहर एक रिलीफ़ कैम्प लगा दिया था। जहाँ मुफ्त का खाना बाँटा जा रहा था। वापस आने वाली भूखी-प्यासी भीड़ के लिए ये बहुत बड़े इनाम से कम न थी। कैम्प को चलाने वालों ने इस सबका स्वागत किया और पेट भर के खाना दिया। खाना खत्म होने के बाद कुछ पार्टी लीडर आए और उनसे कहा कि - ''भाईयों आप लोगों के साथ जयादती हुई और हम आप लोगों का दुख समझते हैं। पिछले इलेक्शन में आपकी कॉलोनी के अधिकतर लोगों ने वोट दूसरी पार्टी को दिया था मगर फिर भी हम आप की मदद को पहले आए। आपके घर को तोड़े जाने में हमारी राज्य सरकार का कोई हाथ नहीं है क्योंकि ये सब कुछ कोर्ट के ऑर्डर से हुआ है मगर हमारी सरकार ये कोशिश कर रही है कि आप लोगों की पूरी तरह से मदद की जाए। हमारे मुख्यमंत्री और शहरी विकास मंत्री आप लोगों से मिलना चाहते हैं ताकि आपकी समस्याओं को हल किया जा सके।''
इस सारी गुफ्तुगू का बस्ती के लोगों पर बहुत ही जबरदस्त असर हुआ और पार्टी जिन्दाबाद के नारे फ़िजा में बुलंद होने लगे। स्वराज की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बेटी और नतनी को किस तरह तलाश करे। उसने बड़ी बे-दिली से रिलीफ़ कैम्प में कुछ निवाले जहर मार किए। क्योंकि उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। उसने सोचा कि ''कम से कम अंजू और अनिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस स्टेशन में तो कर ही दूँ।'' वह ये सोचकर इलाके की पुलिस चौकी में गया और दोनों की गुमशुदगी के बारे में ड्यूटी अफ़सर से रिपोर्ट लिखने की विनती की। ड्यूटी अफ़सर से अंजू की उम्र और दूसरी निजी बातों के बारे में प्रश्न पूछने के बाद हंस कर बोला-''जा घर जा, यार के साथ भाग गई होगी। कुछ दिनों में वापस आ जाएगी।''
जब स्वराज ने उनकी बातों में पे ऐतराज करने की कोशिश की तो उसने गालियों की बौछार करने के बाद कहा-''ऐसे मामले हमारे पास रोज आते हैं, क्या पुलिस फोर्स तुम्हारी बस्तियों की आवारा लौंडियों को तलाश करने के लिए ही रह गई हैं। भाग जा यहाँ से।'' यह सुनकर स्वराज की आँखों में आँसू तैरने लगे और दुखी होकर वापस रिलीफ़ कैम्प में आ गया। लगभग चार बजते-बजते सामने के मैदान में एक स्टेज बना दिया गया और हजारों की संख्या में पार्टी के झंडे चारों ओर लहराने लगे। आस पास की झुग्गी-झोपड़ी कालोनियों से भी काफ़ी संख्या में लोगों को जमा किया गया और पाँच बजे तक बड़ी राजनीतिक पब्लिक मीटिंग की तैयारी पूरी हो चुकी थी। मुख्यमंत्री और शहरी विकास मंत्री के पहुँचने में भी देर न लगी। धुआंधर भाषण शुरू हो गये। प्रत्येक भाषणकर्ता इस बात पर जोर दे रहा था कि ये शहर की गरीब जनता के खिलाफ केन्द्रीय सरकार, विशेष रूप से शहरी विकास मंत्री का हाथ हो सकता है, इसको नाकाम बनाएं। मुख्यमंत्री, शहरी विकास मंत्री और दूसरे लीडरों ने जनता की लड़ाई में अपनी जान तक कुर्बान करने के वायदे कर डाले और आखिर में मुख्यमंत्री ने तालियों की गूंज में ये ऐलान किया, ''वह सारे लोग जो यहाँ से उजाड़े गये हैं उन्हें राज्य-सरकार की तरफ से दस-दस गज जमीन दी जाएगी।''
ये सारी कार्रवाई देखने के बाद उन सब लोगों की बहुत उमीदें बंधी थीं क्योंकि यहाँ पर जिन्दगी और मौत का सवाल था। अगले वक्त की रोटी और शाम को सर छुपाने के लिए सर पर छत की जरूरत थी। जो भी इस तत्कालीन आवश्यकता को पूरा करने की उमीद दिला दे उसी को अपना माई-बाप बनाने में आफ़ियत है। यहाँ मामला मूर्ख बनने का नहीं था बल्कि जिन्दा रहने के संघर्ष का था। इसीलिए जय-जय कार और नारे की गूंज में जिन्दगी का अंश नजर आया। पिछले ५६ साल के तजुर्बे याद करके दिल परेशान करने से कुछ हासिल नहीं हो सकता था।
जलसे में हुए ऐलान सुनने के बाद स्वराज को कुछ सुकून का एहसास हुआ कि कम से कम सर छुपाने की जगह तो मिल जाएगी। मगर एक तनाव के कम होते ही उसको अपनी बेटी और नतनी की फिक्र व्यग्रता से सताने लगी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? कहां जाए उन्हें तलाश करने? और उसके लिए किसकी मदद ले? इसी बीच उसे रिलीफ़ कैम्प और जलसे के व्यवस्थापकों में एक से उसका सामना हुआ और उसने अपनी परेशानी उससे बयान कर दी। कुछ ही लम्हों में वो इलाके के पार्टी अध्यक्ष के सामने खड़ा था जो पूरे जज्बात के साथ अपनी हमदर्दियों का इज्हार कर रहा था। जल्द ही लोगों का एक समूह जमा हो गया और लापता ''माँ-बेटी'' की तलाश न कर पाने के लिए ''पुलिस हाय-हाय'' के नारे गूंजने लगे और ये भीड़ नारेबाजी करती हुई पुलिस स्टेशन की तरफ़ चल पड़ी। पुलिस स्टेशन पर पहुँच कर पार्टी अध्यक्ष महोदय अपने कुछ चम्चों और स्वराज को लेकर एस.एच.ओ. के कमरे में चले गए। एस.एच.ओ. बड़ी गरमजोशी और अपनाइयत से मिला। तुरन्त चाय आदि का इंतजाम किया गया और एस.एच.ओ. ने सम्मानपूर्वक कहा--''श्रीमान इतनी भीड़ लाने की क्या जरूरत थी। मुझ को बुलवा लिया होता। मैं इस सिलसिले में कुछ करता हूँ...''
पुलिस स्टेशन के स्टाफ ने स्वराज का बयान लिया और एफ.आई.आर. दर्ज किया। स्वराज का दिल बहुत बेचैन था। उसने कहा - मैं अपनी टूटी हुई झुग्गी देखना चाहता हूँ। शायद मेरी बेटी और नतनी वहाँ कहीं फंस गये हो-पुलिस वालों ने उसका मजाक उड़ाया और कहा - ''वहाँ कोई कैसे हो सकता है? वो इलाक़ा तो खाली करा लिया गया था।'' ये तमाम कार्रवाई चल ही रही थीं कि अचानक एस.एच.ओ. के टेलीफोन की घंटी बजी और दूसरी तरफ से उनके मातहत पुलिस वालों ने बताया कि टूटी हुई झुग्गियों के मलवे से एक औरत और एक छोटी सी बच्ची की लाश बरामद हुई है। एस.एच.ओ. के दिमाग़ में अचानक बिजली कौंध गई और वो परेशान हो गये, इसलिए नहीं कि दो मजलूम इंसानों की लाशें बरामद हुई थीं बल्कि इसलिए कि इसकी सफ़ाई कौन-कौन और कैसे-कैसे देगा ताकि अपनी-अपनी नौकरियाँ बचाई जा सकें। टेलीफोन रखने के बाद एस.एच.ओ. पार्टी लीडर को एक दूसरे कमरे में ले गया और उसे फोन पर मिलने वाली सूचना के बारे में बताया। एस.एच.ओ. के चेहरे पर परेशानी साफ झलक रही थी और उसी हाल में वह पार्टी अध्यक्ष से बार-बार कह रहा था - ''मैंने हमेशा आपका साथ दिया है आज आपको मुझे इस मुसीबत से निकालना होगा...''
अध्यक्ष महोदय ने भी उसे यक़ीन दिलाया कि - ''यदि वो उसके कहे पर चलता रहेगा तो वह उसकी जरूर मदद करेगा...''
वो दोनों लाशें वाकई अंजू और अनीता की थीं। अंजू सूर्योदय से पहले जब शौच आदि के लिए दूर मैदान में गई तो नन्हीं अनीता गहरी नींद में सो रही थी। अंजू के वापस आने से पहले ही झुग्गियां तोड़ने का काम शुरू हो चुका था। सरकारी अधिकारी और पुलिस, लाउडस्पीकर पर ऐलान करने के बाद इस बात से संतुष्ट हो गये कि झुग्गियां खाली हो चुकी हैं। नन्हीं अनीता गहरी नींद में अपनी बचपन का लुत्फ उठा रही होगी, इसका किसी को ख्+याल नहीं था। मगर अंजू ने वापस आते वक्त जब बढ़ते हुए बुल्डोजर को अपनी झुग्गी की तरफ आते हुए देखा तो उसकी ममता बेचैन हो उठी और चिल्लाते और रोते हुए अपनी झुग्गी में घुसकर अपनी बच्ची को बचाने की कोशिश करने लगी। बढ़ते हुए बुल्डोजर की आवाज टूटती दीवारों और गिरती हुई छतों का शोर इतना ज्यादा था कि चिल्लाती और बिलबिलाती अंजू की आवाज कोई न सुन सका। दो मासूम जानें सरकारी लापरवाही की भेंट चढ़ गईं।
बिलबिलाते रोते स्वराज को सांत्वना देने वालों के अलावा कोई न बचा था। इस घटना की जाँच के लिए एक कमीशन बनाया गया। जिसने पाँच साल के बाद यानी स्वराज की मृत्यु के डेढ साल बाद सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश की। जिसमें कहा गया था - ''ये केवल एक हादसा था और इसके लिए किसी को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता...''
बस्ती एक बार फिर से आबाद थी...!
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वाई-२०२, ताज इन्क्लेव, लिंक रोड,
गीता कॉलोनी, दिल्ली-११००३१
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अंतस की आवाज

- सुदर्शन पानीपती
आखिर रेणुका चली गई। उसे विदा देकर मैं लौटा तो मेरी मनःस्थिति उस मुसाफिर की-सी थी जो थक जाये, हार जाए, मंजिल के पास जाकर भी उसे छू न सके, असफलता जिसकी नियति बन जाए।
मैं चल तो रहा था किन्तु मेरी चाल में असमरसता नहीं थी। मेरे पांव लड़खड़ा रहे थे। मैं कुछ कदम चल कर रुक जाता। मुझे एहसास होता कि मेरी टांग मेरे जिस्म को खींच नहीं पाएगी। टांगें बहुत कमजोर हैं और जिस्म बहुत बोझल। बदहवासी में मैं अपनी गरदन पीछे घुमाता, मुड़कर देखता। मुझे भ्रम होता है कि रेणुका मेरा पीछा कर रही है, भागी आ रही है। रुक जाओ, रुक जाओ पुकार रही है। ग़ौर से देखने पर ही मुझे विश्वास होता कि नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैं जिन चेहरों में रेणुका का चेहरा खोज रहा हूँ, कौतूहलवश वे मुझे घूर रहे हैं, मानो जानना चाहते हैं कि मैं परेशान क्यों हूँ? रह रहकर पीछे मुड़कर क्यों देखता हूँ? रुक ही क्यों नहीं जाता? आने वाले की प्रतीक्षा ही क्यों नहीं कर लेता?
जैसे-तैसे मैं घर के मुख द्वार पहुँचा। चाहता था कि हाथ बढ़ाऊं, दरवाजे पर दस्तक दूँ, किवाड़ खुलवाऊं मगर मुझसे यह नहीं हो पा रहा था। ऐसा करना मुझे असंभव प्रतीत हो रहा था। मेरी इच्छा शक्ति ही जवाब देने लगी थी। मुझे आभास हो रहा था कि मैं यदि चाहूँ भी तो हाथ नहीं उठेगा, दरवाजे की जानिब नहीं बढ़ेगा। मेरे मनोप्राण कसमसाने लगे थे, बदन सिहरने लगा था। मुझे यक़ीन था कि बाबा जाग रहे होंगे, मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। मां ने उन्हें सब कुछ बता दिया होगा। किवाड़ वही खोलेंगे। फिर दोनों पल्लों को अपने हाथों से थामते हुए पूछने लगेंगे।
तुम्हारा मुँह क्यों उतरा हुआ है?
रेणुका क्यों नहीं आई?
यहां आना उसे अच्छा क्यों नहीं लगा?
वह वापस लौट गई है क्या?
उनके प्रश्नों का स्वरूप ऐसा होगा, यह मेरी कल्पना थी। मात्रा मेरे चिंतन की उपज। इसलिए मैं उन्हें विशेष महत्त्व नहीं दे रहा था। मैं जानता था कि ये मेरे अंतस में व्याप्त हताशा का परिणाम है। बाबा किसी और तरह भी पूछ सकते हैं। मगर सारांश तो यही होगा, मुझे ख्याल आया। मेरी हताशा बढ़ने लगी। उसके तीनों अक्षर, ह ता शा एक बड़े सवालिया निशान में ढल गये। मेरी आंखों के सामने हिलोरे लेने लगे, वाल क्लाक के पैंडुलम की तरह झूलने लगे, इधर से उधर, उधर से इधर।
तब क्या होगा जब किवाड़ खुलेंगे, बाबा से सामना होगा। वह मेरी आंखों में झाकेंगे। मुझसे सवाल करेंगे। वही सवाल, मैं जिनकी कल्पना तो कर रहा हूँ किन्तु उन्हें महत्त्व नहीं देना चाहता था। वह अपनी खनकदार आवाज में उन्हें दोहराएंगे, उनका पुनर्पाठ करेंगे।
यह विचार मेरे रोम-रोम में चरमराहट उत्पन्न करने लगा, पेड़ से झड़ते सूखे पत्तों की-सी चरमराहट।
रेणुका, जाने उसका नाम मेरी ज+बान पर कैसे आ गया। अब मेरे सामने बाबा का आक्रोशित चेहरा नहीं, रेणुका का वजूद था, सुघड़, सलोना, सौष्ठव। वह झील-सी विस्फारित आंखों वाली लड़की मुझे सम्मोहित कर रही थी।
मेरा अतीत मेरी आंखों के सामने उघड़ने लगा, एक नन्हीं-सी बच्ची को कन्धे से लगाए वह हमारे घर के सामने से गुज+रती है। मां बनने के बाद जब वह अपने बच्चे को उठाकर चलेगी तो कैसी लगेगी, मैं अनुमान लगाता हूँ। उसने कनखियों से मेरी ओर देखा है। मैं सायास मुस्कराता हूँ। एक मधुर मुस्कान उसके अधरो पर भी छितर गई है। मैं उमगता हूँ। सोचता हूँ लड़की पटने ही वाली है। जिस उद्देश्य से मैं उसे रोज ताकता हूँ उसके पूर्ण होने में अब देर नहीं। वह गली की नुक्कड़ पर जाकर जरा सी ठिठकती है, पीछे मुड़कर देखती है, मुस्कराती है और चली जाती है। मैं चाहता हूँ। मेरा मन बल्लियों उछलने लगता है।
हमारा एक कमरे का किराए का घर उसके घर के बिल्कुल सामने था। बाबा वहां एक फैक्ट्री में नौकरी करते थे। दरअसल वह नौकरी मुझे दिलाने गये थे किन्तु स्वयं भी करने लगे। सुबह जब वह काम पर चले जाते, मैं टिकटिकी लगाकर उसके घर की ओर देखने लगता। हर क्षण मुझे यह आस रहती कि वह अपनी विधवा मां की नजर बचाकर बाहर आएगी, मेरी ओर देखेगी, हंसेगी और शर्माती हुई लौट जाएगी।
बाबा सांझ को थके हारे लौटते। मुझसे पूछते कि दिन भर मैं क्या करता रहा हूँ? कहीं कोई नौकरी आदि तलाश करने का प्रयास भी किया अथवा नहीं। उनकी संतुष्टी के लिए मैं झूठ बोलता। अपने उत्तर में एक कल्पित दिनचर्या का खाका पेश करता। उस निकृष्ट प्रस्तुति के समय मुझे आत्मग्लानी का अहसास भी होता। मुझे ख्याल आता कि नौकरी करने तो मैं आया था, बाबा को तो फकत मेरा अभिभावक बन कर रहना था, सिर्फ मुझे संरक्षण देना था। इस दायित्व का निर्वहन भी वह मां के कहने पर कर रहे थे। ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित मां की मुसमुसी शक्ल देखकर बाबा भाव विह्नल हो उठते थे। वह समझते थे कि उसके किसी भी अनुरोध को अस्वीकार करना उसे मानसिक यातना देना है।
मां ने ही तो कहा था, दीपू की उम्र बढ़ती जा रही है। मेरी इच्छा है कि यह कोई धंधा करे, अपने पांव पर खड़ा हो, इसकी शादी हो। इसे बसता - रसता देखकर मैं चैन से मरूंगी। मैं सोचती हूँ करनाल हमारा आबाई वतन है वहां के लोग आज भी आप को याद करते हैं। आप इसे वहीं ले जाएं, कह-कहवाकर किसी फैक्ट्री में काम दिला दें। यह नौकरी करेगा, आप इसका ख्याल रखना।
कहते-कहते मां की आंखें भर आई थीं। बाबा न चाहते हुए भी मेरे साथ आ गए थे। तभी हमने यह कमरा किराए पर लिया था। मिलने-मिलाने वाले तो बहुत हैं, पर किसी के यहां ठहरना मुनासिब नहीं, बाबा सोचते थे। कमरे का परिवेश कैसा है, यहीं अंदाजा लगाने के लिए मैं इधर-उधर झांक रहा था कि अकस्मात मेरी नजर रेणुका पर पड़ी। उसने भी निगाह भर कर मुझे देखा था। लौडिंया सुन्दर है मैंने होंठों ही होंठों में कहा था।
बाबा के प्रयासों से मुझे एक फैक्ट्री में काम मिल गया। वह स्वयं किसी दूसरी जगह नौकरी करने लगे तेरी मां की बीमारी, घर की खस्ताहाली तथा दो स्थानों पर बटकर रहने का खर्च मेरी पैंशन और तेरी पगार में नहीं निपटेंगे। यो भी निठल्ले आदमी से जिन्दगी चिढ़ने लगती है। इसीलिए मैंने जॉब करना ही उचित समझा है बाबा ने एक शाम बताया था।
वह जॉब करते रहे लेकिन मैंने छोड़ दी। बहाना बना दिया कि मेरी मालिकों से नहीं बनती। कह दिया कि नौकरी का क्या है, कहीं और ढूंढ लूंगा। वास्तव में मेरी रुचि तो महज रेणुका को फांसने में थी। अब मैं जुनूनी की भांति अपने कमरे के बाहर खड़ा रहता। मुझे यही इन्तजार होता कि वह मेरे सामने आए तो मैं उसे देखकर मुस्कराऊं। मेरी बेबाकी तथा बेशर्मी पर आस पड़ौस के लोग काना-फूंसियां करते, जवान लौंडा कुछ नहीं करता, केवल इश्क फरमाता है और बूढ़ा बाप जिसे आराम करना चाहिए, सुबह से शाम तक पिलता रहता है।
रेणुका से मेरी मित्रता पर निखार आने लगा। हम शाम के गहराते अंधेरे में मिलते। उस कॉलोनी के बीचों-बीच बना छोटा-सा पार्क हमारे प्रेम प्रसंगों का साक्षी होता। उसे अपने चंगुल में पूरी तरह फांसने के लिए मैं खूब झूठी सच्ची फैंकता। कुछ ही दिनों में मेरा जादू उसके सिर चढ़कर बोलने लगा। अब वह मिलन स्थल पर मुझसे पहले पहुंचती मेरी प्रतीक्षा करती। वह सदैव उल्लसित होकर कहती कि उसे मेरी राह देखना अच्छा लगता है।
युवा मनों की चाहत युवा शरीरों की चाहत में बदलती, इससे पूर्व ही एक दिन बाबा ने घर बदलने की घोषणा कर दी। शायद वह मामले की तह तक पहुँच चुके थे।

नया घर शहर से बाहर था, उनकी फैक्ट्री के समीप किन्तु रेणुका के घर से बहुत दूर। अब रोज मिलना संभव नहीं होगा, एक ठण्डी आह भरकर मैंने रेणुका से कहा। एक सांझ, बाबा ने किचन में घुसते ही प्रश्न किया -
कौन आया था?
कोई नहीं
तो क्या दो गिलासों में चाय पीने वाले तुम अकेले ही थे?
अब झूठ की गुंजाइश नहीं थी। मैंने सच उगल दिया कि रेणुका आई थी।
अच्छा तो वह डायन यहां भी पहुँच गई।
उन्होंने त्यौरियां चढ़ाकर कहा। वह खिन्न थे किन्तु मेरे लिए वह खिन्नता बेअसर थी। अपने घर से इतनी दूर आकर उसका मुझे मिलना, मेरे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। मैं स्वयं पर इतरा रहा था। मैं समझता था कि मुझसे मुलाकात का जोखिम उठाकर उसने मेरे भीतर आत्म विश्वास पैदा किया है। मुझे यह अहसास दिया है कि मैं मां-बाप की नज+रों में भले ही निकम्मा और निखट्टू हूँ, किन्तु इश्क की राह में तो मैंने मील का पत्थर गाढ़ दिया है। लौंडिया फांसना कोई आसान काम नहीं है। मेरे ये विचार मेरी मानसिक वृत्तियों पर पूरी तरह छा गये थे।
बाबा की संभवतः मेरी मूर्खता का अनुमान लगा चुके थे। कुछ देर पहले जो रोष उनके चेहरे पर उजागर हुआ था, अब नहीं था। वह सहज होकर बोले -
क्यों आई थी?
मुझे चूरमा खिलाने। कह रही थी वह मुझे बहुत प्यार करती है। मन की अतल गहराईयों से चाहती है।
मैंने बड़े गर्व से उत्तर दिया। बाबा एक क्षण के लिए गम्भीर हो गये। मगर दूसरे ही क्षण अपने होठों पर हल्की सी मुस्कराहट बिखेरते हुए बोले -
चूरमा खिलाने आई थी, अच्छा? इस लोकांचल में प्रचलित हीर रांझा की प्रेम कहानी तो तुमने सुनी ही होगी। उस हीर ने भी रांझे को बहुत चूरमा खिलाया था। वह भैंसे चराता था। हीर उसे रोज मिलने जाती थी। उसकी बाहों में सिमटी सकुची उसे चूरमा खिलाती थी। उसी चूरमे की गंध मायावी सिद्ध हुई। वह संघर्षशील चरवाहा प्रेम दीवाना हो गया। उसने कान छिदवाकर कुण्डल पहन लिए, वीतरागी बन गया
गांभीर्य एक बार पुनः उनके चेहरे पर उभरने लगा। वह पैनी दृष्टि से मुझे घूरते हुए बोले, - तू बन सकेगा रांझा? हो सकेगा संन्यासी अपनी रेणुका की खातिर? तुम पाठ्य पुस्तकों से लौ नहीं लगा सके, रोजी-रोटी की खातिर हल्कान नहीं हो सके, जीवन की प्राथमिकताएं तय नहीं कर सके, प्रेम के दुर्गम मार्ग पर चल सकोगे?'' बाबा का स्वर शनै-शनै तीखा होता जा रहा था। उनके सामने खड़ा रहने की ताब अब मुझमें नहीं थी। मैं चुपचाप कमरे से बाहर निकल गया।
रेणुका अब लगभग रोज आने लगी थी। हम काफी समय एकान्त में गुजारते, कहकहे लगाते, अपने कमरे की खामोश फजाओं में जीवंतता उलीचते। वह मेरी बाहों में होती। मैं उसे अपनी वाक्‌ पटुता से भांति-भांति के सब्ज बाग दिखाता। जीवन भर साथ रहने की कसमें देता। वह मुझसे रोज मिलने आती है, इसी आधार पर मैं उसे सोहिनी की संज्ञा देता।
सोहिनी जो घड़े के सहारे तैरती हुई चनाव नदी को पार करती थी। हर रोज अपने यार महींवाल को मिलती थी।
उन्मना होने का अभिनय करते हुए मैं उसे बताता कि किस प्रकार एक दिन सोहिनी का घड़ा दरिया की निर्मम लहरों से जूझता हुआ फूट गया, वह गहरे पानी में समा गई।
सोहिनी डूब गयी, मगर महींवाल से उसकी मुहब्बत जिन्दा रही। उसका फसाना पंजाब की एक रागरंजित लोकगाथा बन कर अमर हो गया।

मैं जब-जब उसे यह कहानी सुनाता, उसकी मानसिक तथा दैहिक उत्तेजना बढ़ने लगती। उसका समर्पण अतिरेक को छूने लगता। वह प्यासी हिरणी की तरह छटपटाती, आंखों ही आंखों में कहती कि, मैं अपनी बाहों का घेरा और मजबूत करूं। अपनी आगोश में इतना कसूं कि वह मेरे ही वजूद का हिस्सा बन जाए।
उन अंतरंग क्षणों में वह प्रायः बुदबुदाती कि वह मेरे बच्चे की मां बनेगी, मुझे मेरा प्रतिरूप देगी। वह भाव विह्‌वल होकर फुसफुसाती, मैं अपना हाथ किसी दूसरे को नहीं दूंगी। तुम्हें वक्त की निर्ममता का शिकार नहीं होने दूंगी, रांझे की तरह मारा-मारा नहीं फिरने दूंगी, महींवाल की तरह बिछोह नहीं सहने दूंगा मैं मन ही मन अपनी चतुराई पर खुश होता।

एक दिन अचानक बाबा की नौकरी छूट गयी। वह घर आए तो उनका मुंह लटका हुआ था। उन्होंने एक नजर मुझ पर डाली और स्वतः बोलने लगे ,जिन्दगी भी एक रूपसी की तरह है, खूबसूरत बिंदास मोहिनी। परन्तु उसकी जुल्फें संवारने के लिए आदमी को फरहाद बनना पड़ता है, पहाड़ काटने पड़ते हैं। लेकिन नहीं, यह सब तुम्हें बताने का कोई फायदा नहीं। मैं समझता था कि मुझे इस वृद्ध अवस्था में नौकरी करते देखकर तुम्हारी आंखें खुलेंगी। तुम्हारे भीतर आत्म निर्भर बनने की ललक जागेगी। तुम मुझे नौकरी छोड़ देने के लिए कहोगे। खुद करने का आग्रह करोगे। तुमने अगर यह किया होता तो न मैं बुढ़ापे में नौकरी करता और न ही नौकरी से निकाले जाने का कड़वा अहसास लेकर लौटता''
बाबा, बोलते-बोलते रूआंसे हो उठे। अगले ही क्षण उनकी आंखें बरसने लगीं। परन्तु बूढ़ी आंखों से गिरते मोटे-मोटे आंसुओं का आकार मुझे एक झीने पारदर्शी आवरण सा ही लगा। मेरी नजरें उन्हें बेधती हुई रेणुका के शारीरिक अवयवों को देखने लगी। उनके बांकपन का आंकलन करने लगीं। खजुराओं की किसी मूर्ति की तरह उसका जिस्म मेरे सामने लहराने लगा। मैं कल्पना करने लगा कि उसके रसीले अधर मेरे पिपासित होठों की प्यास बुझा रहे हैं। उसकी सुंगधित सांसे मेरी रूह को सुवासित कर रही हैं। मेरे सीने से सटे उसके उरोज यह टोह लेना चाहते हैं कि मेरी धड़कनों में उसका नाम रचा बसा है या नहीं। बाबा रोते रहे, लेकिन मेरे कान पर जूं तक न रेंगी।

वह झल्लाते हुए बोले, अब भांकरोटा लौटने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। तुम्हें तो कुछ करना धरना नहीं। मुझे ही झक मारनी है तो मैं वहीं मार लूंगा अपने गांव में। कम से कम तेरी मां का ख्याल तो रख सकूँगा।
आखिर कुछ दिनों में करनाल हम से छूट गया।

गांव लौटकर मैं रेणुका की याद में आंसू बहाता रहता। मां मेरे निठल्लेपन पर सिर पीटती। बाबा यदा-कदा बुदबुदाने लगते। उनकी बुदबुदाहट हमेशा एक ही कथन की पुनरावृत्ति होती।
इस सच्चाई से तुम वाकिफ नहीं हो कि जीवित रहने के लिए मनुष्य को भूख के खिलाफ जिहाद करना पड़ता है। एक लड़की के इश्क में गिरफ्तार होकर तुमने समझ लिया है कि करबला का मैदान मारने वाले तुम्हीं थे.
मां प्रायः उनकी बात काट कर अपनी कहती, इससे इतना भी तो नहीं हुआ। यह उसे बहू बनाकर ही ले आता तो भी मैं समझती कि यह कुछ कर गुजरा है। मैं दोनों की सुनता और शून्य में घूरने लगता।

एक दिन अचानक मुझे रेणुका का पत्र मिला। लिखा था -
दीपू
मैं २५ जून को जयपुर आ रही हूँ। मुझे अंबेर में शिलामाता के दर्शन करने हैं। भैया ने कभी कोई मन्नत मांगी थी, मेरा वहाँ आगमन इसी सिलसिले में है। रात की बस से चलकर मैं सुबह पहुंचूँगी और उसी सांझ लौट आऊंगी। आशा करती हूँ कि तुम आओगे कुछ देर साथ रहेंगे।
रेणुका
२० जून को लिखा गया उसका पत्र मुझे २४ जून को मिला, मैंने पत्रा पढ़ा, उसे बार-बार चूमा। सहसा मुझे याद आया कि उसने बड़े ही निच्छल भाव से कहा था -
मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनूंगी, तुम्हें तुम्हारा प्रतिरूप दूंगी,

मैं बहुत खुश था। मैंने सोचा, मैं उसे भांकरोटा ले आऊंगा, वापस नहीं जाने दूंगा फिर मुझे ख्याल आया कि वह स्वयं ही नहीं लौटेगी। भैया को पत्रा द्वारा सूचित कर देगी कि उसने अपना लक्ष्य पा लिया है। उसे उसका अभीष्ट मिल गया है। मैं मां से कहूँगा लो मैं तुम्हारी बहू ले आया हूँ, बाबा को बोलूंगा लो बाबा, देखो मेरी हीर मेरे साथ आ गई है। उसने अपने रांझे को जोगी नहीं बनने दिया। अगले दिन सवेरे-सवेरे ही मैं उसकी अगुवानी के लिए निकल पड़ा। जाते-जाते मां को इस सम्बन्ध में एक हल्का सा संकेत भी दे गया।
मेरे पहुंचने से पूर्व रेणुका, वहां पहुंच चुकी थी। वह देवी के पूजन अर्चन से निवृत हुई तो हम मन्दिर के प्रांगण में टहलने लगे। वह पर्यटकों की सवारी हेतु सजे संवरे हाथियों को देखती रही। वहां की दुकानों पर रखी राजस्थान मूल की कलाकृतियों में खोई रही। कुछ देर बाद हम सुस्ताने के लिए वहीं एक ओर बैठ गये। उसकी भाव भंगिया से मुझे महसूस हुआ कि आज वह सदैव की भांति प्रफुल्लित नहीं है। उसका मस्तिष्क किसी उलझन का निदान ढूंढ रहा है। उसकी मांसल गालों पर गम की एक ऐसी परत है जिसके परिप्रेक्ष्य में गहरा दर्द उफन रहा है। इससे पूर्व कि मैं उसकी उदासी को खंगालने का प्रयास करूं उसने नजर भर कर मेरी आँखों में देखा। सहसा उसका सिर मेरे कंधे पर झूल गया। उसके अधर फड़फड़ाए -
दीपू, आज की भेंट हमारी अंतिम भेंट है।
मैं विस्मत सा उसका मुँह ताकने लगा। उसने अपनी बात जारी रखी।
तुम से विवाह का मेरा प्रस्ताव भैया ने खारिज कर दिया है। उनकी दृष्टि में तुम्हारी जीवन संगिनी बनने की अपेक्षा मेरा जीवन पर्यन्त कुंआरी रहना कहीं बहतर है। उनका कथन है कि जो अपना पेट भरने के लिए ही अपने बाप का मोहताज है वह पत्नी को कहां से खिलायेगा। उन्होंने यह धमकी भी दी है कि मैं यदि जिद करूंगी तो वह आत्म हत्या कर लेंगे। दीपू, तुम तो जानते ही हो कि पिता के देहान्त के पश्चात्‌ मुझे भैया ने ही पाला-पोसा है। मैं तुमसे प्यार जरूर करती हूँ किन्तु तुम्हारी खातिर मैं अपने मां जाये की लाश से नहीं गुजर सकती। यह साहस मुझमें नहीं है। मैं क्षमा चाहती हूँ। मुझे माफ करना दीपू।

कभी कभार शायद खामोशियां भी बोलती हैं अन्यथा बाबा कैसे जान पाते कि मैं बाहर खड़ा हूँ। उन्होंने एक झटके के साथ किवाड़ खोले, मैंने पर्दापण किया। मुझे देखकर मां भी वहीं आ गई। अचकचाते हुए मैंने सारा माजरा कह सुनाया। सुनते ही मां सिर पकड़ कर बैठ गई किन्तु बाबा ने एक जोरदार ठहाका लगाया।
तो तुम्हारी रेणुका, साहिबा बन गयी। साहिबा ने भी अपने भाईयों की खातिर अपने यार मिजरा के धनुष और बाण तोड़ डाले थे।
उफनते लावे की तरह ये शब्द उनके मुंह से निकले।
मां ने अपने स्वभावानुसार उनकी बात काटते हुए टिप्पणी की।
इस संघर्ष भीरू की तुलना मिर्जा से? आप भी कमाल करते हैं। कहां वह बहादुर प्रेमी और कहां यह हरामखोर पाखंडी।
हरामखोर, पाखंडी, मां के इन शब्दों ने मेरे तन बदन में आग लगा दी। मैं चाहता था कि उसका प्रतिवाद करूं, मगर मेरे भीतर का मैं मुझे धिक्कारने लगा।
तुमने पाखण्ड और हरामखोरी के सिवा किया ही क्या है?
यह मेरे अंतस की आवाज थी।
एच.१९/ए, रामनगर विस्तार,
सोडाला, जयपुर।

Thursday, March 27, 2008

मैंने कहा ना मैं तुलाराम नहीं हूँ

जाबिर हुसेन
तुलाराम अपने घर की तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर था कि उसके दिमाग़ में बाप की कही बात दोबारा कौंधी-
'कल से, उन्हीं में से किसी एक गोदाम में जाकर बैठा कर, घर आने की जरूरत नहीं। वहीं बीड़ियां बना कर अपना पेट पालने की सोच। आज से तेरे लिए इस घर के दरवाजे बंद।'
तुलाराम को बाप की कहीं बात और उसके धक्के याद आते ही यह ख्याल भी आया कि उसने सीढ़ियां उतरने से पहले अपनी मां से भेंट नहीं की। बल्कि उस दालान की तरफ़ देखा तक नहीं, जहां उसकी मां हर वक्त किसी काम में उलझी रहती है।
एक लम्हे के लिए तुलाराम ने सोचा, उसे सीढ़ियां दोबारा चढ़कर मां से आख़िरी बार जरूर मिल लेना चाहिए। आख़िर इसमें उसकी मां का क्या क़सूर ? क़सूर तो सारा तुलाराम का ही है। वही तो अपनी मर्जी से स्कूल का बस्ता पटक कर हर रोज कोई किताब या मैगजीन लिए गोदाम पहुंच जाता है। घर के लोग समझते हैं कि वो खेलने-कूदने निकला है, और घंटे-भर बाद लौट आएगा।
एक दिन, देर शाम, घर लौटने पर, रोटियां परोसते वक्त मां को तुलाराम के कपड़ों से तंबाकू की बू आती महसूस हुई तो उसने तुलाराम को टोका -
'तंबाकू की बू आ रही है, तेरे कपड़ों से। कहां गया था, बोल किन के साथ उधम मचा कर आया है।'
झूठ बोलने के सिवा कोई चारा नहीं था, तुलाराम के पास। वो जानता था, सच बोलने का मतलब होगा बाप के हाथों पिटाई, जिसके बारे में सोच कर ही वो एकदम से डर जाने लगा था। 'खेलते वक्त कूड़े के ढेर पर गिर गया था, वहीं तंबाकू का बुहारन पड़ा था।'
तुलाराम ने सफ़ाई के साथ जवाब दिया और रोटियां जल्दी-जल्दी मुंह में डालने लगा। दालान के एक तरफ़, उसके सवाल-जवाब से बेख़बर, बाप की नजरें अख़बार के पन्ने पर जमी रहीं।
अगले दिन, और एक किताब उसके हाथ लग गई, जिसके कुछ हिस्से तो उसने स्कूल में टिफ़िन की घंटी के बीच ही पढ़ डाले। कारख़ाना मजदूरों की लड़ाई से भरी थी वह किताब, जिसमें उन पर होने वाले जुल्म और कारख़ाना-मालिकों के ख़िलाफ चलने वाली लड़ाइयों की तफ़सील बयान की गई थी। पुलिस की जोर-जबरदस्ती का ब्यौरा था।
गोदाम में उस रोज मामूल से ज्यादा भीड़ थी। सिराज मियां के गोदाम के मजदूर भी अपना काम ख़त्म करके कहानी सुनने वहीं आ गए थे।
गोदाम में पेट्रोमैक्स की रोशनी फैली हुई थी और गहरा सन्नाटा था। बीच-बीच में, किसी के खांसने की आवाज और तेज-तेज चलने वाली सांसें जरूर सुनाई दे जाती थीं, जिससे गोदाम का सन्नाटा कुछ लम्हों के लिए भंग हो जाता था।
किताब दिलचस्प थी। किताब के हीरो की तक़रीरों में सिहरन पैदा करने वाली तासीर थी। तुलाराम के पढ़ने के ड्रामाई अंदाज से कहानी में जान आ गयी थी।
एक अध्याय, दो अध्याय, तीन अध्याय!
तुलाराम किताब पढ़ता गया, किताब के पन्ने उलटते गए। गोदाम के मजदूरों की उंगलियां तेजी से चलती रहीं। पत्ते काटती, तंबाकू भरती, धागे लपेटती उंगलियों के नुकीले नाखुन का बढ़ता पीलापन देखने की फुर्सत किसी को नहीं थी।
गोदाम में जलने वाले पेट्रोमैक्स का तेल ख़त्म होने को नहीं आ जाता तो शायद तुलाराम का पाठ कहानी ख़त्म होने तक इसी तरह जारी रहता।
तुलाराम और दिनों के मुक़ाबले, कुछ ज्यादा ही वक्त गुजार कर उस दिन घर लौटा। इसलिए सब की नजर में उसका आ जाना स्वाभाविक था। घर में दाख़िल होते ही, सबसे पहले टोकने वाली उसकी मां थी -
'कहां था, इतनी देर? किसके साथ था?'
तुलाराम को मालूम था कि उसकी मां इस बात से ज्यादा चिंतित रहती है कि वो घर से बाहर किसके साथ अपना वक्त गुजारता है। इसलिए वो हर दम मां के संतोष के लायक़ जवाब तैयार रखता था -
'मौसी के घर चला गया था, वहीं देर हो गई। मौसी ने खाने के लिए रोक लिया था।'
मौसी से मां के बहुत ही गहरे रिश्ते थे। मौसी मां की सबसे कमजोर नब्ज थी। उसका जि+क्र आते ही मां का गुस्सा शांत हो जाया करता। बल्कि, उसका नाम सुनते मां की आंखों में बूंदें छलक आतीं।
'मौसा घर में थे? कोई हंगामा तो नहीं हो रहा था? शराब पीकर तो नहीं आए थे? मौसी खुश तो लग रही थी ना?'
तुलाराम मां के इन सवालों के लिए तैयार नहीं था।
'मौसी ने कल फिर बुलाया है, कल सब कुछ देखकर आऊंगा।'
तुलाराम मां को टाल गया।
हाथ-मुंह धोकर खाने को बैठा तो तुलाराम को बाप की खोजी आंखें अपनी तरफ़ घूरती महसूस हुईं। पहला निवाला ही जैसे मुश्किल से गले उतरा।
'परीक्षा में थोड़े दिन रह गए हैं। कल से स्कूल के बाद सीधे घर आना है, खेल-कूद बंद।'
तुलाराम को बाप के शब्द सीसे की तरह कान के पर्दों पर टपकते महसूस हुए। खेल-कूद बंद और स्कूल से सीधे घर आना हुआ, तो गोदाम में किताब का बाकी हिस्सा पढ़कर कौन सुनाएगा।
तुलाराम गहरी सोच में डूब गया।
अगले दिन, स्कूल की दो घंटियां उसने किसी तरह पूरी कर लीं। तीसरी घंटी में, उसका दिल उसे बेचैन करने लगा। तुलाराम क्लास से निकल कर टीचर के पास गया, पेट में अचानक दर्द की शिकायत की और बस्ता संभाले स्कूल से बाहर आ गया।
गोदाम वाली गली की तरफ़ मुड़ते वक्त अपने जानते अच्छी तरह देखकर तुलाराम ने इत्मीनान कर लिया कि आस-पास कोई उसके इस तरह स्कूल से भाग आने की शिकायत उसके बाप से करने वाला मौजूद नहीं है।
सीलन-भरे गोदाम में, काम पर जुटे मजदूरों ने वक्त से पहले तुलाराम को वहां देखकर हैरत और खुशी जताई।
'स्कूल में छुट्टी हो गई। वो था ना रामू, काफी दिन से बीमार था। आज सुबह मर गया। इसीलिए छुट्टी हो गई।'
तुलाराम को बहाना तलाशने में महारत हालिस थी।
दिन का सारा वक्त तुलाराम ने उस रोज गोदाम में ही बिताया। सारे अध्याय किताब के उसने मजदूरों को पढ़ सुनाए। आख़िरी अध्याय, जिस में हीरो की मौत के साथ मजदूरों की जीत का जिक्र था, मजदूरों ने दोबारा पढ़वा कर सुने। हीरो की मौत, लेकिन मजदूरों की जीत!
किताब का अंत मजदूरों को रास नहीं आया। तंबाकू के पत्ते काटते-काटते उनकी उंगलियां रुक गईं।
किसी कोने से शिकायत-भरी आवाज उभरी -
'क्यों मारा कहानीकार ने हीरो को? जिसने मजदूरों को जीत दिलाई, उसे ही क्यों मार डाला?' सबने इस एतराज का समर्थन किया।
तुलाराम के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। खुद उसकी आंखें भी हीरो की मौत से भीग गई थीं।
हीरो की लाश कारख़ाने के मुख्य द्वार पर पड़ी है, खून में लथपथ लाश। चेहरा भी मुश्किल से पहचान में आता है। दूसरी तरफ़, कारख़ानेदार की आवाज माईक पर सुनाई दे रही है -
'मजदूर हमारे मालिक हैं। हमें उनकी सारी मांगें मंजूर हैं। कल से कारख़ाना खुल जाएगा। किसी को कोई सजा नहीं मिलेगी। कल ही बढ़ी दर पर बक़ाया मजदूरी का भुगतान भी हो जाएगा। सारी मांगे मान ली गई हैं। अब कोई झगड़ा नहीं रहा।'
तुलाराम ने किताब की आख़िरी पंक्तियां पढ़ीं, जिनमें कारख़ाने पर मजदूरों के झंडा फहराने की बात लिखी थी, मगर जहां हीरो की ख़ून में लथपथ लाश का कोई जिक्र नहीं था।
तुलाराम के पास हालांकि घड़ी नहीं थी, मगर वो इतना जरूर अंदाज से जान गया था कि स्कूल का वक्त ख़त्म हो गया है, और अब उसे सीधे घर पहुंचना है।
गोदाम से निकलते वक्त भी तुलाराम ने झांककर गली में देख लिया। जान-पहचान को कोई आदमी उसे गली में आता-जाता दिखाई नहीं दिया।
लेकिन तेज क़दमों से भागता तुलाराम जैसे ही शेरगंज की चौड़ी सड़क पर आया, उसकी नजर कोने वाली शराब की दुकान से बाहर निकल रहे मौसा जी पर पड़ी। नजर पड़ते ही, तुलाराम को मां के तीखे सवाल याद हो आए। अपने घर लौटने की बजाय, तुलाराम मौसी के घर की तरफ़ मुड़ गया।
मौसी ने उस दिन सचमुच तुलाराम को खाने पर रोक लिया।
घर लौटते-लौटते उसे फिर देर हो गई। घर की सीढ़ियां चढ़ते ही उसे बाप की गरजदार आवाज सुनाई दी -
'भला हो मदनजीत बाबू का कि उनने लौंडे को गोदाम से निकलते देख लिया, अपनी आंख से, वरना मैं तो अंधेरे में ही पड़ा रहता।'
तुलाराम सकते में आ गया। मदनजीत बाबू, यानी मौसा जी, जिन्हें उसने अपनी आंख से सड़क के कोने वाली शराब की दुकान से निकलते देखा था!
तुलाराम को समझते देर नहीं लगी। मौसा जी ने ही उसके बीड़ी गोदाम जाने की शिकायत बाप तक पहुंचा दी थी।
तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर खड़े तुलाराम को एक झटके में सारी बातें कचोके के साथ याद हो आयीं। तुलाराम ने सोचा, बाप ने धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया तो क्या हुआ। बाप है, तो क्या इतना भी नहीं कर सकता! मुझे लौटकर मां को जरूर बताना चाहिए कि मौसा जी ने आज फिर शराब पी है। और यह भी कि मौसा जी ने आज फिर मौसी की जमकर पिटाई की है।
तुलाराम तंग सीढ़ियां तय करके अपने घर लौट गया है।
लेकिन मैं?
मैं तो अब भी तुलाराम का नाम ओढ़े उसके घर की तंग सीढ़ियों की आख़िरी टेक पर ही खड़ा हूं!
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Wednesday, March 26, 2008

गज़ल

शहरयार
सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है

दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
पत्थर की तरह बेहिस-ओ-बेजान सा क्यूँ है

तन्हाई की ये कौन सी मन्ज़िल है रफ़ीक़ो
ता-हद्द-ए-नज़र एक बयाबान सा क्यूँ है

हम ने तो कोई बात निकाली नहीं ग़म की
वो ज़ूद-ए-पशेमान पशेमान सा क्यूँ है

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में
आईना हमें देख के हैरान सा क्यूँ है
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गज़ल

शहरयार
दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये

इस अंजुमन में आपको आना है बार बार
दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिये

माना के दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास
लेकिन ये क्या के ग़ैर का एहसान लीजिये

कहिये तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिये
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Aligarh INDIA
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गज़ल

शहरयार
इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
इन आँखों से वाबस्ता अफ़साने हज़ारों हैं

इक तुम ही नहीं तन्हा उलफ़त में मेरी रुसवा
इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं

इक सिर्फ़ हम ही मय को आँखों से पिलाते हैं
कहने को तो दुनिया में मैख़ाने हज़ारों हैं

इस शम्म-ए-फ़रोज़ाँ को आँधी से डराते हो
इस शम्म-ए-फ़रोज़ाँ के परवाने हज़ारों हैं

इश्क का चक्कर

- डॉ० सन्त कुमार टण्डन
मैंने लम्बे समय तक चप्पल ही पहनी, जूते नहीं। बचपन से विद्यार्थी जीवन, यूनिवर्सिटी लेविल तक। चप्पल कम्फर्टेबिल रहती हैं। पैंट-शर्ट, सूट के साथ भी पैरों को कसे जूतों में डालना मुझे बुरा लगता था। जब सर्विस में आया, आफिस जाने लगा, तो भी चप्पल-प्रेमी बना रहा। लेकिन जब अधिकारी के पद पर पहुँचा, तो मेरे पदों पर चोट लगी। चप्पल छोड़ जूते पहिनना पड़ा। एक विवशता और रोज शेव करना। दोनों मुझे कष्टकर था, पर करना पड़ा।
मुझे पच्चीस साल बाद राहत मिली, जबरदस्त राहत, जब मैं ऑफिसर की पोस्ट से रिटायर हुआ। दाढ़ी सप्ताह में दो बार बनने लगी और मैं रिटायर होते ही चटपट चप्पल खरीद लाया। बड़ा सुख, बड़ी चैन। लगा मुक्ति मिली। ये दोनों मुक्तियाँ सर्विस भी मुक्ति से कम सुख-चैन-दायिनी न थीं।
अमूमन मैं अपने पदत्राण बंद रहने वाली (विदाउट लॉक) आलमारी में रखता हूँ। आज भी रखता हूँ, बजाय किसी खुले स्थान के। सो जूते मैं अपनी एक्सट्रा अलमारी में रख दिए-सदा-सर्वदा के लिए। चप्पल भी वहीं, उसी आलमारी में, उसी खाने में रखने लगा। जहाँ जूता-देव विराजमान थे। जूते और उनके ठीक बगल में चप्पलें।
मैंने सुना हुआ था, पढ़ा भी था, देखा भी है कि दो विषमलिंगी जब आस-पास होते हैं, खासकर एकांत में तो उनमें कुछ खुसुर-पुसुर चल पड़ती है। जवान या हम उम्र हों तो यह लाजमी है। शास्त्रों में भी यह कहा गया है कि फूस और आग आस-पास न हों और स्त्री-पुरुष का एकान्त-सेवन सब कुछ करा सकता है।
एक दिन मेरे सामने सब प्रत्यक्ष घटित था। यूँ तो जूते-चप्पल अगल-बगल, सटे-से रहते थे। एक दिन मैंने उन्हें अनुचित अवस्था में देख लिया। मैं अवाक्‌। चप्पल नीचे, जूता ऊपर, एक नहीं जोड़ी के दोनों। जूते तो बूढ़े थे यानी पुराने सालों के, चप्पलें नई नवेली जवान थीं। इस बेमेल उम्र में भी उनमें इश्क हो गया। फिर इश्क में तो यह होना ही था। इश्क जो कराए वह थोड़ा। शास्त्रों में कही गई बात, अब मुझे प्रमाणित और सत्य लगी। तभी मैंने जूते उठाकर नौकर को दे दिए कि वह पहन डाले। मैंने राहत अनुभव की।
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५३५/१-आर, मीरापुर,
इलाहाबाद-२११००३
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कालू

- सुशान्त सुप्रिय
कुत्तों से दत्ता साहब को सख्त चिढ़ थी। नफ़रत थी। एलर्जी थी। पर गली का कुत्ता कालू था कि दत्ता साहब की इस चिढ़ की परवाह ही नहीं करता था। जैसे ही दत्ता साहब बाहर जाने के लिए दरवाजा खोलते, कालू को सामने पाते। कालू को देखते ही दत्ता साहब का गुस्सा आसमान छूने लगता। उन्होंने कालू को डराने-धमकाने, गली से बाहर खदेड़ने की बहुत कोशिश की। पर कालू था कि पिछली घटना भूल कर दत्ता साहब के मकान के दरवाजे पर फिर मौजूद हो जाता। दत्ता साहब उसे छड़ी दिखाते। वह छड़ी की मार के दायरे से बाहर रहते हुए पूँछ हिलाता। कालू के पूँछ हिलाते रहने से दत्ता साहब और चिढ़ जाते। दो-एक बार उन्होंने पास पड़े पत्थर और पैरों में पहनी चप्पलें उतार कर कालू को दे मारीं। पर दत्ता साहब का निशाना हर बार चूक जाता। उधर कालू चप्पलों और पत्थरों को छकाने की कला में और पारंगत होता जाता। जब तक दत्ता साहब गली से बाहर नहीं चले जाते, कालू उनसे एक मर्यादित दूरी बनाएं रखते हुए सतर्कतापूर्वक उन्हें गॉर्ड ऑफ़ ऑनर देता चलता। दत्ता साहब का मन करता कि वे अपने सिर के बाल नोच लें।
कुछ महीने पहले तक दत्ता साहब के सामने यह समस्या नहीं थी। वे रोजाना सुबह-शाम टहलने जाते थे। रात का खाना खाने के बाद भी उन्हें गली के दो-तीन चक्कर लगाने की आदत थी। पर बुरा हो गली के नए गोरखा चौकीदार का। उनसे न जाने कहाँ से भटकते हुए आ गए कालू को अपने पास पाल लिया।
गली के बाकी लोगों को कालू से कोई परेशानी नहीं थी। गली की महिलाएँ अपने-अपने घरों का बाकी बचा जूठा सुबह-शाम कालू को खिलाने लगीं। ऐसी आव-भगत छोड़कर कालू भला और कहीं क्यों जाता? पर दत्ता साहब को दुःख इस बात का था कि उनकी पत्नी भी गली की महिलाओं की तरह सुबह-शाम कालू को खिला-पिला कर हट्टा-कट्टा बनाने वालों की सूची में शामिल थीं। दत्ता साहब के लिए यह बात असहनीय थी। यह ऐसा था जैसे कोई सगा-सम्बन्धी दुश्मन की फ़ौज में शामिल हो जाए। उन्होंने पहले पत्नी को समझाया, फिर कई बार उसे डाँटा भी। पर पत्नी थी कि उनकी आँख बचाकर कालू को बचा-खुचा जूठा खिला ही आती।
दत्ता साहब ने एक-दो बार चौकीदार को भी डाँटा कि वह न जाने कहाँ से इस आवारा कुत्ते को पकड़ लाया है। पर चौकीदार का कहना था कि कालू के होते कोई चोर-उचक्का गली में नहीं घुस सकता। यह सुनकर दत्ता साहब को और गुस्सा आया। उन्होंने कहना चाहा-अबे साले, चौकीदारी के लिए तुझे रखा है कि कुत्ते को? अगर कालू ने ही चौकीदारी करनी है तो तेरी तनख्वाह भी कालू को ही दे देते हैं। पर चौकीदार के मुँह लगना उन्होंने ठीक नहीं समझा।
दो-चार बार दत्ता साहब ने इस मुद्दे पर पड़ोसियों और अन्य गली वालों से भी बात की। पर बात करने पर पता चला कि गली में अन्य किसी को भी कालू से कोई शिकायत नहीं थी। कुछ लोगों ने तो कालू की तारीफ़ में कसीदे भी पढ़े-बड़ा सीधा कुत्ता है जी। मास-मछली को तो सूँघता तक नहीं। छोटे बच्चे इसकी पूँछ खींच लेते हैं पर यह गुर्राता तक नहीं। पर गली में आने-जाने वाले अजनबी लोगों पर यह पूरी निगाह रखता है। वगैरह।
दत्ता साहब समझ नहीं पा रहे थे कि कैसे कालू से छुटकारा पाएँ। गुस्से में उनके मन में बड़े भयंकर ख्याल आते। क्या वे कालू को जहर मिला खाना दे दें? जीव-हत्या? ना बाबा ना। उनका मन इस ख्याल को उसी समय खारिज कर देता। क्या नगर निगम वालों को फ़ोन करके कह दें कि उनकी गली में काले रंग का एक पागल कटहा कुत्ता दहशत मचाए हुए है? पर उनकी बात का समर्थन कौन करेगा? उन्हें इस समस्या का कोई हल दिखाई नहीं देता।
फिर एक समय ऐसा आया जब कालू दत्ता साहब को नींद में भी पीड़ित करने लगा। उनके सपनों में भी कालू आ कर उन्हें सताने लगा। वे कोई बड़ा अच्छा-सा सपना देख रहे होते। सपने में इन्द्रधनुष होता, तितलियां होतीं, मेमने होते, हंस होते। अचानक किसी झाड़ी के पीछे से कालू उदित हो जाता। फिर उसका आकार बढ़ने लगता। वह एक बड़े भालू के आकार का हो जाता। उसकी आँखें भेड़ियों की तरह खूँखार लगने लगतीं। और वह दत्ता साहब को खाने दौड़ता। और सर्दियों की रात में भी पसीने-पसीने हो गए दत्ता साहब इस दुःस्वप्न से डरकर उठ जाते।
इसी तरह कुछ महीने और गुजर गए। एक सुबह दत्ता साहब दफ्+तर जाने के लिए घर से निकले और कालू आदतन उनके साथ हो लिया। दत्ता साहब तो पहले ही कालू से जन्म-जन्म के खीझे हुए थे। गली के मोड़ पर उन्हें एक पत्थर का टुकड़ा दिखा। उन्होंने फुर्ती से पत्थर उठाकर कालू को दे मारा। पत्थर की मार से बचने के चक्कर में कालू इधर-उधर लपका। बदकिस्मती से वह सामने आ रही एक बस की चपेट में आ गया। ड्राइवर ने ब्रेक लगाई पर तब तक बस कुत्ते को कुचल चुकी थी। एक किंकियाहट हुई और कालू के प्राण-पखेरू उड़ गए।
दत्ता साहब सन्न रह गए। सड़क पर कालू की क्षत-विक्षत लाश पड़ी थी। चारों ओर खून बिखरा हुआ था। दत्ता साहब सोच नहीं पा रहे थे कि वे खुश हों या शोक मनाएँ। अचानक घटी इस घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। उनकी आँखों में आंसू आ गए। वे दफ्तर नहीं जा पाए। वापस घर लौट गए। उस दिन उनसे खाना भी नहीं खाया गया।
दत्ता साहब कालू से छुटकारा तो चाहते थे पर कालू की ऐसी नियति देख कर वे भी सिहर उठे थे। कई दिन बीतने पर भी वे इस घटना से नहीं उबर पाए। कालू के नहीं रहने पर उन्होंने महसूस किया कि उन्हें कालू की आदत पड़ गई थी। कभी-कभी आप जिससे नफ़रत करते हैं, आपको उसकी भी आदत पड़ जाती है। यदि अचानक वह नहीं रहे तो आपके जीवन में एक खालीपन, एक सूनापन आ जाता है। आपके जीवन से जैसे कुछ छिन जाता है। इस लिहाज से नफ़रत और प्यार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
कुछ दिनों बाद मोहल्ले वालों ने पाया कि दत्ता साहब कहीं से एक काला पिल्ला ले आए थे। उन्होंने उसका नाम रखा था-कालू।
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(भाषान्तरः लोक सभा)
१४८, संसद भवन,
नई दिल्ली - ११०००१
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Tuesday, March 25, 2008

प्याऊ

डॉ० पूरन सिंह
मैं अभी घर में घुसा ही था कि बाबूजी ने आवाज लगाई ''बेटा तुम्हारी कोई किताब आई है डाकिया दे गया है तुम्हारी मेज पर रखी है।''
''जी'' बाऊजी कहकर सीधा मैं कमरे से चला गाय था। कमरे में जाकर देखा तो वहाँ टेबल पर एक साहित्यिक पत्रिाका रखी थी। पत्रिाका को उलट-पुलटकर देखा तो उसमें मेरी रचना छपी थी। मैं तो बेहद खुश हो गया था। भागता-भागता आया और अपने बाऊजी को बताने लगा था। ''बाऊजी इस पत्रिका में मेरी रचना छपी है। देखो न कितनी अच्छी रचना है। यह रचना मैंने दलित वर्ग के लिए ही विशेष रूप से लिखी है। आप सुनोगे तो मैं आपको सुनाऊँ। और हाँ बाऊजी सबसे अच्छी बात तो यह है कि यह रचना ब्राह्मणों की पत्रिाका में छपी है। यह वही, ब्राह्मण है जिनके ग्रन्थों में लिखा है कि शूद्र यदि वेद पुराण सुन ले तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। बाऊजी आज समय कितना बदल गया है। वैसा कुछ भी कहो बाऊजी जाति-पांति और भेदभाव में फर्क तो आया है। आज चाहे ब्राह्मण, बनिया पीछे कुछ भी करे लेकिन मुँह पर कुछ नहीं बोलता है।'' मैं एक ही सांस में सारी बातें बोलता चला गया था। बाऊजी कुछ समझे कुछ नहीं, हाँ इतना तो अवश्य जानता हूँ वे रचना का अर्थ तो कतई नहीं समझे होंगे लेकिन पत्रिाका में मेरे नाम से कुछ छपा है और मैं खुश हूँ इस बात से वे अवश्य खुश हुए थे। दरअसल मेरे बाऊजी पढ़े-लिखे बिल्कुल नहीं हैं। हाँ, उन्होंने हम सभी भाइयों को पढ़ाया-लिखाया और बड़ा आदमी बनाया। वे तब मजदूरी करते थे और मेरी नौकरी लगने तक मजदूरी ही करते रहे। ऐसा नहीं था कि भाइयों ने उन्हें मना नहीं किया लेकिन वे नहीं माने थे अब जरूर उन्होंने मजदूरी करना छोड़ दिया था या तो यह कहें कि उनके हाथ-पाँव साथ नहीं देते इसलिए उनकी विवशता है। खैर जो भी रहा हो।
''फर्क की बात करते हो बेटा'' उन्होंने मेरी बात को बल देते हुए कहा था, ''तो मैं बताता हूँ तुम्हें। फर्क जब से शुरू हो गया था जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे। तब मैं तुम्हारी तरह ही जवान था।'' बाऊजी ने बताना शुरू किया था, ''मैं और शुक्का दोनों काम करके लौट रहे थे। रास्ते में बहुत जोर की प्यास लगी। मैंने शुक्का से कहा पानी पीएंगे भाई प्यास लग रही है बड़ी जोर की। वह कहने लगा कि अभी थोड़ी ही देर में कुछ दूरी पर ठाकुरों का गांव है। वहाँ उन्होंने प्याऊ रखी है वहाँ चलकर पानी पी लेंगे तब तक रोके रख अपने आपको। मैंने उसकी बात मान ली थी। कुछ देर पैदल चलने के बाद, ठाकुरों का गांव आ गया था। प्याऊ पर एक आदमी पानी पिला रहा था। बहुत सारे मटके रखे थे। पीतल के लोटे से वह सभी लोगों को पानी पिला रहा था। मैं भी उसके सामने जाकर पानी पीने के लिए खड़ा हो गया था। वह आदमी मुझे जानता था। जानता इसलिए था बेटा, कि मैंने वही ठाकुरों के गांव में मजदूरी की थी। मैंने उससे कहा, 'पानी पिला दो भइया' 'अभी लो' और वह आदमी एक बड़ा-सा पनारा लेकर आ गया। पनारा तुम जानते हो बेटा, जिसे तुम आज की भाषा में पाइप कहते हो वैसा ही होता था तब, मिट्टी का लम्बा-सा बरतन की तरह। उसने उस पनारे को पकड़ा और उसके एक तरफ से पानी डालना शुरू किया। वह पनारे के एक ओर पानी डालता और कुछ दूर उसके दूसरे सिरे से पानी मेरी अंजुली तक आ जाता था। यह प्रक्रिया मेरे बाऊजी मुझे हाथ से करके भी बताते जा रहे थे। मैं बहुत प्यासा था सो पानी पी गया था। अब शुक्का की बारी थी। उसने पानी तो पी लिया फिर बाद में उस पानी पिलाने वाले से पूछा कि उसने हमें पानी ऐसे क्यों पिलाया और सभी लोगों की तरह क्यों नहीं पिलाया। तो उस पानी पिलाने वाले आदमी ने कहा कि तुम नीच जाति के हो तुम्हें लोटे से पानी पिलाने से लोटा अछूत हो जाता इसलिए मैंने तुम्हें इस पनारे से पानी पिला दिया इसमें बुरा मानने की बात नहीं मैंने तुम्हें पानी तो पिला ही दिया। अब जाओ। 'अच्छा एक बात और बताओ' शुक्का खिसियाने लग गया था, ''अगर तुम लोटे से पिलाते तो लोटा अछूत बन जाता। तो तुम लोटा का क्या करते।' पानी पिलाने वाला बोला कि फेंक देते। फिर तो बेटा, शुक्का बिफर गया उसने पानी पिलाने वाले को छू लिया और छू क्या लिया उसके ऊपर चढ़कर बैठ गया और कहने लगा अब तू अपने आप को फेंक। शुक्का मेहनती तो था ही सो उसका शरीर पहलवानों की तरह बना हुआ था। पानी पिलाने वाला उसका कुछ न कर सका और भाग खड़ा हुआ। तब तक शुक्का ने वहाँ रखे हुए सारे घड़ों को लाठियों से मार-मार कर फोड़ डाला दरअसल लाठियाँ लेकर ही हम लोग काम पर जाते थे और वापिस भी आते थे क्योंकि रात-बिरात कोई जानवर आदि न मिल जाए तो हम उससे बच सकें। फिर क्या हुआ बेटा! पानी पिलाने वाला गांव में भगता हुआ गया और लौटकर पाँच-सात आदमियों को लेकर भागता हुआ ही आया। फिर वहाँ लाठियाँ चलना शुरू हुई। एक तरफ मैं और शुक्का और दूसरी तरफ वे लोग। खूब लाठी चली। हमने और शुक्का ने मारकर पसार दिया उन पाँचों को। ऐसी बात नहीं थी कि हमारे भी न लगी हो। ये जो माथे पर चोट देख रहे हो यह तभी की है। ''और बाऊजी अपना माथा दिखाने लगे थे'' और फिर उन पाँचों को पसार के इकट्ठा कर दिया फिर हम दोनों अपने घरों को वापिस लौट आए थे। कुछ दिनों बाद हमारी चोटें ठीक हो गईं लेकिन जख्म के निशान आज भी है। फिर बाद में हम काम पर जाने लगे थे। हाँ, अब एक बात जरूर थी कि वहाँ प्याऊ नहीं लगती थी। इससे इतना नुकसान तो हुआ था कि प्यासे को पानी आसानी से नहीं मिलता था लेकिन छूत-अछूत की बीमारी का भी किसी को सामना नहीं करना पड़ता था। अब तुम देखो न बेटा प्यास से मर तो जाएंगे नहीं और मर भी जाएं तो कम से कम एक बार ही मरेंगे। लेकिन अपमान से रोज-रोज मरना तो अच्छी बात नहीं है।'' ''हाँ बाऊजी'' मैं सिर्फ इतना ही कह पाया था।
२४०-फरीदपुरी, वेस्ट पटेल नगर,
नई दिल्ली - ८
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जमूरा

प्रेम कुमार
घर भर में कोई सहज नहीं था। न माँ, न पिताजी, न पत्नी, न बहनें! मेरे गाँव आने पर लोगों का मुझसे मिलने आना सबको अच्छा लगता रहा है। पर आज वैसा नहीं था। सबकी कोशिश थी कि उनके आने पर मैं उनसे न मिलू। मिलू भी तो उन्हें या उनके काम को कोई तवज्जो न दूं। पिताजी उन्हें लपाड़िया बताकर अपनी खीझ निकाल रहे थे। माँ उनके बहरूपिएपन की बातें बता-बताकर अपनी झुझलाहट कम कर रही थीं। पत्नी और बहनों ने मिलकर कई बार उन्हें जनानिया, लुच्चा, लफंगा सिद्ध कर दिया था। और मैं था कि किसी अमंगल के घटने की आशंका से त्रस्त, कुंदमन सुबह से ही दरवाजे के पास चारपाई पर पड़ा उनके आने का इंतजार कर रहा था।
पिताजी इस बात पर चिढ़े थे कि तीन दिन से उन्होंने देहरी की धूल ले डाली है। काम पूछा तो बताया नहीं। ऊपर से आग में यह घी और - 'पढ़ाई-लिखाई का मामला है उन्हीं को बताना है।' पिताजी इस बात पर भी आग बबूला थे कि उन्होंने मेरा आधा नाम लेकर ही आने के बारे में पूछा था। इसीलिए उनके आने की सूचना देते समय पिताजी खूब गुस्से में थे - 'तुम दोनों में बड़ा कौन है? तू कि वो? नाम तो ऐसे ले रहा था जैसे गोद में खिलाया हो उसने तुझे। हमें काम नहीं बताएंगे, पर आने की पूछने के लिए सुबह-शाम दिमाग हमारा चाटेंगे! लपाड़िया, चुगलखोर कहीं का! तू उसके चक्कर में मत आ जाना! खुद किसी की चिरी उँगली पर पेशाब तक नहीं करेंगे, पर मतलब पर गधे को भी बाप बना लेंगे। तू भूल गया क्या? तेरी नौकरी लगी तो कैसा-कैसा जहर उगलता घूमा था ये गाँव भर में ...।' माँ को मौका मिला तो उन्होंने भी कान में फसफुसा दिया - 'बड़ा नौटंकीबाज है। सामने मिलेगा तो कैसा चाची-चाची कहकर झुका आएगा, पीठ पीछे एक-एक की हजार-हजार बनाकर उड़ाएगा! तेरी बहनों के बारे में यही तो उड़ाता घूमा था पिछली साल! सबकी बहन-बेटियों को बदनाम करता फिरता है। आग भी तो नहीं लगती ऐसों की जीभ में! जिस घर में घुसा, बजवाकर, तीन-तेरह कराकर ही निकला वहाँ से! बातें ऐसी कि पानी में भी आग लग जाए ... ।' पत्नी और बहनों ने भी खूब कारनामे सुनाए थे उनके! सबके चेहरों पर तनाव था, खिंचाव था। सब चाहते थे, मैं उनसे न मिलू, उन्हें न सुनू। सबकी हाँ में हाँ मिलाते हुए मैंने भी उनसे जुड़े कुछ अजीब किस्से सबको सुनाए थे। अंत में इस ओर से भी सावधान किया था कि ऐसे लोग चिढ़कर किस सीमा तक आ सकते हैं। बड़ी मुश्किल और मशक्कत से मैं घर के लोगों को इस बात पर राजी कर पाया कि मैं उनसे मिल लूँ, उनकी बात सुन लूँ, पर किसी काम के लिए हाँ कतई न करूँ!
प्रोफेसर साब हैं क्या ऽऽऽ?' आवाज की चुभती तेजी ने मुझे उठाकर चारपाई पर बिठा दिया। बदले, आदरसूचक सम्बोधन को सुनकर राहत मिली। चाहा कि सारे घर ने यह सुना हो। मेरी नमस्ते का खाँसते-हँसते उत्तर देते हुए तकिया खिसकाकर वे सिरहाने की तरफ बैठ चुके थे। कंधे पर पड़े हरे रंग के लम्बे अँगोछे से मुँह-माथे का पसीना खूब रगड़-रगड़कर पौंछा था। थोड़ा घूमकर पीठ दीवार से टिका ली थी और पैरों को फैलाकर लगभग सीधा कर लिया था! मेरे कुछ कहने से पहले उनकी गर्दन घर के अंदर की दिशा में मुड़ चुकी थी - अरे लाली, पानी-फानी लाओ कुछ! गजब की गर्मी है! गला चटका जा रहा है! कुछ पल उनकी मिचमिची आँखों ने मुझे इस तरह देखा जैसे मुझमें से अपना कुछ छिप-खो गया ढूढ़-निकाल लेना हो उन्हें! उसके बाद उन्होंने कई ऐसे प्रश्न एक साथ दागे, जिनके उत्तर खुद उन्होंने दे लिए थे - और सुनाओ, क्या हाल हैं वहाँ के? तुम लोग तो बादशाह हो, बादशाह! जाओ, न जाओ; पढ़ाओ, न पढ़ाओ, तुम्हारी तनख्वाह दूध पीती रहती है। हमेशा हरी की हरी! मरना तो हम जैसों का है। रोज कुँआ खोदो, फिर भी पानी निकलने की गारंटी नहीं। क्या तनख्वाह मिलती है तुम्हें अब? सुना है पच्चीस-तीस हजार मिलते हैं। खूब पुण्य किए होंगे हमारे चाचा-चाची ने पिछले जन्म में। उनके बेटे इतने नोट छाप देते हैं एक महीने में कि बैंक की मशीन भी क्या छापेगी? गाँव के बालक बताते रहते हैं - बड़ी तरक्की की है तुमने, खूबनाम कमाया है। कॉलिज में खूब चलती है तुम्हारी! हमें खुशी इस बात की है कि इस में हमारी भी नामवरी है। किसी के भी सामने छाती ठोककर कह सकते हैं कि हमारा भाई भी इतना बड़ा प्रोफेसर है ...!
उनका इतना बोलना चिढ़ पैदा कर रहा था। गनीमत हुई कि अंजू ने पानी का गिलास उनकी ओर बढ़ाया। ही-ही कर लम्बी हँसी-हँसे! गिलास थामने को हाथ आगे बढ़ाया -लगता है हमारी चाची नहीं हैं घर में? होतीं तो खाली पानी आ ही नहीं सकता था किसी के सामने। दुनियाँ जानती है कि वो बिना चाय-नाश्ते के रास्ता चलते को भी नहीं जाने देतीं!
अंजू को देखा तो लगा कि वह अब फटी, कि अब बरसी! हस्तक्षेप जरूरी लगा - नहीं, माँ घर पर ही हैं! चाय अपने सामने बनवा रही होंगी शायद ...। गटागट की आवाज के साथ उन्होंने पानी अंदर उतारा, भीगे होठ अंगोछे से पौंछे और फिर जेब से बीड़ी के बंडल और माचिस को बाहर निकाला। बीड़ी को मुँह तक ले जाते-ले जाते रुके! जैसे कुछ खास ध्यान आया हो। फुसफुसाते से ऐसे बोले जैसे बड़ों के लिहाज की रस्म अदा कर हरे हों - प्रोफेसर के दरवाजे पर भी क्या भैया को अपनी बीड़ी फूकनी पडेगी?' बुरा-सा मुँह बनाया, दायाँ हाथ नाचने-मटकने लगा - इसी बात से हमें ये मास्टरी दो कौड़ी की नहीं लगती! कितना ही कमा लें, पर रहेंगे किरमिची ही! उस दुलारे के बेटा की दरियादिली देखो! है तो फौज में रंगरूट-पर जब आता है तो अंग्रेजी शराब की बोतलें और विदेश की सिगरेट लाता है। यार-दोस्तों को इतनी पिलवाता है कि पिछला सारा कोटा पूरा कर जाता है।' उन्हें देखना, सुनना असह्‌य हो रहा था। टालने के लिए कह दिया - 'आज बीड़ी से काम चला लें! घर में कोई सिगरेट लाने वाला भी तो नहीं है!' उन्हें जैसे मालूम था कि मैं यही कहूगा। बड़ी होश्यारी से उन्होंने भीतर बचाकर रखे को कहने का मौका पा लिया था - 'भली फिक्र की तुमने? तुम्हारा ये भतीजा आखिर किस मर्ज की दवा है? चल रे रजुआ …! सड़क पर खड़ा-खड़ा क्या आने-जाने वालों को ताक रहा है? देख, तेरे चाचा जी कुछ कह रहे हैं!'
अच्छी-भली शक्ल, सजी-सँवरी देह, अठारह-उन्नीस की उम्र का वह लड़का गर्दन झुकाए मेरे सामने आ खड़ा हुआ था। पैसे निकालकर देने के अलावा अब कोई चारा नहीं बचा था। लड़का जाने को मुड़ा ही था कि वे गरजे - 'तमीज तो सारी उम्र आने से रही। मगज में गोबर जो भरा है। ऊँट हो गए पर अक्ल नहीं आई। ये पूछा कि सिगरेट कौन-सी लानी है? चाचाजी के पैर तक नहीं छुए तुमने। बड़ों के पैर छूने में नाक नीची होती है इनकी। सीखो कुछ, नहीं तो सारी उम्र मूड़ पकड़कर रोओगे ...।' लड़का लौटा। अनमने, थके-से उसके हाथ मेरे पैरों की ओर बढ़े जिस तरह वह चरण स्पर्श कार्यक्रम सम्पन्न हुआ, उससे मुझे वितृष्णा ही हुई। भुनभुनाता, पैर पटकता हुआ लड़का चल देने को मुड़ा। पिता होने के नाते वे अपने बेटे को अच्छी तरह समझते थे। शायद इसीलिए उसके कुछ न पूछने पर भी उसे समझाए जा रहे थे - 'विल्स फिल्टर की पांच सिगरेट! और हाँ - एक डबल जीरो का पान - इकराम की दुकान का। जल्दी लौटना - कहीं यार-बाशी में जा बैठे ...।'
लड़के के जाते ही उनकी बातों के विषय, अंदाज-सब एकदम बदल गए थे। परिवर्तन की गति और शैली से भौंचक में उन्हें चुप बैठा देखता-सुनता भर रहा था। गिरगिट भी शायद ही इतनी जल्दी रंग बदलता होगा! बीच-बीच में भीगी-सी हो उठती उनकी खरखरी तेज आवाज कह रही थी कि वे काफी कुछ बताने की जल्दी में हैं। अपने तीनों बच्चों के बारे में बताने से उनकी शुरुआत हुई। फिर अपने इरादों, योग्यताओं पर उन्होंने लम्बा व्याख्यान दिया। बेमन, तनावपूर्ण मनःस्थिति में उन्हें सुनते हुए मेरी समझ में सिर्फ इतना आया कि उनकी बेटी तीन साल की है। उससे बड़ा बेटा सातवीं क्लास में आया है। तीसरे इस सबसे बड़े बेटे ने इस साल प्रमोशन से इंटर पास किया है। बड़ी ठसक से बताते रहे थे कि अपने इस नाकारा बेटे को पास कराने के लिए उन्हें किस-किस मास्टर से निहोरे करने पड़े! बोर्ड में नकल कराने और नम्बर बढ़वाने के लिए उन्हें क्या जोड़-तोड़ करनी पड़ी। उनका दावा था कि इतने निकम्मे को बिना छदाम खर्च किए यहाँ तक पढ़ा देना उन जैसे पिता का ही बूता है। बड़ी शान से देर तक वे बताते रहे कि कब-कैसे ड्राइवरों-कंडक्टरों से दोस्ती गाँठकर फोकट में दूर-दूर तक का सफर कर आए हैं और रेलवे के स्टाफ को पटाकर कैसे दिल्ली, लखनऊ, मुम्बई तक घूम आए हैं। उन्हें दुख था तो यह कि दुनियाँ भर की हथफेरी करके, अपना पेट काटकर औलाद को वे कुछ बनाना चाहते हैं, पर औलाद है कि उनकी हर बात इधर से सुनकर उधर निकाल देती है। बीबी से उन्हें इस बात की शिकायत थी कि वह हमेशा बेसुरा राग ही अलापती रहती है। जो वे कहेंगे, हमेशा उसका उल्टा करेगी। यह बताते समय उनका गर्व छिप नहीं रहा था कि कितने ही लड़की वाले जब-तक उनकी देहरी पर नाक रगड़ते रहते हैं। इधर-उधर का दबाव डलवाते हैं और चार-पांच लाख की बात से अपनी शुरुआत करते हैं। बड़े रहस्यपूर्ण अंदाज में बहुत धीमी आवाज+ के साथ उन्होंने अपनी एक बुद्धिमानी की तारीफ मुझसे भी करानी चाही थी। 'अगर मैं आज लड़के का रिश्ता तय कर लूं तो वह इंटर पास ही तो कहलाएगा। बी०ए० में दाखिले के बाद तय होगा तो दस जगह यह कहने की गुंजाइश रहेगी कि उस-उसके कम्पटीशन में बैठने का इरादा है लड़के का ...!'
सारी ऊब और उखड़ाव के बावजूद उन्हें सुनते रहना मेरी विवशता थी! घर के अंदर से आती आवाजें भीतर की उकताहट-अकुलाहट की सूचना दे रही थीं। इतनी देर बाद तक उनके आने का साफ उद्देश्य मेरी समझ में नहीं आ पा रहा था। अंजू चाय-नाश्ता ले आई थी। इससे पहले कि मैं उनसे चाय लेने के लिए कहता, वे प्लेट से लड्डू उठाकर मुँह तक पहुँचा चुके थे। लड्डू को दबाते-चबाते उसके स्वाद की उन्होंने खूब तारीफ की थी। तारीफ करते-करते एक-एक कर वे चारों लड्डू गटक चुके थे। बिल्कुल ऐसे जैसे कोई जादूगर लोहे के गोलों को एक-एक कर उदरस्थ करता जाता है। चाय का प्याला हाथ में थामे वे अपने बेटे की चर्चा की ओर मुड़े - लाख समझाया कि बुलंदशहर दाखिला मत ले। अपने चाचा के पास चला जा। उसके होते तुझे किसी बात की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। किताब-कापी का इंतजाम वो करा देगा। फीस-वीस माफ हो जाएगी। घर से रोज आना-जाना हो जाएगा। जाड़े, गर्मी, बरसात - जब जरूरत पड़े-तो चाचा का घर है ही। आजकल के ये लड़के अपने आगे सबको बेवकूफ समझते हैं। किसी की मानें तब न! नहीं माने, चले गए बुलंदशहर। शाम को ही आ खड़े हुए मेरे सामने थोबड़ा लटकाए। रोने लगे कि नम्बर कम हैं, दाखिला नहीं हुआ। बीस बार समझाया कि चाचा से मिल आ। मेरा नाम सुनते ही दाखिला कराएगा तेरा! पर उनकी तो नाक कटती है किसी से कुछ कहने में! आ तो मैं तुम्हारे कॉलिज ही रहा था। पर सोचा कि वहाँ क्यों तंग करूँ। शनिवार को गाँव आओगे ही, तभी बात कर लूंगा। अब जैसे भी हो, तुम्हें देखना है सब! तुमसे कह दिया, मेरी चिंता खत्म हुई ...!''
यदि मैं पहले से सावधान न होता तो मेरी प्रतिक्रिया भिन्न रही होती। मैं उनसे तंग आ चुका था। लग रहा था कि वे अपनी बातों के लपेटे में बड़ी कुशलता से मुझे लपेटते-कसते जा रहे हैं। जकड़न ऐसी कि दम घुटता लगा। फिर भी आत्मीयता प्रदर्शित करते हुए मैंने उनके बेटे के नम्बर पूछे। सोचा कि कम प्रतिशत की बात कहकर अभी किस्सा खत्म करता हूं। बेटे द्वारा प्राप्त अंकों का विषयवार ब्यौरा उन्होंने इतने तपाक से दिया जैसे परीक्षा उन्होंने ही दी हो! - केवल अड़तीस प्रतिशत! तब तो दाखिला हो पाना एकदम मुश्किल है!' यह सुनकर पहली बार उनका बोलना थोड़ी देर के लिए रुका। चेहरा बुझ-सा गया। पर उन्होंने इतनी जल्दी हार मानना सीखा ही नहीं था। अगले ही क्षण वे पूरे दम-खम के साथ शुरू हो गए थे - मुश्किल क्यों है? बेटे के चाचा की प्रोफेसरी फिर किस काम आएगी? नम्बर अच्छे होते तो फिर रोना ही किस बात का था? तब किसी के पास मुझे आना क्यों पड़ता?
बेटा लौट आया था। बड़ी तेजी से, झपटते हुए से उन्होंने पान-सिगरेट को लड़के के हाथ से अपने कब्जे में ले लिया था। पान को मुँह में दबाया, सिगरेट सुलगाकर होठों के बीच दबाई और माचिस व बची सिगरेटों को अपनी जेब के हवाले किया। लम्बा कश खींचा और वे फिर शुरू हुए - देखना तो अब तुम्हीं को है भैया! गाँव-नाते से तुम्हारा इतना फजर् तो बनता ही है। तुम्हारे भतीजे के भविष्य का सवाल है। जो अपने भाई-भतीजों के काम न आ सके ऐसे रौब-रुतबे से क्या फायदा? ऊँची जाति वालों को तो वैसे ही कहीं पूछ-गछ नहीं है। गाँव-नाते, जाति-बिरादरी का लिहाज तो क्या नेता, क्या अफसर-सब रखते हैं। फिर हम-तुम तो एक गाँव, एक बिरादरी, एक घर के ठहरे!'
घर के लोगों की उकताहट-झल्लाहट रह-रहकर बाहर आ रही थी। फिलहाल टालने, पीछा छुड़ाने को हड़बड़ी में कह बैठा - पहले यह फार्म तो लाकर भरे! बाकी सब उसके बाद ही तो होगा! मैं चौंका कि वे एकदम उछल-से क्यों पड़े! ऐसे बोले जैसे मुंह मांगी मुराद मिल गई हो - यही तो मैं भी कब से कह रहा हूँ इससे! अक्ल में बैठे तब न! फार्म भर देगा तभी तो तुम कुछ कर पाओगे! सौ बार कह लिया, पर फार्म आज तक नहीं आ पाया। अब भी भला ये क्या खाक फार्म लाएंगे? इन्हें लेने भेजो-बीस रुपये बस के - पैदल चलेंगे नहीं सो बीस रिक्शे के, और बीस-तीस ऊपर से और। इतने पर भी फार्म आने की गारंटी नहीं। ऐसे ही होते तो फिर रोना किस बात का था? इसीलिए तो कहता हूँ कि भैया फार्म तुम्हीं भेज देना। यहाँ घर से यह ले जाएगा। यही सोचकर साथ लाया हूँ आज इसे। तुम भी देख लोगे, इसकी भी झिझक निकल जाएगी!'
उन्हें उठकर खड़ा होते देख बड़ा चैन मिला। फार्म के भेजने या न भेजने के बारे में मैं न ना कह पाया था न हाँ! चलते-चलते आदेश देते-से वे बोले - एक-दो दिन में ही भिजवा देना याद करके! आखिरी तारीख निकल गई तो इनके उर्द पर तो सफेदी भी नहीं आनी! मरना हमारा-तुम्हारा ही है हर तरह! मैं बेफिक्र होकर जा रहा हूँ! अब जिम्मेदारी तुम्हारी है।
मुझे कुछ कहने-समझा सकने का अवसर वे दे ही नहीं रहे थे। बेशर्म-सी बेहूदगी के साथ थोपी जा रही इस जिम्मेदारी को मैं पचा नहीं पा रहा था। ऊपर से बिना पैसे दिए फार्म मँगा लेने की उनकी धूर्ततापूर्ण चालाकी! अपनी उत्तेजना और चिड़चिड़ाहट को काबू में रखना मेरे लिए मुश्किल होता जा रहा था। वे किसी गलत फहमी या अँधेरे में न रहें, यह सोचकर बड़े धीमे, मुलायम स्वर में मैं इतना भर ही कह पाया था - देख लें फार्म भरवाकर! पर दाखिले की मुझे ज्यादा उम्मीद नहीं दिख रही ...। जैसे ये शब्द न हों, शोले हों! पता नहीं क्या हुआ कि उनका रूप-रंग एकदम बदल गया। वे आग-बबूला हो उठे - अरे, सीधे-सीधे क्यों नहीं कह देते कि तुम्हें दाखिला कराना नहीं है। तुम क्यों चाहोगे कि हम जैसों के बेटे-बेटी पढ़-लिखकर तुम जैसे हो जाएँ ...!
उसके बाद सब कुछ इतनी तेजी और ऐसे जादुई ढंग से हुआ कि मैं सन्न रह गया सुन्न हुआ-सा मैं वहां होकर भी जैसे वहाँ नहीं था। सब कुछ देखते-सुनते हुए भी जैसे कुछ देख-सुन नहीं रहा था। पलक झपकने से भी कम की देरी में उन्होंने अपने बेटे को बालों से पकड़कर खींचा था। एक झटके में उसे जमीन पर पटक लिया था। लात-घूँसे चलाते-बजाते वे हौं-हौंकर हाँफ रहे थे। घर जैसे अखाड़ा हो और वे बड़े मातबर पहलवान! रोने-चिल्लाने की आवाजों ने घर को कट्टीघर बना दिया था। धूम-धड़ाक और चीख-पुकार सुनकर घर के लोग वहाँ आ घिरे थे। सब कुछ इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि हैरान खड़ा मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। चकराए-से पिताजी उन्हें कंधों से पकड़कर मुश्किल से चारपाई पर बिठा पाए थे। पुचकारते-फटकारते उन्हें शांत होने के लिए मनाने में जुटे थे। वे थे कि अपने हालात और औलाद के कारण हुई बेइज्जती का रोना रोए जा रहे थे। घबराई-सी माँ उनके बेटे को दुलारने-पुचकारने में लगी थीं। न उनकी गालियाँ थम रही थीं, न बेटे का रोना-सुबकना!
अब तक मैं अपने आप में लौट आया था। मन हुआ कि मैं भी कुछ कहूँ-करूँ! पर क्या, कैसे? इतनी जल्दी यह तय ही नहीं कर पाया। तभी दिखा कि पिताजी उन्हें अपनी बाहों में लिए-लिए चारपाई पर बैठ गए हैं। पिताजी की आवाज में बुजुर्गों वाला प्यार भी था, अधिकार भी - बच्चे पर हाथ क्यों उठाया तूने? अरे, ये तो सोचा होता कि अपने इस छोटे भाई पर तेरा भी तो अधिकार है। इतना परेशान होने की क्या जरूरत थी? फार्म भेजने को उसने मना तो नहीं किया। दाखिले को भी कोई-न-कोई रास्ता ये निकालेगा! भरोसा तो रख! बाद में इससे मैं भी बात कर लूंगा!' पिताजी-और हाँ, माँ में भी, आए परिवर्तन को देख मैं स्तब्ध था! पिताजी के इस आश्वासन ने मुझे चिंतित भी किया था और दुखी भी! पिताजी से यह सुनकर उनके चेहरे पर यकायक एक चमक दिखाई दी। अंगोछे को सिर पर लपेटते हुए वे उठ खड़े हुए। चाचा-चाचा की रट लगाते वे पिताजी के सामने झुके-झुके जा रहे थे। पलभर को लगा जैसे घर में अभी कोई जादू का खेल होकर चुका हो। जादूगर भी तो ऐसा ही कुछ करता है। साथ लाए जमूरे को देखते-देखते भीड़ सामने गायब कर दे, उसके शरीर के टुकड़े कर दे, उसे फिर से जोड़कर दिखा दे। सम्मोहित भीड़ खूब तालियाँ पीटे, पैसे फैंके, घरों से खाना-कपड़ा लाकर दे। जादूगर तालियाँ, माल-पानी बटोरे और अपने करतब से सही सलामत किए जमूरे के साथ अगले ठिकाने की तलाश में आगे बढ़ जाये। दर्शकों की भीड़ में खड़े चकित, गद्गद् व्यक्ति की तरह पिताजी उन्हें सामर्थ्य भर देकर संतुष्ट दिख रहे थे। पर मैं था कि दृश्य की भयावहता से अवसन्न, एक भीत बच्चे की तरह चुप, जड़वत खड़ा हुआ था। न तालियाँ बजा पा रहा था, न कुछ दे पाने का साहस जुटा पा रहा था।
वे अपने सुबकते बेटे की ओर बढ़े। हाथ पकड़कर खींचते हुए उसे खड़ा किया और उसे बाहर की तरफ धकेलते-से बोले - क्यों टसुए बहाए जा रहा है औरतों की तरह? कोई तोप तो नहीं दागी मैंने। किसी काम को करा लेना इतना आसान है क्या? इतने पर भी दाखिला हो जाए, तेरा भविष्य बन जाए, तब भी बहुत सस्ता है। कुछ तो सीख ले इस घर की! सबकी औलादें तेरी तरह ही तो नहीं हैं। ये चाचा-चाची की औलाद है। श्रवण कुमार से राई-रत्ती कम नहीं। अपने पिता का कहना टाल ही नहीं सकती कभी! निसा खातिर रह तू ...!
गर्दन झुकाए उनके पीछे-पीछे चुपचाप सड़क पर जाते उनके बेटे को पहली बार मैंने इतने गौर से देखा था। तब भी वह मुझे उनका बेटा नहीं, जमूरा ही लगा था। पहली बार उसके वर्तमान पर मुझे अफसोस हुआ। इस जमीन, इस हवा, पानी और रोशनी के साथ वह जमूरे से अधिक और हो भी क्या सकता है! उसके ही नहीं उसके पिता के भविष्य को लेकर मुझे चिंता हुई। पहली बार उसके लिए मेरे मन में कुछ उमड़ा। मन हुआ उसे आवाज दूँ, रोकूँ। उससे कुछ कहूँ। पर उसके साथ उसके पिता आकर फिर से अपनी जादूगरी के करतब दिखाना शुरू न कर दें इसलिए चुप खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रहा।
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