Saturday, May 31, 2008

हाइकु

रचना गौड़ भारती

चिड़िया चुगे
भूखा बच्चा कलपे
युगान्त चले

हाइकु

रचना गौड़ भारती




दें आरक्षण
हो देश-विभाजन
क्या प्रशासन

हाइकु

रचना गौड़ भारती


बम धमाके
खून भरी सड़कें
समाधी यहां

Friday, May 30, 2008

गजल

रचना गौड़ भारती

जज्बात और महक जो काबू में आ जाते
इंसान भी फ़रिश्तें की गिनती में आ जाते

खत्म होगई थी रोशनाई लिखते लिखते
वरना जज्बात हमारे भी कागज पे आ जाते

पहले ही क्या कम थे यहां सागर खारे
काबू कर न पाते तो आंख में आंसू आ जाते

हर जख्म भरता नहीं बिना मरहम के
कुछ शब्द ही होते जो इसके काम आ जाते

शब्द स्पर्श से बड़े हैं हम भी ये बताते
कुछ तो शब्द कहते हम और करीब आ जाते

मटका (पुरूष) और सुराही (स्त्री)

रचना गौड़ भारती

कच्ची मिट्टी का घड़ा हो तुम
मैं हूं तुम्हारी सुराही
भीनी सी खुश्बू तुम में थी
सुगंधित जल मैं भर लायी
जीवन का लहू जमा हुआ- सा
चलो मिलकर इसे पिघलाएं
एक कुम्हार (परमात्मा), एक ही मिट्टी,
तुम रहे तने, मुझे झुकाया ये कैसी प्रकृति
टूटोगे तुम भी, बिखरूंगीं मैं भी
काम एक ही है प्यास बुझाना
प्यास जो बुझे तो प्यासे, खुदा से दुआ करना
मटके से मेरी गर्दन कभी न लम्बी करना
वरना ये दुनियां पकड़-पकड़ गिराएगी
पानी पीकर खाली सुराही (भोग्यक्ता)
जमीन पर लुढ़काएगी

निरक्षर मानव

रचना गौड़ भारती

पेड़ के ओखल में
कठफोड़वे का घर था
वन पेड़ों से बेजोड़ था
बीहड़ जंगल, लकड़ियों का खजाना जैसे
जीव जन्तुओं से नहीं इसे
खुदग़र्ज आदमियों से डर था
वहीं हाथों में कुल्हाड़ी लिए
कुछ लकड़ी चोरों का भी दल था
कठफोड़वे और लोगों को जंगल से
बराबरी का आसरा था
पहली कुल्हाड़ी की ठेस
वृक्ष व कठफोड़वे को एक साथ हिला गई
तब कठफोड़वे की निगाह अपनी प्रहारी
चोंच के प्रहार पर गई
तने को आश्वासित कर वो
उन लोगो पे जा टूटा
अपने आसरे का सिला एक
कठफोड़वे ने ऐसे दिया
अब वृक्ष की हर शाखा भी झूम उठी
तेज पवन के झौंकों से जैसे
निकली ध्वनि, शुक्रिया कह उठी
ये पेड़ एक विद्यालय के प्रांगण में था
लोग जहां के अशिक्षित पर
वृक्ष शिक्षा की तहजीब में था
परोपकारिता और शिष्टता का पाठ
एक वृक्ष व कठफोड़वा पढ़ गया
अफ़सोस इतना ही रहा कि
इंसानियत का मानव इससे
क्यों निरक्षर रह गया ।

Thursday, May 29, 2008

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

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अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण करता है, ‘‘बाद में प्रगति हासिल करके जब लोगों को अग्नि तैयार करने की प्रक्रिया का ज्ञान हुआ तब वे वन्य लोग अग्नि के आस-पास रतिक्रिया करते थे। किसी भी स्त्री को किसी भी पुरुष द्वारा रतिक्रिया के लिए पकड़कर ले जाना, उस काल में धर्म माना जाता था। यदि किसी स्त्री को, कोई पुरुष पकड़कर न ले जाए, तो वह स्त्री बहुत उदास होकर रोया करती थी कि उसे कोई पकड़कर नहीं ले जाता और रति सुख नहीं देता। इस प्रकार की स्त्री को पशु आदि प्राणियों से अभिगमन करने की स्वतंत्रता थी। वन्य ऋषि-पूर्वजों में स्त्री-पुरुष में समागम की ऐसी ही पद्धति रूढ़ थी।'' यह कथन निर्विवाद रूप से स्त्रियों की उसी मानसिकता का उद्घाटन करता है कि वे संभोग के लिए न केवल प्रस्तुत रहती हैं, बल्कि उनका एकमात्र अभिप्रेत यौन-तृप्ति के लिए पुरुषों को प्रेरित करना है।
इस तरह के दृष्टांत वेद-पुराण इत्यादि में भी बहुततायत से उपलब्ध हैं। यहाँ ऋग्वेद के कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं -
मेरे पास आकर मुझे अच्छी तरह स्पर्श करो। ऐसा मत समझना कि मैं कम रोयें वाली संभोग योग्य नहीं हूँ(यानी बालिग नहीं हूँ)। मैं गाँधारी भेड़ की तरह लोमपूर्णा (यानी गुप्तांगों पर घने रोंगटे वाली) तथा पूर्णावयवा अर्थात्‌ पूर्ण (विकसित अधिक सटीक लगता है) अंगों वाली हूँ।(ऋ. १।१२६।७) (डॉ. तुलसीराम का लेख-बौद्ध धर्म तथा वर्ण-व्यवस्था-हँस, अगस्त २००४)
कोई भी स्त्री मेरे समान सौभाग्यशालिनी एवं उत्तम पुत्र वाली नहीं है। मेरे समान कोई भी स्त्री न तो पुरुष को अपना शरीर अर्पित करने वाली है और न संभोग के समय जाँघों को फैलाने वाली है।(ऋ. १०/८६/६) ऋग्वेद-डॉ. गंगा सहाय शर्मा, संस्कृत साहित्य प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण १९८५)
हे इन्द्र! तीखे सींगों वाला बैल जिस प्रकार गर्जना करता हुआ गायों में रमण करता है, उसी प्रकार तुम मेरे साथ रमण करो।(ऋ. १०/८६/१५) (वही)
ब्रह्म वैवर्त पुराण में मोहिनी नामक वेश्या का आख्यान है जो ब्रह्मा से संभोग की याचना करती है और ठुकराए जाने पर उन्हें धिक्कारते हुए कहती है, ‘‘उत्तम पुरुष वह है जो बिना कहे ही, नारी की इच्छा जान, उसे खींचकर संभोग कर ले। मध्यम पुरुष वह है जो नारी के कहने पर संभोग करे और जो बार-बार कामातुर नारी के उकसाने पर भी संभोग नहीं करे, वह पुरुष नहीं, नपुंसक है।(खट्टर काका, पृ. १८८, सं. छठाँ)
इतना कहने पर भी जब ब्रह्मा उत्तेजित नहीं हुए तो मोहिनी ने उन्हें अपूज्य होने का शाप दे दिया। शाप से घबराए हुए ब्रह्मा जब विष्णु भगवान से फ़रियाद करने पहुँचे तो उन्होंने डाँटते हुए नसीहत दिया, ‘‘यदि संयोगवश कोई कामातुर एकांत में आकर स्वयं उपस्थित हो जाए तो उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए। जो कामार्त्ता स्त्री का ऐसा अपमान करता है, वह निश्चय ही अपराधी है। (खट्टर काका, पृष्ठ १८९) लक्ष्मी भी बरस पड़ीं, ‘‘जब वेश्या ने स्वयं मुँह खोलकर संभोग की याचना की तब ब्रह्मा ने क्यों नहीं उसकी इच्छा पूरी की? यह नारी का महान्‌ अपमान हुआ।'' ऐसा कहते हुए लक्ष्मी ने भी वेश्या के शाप की पुष्टि कर दी।(वही, पृष्ठ १८९)
विष्णु के कृष्णावतार के रूप में स्त्री-भोग का अटूट रिकार्ड स्थापित करके अपनी नसीहत को पूरा करके दिखा दिया। ब्रह्म वैवर्त में राधा-कृष्ण संभोग का जो वीभत्स दृश्य है उसका वर्णन डॉ. गंगासहाय ‘प्रेमी' ने अपने लेख ‘कृष्ण और राधा' में करने के बाद अपनी प्रतिक्रिया इन शब्दों में व्यक्त किया है, ‘‘पता नहीं, राधा कृष्ण संभोग करते थे या लड़ाई लड़ते थे कि एक संभोग के बाद बेचारी राधा लहूलुहान हो जाती थी। उसके नितंब, स्तन और अधर बुरी तरह घायल हो जाते। राधा मरहम पट्टी का सामान साथ रखती होगी। राधा इतनी घायल होने पर प्रति रात कैसे संभोग कराती थी, इसे बेचारी वही जाने। (सरिता, मुक्ता रिप्रिंट भाग-२) इस प्रतिक्रिया में जो बात कहने को छूट गयी वह यह है कि इस हिंसक संभोग, जिसे बलात्कार कहना ज्यादा उचित है, से राधा प्रसन्न होती थी जिससे यही लगता है कि स्त्रियाँ बलात्कृत होना चाहती हैं।
History of prostitution in india के पृष्ठ १४७ पर पद्म पुराण के उद्धृत यह आख्यान प्रश्नगत प्रसंग में संदर्भित करने योग्य है। एक विधवा क्षत्राणी जो कि पूर्व रानी होती है, किसी वेद-पारंगत ब्राह्मण पर आसक्त होकर समर्पण करने के उद्देश्य से एकांत में उसके पास जाती है लेकिन ब्राह्मण इनकार कर देता है। इस पर विधवा यह सोचती है कि यदि वह उस ब्राह्मण के द्वारा बेहोशी का नाटक करे तो वह उसको ज+रूर अपनी बाँहों में उठा लेगा और तब वह उसे गले में हाथ डालकर और अपने अंगों को प्रदर्शित व स्पर्श कराकर उसे उत्तेजित कर देगी और अपने उद्देश्य में सफल हो जाएगी। निम्न श्लोक उसकी सोच को उद्घाटित करते हैं - सुस्निग्ध रोम रहितं पक्वाश्वत्थदलाकृति।/दर्शयिष्यामितद्स्थानम्‌ कामगेहो सुगन्धि च॥
मैं उसको पूर्ण विकसित पीपल के पत्ते की आकार की रोम रहित मृदुल और सुगंधित काम गेह(योनि) को (किसी न किसी तरह से) दिखा दूँगी क्योंकि - बाहूमूल कूचद्वंन्दू योनिस्पर्शन दर्शनात्‌।/कस्य न स्ख़लते चिन्तं रेतः स्कन्नच नो भवेत्‌॥
यह निश्चित है कि ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है जिसका वीर्य किसी के बाहु-युगल, स्तन-द्वय और योनि को छूने और देखने से स्खलित न होता हो।
ये कुछ दृष्टांत हैं स्त्रियों के काम-सापेक्ष प्रवृत्ति की निर्द्वन्द्व स्वच्छंदता के, जो वर्तमान नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में गहन वैचारिक मंथन की मांग करते हैं।
अभी तक की चर्चा से यह निष्कर्ष स्थापित होता है कि यौन-सम्बन्धों के धरातल पर स्त्री-पुरुष समान हैसियत में नहीं खड़े हैं। कहने को स्त्री पुरुषों के वर्चस्व से अपनी देह को स्वतंत्र कराने के लिए युद्धरत हैं परन्तु अपनी देह के बहुमूल्य कोष को दोनों हाथों से उन्हीं को लुटाने के लिए व्यग्र भी है। यहाँ पर आकर मामला दो पृथक्‌ मानसिकता का बनता है जो स्वयं शासक और शासिता, स्वामी और सेविका(सेविता) में परिणित हो जाता है। यही मानसिकता का वह कारक तत्त्व है जो स्त्रियों की प्रताड़ना के लिए पुरुषों को उकसाता रहता है। अतः नारी-विमर्श के परिप्रेक्ष्य में पहले इस मानसिकता को पुनर्परिभाषित करने की आवश्यकता है। आज भी पुरुष किस जकड़न के साथ इसी मानसिकता को जी रहा है और स्त्री जाने-अनजाने उसकी सहयोगिनी की भूमिका निभा रही है, इसकी पुष्टि में कुछ वास्तविक घटनाएँ उद्धृत की जा रही हैं-
सर्वाधिक कन्या भ्रूण हत्याएँ वाराणसी में- (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, २०.४.०६)
महिला के साथ सामूहिक दुराचार, घर से ले गये थे दबंग, पीड़िता के देवर को दरोगा ने किया बंद। (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २७.०५.२००५) जनपद गाजीपुर में घटित घटना।
थानें में तीन तलाक और पत्नी से छुटकारा। (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक ०४.०५.२००५)। जनपद लखीमपुर-खीरी के गोला कोतवाली में सुलह-समझौते के समय घटित घटना।
बेटियों के दुष्कर्म करने वाले पिता को ३२ साल की सजा। (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २१.०४.२००६)। सिंगापुर में ६४ बच्चों के पिता और दस पत्नियाँ रखने वाले इस्लामी इतिहास के एक विद्वान द्वारा अपनी कुछ पत्नियों की मदद से १८ महीने तक १२-१५ वर्ष की अपनी बेटियों के साथ बलात्कार किया जा रहा और उनमें से दो गर्भवती भी हो गई। मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील की इस दलील-’’आरोपी को विश्वास है कि यदि उसने अपनी बेटियों की यौन-इच्छा को तृप्त कर दिया तो वे विवाह से पहले अन्य व्यक्तियों के साथ यौन-सम्बन्ध नहीं बनायेंगी'', की विकृति के लिए कोई भी शब्द पर्याप्त नहीं है।
नींद में कहे गए तलाक ने खिलाया नया गुल : धार्मिक नेताओं ने दम्पत्ति को अलग रहने का आदेश दिया।(हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २७.०३.०६)। सिलीगुड़ी में आफताब अंसारी नामक व्यक्ति ने नींद में अपनी पत्नी से तीन बार तलाक कह दिया। स्थानीय इस्लामी धर्मगुरुओं ने इसे बाक़ायदा तलाक़ मान लिया।
नजमा करेगी दूसरी शादी, कट्टरपंथियों की जिद मानी : ‘हलाला' के लिए तीन पुरुषों में एक को चुनेगी शौहर (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक १८.०८.०६)। सिलीगुड़ी के केन्द्रपाड़ा में एक मजदूर ने शराब के नशे में अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। गाँव की धार्मिक समिति ने उसे ‘हलाला' होने का आदेश दिया और निकाह करने के लिए तीन पुरुषों में से किसी एक के चयन का विकल्प भी दिया।
जहाँ छात्राओं पर पड़ते हैं ‘तालिबानी हंटर' : सरकारी छात्रावास में देनी होती है बेहद अंतरंग जानकारी (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक २७.०३.०६) कर्नाटक के मदुरै जिले में स्थित गरीब और पिछड़े वर्ग के छात्रााओं के छात्रावास में महिला वार्डेन द्वारा छात्राओं को इस बात के लिए प्रताड़ित किया जाता है कि वे अपने मासिक धर्म की तिथि एक सार्वजनिक रजिस्टर में दर्ज करें।
कश्मीरी बालाओं के लिए कालेजों में आचार संहिता (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक ०७.०७.०६)। कश्मीर के महिला कालेजों और बालिकाओं के स्कूलों में पढ़ने और पढ़ाने वालों के लिए आचार संहिता लागू हो गई है। क्या करना है और कैसे करना है, के साथ-साथ कब करना है, को भी लागू कर दिया गया है।
पाक सदन में बोलने नहीं दिया जाता महिला सांसदों को : प्रशिक्षण कार्यक्रम में सुनाई अपनी व्यथा कथा (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २३.०४.०६)।
जान के लिए प्यारा जेलखाना : पाकिस्तानी अखबारों से (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक २३.०७.०६)। पाकिस्तान की जेलों में बलात्कार की शिकार ढाई हजार ऐसी महिलाएं बंद हैं। जो शरीयत कानून के अनुसार बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ चश्मदीद गवाह नहीं पेश कर सकीं। उन्हें भय है कि यदि वे छोड़ दी जाती हैं तो उनके पति और भाई उनकी हत्या कर देंगे।
मजिस्टे्रट पुत्र ने यौन शोषण के बाद की ममेरी बहन की हत्या (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक १४.०५.२००६)
आदिवासी युवतियों के साथ सामूहिक दुराचार : शिकायक के बावजूद नहीं दर्ज हो पायी प्राथमिकी (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक ०९.०१.२००६)
ईसाई अभिनेत्री के मंदिर में प्रवेश से विवाद : मंदिर में केवल हिन्दू श्रद्धालुओं को ही दर्शन की अनुमति (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक ०२.०७.०६)। कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला और मलयालम अभिनेत्री मीरा जास्मीन द्वारा मंदिर में प्रवेश पर बवाल मच गया।
नाइयों की औरतों को बरातियों के पैर न धोने पर नग्न घुमाया (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २४.०९.२००५)। उड़ीसा के पुरी जिले के भुवनपति गाँव में तथाकथित ऊँची जाति के बारातियों की ओछी और काली करतूत।
मुस्लिम जमात ने महिला का सिर मूंडने को कहा(हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक ०२.०४.०६)। चिरूचिरापल्ली में एक पचपन वर्षीय महिला का सिर मूडने का आदेश दिया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि उसने अपनी बेटी को वेश्यावृत्ति के लिए प्रोत्साहित किया।
रंगरेलियाँ मनाते पकड़ी गई युवती ने खुद को जलाया (हिन्दुस्तान, वाराणसी, १३.०७.२००६)। स्त्री के लिए शब्द ‘रंगरेलियाँ' और पुरुष के लिए?
शराबी पिता ने दुराचार के बाद हत्या कर बेटी को कुएँ में फेंका(हिन्दुस्तान, वाराणसी, २६.०७.२००६)
क्यों करती हैं अभिनेत्रिायाँ आत्महत्या? (हिन्दुस्तान, वाराणसी, १०.०२.०६)। क्योंकि अन्यों के साथ ही साथ उनके परिवार वाले भी उन्हें पैसा देने वाला पेड़ समझकर शोषण करते हैं।
नागरिकता नहीं तो परमिट ही मिल जाए (दैनिक जागरण, वाराणसी, दिनांक २३.०२.०५)। स्त्रियों के हक के लिए इस्लामी कट्टरवाद से लड़ने वाली विश्व प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन की भारत सरकार से गुहार। अनगिनत बंगलादेशियों के अवैध घुसपैठ को वोटर-लिस्ट के माध्यम से वैध करने वाला पराक्रमी देश इस असहाय स्त्री की वैध माँग पर उससे अधिक असहाय।
बलात्कार को लेकर गंभीर नहीं है पुलिस : आई.जी., बलात्कार की बढ़ती घटनाओं से मानवाधिकार आयोग चिन्तित (हिन्दुस्तान, वाराणसी, ०७.०६.०५)।
बरनाला का विधायक पुत्र बलात्कार के आरोप में बंदी (हिन्दुस्तान, वाराणसी, दिनांक १३.०८.२००६)।
उक्त सभी घटनाएँ ऐसी हैं जिनमें पुरुष ही मुख्य कर्ता है लेकिन इनमें कहीं न कहीं से स्त्रियों की भागीदारी को भी रेखांकित किया जा सकता है। अब उन स्थितियों और घटनाओं को इंगित किया जा रहा है जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि स्त्रियाँ ही पुरुषों की इस मनोदशा की पोषक और वाहक होती हैं क्योंकि जिस पुत्रा-रत्न को प्राप्त करके इनके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते वही तो भविष्य का पुरुष होता है। कन्या-भ्रूण की हत्या को आदि युग से प्रचलित कन्या-वध की प्रथा के वर्तमान रूप में देखा जा सकता है। कन्या-हत्या निश्चित रूप से मातृ-सत्तात्मक समाज की देन है जिसकी झलक राहुल जी की पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा' की पहली कहानी ‘निशा' में मिलती है जिसमें जब निशा यह देखती है कि उसके वर्चस्व को उसकी अपनी ही बेटी लेखा से खतरा उत्पन्न हो गया है तो वह उसकी हत्या का प्रयास करती है और दोनों ही मर जाती हैं। उनकी मृत्यु के बाद परिवार की सबसे बलिष्ठ स्त्री रोचना का निशा-परिवार की स्वामिनी बनने का सीधा संकेत तो यही है कि परिवार के सभी पुरुषों पर एक ही स्त्री का एकाधिकार। इसने स्त्रियों के मध्य आपसी वैमनस्य और शत्रुता तो पैदा ही किया होगा, इस एकाधिकार के विरुद्ध गुप्त संभोग हेतु वेदों में वर्णित जार-प्रथा का प्रचलन भी किया होगा। काशीनाथ विश्वनाथ राजवाडे ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' में इस आधार पर कि गांधारी के सौ पुत्र और मात्रएक ही कन्या थी, कन्या-हत्या का प्रचलन स्थापित किया है। (पृष्ठ ७०)।
स्त्रियों का स्त्रियों के प्रति इस मारक द्वेष की मानसिकता की चरम परिणति उसकी पुत्र-प्राप्ति की अदम्य और दम्भपूर्ण लालसा में देखा जा सकता है जो पुरुष-सत्ता का मातृ-सत्ता पर बिना प्रयास के विजय सरीखा है। इस मानसिकता की पुष्टि दैनिक जागरण, वाराणसी के दिनांक १३.०९.०६ में छपे दो समाचारों से बिना किसी संशय के होती है। पहले समाचार का शीर्षक है ‘महिलाएँ कल रखेंगी जीवित्पुत्रिका व्रत' इसकी शुरुआत इस प्रकार है-’स्त्री के जीवन में पति और पुत्र ही उसका प्रत्यक्ष आभूषण है। इनकी रक्षा हेतु अनेक व्रत-उपवास का विधान शास्त्राों में बताया गया है।....यह व्रत स्त्रियाँ अपने पुत्रों की जीवन-रक्षा के उद्देश्य से करती हैं। इसी तिथि को प्रकाशित दूसरे समाचार का शीर्षक है, ‘‘जहाँ अवांछित लड़कियों को कहा जाता है ‘काफी' और ‘अनचाही' - पंजाब और हरियाणा राज्य जहाँ बड़े पैमाने पर कन्या भ्रूण-हत्या के कारण लिंगानुपात खतरनाक रूप से असंतुलित हो गया है, से संबंधित इस समाचार का सार यह है कि परिवार में अवांछित होने के कारण इन लड़कियों के ‘काफी', ‘अनचाही', ‘भरपाई', ‘भतेरी' जैसे अटपटे नाम रख दिए जाते हैं। इसकी थोड़ी-सी बानगी देखिए - ‘एक ओर जहाँ काफी का भाई अपनी माँ की आँखों का तारा है, तो काफी आँख की किरकिरी।...उसकी माँ दयावती कहती है कि ...चूँकि हम लड़की को कुदरत की ओर से सजा ही मानते हैं, इसलिए उसका नाम भरपाई रख दिया गया है। यानी अपराध की भरपाई।
स्पष्ट है सजा कोई भी नहीं भुगतना चाहेगा और अनचाही सजा तो क़तई नहीं। एक समाचार शीर्षक की बानगी और देखिए, ‘‘पुत्र की कामना के साथ हजारों ने लगाई लोलार्क कुंड में डुबकी' (‘हिन्दुस्तान', वाराणसी, दिनांक ३०.०८.०६)। अभी-अभी हरितालिका तीज का पर्व सम्पन्न हुआ। (अगस्त २००६)। यह पर्व स्त्रियाँ अपने पति की रक्षा और अखंड सौभाग्यवती रहने के लिए निर्जला व्रत रहकर मनाती हैं। इसी श्रेणी का एक पर्व करवा चौथ भी है। ‘हिन्दुस्तान', वाराणसी के दिनांक २५.०८.२००६ के परिशिष्ट ‘सुबह-ए-बनारस' में ‘ताकि सुहाग सलामत रहे' शीर्षक से प्रकाशित सियाराम यादव का यह पैरा उद्धृत है, ‘‘पश्चिमी समाज की महिलाओं को आश्चर्य होता है कि भारत (एक हद तक पूरब) की महिलाएँ पति में इनकी आस्था कैसे रखती हैं? उनके प्रति इतना विश्वास उनमें क्यों होता है कि वे उनकी पूजा तक करती हैं। वे पति को परमेश्वर मानती हैं। यहाँ तक स्पष्ट कर देना जरूरी है कि भारत में विवाह जन्म-जन्म का पवित्र रिश्ता होता है जबकि पश्चिम में यह एक समझौता। जाहिर है जो जन्म-जन्म का रिश्ता है वह स्थित दीर्घजीवी बल्कि अमर होता है। वह अनेक जन्मों तक चलता रहता है। इसलिए उसके प्रति गहरी आस्था विश्वास होना स्वाभाविक है और इसलिए पति परमेश्वर भी हो जाता है। हालांकि रिश्ता दो तरफा है, इसलिए पत्नी का भी इतना ही महत्त्व होना चाहिए, जितना पति का होता है, यानी पति अगर परमेश्वर है तो पत्नी को भी देवी होना चाहिए। यूँ तो भारतीय नारी को देवि का दर्जा प्राप्त है लेकिन यह सैद्धान्तिक ही है, व्यावहारिक जगत्‌ में ऐसा नहीं है। फिर भी भारतीय समाज में दाम्पत्य की गहरी नींव का श्रेय महिलाओं को ही जाता है।'' यादव जी का लेख उन तमाम वैचारिक झोल का सम्पुट है जो इस प्रकार के परम्परावादी लेखों की विशेषता होती है लेकिन यहाँ इस पर चर्चा नहीं करनी है। उनके द्वारा अंतिम वाक्य में सत्य को स्वीकार कर लिया गया है। अब स्त्रियों को ही सोचना है कि वे कब तक अपनी अस्मिता को मारकर दाम्पत्य जीवन की गहरी नींव की ईंट बनी रहेंगी।
इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म, ईश्वर, देवता, परम्परा आदि सभी कुछ स्त्री के विरोध मंय संगुफित है और पुरुष इनका एकमात्र घोषित प्रतिनिधि है जो इन्हीं के माध्यम से स्त्री की प्रताड़ना का संहिताकरण करता है और फिर उन संहिताओं की विधि-विधान से पूजा करने के लिए स्त्रियों का मानसिक अनुकूलन भी करता है। जब कोई स्त्री पुत्र को जन्म देने के बाद अपने चारों तरफ एक दंभभरी मुस्कान फेंकती है, या एक पत्नी या माँ के रूप में पति और पुत्र के आवरण में लिपटे पुरुष नामधारी जीव की रक्षा और दीर्घायु के लिए कष्टकारी अनुष्ठान करती है, अथवा पुत्र की तुलना में पुत्री की उपेक्षा करती है, पुत्र या परिवार के अन्य सदस्यों की प्रताड़ना का अनुमोदन करती है तो निश्चित मानिए, वह भविष्य के किसी बलात्कारी के स्वागत में तोरण द्वार सजा रही होती है। वह एक कहावत है न ‘charity begins at home' तो स्त्रियों का ही यह दायित्व है कि पुत्र पैदा करके उनके अंदर यह संस्कार भी डालें कि वह स्त्रियों का सम्मान करना सीखें। स्त्री को किसी हिंसक पशु से कोई खतरा नहीं है। उसके लिए पुरुष ही एक मात्र हिंसक पशु है। वह घर-आँगन से लेकर हर गली-कूचे में इन्हीं का शिकार होती रहती है। यदि कोई स्त्री अपने बलात्कारी पुत्र या पति की सुरक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत उपवास रखती है, यदि वह इन तथाकथित धर्म-ग्रन्थों अथवा उन पर स्थापित इतर शक्तियों की पूजा करती है, जो उसको मनुष्य का दर्जा ही नहीं देते तो क्या यह स्त्री-विमर्श की राह में सबसे बड़ा रोड़ा नहीं है? क्या स्त्री पुरुष-वर्चस्व के इन प्रतीक चिद्दों को ध्वस्त करने के लिए तैयार है? क्या वह इसके लिए वह अपनी मानसिकता में बदलाव करने का साहस कर सकेगी?
मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ कि उक्त या ऐसे किसी भी प्रश्न का उत्तर नकारात्मक ही होगा क्योंकि वर्ण-व्यवस्था सामाजिक पहचान की दंभी सोच का परिचायक भी है और स्त्रियाँ अपनी वास्तविक हैसियत से अनभिज्ञ अपनी जातीय श्रेष्ठता के विज्ञापन-प्रदर्शन में पुरुषों की अपेक्षा कहीं अधिक क्रूर होती हैं। अपने से निम्न जाति के स्त्री-पुरुषों के साथ उसका व्यवहार घृणास्पद और शत्रुवत्‌ ही होता है और यदि कोई व्यक्ति दलित हो तो कहना की क्या? वह तो पैदाइशी घृणा का पात्र है। किसी दलित स्त्री का बलात्कार हो जाए तो कितनी सवर्ण स्त्रियाँ उद्वेलित होती हैं? कोई सामाजिक कार्यकत्री हो तो शायद औपचारिकता निभा दे अन्यथा एक के भी कान पर कोई जूँ नहीं रेंगती। यही कारण है कि आये दिन थोक के भाव से दलित और आदिवासी युवतियाँ सामूहिक बलात्कार का शिकार होती हैं परन्तु किसी का कुछ नहीं बिगड़ता। मैं इस लेख का समापन दैनिक जागरण, वाराणसी के दिनांक १४.०९.२००६ के अंक में ‘बालिका संग दुराचार पीड़ितों को ही जेल' शीर्षक से छपे समाचार से करना चाहूँगा। मामला जनपद आजमगढ़ के जहानागंज थाना क्षेत्र के भोपतपुर गाँव का है। गाँव की एक तेरह वर्षीय दलित बालिका के साथ गाँव का ही एक दबंग युवक बलात्कार कर देता है। घर वाले जब शिकायत लेकर बलात्कारी के घर जाते हैं तो मार-मारकर लहूलुहान कर दिए जाते हैं। थाने पर गुहार लगाते हैं तो मार-पीट के आरोप में जेल पाते हैं। संयोगवश इस वर्ष जीवित्पुत्रिका के व्रत की तिथि भी यही है। बलात्कारी की माँ उसकी रक्षा और दीर्घायु के लिए व्रत रख रही होगी। यह हिन्दी दिवस की भी तिथि है। पूरी सरकार और बुद्धिजीवियों की फ़ौज हिन्दी की अस्मिता बचाने में व्यस्त रहेगी। कितनी बिंदियों के चीथड़े किए गए किसी से क्या मतलब?
स्त्री-विमर्श बौद्धिक-विलास के रंग-मंच पर खेला जाने वाला नाटक नहीं है। यह सक्रिय आन्दोलन का विषय है। अभी भी अधिसंख्य स्त्रियाँ इससे उसी तरह अनभिज्ञ हैं जैसे अपने अस्तित्व से। स्त्री के अस्तित्व की वास्तविक पहचान और मिथक-भंजन इसकी पहली और अंतिम अनिवार्य शर्त है। बीच का सब कुछ अपने आप ढह जाएगा। स्त्री को शिक्षित और नए संस्कार में दीक्षित करने की आवश्यकता है यदि चाहते हैं कि इसका अगला संस्करण समतावादी सोच की धरातल पर मजबूती से खड़ा हो सके।

Wednesday, May 28, 2008

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर


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अब आइये, विषय की ओर लौटते हैं। जिस ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' का डंका पीटकर हिन्दू धर्म और संस्कृति पर गर्व करने वाले घोषणा करते हैं कि हमारे धर्म-शास्त्रों में स्त्री को देवी का रूप मानकर उसकी पूजा करने का प्रावधान है, वह इसी मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के छप्पनवें श्लोक की पहली पंक्ति हैं। किसी ने भी यह सोचने की जरूरत नहीं समझा कि जिस मनु स्मृति ने स्त्रियों की अस्मिता को लांछित करने में कोई कोर-कसर बाक़ी न रखा हो उसमें यह श्लोक आया ही क्यों? लेकिन करें क्या, इस श्लोकार्द्ध का अर्थ ऊपर से देखने में इतना सीधा और सरल है कि इसको किसी के मन में कोई संशय ही नहीं पैदा होता। इसके अतिरिक्त यह कारण भी हो सकता है कि अधिकांश लोगों को यह पता ही न हो कि यह किस ग्रन्थ में है वास्तविक अर्थ तक कैसे पहुँचेगे। इस श्लोक को यदि श्लोक संख्या ५४ और ५५ के साथ पढ़ा जाये तो स्पष्ट होगा कि ‘पूजा' का आशय विवाह में दिया जाने वाला स्त्री धन है और मनु ने इससे दहेज प्रथा की शुरुआत की थी। स्त्री-विमर्श के पैरोकारों को चाहिये कि वे इस दुष्टाचार का पर्दाफ़ाश करें।
मनुस्मृति ने स्त्रियों की अस्मिता और स्वाभिमान पर कितने तरीक़े से हमला किया है, उसकी बानगी देखिये-शूद्र की शूद्रा ही पत्नी होती है। वैश्य को वैश्य और शूद्र दोनों वर्ण की कन्यायों से, क्षत्रिय को क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र तीनों वर्ण की कन्याओं से तथा ब्राह्मण को चारों वर्णों की कन्याओं से विवाह करने का अधिकार है। (३.१३)
लेकिन इसके तुरन्त बाद वाला श्लोक आदेश देता है-ब्राह्मण और क्षत्रिाय को स्वर्णा स्त्री न मिलने पर भी शूद्रा को स्त्री बनाने का किसी भी इतिहास में आदेश नहीं पाया जाता। (३.१४)
इसके आगे के श्लोकों में भी शूद्र वर्ण की स्त्री के लिये तमाम घिनौनी बातें कही गई हैं लेकिन निम्न श्लोक में तो सारी सीमाओं को तोड़कर रख दिया- जो शूद्रा के अधर रस का पान करता है उसके निःश्वास से अपने प्राण-वायु को दूषित करता है और जो उनमें सन्तान उत्पन्न करता है उसके निस्तार का कोई उपाय नहीं है। (३.१९)
किन्तु जैसे ही याद आया कि इससे स्त्रियों को अबाध भोगने के अधिकार से सवर्ण पुरुष वंचित हो जायेंगे तो कह दिय-स्त्रियों का मुख सदा शुद्ध होता है....(५.१३०)
अब स्त्रियों पर कुछ सामान्य टिप्पणियाँ भी देखिये-
मदिरा पीना, दुष्टों की संगति, पति का वियोग, इधर-उधर घूमना, कुसमय में सोना और दूसरों के घरों में रहना ये छः स्त्रियों के दोष है। (२.१३)
स्त्रियाँ रूप की परीक्षा नहीं करतीं, न तो अवस्था का ध्यान रखती हैं, सुन्दर हो या कुरूप हों, पुरुष होने से ही वे उसके साथ संभोग करती हैं। (९.१४)
पुंश्चल (पराये पुरुष से भोग की इच्छा) दोष से, चंचलता से और स्वभाव से ही स्नेह न होने के कारण घर में यत्नपूर्वक रखने पर भी स्त्रियाँ पति के विरुद्ध काम करती हैं। (९.१५)
ब्रह्मा जी ने स्वभाव से ही स्त्रियों का ऐसा स्वभाव बनाया है, इसलिये पुरुष को हमेशा स्त्रियों की रक्षा करनी चाहिए। (९.१६)
मनु जी ने सृष्ट्यादि में शय्या, आसन, आभूषण, काम, क्रोध, कुटिलता, द्रोह और दुराचार स्त्रियों के लिए ही कल्पना की थी। (९.१७)
ऐसे न जाने कितने श्लोक पूरी मनु स्मृति में फैले पड़े हैं। जो लोग यह तर्क देते है कि मनुस्मृति की प्रासंगिकता नहीं रह गई है, वे स्वयं के अन्दर झांककर अपनी मानसिकता की निष्पक्ष पड़ताल करके पूरी ईमानदारी से कुछ बोलें अथवा राजस्थान उच्च न्यायालय के परिसर में मनु की मूर्ति की स्थापना या कल्याण सिंह द्वारा अयोध्या में मनु पार्क के निर्माण के प्रस्ताव (मुझे पता नहीं है कि पार्क बना अथवा नहीं) या भंवरी बाई पर माननीय न्यायाधीश की टिप्पणी अथवा अरविन्द जैन द्वारा इंगित तमाम मामलों के पीछे छिपी मानसिकता का औचित्य प्रस्तुत करें। अभी तो मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि स्त्री मर जाती है, स्त्री पैदा होती है लेकिन उसके दुर्गति की शाश्वतता बनी रहती है। इंतजार है नई स्त्री के पैदा होने की जो विद्रोह कर सके। ब्रह्मा, विष्णु और शिव हिन्दू धर्म में ईश्वर की तीन सर्वोच्च प्रतीक हैं। ब्रह्मा उत्पत्ति, विष्णु पालन और शिव संहार के देवता माने गये हैं। इस रूप में ये एक-दूसरे के पूरक दिखते हैं लेकिन वैष्णवों के मध्य हुए संघर्षों से यह सिद्ध होता है कि प्रारम्भ के किसी काल-खंड में शिव और विष्णु एक-दूसरे के विरोधी विचारधारा के पोषक और संवाहक थे। पालक होते हुए भी तथाकथित अधर्मियों का विनाश करने के लिए विष्णु ही बार-बार अवतार लेते हैं। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती इनकी पत्नियों के नाम हैं। आइये देखें कि यौन-विज्ञान के महारथियों ने इनका किस प्रकार चित्रण किया है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव का सरस्वती, लक्ष्मी और पर्वती के साथ पत्नी के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध का उल्लेख इस लेख के दूसरे खंड में किया जा चुका है। आगे बढ़ने से पूर्व स्त्रियों के प्रति इस वीभत्स काम-कुंठा की अभद्र मानसिकता की एक बानगी देखिये जो ‘खट्टर काका' के अन्तिम पृष्ठ पर अथर्ववेद के हवाले से उद्धृत किया गया है-यावर्दैीनं पारस्वतं हास्तिनं गार्दभं च यत्‌/यावदश्वस्य वाजिनस्तावत्‌ से वर्धतां पसः। (अथर्व ६/७२/३)
अर्थात्‌ ‘‘कामदंड बढ़कर वैसा स्थूल हो जाय जैसा हाथी, घोड़े या गधे का...।''
इस लम्पट और उद्दंड कामुकता के वेग का प्रभाव ऐसा पड़ा यहाँ के यौनाचार्यों पर कि देवी तक की वंदना करते समय उनके कामांगों का स्मरण करना नहीं भूलते। उदाहरण-वामकुचनिहित वीणाम/वरदां संगीत मातृकां वंदे।
बायें स्तन पर वीणा टिकाये हुए संगीत की देवी की वंदना करते है। (खट्टर काका, पृष्ठ १६६)
स्मरेत्‌ प्रथम पुष्पणीम्‌/रुधिर बिंदु नीलम्बराम्‌/घनस्तन भरोन्नताम्‌/त्रिपुर सुन्दरी माश्रये (खट्टर काका, पृष्ठ १६५)
‘प्रथम पुष्पिता होने के कारण जिनका वस्त्र रक्तरंजित हो गया है, वैसी पीनोन्नतस्तनी त्रिापुर सुन्दरी का आश्रय मैं ग्रहण करता हूँ।
कालतंत्र में काली का ध्यान-घोरदंष्ट्रा करालास्या पीनोन्नतपयोधरा/महाकालेन च समं विपरीतरतातुरा। (वही, पृष्ठ १६६)
कच कुचचिबुकाग्रे पाणिषु व्यापितेषु/प्रथम जलाधि-पुत्री-संगमेऽनंग धाग्नि/ग्रथित निविडनीवी ग्रन्थिनिर्मोंचनार्थं चतुरधिक कराशः पातु न श्चक्रमाणि। (वही, पृष्ठ १६७)
लक्ष्मी के साथ चतुर्भुज भगवान्‌ का प्रथम संगम हो रहा है। उनके चारों हाथ फंसे हुए हैं। दो लक्ष्मी के स्तनों में, एक केश में, एक ठोढ़ी में। अब नीवी (साड़ी की गाँठ खोलें तो कैसे? इस काम के लिये एडीशनल हैंड (अतिरिक्त हाथ) चाहने वाले विष्णु भगवान्‌ हम लोगों की रक्षा करें-पद्मायाः स्तनहेमसद्मनि मणिश्रेणी समाकर्षके/किंचित कंचुक-संधि-सन्निधिगते शौरेः करे तस्करे/सद्यो जागृहि जागृहीति बलयध्यानै र्ध्रुवं गर्जता/कामेन प्रतिबोधिताः प्रहरिकाः रोमांकुरः पान्तु नः।अर्थात्‌ लक्ष्मी की कंचुकी में भगवान का हाथ घुस रहा है। यह देखकर कामदेव अपने प्रहरियों को जगा रहे हैं- उठो, उठो घर में चोर घुस रहा है। प्रहरी गण जागकर खड़े हो गये हैं। वे ही खड़े रोमांकुर हम लोगों की रक्षा करें। पार्वती की वंदना-गिरिजायाः स्तनौ वंदे भवभूति सिताननौ, तपस्वी कां गतोऽवस्थामिति स्मेराननाविव,....अंकनिलीनगजानन शंकाकुल बाहुलेयहृतवसनौ/समिस्तहरकरकलितौ हिमगिरितनयास्तनौ जयतः।(वही, पृष्ठ १६८)तो यह कामांध मस्तिष्क की वीभत्स परिणति जो देवी-देवताओं तक को नहीं छोड़ती लेकिन प्रचार किया जाता है कि देश की महान्‌ संस्कृति स्त्रियों को पूज्य घोषित करती है
वैसे ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' के द्वारा स्मृतिकार कहीं से भी यह नहीं कहना चाहता कि स्त्री पूज्यनीय है। यदि बहुप्रचारित (यद्यपि दुष्प्रचारित कहना ज्यादा सटीक है) अर्थ ही लिया जाए तो भी यह सिद्ध नहीं होता कि स्त्रियों के बारे में इससे भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व रेखांकित होता है। यह श्लोक हाईपोथीसिस की बात करता है किसी प्रकार का आदेश नहीं देता। ज्वाला प्रसाद चतुर्वेदी ने इस श्लोक का अनुवाद इस प्रकार किया है, ‘‘जिस कुल में स्त्रियाँ पूजित (सम्मानित) होती हैं, उस कुल से देवता प्रसन्न होते हैं।'' इस अनुवाद से भी यही सिद्ध होता है कि यह एक अन्योन्याश्रित स्थिति है अर्थात्‌ स्त्रियों को पूज्य घोषित करने का कोई बाध्यकारी आदेश नहीं दिया। मनु ने, जैसा कि उन्हें प्रताड़ित अपमानित करने के लिए आदेशित किया है। यही कारण है कि स्त्रियों के बारे में पुरुषों में अच्छी धारणा अंकुरित ही नहीं हो पायी। अपने इस कथन की पुष्टि में प्रेमचंद, तुलसीदास और कबीरदास का उदाहरण देकर करना चाहूँगा।
ऋग्वेद के मंत्र १०।८५।३७ हो या मनु स्मृति के नवें अध्याय के श्लोक ३३ से लेकर ५२ तक स्त्रियों को पुरुषों की खेती कहा गया है। इस्लाम भी कुरान की आयत १.२.१२३ के द्वारा इसी प्रकार की व्यवस्था करता है। प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘बालक' में इस मानसिकता का बखूबी पोषण किया है। इस कहानी का नायक निरक्षक ब्राह्मण गंगू है। गोमती पढ़ी-लिखी विधवा है। कई साल पहले विधवाश्रम में आयी थी। तीन बार आश्रम के कर्मचारियों ने उसका विवाह करा दिया, पर हर बार महीने-पन्द्रह दिन के बाद भाग आती थी और आश्रम से निकाल दी गई थी। इसी गोमती से गंगू प्रेम-विवाह करता है। गोमती पहले से ही गर्भवती होती है। गंगू के पास से भाग जाती है। लखनऊ में बालक को जन्म देती है। पता लगने पर गंगू उसे बालक समेत वापस लाता है। यहाँ गंगू के उद्गार देखिए, ‘‘मैंने तुमसे इसलिए विवाह नहीं किया कि तुम देवी हो; बल्कि इसलिए कि मैं तुम्हें चाहता था और सोचता था कि तुम भी मुझे चाहती हो। यह बच्चा मेरा बच्चा है। मैंने एक बोया हुआ खेत लिया, तो क्या उसकी फसल को इसलिए छोड़ दूँगा, कि उसे किसी दूसरे ने बोया था?'' जो प्रेमचंद ने नहीं लिखा वह यह है कि ‘इतना सुनते ही उस खेती ने तड़ से अपने स्वामी के पैरों पर अपना सर रख दिया और बालक जनने पर फूली न समाई।' पता नहीं बालिका होने पर गंगू का आदर्श कहाँ टिकता?
ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी (सुं.कां. ६२-३) का उद्घोष करने वाले तुलसीदास ने भी स्त्री-निंदा में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा। ‘सरिता' फरवरी १९५६(सरिता मुक्ता रिप्रिंट भाग-१) के अंक में ‘रामचरितमानस में नारी' शीर्षक से प्रकाशित लेख में इसका विस्तृत ब्यौरा दिया गया है। ऐसा करने में उन्होंने भी मनु की शूद्र स्त्री को अलग खाने में रखा है। संदर्भित लेख से ही कुछ उद्धरणों को देकर इसे स्पष्ट किया जा रहा है- करै विचार कुबुद्धि कुजाती। होई अकाजु कवनि विधि राती।/देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गंव तकै लेऊँ केहि भाँति॥/भरत मातु पहि गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥/उतरू देहि नहिं लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।
खोटी बुद्धि वाली और खोटी-नीच जाति वाली मंथरा विचार करने लगी कि रात ही रात में यह काम कैसे बिगाड़ा जाए? जिस तरह कुटिल भीलनी शहद के छत्ते को लगा देखकर अपना मौका ताकती है कि इसको किस तरह लूँ। वह बिलखती हुई भरत की माता कैकेई के पास गई। उसको देखकर कैकेई ने कहा कि आज तू उदास क्यों है? मंथरा कुछ जवाब नहीं देती और लंबी साँस खींचती है और स्त्री चरित्रकरके आँखों से पानी टपकाती है।
मंथरा कैकेई के लिए ही मरती रहती है लेकिन तुलसीदास ने कैकेई के ही मुँह से उसके लिए यह कहलवाया - काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि। तिय विसेखि मुनि चेरि कहि भरत मातु मुसकानि।
काने, लंगड़े, लूले - ये बड़े कुटिल और कुचाली होते हैं और उनमें भी स्त्री और विशेष रूप से दासी-ऐसा कहके भरत मातु मुसकाई।
इतने विशेषणों से उसे तब अलंकृत किया गया जबकि स्वयं सरस्वती ने उसकी मति फेरी थी, अर्थात्‌ सरस्वती भी स्त्री होने के कारण लपेटे में। सीता और पार्वती को भी क्रमशः राम और शिव की किंकरी ही घोषित कराया है। तुलसीदास ने और वह भी उनकी माता के ही मुँह से। सीता की माँ सीता की विदाई के समय राम से कहती है - तुलसी सुसील सनेहु लखि निज किंकरी कर मानिबी।
इसके सुशील स्वभाव और स्नेह को देखकर इसे अपनी दासी मानियेगा। बिल्कुल यही बात पार्वती की माँ भी बेटी को विदा करते समय शिव से कहती है - नाथ उमा मम प्रान सम गृह किंकरी करेहु/छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु।
हे नाथ, यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान है। अब इसे अपने घर की दासी बनाइये और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए-करेहु सदा संकर पद पूजा। नारि धरम पति देव न दूजा॥
पार्वती को उपदेश देते हुए कहती हैं कि हे पुत्री, तू सदा शिव के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जब ईश्वर या उसके अवतार द्वारा स्वयं ही पत्नी को अपने चरण में जगह दी जाती है तो पुरुष क्यों नहीं करेगा अथवा उसे क्यों नहीं करना चाहिए?
गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित रामचरित मानस के एक सौ छठवें संस्करण में निम्न दृष्टांत उद्धृत किए जा रहे हैं - माता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी॥/होई विकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबि मनि द्रव रबिहि विलोकी॥ (पृष्ठ ६२६)
स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकांत मणि ‘सूर्य' को देखकर द्रवित हो जाती है।
सती अनसूया द्वारा सीता को उपदेश देते समय उनके मुँह से स्त्रियों के बारे में जो कहलवाया गया है, वह पृष्ठ संख्या ६०९ और ६१० पर अंकित है। देखिए - धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥/वृद्ध रोग सब जड़ धन हीना।/ अंध बधिर क्रोधी अति दीना॥/ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना।/नारि पाव जमपुर दुखनाना॥/एकइ धर्म एक व्रत नेमा।/कायॅ वचन मन पति पद प्रेमा॥
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री - इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अंधा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन-ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भाँति-भाँति के दुख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिए, बस एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है-जग पतिव्रता चारि विधि अहहीं। वेद पुरान संत सब कहहीं॥/उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहु आन पुरुष जग नाहीं॥
जगत्‌ में चार प्रकार की पतिव्रताएँ हैं। वेद पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत्‌ में(मेरे पति को छोड़कर) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है-मध्यम परपति देखइ कैसे। भ्राता पिता पुत्र निज जैसे॥/धर्म विचारी समुझि कुल रहईं।/सा निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहईं॥
मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो(अर्थात्‌ समान अवस्था वाले वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में और छोटे को पुत्र के रूप में देखती है।) जो धर्म के विचार कर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है वह निकृष्ट स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं- बिन अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥/पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥
जो स्त्री मौका न मिलने से या भयावश पतिव्रता बनी रहती है, जगत्‌ में उसे अधम स्त्री जानना। पति को धोखा देने वाली जो स्त्री पराये पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है-छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥/बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
क्षणभर के सुख के लिए जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मों के दुख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है - पति पतिकूल जनम जहँ जाई। बिधवा होइ पाइ तरुनाई॥
किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानी में) विधवा हो जाती है - सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।/जसु गावति श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिंहि प्रिय॥
स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके यह अनायास ही शुभगति प्राप्त कर लेती है। (पतिव्रत धर्म के कारण) आज भी ‘तुलसी जी' भगवान को प्रिय है और चारों वेद उनका यश गाते हैं।
तुलसीदास जी को पुरुषों में कोई दोष नहीं दिखाई देता तो इसके पीछे पुरुष की वही स्त्री विरोधी मानसिकता है जिसे बड़े करीने से धर्मशास्त्र की सान पर परवान चढ़ाकर विकसित किया गया है और जो आज भी क़ायम है।
कबीर तुलसी के समकालीन माने जाते हैं : परन्तु दोनों का रचना-संसार समान नहीं है। आज कबीर को सामाजिक क्रांति के अग्रदूत, शोषितों, पीड़ितों के प्रबल पक्षकार के रूप में देखा जाता है लेकिन स्त्रियों की निंदा करने में वह भी किसी से पीछे नहीं है। डॉ. युगेश्वर द्वारा सम्पादित और हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी द्वारा प्रकाशित ‘कबीर समग्र' के प्रथम संस्करण १९९४ से कुछ साखियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं :-
कामणि काली नागणीं तीन्यूँ लोक मंझारि।
राम सनेही ऊबरे, विषई खाये झारि॥
(पृष्ठ २८४)
एक कनक अरु कॉमिनी, विष फल कीएउ पाइ।
देखै ही थै विष चढै+, खॉयै सूँ मरि जाइ॥
(पृष्ठ २८६)
नारी कुंड नरक का, बिरला थंभै बाग।
कोई साधू जन ऊबरै, सब जग मूँवा लाग॥
(पृष्ठ २८६)
जोरू जूठणि जगत की, भले बुरे का बीच।
उत्थम ते अलग रहैं, निकट रहें तें नीच॥
(पृष्ठ २८६)
सुंदरि थै सूली भली, बिरला बंचै कोय।
लोह निहाला अगनि मैं, जलि बलि कोइला होय॥
(पृष्ठ २८६)


इक नारी इक नागिनी, अपना जाया खाय।
कबहूँ सरपटि नीकसे, उपजै नाग बलाय॥
(पृष्ठ ४३७)
सर्व सोनाकी सुन्दरी, आवै बास सुबास।
जो जननी ह्नै आपनी, तौहु न बैठे पास॥
(पृष्ठ ४३७)
गाय भैंस घोड़ी गधी, नारी नाम है तास।
जा मंदिर में ये बसें, तहाँ न कीजै बास॥
(पृष्ठ ४३८)
छोटी मोटी कामिनी, सब ही विष की बेल।
बैरी सारे दाब दै, यह मारै हँसि खेल॥
(पृष्ठ ४४०)
नागिन के तो दोय फन, नारी के फन बीस।
जाको डस्यो न फिरि जिये, मरि है बिस्वा बीस॥
(पृष्ठ ४४०)
इस प्रकार हम देखते हैं कि स्त्री निंदा में कोई किसी से कम नहीं है। क्या नारी विमर्श के पैरोकार प्रेमचंद, तुलसी, कबीर का पुनर्मूल्यांकन करेंगे? क्या स्त्रियाँ रामचरित मानस को अपनी आस्था के आसन से नीचे उतारकर उसे ख़ारिज करेंगी? नारी-विमर्श के पैरोकारों से इस प्रश्नों का भी उत्तर माँगना चाहिए।
अभी तक की चर्चा में आपने देखा कि किस प्रकार से आर्ष समाज से लेकर अर्वाचीन समाज तक स्त्रियों की छवि को एक विशेष खाँचे में फिट किया गया। मातृ-सत्तात्मक समाज रहा हो या पितृ-सत्तात्मक स्त्री को देह की भाषा में ही व्यक्त करने और होने का खेल चलता रहा। इस खेल में स्त्री भी बराबर की हिस्सेदार रही। उसने इस आरोपण को सच की तरह अंगीकृत कर लिया कि वह एक देह है और इस देह की एक मात्र आवश्यकता है यौन-तृप्ति। यह मानते हुए भी कि यौन-सम्बन्ध द्विपक्षीय अवधारणा है जिसके प्रति पुरुष भी उतना ही लालायित रहता है। विकास के किसी भी मोड़ पर पुरुषों की काम-प्रवृत्ति का उस तरह से मनोविश्लेषण नहीं किया गया जैसा कि स्त्रियों का। इसका परिणाम यह हुआ कि सारी वर्जनाएँ स्त्रियों पर ही थोप दी गईं और पुरुषों को स्वच्छंद छोड़ दिया गया और वे स्त्रियों के साथ निर्द्वन्द्व होकर मनमानी करते रहे। स्त्रियाँ भोग्या बनने और वर्जनाओं के उल्लंघन के नाम पर लांछित होने को अभिशप्त होती रहीं। यही उनकी नियति बन गयी और उन्हीं के मुँह से इसे स्वीकार भी कराया गया। यह पुरुष-सत्तात्मक समाज के नीति-नियामकों की जीत और स्त्रियों की सबसे बड़ी हार थी, जिस पर ईश्वर की सहमति का ठप्पा भी लगवा लिया गया।

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

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हमारे शास्त्र कन्या-संभोग और बलात्कार के लिये भी प्रेरित करते हैं। मनुस्मृति के अध्याय ९ के श्लोक ९४ में आठ वर्ष की कन्या के साथ चौबीस वर्ष के पुरुष के विवाह का प्रावधान है। ‘भारतीय विवाह का इतिहास'(वि.का. राजवाडे) के पृष्ठ ९१ पर उद्धृत वाक्य ‘‘चौबीस वर्ष का पुरुष, आठ वर्ष की लड़की से विवाह करे, इस अर्थ में स्मृति प्रसिद्ध है। विवाह की रात्रिा में समागम किया जाय, इस प्रकार के भी स्मृति वचन हैं। अतः आठ वर्ष की लड़कियाँ समागमेय हैं, यह मानने की रूढ़ि इस देश में थी, इसमें शक नहीं।'' इसी पुस्तक के पृष्ठ ८६-८७ तथा ९० के नीचे से चार पंक्तियों को पढ़ा जाय तो ज्ञात होता है कि कन्या के जन्म से लेकर छः वर्ष तक दो-दो वर्ष की अवधि के लिये उस पर किसी न किसी देवता का अधिकार होता था। अतः उसके विवाह की आयु का निर्धारण आठ वर्ष किया गया। क्या इससे यह संदेश नहीं जाता कि कन्या जन्म से ही समागमेय समझी जाती थी क्योंकि छः वर्ष बाद उस पर से देवताओं का अधिकार समाप्त हो जाता था। यम संहिता और पराशर स्मृति दोनों ही रजस्वला होने से पूर्व कन्या के विवाह की आज्ञा देते हैं (खट्टर काका पृष्ठ १०१) निम्न श्लोक देखें-प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति/मासि मासि रजस्तयाः पिब्रन्ति पितरोऽनिशम्‌। (यम संहिता)
यदि कन्या का विवाह नहीं होता और यह बारह वर्ष की होकर रजस्वला हो जाती है तो उसके पितरों को हर माह रज पीना पड़ेगा-रोमकाले तु संप्राप्ते सोमो सुंजीथ कन्यकाम/रजः काले तुः गंधर्वो वद्दिस्तु कुचदर्शने।
रोम देखकर सोम देवता, पुष्प देखकर गंधर्व देवता और कुच देखकर अग्नि देवता कन्या का भोग लगाने पहुँच जायेंगे।
जिस धर्म के देवता इतने बलात्कारी, उस धर्म के अनुयायी तो उनका अनुसरण करेंगे ही। कुंती के साथ सूर्य के समागम का विवरण राजवाडे के शब्दों में इस प्रकार है,-’वनपर्व' के ३०७वें अध्याय में सूर्य कहता है- ‘‘हे कुंती, कन्या शब्द की उत्पत्ति, कम्‌ धातु से हुई और इसका अर्थ है- चाहे जिस पुरुष की इच्छा कर सकने वाली। कन्या स्वतंत्र है, स्त्रियों और पुरुषों में किसी प्रकार का परदा या मर्यादा न होना- यही लोगों की स्वाभाविक स्थिति है, विवाहादि संस्कार सब कृत्रिम हैं, अतः तुम मेरे साथ समागम करो, समागम करने के बाद तुम पुनरपि कुमारी ही, अर्थात्‌ अक्षत योनि ही रहोगी।'' (वही, पृष्ठ ८९-९०) और देवराज इन्द्र द्वार बलात्कार के किस्से तो थोक के भाव मौजूद है।
यह रहा, तथाकथित पूज्य वेदों, पुराणों, महाभारत इत्यादि का स्त्रियों के प्रति रवैये की छोटी-सी बानगी। संस्कृत वाङ्मय के ग्रन्थ अथवा साहित्यिक रचनायें अथवा उनसे प्रेरित श्रृंगारिक कवियों की श्रृंगारिक भाषायी रचनाओं से लेकर आधुनिकता का लिबास ओढ़े चोली के पीछे क्या है.... ‘अथवा' मैं चीज बड़ी हूँ मस्त-मस्त..... तक के उद्घोष में स्त्री-पुरुष बराबर के साझीदार हैं। इन कृतियों में से होकर एक भी रास्ता ऐसा नहीं जाता जिस पर चलकर स्त्री सकुशल निकल जाये, फिर भी वह इनके प्रति सशंकित नहीं है तो इस पर गहन, गम्भीर विमर्श होना चाहिये। सबसे बड़ी विडम्बना तो स्त्रियों का कृष्ण के प्रति अनुराग है जबकि स्त्रियों के साथ कृष्ण-लीला इनके चरित्र का सबसे कमजोर पहलू है। ब्रह्म वैवर्त में कृष्ण का राधा या अन्य गोपियों के साथ संभोग का जैसा वर्णन है, उसको पढ़कर उनके आचरण को अध्यात्म की भट्ठी में चाहे जितना तपाया जाये, उसे नैतिकता के मापदण्ड पर खरा नहीं ठहराया जा सकता।
मनु स्मृति संभवतः ऐसा अकेला ग्रन्थ है जिनसे भारतीय मेधा को न केवल सबसे अधिक आकर्षित किया अपितु व्यवहार-जगत्‌ में उसकी मानसिकता को ठोस एवं स्थूल स्वरूप भी प्रदान किया। भारतीय मेधा अर्थात्‌ भारतीय राज्य-सत्ता और उसके द्वारा पोषित सामंती प्रवृत्तियों का गंठजोड़, जिसके हाथ में मनु ने मनुस्मृति के रूप में, ‘करणीय और अकरणीय' का औचित्य-विहीन संहिताकरण करके एक क्रूर और अमानवीय हथियार पकड़ा दिया और उसे धर्म-सम्मत मनमानी करने का निर्णायक अवसर प्रदान कर दिया। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मनुस्मृति का सबसे घातक दुष्परिणाम यह हुआ कि इसने पहले से ही क्षीण होती जा रही संतुलन-शक्तियों का समूल विनाश कर दिया। शूद्र (वर्तमान दलित) और स्त्री के लिये दंड-विधान के रूप में ऐसे-ऐसे प्रावधान किये गये कि इनका जीवन नारकीय हो गया।
विषय-वस्तु के बेहतर प्रतिपादन के लिये थोड़ा विषयान्तर समीचीन दिखता है। मनु-स्मृति में हमें तीन बातें स्पष्ट दिखाई देती हैं। पहला, वर्ण-व्यवस्था का पूर्ण विकसित और अपरिवर्तनीय स्वरूप (मनु १०.४) दूसरा, राक्षस या असुर जाति का विलोपीकरण और तीसरा देवताओं के अनैतिक आचरण को विस्थापित करके उनकी कल्याणकारी इतर शक्तियों के रूप में स्थापना। वर्ण-व्यवस्था का सिद्धान्त आर्यों की देन है जो ऋग्वेद के पुरुष सूक्त से प्रारम्भ होता है और सभी अनुवर्ती ग्रन्थों में जगह पाता है। स्त्रियों की भाँति राक्षसों की भी उत्पत्ति वर्ण-व्यवस्था से नहीं होती। सुर और असुर के मध्य लड़े गये तमाम युद्धों का वर्णन वैदिक साहित्य में भरे पड़े हैं। रामायण काल तक राक्षस मिलते हैं, महाभारत काल में विलुप्त हो जाते हैं। महाभारत काल में कृष्ण के रूप में ईश्वर अवतार लेते हैं। गीता में अपने अवतार का कारण अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करना बताते हैं। प्रत्यक्ष विनाश वे अपने मामा कंस का करते है। महाभारत युद्ध की विनाश-लीला के नायक होते हुए भी इस युद्ध में उनकी भूमिका राम की तरह नहीं है। कृष्ण का मामा होने के कारण कंस को राक्षस कहा जाय तो सबसे बड़ी अड़चन यह आयेगी कि कृष्ण को भी राक्षस कहना पड़ेगा लेकिन थोड़ा-सा ध्यान दें तो इस गुत्थी को सुलझाना बहुत आसान है। राम और रावण के बीच लड़ा गया युद्ध निश्चित रूप से आर्यों के बीच लड़ा गया अन्तिम महायुद्ध था जिसमें आर्यों की सबसे बड़ी कूटनीतिक विजय यह थी कि आर्य राम की सेना अनार्य योद्धाओं की थी और रावण की पारिवारिक कलह चरम पर थी। इसका प्रत्यक्ष लाभ राम को यह मिला कि उन्हें घर का भेदी ही मिल गया और लंका ढह गयी। आर्य संस्कृति की विजय हुई लेकिन वर्चस्व स्थापित नहीं हो सका होगा। क्योंकि विभीषण चाहे जितना बड़ा राम भक्त राह हो, तो अनार्य ही न और फिर रावण की पटरानी मंदोदरी ही उसकी पटरानी बनी। क्या विभीषण कभी उससे आँख मिला पाया होगा? क्या कभी मंदोदरी यह भुला सकी होगी कि वह जिस कायर की पत्नी है उसी के विश्वासघात ने उसके प्रतापी पति की हत्या करवाई थी।
इस कड़ी को कृष्ण द्वारा कंस के संहार से जोड़कर देखें तो स्थिति यह बनती है कि अनार्यों की बची-खुची शक्ति के सम्पूर्ण विनाश के लिये इस बार घर से ही नायक को उठाया गया। यह इस बात से सिद्ध है कि कृष्ण के नायकत्व या संयोजकत्व में जितने भी युद्ध लड़े गये सभी पारिवारिक थे। अतः यह कहा जा सकता है कि अनार्य आपस में लड़कर विनाश को प्राप्त हुए और वर्ण से बाहर की दलित जातियाँ उन्हीं की ध्वंसावशेष हैं। इस सम्पूर्ण विजय के बाद आचरण हीन देवता स्वयं को कल्याणकारी इतर शक्ति के रूप में स्थापित कराने में सफल हो गये तो क्या आश्चर्य।
मनु स्मृति शांति काल की रचना प्रतीत होती है जिसमें शासन-व्यवस्था के संचालन और समाज को नियंत्रित करने का प्रावधान है। स्पष्ट है कि इसका डंडा वर्णेतर जातियों पर पड़ना था और पड़ा भी। दलित और स्त्री उन सभी सुविधाओं और अवसरों से वंचित कर दिये गये जो उनके बौद्धिक-क्षमता के विकास में सहायक थे। इस प्रकार मनु स्मृति से भी यह सिद्ध होता है कि दलित और स्त्री वर्ण-व्यवस्था के बाहर का समुदाय है।

Tuesday, May 27, 2008

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर
स्त्री और पुरुष के बीच सम्बन्ध का यही कटु यथार्थ है कि स्त्री पुरुष को उत्पन्न करती है परन्तु पुरुष उसका अमर्यादित शोषण करता है और ऐसा करने के लिये वह सामाजिक, नैतिक और धार्मिक रूप से अधिकृत है। इतना ही नहीं, पुरुष द्वारा स्त्री को भोग्य के रूप में मान्यता ‘उत्पादन द्वारा उत्पादक' के भक्षण का एक मात्र उदाहरण है। स्त्री के प्रति पुरुष की इस मानसिकता का विकास संभवतः सृष्टि-रचना के आदि सिद्धान्त में निहित है जहाँ सृष्टिकर्ता स्त्री नहीं पुरुष है। हिन्दू माइथालोजी में पशु-पक्षी इत्यादि के स्रोत का तो पता नहीं, मनुष्य की उत्पत्ति भी योनि से न होकर ब्रह्मा के शरीर के विभिन्न हिस्से से हुई और वह भी मनुष्य के रूप में नहीं बल्कि वर्ण के रूप में। ऋग्‌वेद के पुरुष सूक्त से लेकर सभी अनुवर्ती गन्थों में उत्पत्ति का यही वर्ण-व्यवस्थायीय प्रावधान मिलता है और इसके लिये रचित मंत्र और श्लोकों का जो टोन है उनसे यही ध्वनित होता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में केवल पुरुषों की ही उत्पत्ति हुई स्त्रियों की नहीं और अब, जबकि यह सिद्ध हो चुका है कि दलित शूद्र के अंग नहीं है क्योंकि शूद्र अस्पृश्य नहीं थे, तो इसमें कोई विवाद नहीं होना चाहिये कि स्त्री की भाँति दलित भी वर्ण-व्यवस्थायीय उत्पत्ति नहीं हैं। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि भारतीय समाज-व्यवस्था में स्त्री और दलित दोनों ही बाहरी व अपरिचित तत्त्व हैं। इसलिये भारतीय समाज का रवैया यदि इनके प्रति शत्रुवत्‌ है तो आश्चर्य नहीं करना चाहिये।
उपरोक्त कथन के विरोध में यह तर्क दिया जा सकता है कि समय के साथ न जाने कितने विरोधाभाषों का समरस विलीनीकरण अथवा सहमतिपूर्ण सामंजस्य हो जाता है और मनुष्य अपनी विकास-यात्रा के जिस पड़ाव पर पहुँच चुका है। उस परिप्रेक्ष्य में यह एक मूर्खतापूर्ण सोच है। यह तर्क दिखने में चाहे जितना दमदार हो लेकिन वास्तव में इसमें कोई दम नहीं है क्योंकि धार्मिक मान्यताओं के प्रति भारतीय समाज ही नहीं समग्र मानव समाज इतना जड़ है कि वह आदि युगीन मानव की भाँति ही सोचता है और उसी समय में जीता है। उसके लिये आज भी ईश्वरीय सत्ता ही वास्तविक सत्ता है और बिना उसकी मर्जी के कुछ भी घटित होना संभव नहीं है। उसकी दिनचर्या का निर्धारण और नियंत्राण हजारों हजार मील दूर स्थित कोई ग्रह करता है; यह बात अलग है कि वह ग्रह स्वयं अपनी गोद में किसी जीव का पालन करने में समर्थ नहीं है। स्त्री-पुरुष के सहज संयोग को सन्तानोत्पत्ति का कारण न मानकर इसे ईश्वर की देन कहने वालों की आज भी कोई कमी नहीं है और इसमें प्रजनन करवाने वाली डॉक्टर भी शामिल है जो इसकी वैज्ञानिक वास्तविकताओं से पूरी तरह भिज्ञ होती है किन्तु यही लोग बिना वैवाहिक सम्बन्ध के उत्पन्न सन्तान को ईश्वर की देन मानने से न केवल इनकार करते हैं अपितु माँ को कुलटा भी घोषित कर देते हैं। चन्द्र एवं सूर्यग्रहण आज भी इनके लिये कोई वैज्ञानिक परिघटना न होकर राहु और केतु कारस्तानी है। ऐसा नहीं है कि हिन्दू धर्म के अनुयायी ही ऐसा करते हैं। किसी भी धर्म के अनुयायिओं के आचरण के बारे में इस प्रकार के दृष्टान्त उद्धृत किये जा सकते हैं। चूँकि धर्म एवं वर्ण-व्यवस्था की मानसिक ग्रन्थि से भारतीय समाज आज भी निकलना नहीं चाहता। अतः दलितों और स्त्रियों के प्रति उसके व्यवहार के बारे में मेरे कथन के विरोध में व्यक्त तर्क स्वतः ही दम तोड़ देता है। इस लेख का विषय स्त्री-विमर्श से सम्बन्धित होने के कारण इसी परिप्रेक्ष्य में इस चर्चा को आगे विस्तार दिया जा रहा है।
अध्यात्म के स्तर पर धर्म का चाहे जो तात्पर्य हो लेकिन व्यवहार के स्तर पर उसका वही आशय है जो कानून का है। दोनों का उद्देश्य समाज को नियंत्रित करना है। इसके लिए ‘क्या करना चाहिये' और ‘क्या नहीं करना चाहिये' का संहिताकरण और उल्लंघन करने पर दंडित करने का प्रावधान दोनों जगह किया गया है लेकिन दोनों में एक अन्तर है। कानून लोकतांत्रिक व्यवस्था की देन है और सबको समान दृष्टि से देखने की वकालत करता है और धर्म राजतंत्र द्वारा पोषित ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जो वर्ग-हित की वकालत करता है। इसमें मनुष्य के साथ समानता के आधार पर नहीं बल्कि उसके वर्णगत्‌ हैसियत के आधार पर व्यवहार करने का प्रावधान है, जिसे ईश्वर अथवा मनुष्येतर शक्तियों द्वारा अनुमोदित घोषित करवाकर इसे अनुल्लंघनीय बना दिया गया । इस उपाय के द्वारा राजा के हाथों से नियंत्रण की शक्ति स्वतः छिन गयी और वह ईश्वर के नाम पर दंड देने के बहाने एक से एक अनैतिक काम करने लगा। इन अनैतिक कार्र्यों के पाप-बोध से मुक्ति दिलाने के उद्देश्य से राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि और ब्राह्मण को उसकी इच्छाओं का व्याख्याकार उद्घोषित किया गया। अब राजा बनने की एक मात्र योग्यता पूर्ववर्ती राजा का ज्येष्ठ पुत्र रह गयी और राजा बनने का एकमात्र कार्य ब्राह्मणों की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए उनकी अनुगामिता और इसी विषाक्त मानसिकता की भूमि पर धर्म का बीजारोपण होता है जो बात तो करता है मानव के समग्र कल्याण की, आत्मिक चेतना के विकास की और प्रावधान ऐसा करता है कि अधिसंख्य मानव-समुदाय न केवल हाशिये पर पहुँच गया बल्कि दलित और स्त्री तो मनुष्य होने से वंचित हो गये।
समाज को व्यवस्थित नियंत्रित और अनुशासित करने के लिये करणीय और अकरणीय का प्रावधान, जो वास्तविक व्यवहार में कानून ही था, धार्मिक घाल-मेल के रूप में अवतरित हो गया और भारतीय समाज इसी परिवेश में पलने लगा। धार्मिक व्यवस्था के नाम पर इसमें दलितों और स्त्रियों के लिये ऐसे-ऐसे घृणित प्रावधान किये गये कि किसी भी सभ्य समाज का सिर शर्म से झुक जाये मगर धर्म की मानसिक ग्रन्थि ने समाज को मानवीय संवेदना और समानता के स्तर पर कभी भी सभ्य नहीं होने दिया क्योंकि इसने वर्ण-व्यवस्था को शाश्वत और अक्षुण्ण बनाये रखने के लक्ष्य का कभी परित्याग ही नहीं किया। लोकतंत्रीय व्यवस्था ने यद्यपि समानता, बन्धुता और स्वतंत्रता के नैसर्गिक सिद्धान्त को अपनाकर सबको आगे बढ़ने का तो अवसर प्रदान किया लेकिन साधन-संसाधन पर व्यक्तिगत्‌ नियंत्रण से कोई छेड़-छाड़ नहीं की और न सरकार ने कभी विपन्न समुदाय के लिए इतनी व्यवस्था की वे साधन-हीन होते हुए भी अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सकें। तथाकथित आरक्षण व्यवस्था जो मात्र सरकारी क्षेत्र तक ही सीमित रही और सदा से इन सशक्त सामंती प्रवृत्ति के लोगों की आँखों की किरकिरी बनी हुई है, आज तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त कर सकी है और अब इसे अपनी मौत करने के लिये छोड़ दिया गया है। इसके बल पर जो थोड़े से लोग किसी प्रकार आगे बढ़ गये हैं उन्हीं को देखकर यह धारणा बन गई है कि इनका वांछित विकास हो चुका है। अब जो कुछ करना हो अपने बलबूते पर ही करें। यहाँ पर यह कहना असंगत न होगा कि अभी तक कोई ऐसा सर्वेक्षण नहीं किया गया कि आरक्षित समुदाय को जो कुछ भी प्राप्त हुआ वह किसके हिस्से का था? मुझे लगता है कि आजादी मिलने के साथ पढ़े-लिखे मुसलमानों का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया। आजाद भारत का मुसलमान शैक्षिक रूप से पिछड़ जाने के कारण अपने पूर्ववर्तियों द्वारा रिक्त स्थान तक नहीं पहुँच सका। फलतः वे आरक्षित समुदाय के हिस्से में आ गया। सवर्णों को मिलने वाले हलवा-पूड़ी में कोई कटौती हुई कि नहीं, इस पर चर्चा करने की बजाय आरक्षण के विरोध में उनके सुर से सुर मिलाने वाले लोग समाज के प्रति नैतिक निष्ठा और उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं कर रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर सबसे गम्भीर चिन्तन मुसलमान बुद्धिजीवियों को ही करना है जिनका जन-सामान्य फतवाओं की राजनीति में ही उलझा रहता है। इस विश्लेषण से हम पाते है कि मुसलमान भी उसी पायदान पर खड़े हैं जिस पर दलित और स्त्री हैं। अन्य अल्पसंख्यकों के परिप्रेक्ष्य में इस विचार को विस्तारित करने का पूरा स्कोप है।
अभी तक के विश्लेषण से दो तथ्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित होते हैं। पहला, जो समुदाय वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति नहीं हैं उनके प्रति हिन्दू धर्म की अवधारणायें, मान्यतायें तथा प्रावधान अत्यन्त कठोर, अश्लील और घृणास्पद हैं। आज इसे शायद ही कोई माने लेकिन यह स्वर्णों के अवचेतन में दबी हुई वह कुंठा है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानान्तरित होते हुए दैनंदिक दिनचर्या का सहज स्वाभाविक अंग बनकर व्यवहार में झलकती तो रहती हैं मगर उन्हें दिखाई नहीं देतीं। दूसरा, आरक्षण के रूप में विशेष सुविधा देने के बावजूद राज्य द्वारा साधन-संसाधन की समुचित व्यवस्था न किये जाने के कारण विपन्न समुदाय का वांछित विकास संभव नहीं हो सका; परिणामस्वरूप आज भी सत्ता पर वहीं सामन्त-समूह या उनकी पालित संतानों ही ठसक के साथ काबिज हैं। ये धार्मिक पूर्वाग्रहों से इस बुरी तरह से ग्रस्त हैं कि जो जहाँ है वहीं लोकतांत्रिक कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर दलित और स्त्री का अपमान करने की सुखानुभूति कर रहा है।
अरविन्द जैन ने अपने लेख ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा' (अतीत होती सदी और स्त्री का भविष्यः खंड-१, ‘हंस' जनवरी-फरवरी २०००) में उच्चतम न्यायालय सहित विभिन्न न्यायालयों द्वारा यौन हिंसा और बलात्कार के निर्णीत मामलों का जो लोमहर्षक लेखा-जोखा प्रस्तुत किया है उसे पढ़ने के बाद शायद ही कोई ऐसा होगा जो मेरे प्रतिपादित कथन से सहमत न हो। अपर्णा भट्ट द्वारा सम्पादित पुस्तक court on rape trials की भूमिका में चार वर्ष की बच्ची के साथ घटित बलात्कार के मामले में सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की जो टिप्पणी उद्धृत की गई हैं, वह यह है, ‘If a 25 year old man lay on top of a four year old girl, the girl would get crushed and die. कहने की आवश्यकता नहीं है कि अपील जिसे लेखिका ने स्वयं दायर किया था, ख़ारिज कर दी गयी। जन-मानस में स्त्रियों की छवि ‘जवान हो या नन्हीं-सी गुड़िया, कुछ भी हो औरत जहर की है पुड़िया' अथवा ‘तिरिया चरित न जाने कोय खसम मार के सत्ती होय' की बनी है तो इसमें स्त्रियों के प्रति दबी हुई स्वाभाविक घृणा के अतिरिक्त और क्या है? इसी प्रकार अपनी पुस्तक dalits and law में लेखक द्वय गिरीश अग्रवाल और कालिन गॉन साल्वेस द्वारा इस तथ्य की विस्तृत पड़ताल की गई है कि किस प्रकार दलितों की सुरक्षा के लिये बनाये गये कानूनों की हर स्तर पर धज्जियाँ उड़ाकर उनका प्रायोजिक उत्पीड़न किया जाता है। राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रांगण में मनु की काल्पनिक मूर्ति स्थापित करने का यदि यह संदेश जाये कि उच्च जाति का पुरुष नीच जाति की स्त्री से संभोग नहीं कर सकता तो क्या आश्चर्य (भंवरी बाई बलात्कार कांड)। कल्याण सिंह ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में अयोध्या में मनु की मूर्ति स्थापित करवाने का प्रस्ताव किया था। (राष्ट्रीय सहारा, लखनऊ २८.३.९९) इस प्रस्ताव का क्या हुआ, यह जानने से ज्यादा इस निहितार्थ को जानना महत्त्वपूर्ण है कि यह एक शूद्र मुख्यमंत्री का मनु-प्रेम है जो वर्णीय-भ्रातृत्व-प्रेम का आदर्श उदारहण है। आज जिस तेजी और सहजता से शूद्रों की अन्तर्वर्णीय ग्राह्यता बढ़ी है लेकिन दलित और स्त्री इसी प्रकार से हेय व उपेक्षित हैं, उससे वर्ण-व्यवस्था से बाह्यीकरण के सिद्धान्त की संदेह-रहित पुष्टि होती है।
स्त्री-विमर्श का सबसे अहम्‌ मद्दा देह का है। स्त्री लेखन से प्रायः यही संदेश मिलता है कि अपनी देह की स्वतंत्रता और उस पर स्वयं का अधिकार ही इसका एक मात्रध्येय और लक्ष्य है, लेकिन अपने अध्ययन और चिन्तन के द्वारा मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि स्त्री मात्र’योनि' है जिसकी काम-पिपासा शाश्वत्‌ अतृप्त रहती है और जो सदैव ‘लिंग-भक्षण' के लिये लालायित रहती है। इसी आधार पर ‘स्त्री-योनि' को नरक-द्वार और ‘नरक-कुंड' तक कहा गया है। इसकी यह छवि सोद्देश्य बनाई गयी है अथवा यह उसके स्वभाव की वास्तविकता है, स्त्री-विमर्श के क्षेत्र में या तो छूटा हुआ है या समुचित स्पेस नहीं पा सका हैः यद्यपि इसके लिये भरपूर स्कोप है। लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक यह है कि जिन ग्रन्थों, दृष्टान्तों और आख्यानों ने उनकी देह को योनि में संकुचित कर दिया उन्हीं के प्रति वे पूज्य भाव
बनाये रखती है। इससे यही लगता है कि इस स्थिति से वे सहमत भी हैं। यहाँ कुछ ऐसे दृष्टांत उद्धृत किये जा रहे हैं जो यह दर्शाते हैं कि स्त्रियाँ स्वयं यह घोषणा करती हैं कि वे मात्र योनि हैं और काम-पिपासा को तृप्त करना उनका एकमात्र लक्ष्य है।
सुधीर पचौरी ने अपने लेख ‘स्त्रीत्ववाद में मर्दों की जगह' (‘हंस', स्त्री विशेषांक, जनवरी-फरवरी २०००) की शुरुआत निम्न संवाद को संदर्भित करते हुए किया है-
फ्रायड ने पूछा है कि औरत चाहती क्या है?...
बौदलेयर ने जवाब दिया है कि वह फ़क होना चाहती है...
इस संवाद को पढ़कर फ़क होने वाली कोई बात नहीं है। पचौरी ने पता नहीं क्यों फ्रायड..... को उद्धृत किया। ऐसे आख्यानात्मक दृष्टांत तो यहाँ भरे हैं। विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ पर उद्धृत यह वाक्य ‘मैं तुम्हारे पास गर्भधारणार्थ आयी हूँ, तुम भी मेरे पास बीज डालने के लिये आओ...। स्त्रियों को लिंग जान से भी प्यारा होता है। क्योंकि वह योनि को कुचलता है...।' उक्त संवाद से कहीं अधिक स्पष्ट और अर्थपूर्ण है। यह स्पष्ट संकेत करता है कि स्त्री का पूरा अस्तित्व ही योनि में सिमट गया है। यह मात्रएक उदाहरण है। इस पुस्तक में स्वच्छन्द यौन-संसर्ग के अनेक दृष्टांत दिये गये है। जो उक्त कथन की पुष्टि करते हैं: साथ ही आर्ष ग्रन्थों के प्रति प्रचलित पूज्य भावना को पुनर्रेखांकित करने की भी मांग करते हैं।
वेद, पुराण, स्मृति, महाभारत आदि ग्रन्थ हमारी सभ्यता और संस्कृति की धरोहर हैं और इनका इसी दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाय तो हमारे इतिहास की न जाने कितनी विश्रृंखलित कड़ियों को जोड़ने में मदद मिल सकती है लेकिन विडम्बना यह है कि इनको धर्म-ग्रन्थ मानकर पूज्य घोषित कर दिया गया है जबकि स्त्री-विमर्श के दृष्टिकोण से तो इनके विशेष अध्ययन की आवश्यकता है क्योंकि इन्हीं के अन्दर उस रहस्य की चाभी छुपी है जो यह बताती है कि किस प्रकार मातृ-सत्तात्मक युग की शक्तिशाली स्त्रियों को पहले देह में और फिर योनि में संकुचित करके उसे औपनिवेशक सम्पत्ति घोषित कर दिया गया। यदि प्रथम लिखित शब्द से ही सभ्यता की शुरुआत मानें तो कह सकते हैं कि यही स्त्री के स्त्रीतत्व का बलिदान दिवस था जिसे लगातार सुनियोजित षड़यंत्र करके न केवल पुख्+ता किया गया बल्कि इसके लिये उनका मानसिक अनुकूलन भी किया गया जो आज भी जारी है। यही कारण है कि नारी-विमर्श और नारी-सशक्तिकरण का चाहे जितना डंका पीटा जाये, सिवाय चन्द नारी-वादिनियों के यह किसी को सुनाई नहीं देता। इस भाग में वेद, पुराण और महाभारत से उदाहरण देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया है कि आज के परिप्रेक्ष्य में किस प्रकार इन ग्रन्थों में स्त्रियों की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया गया है। वेदों में वर्णित कुछ कामुक दृष्टांत हरिमोहन झा की पुस्तक ‘खट्टर काका' से साभार लेकर यहाँ पर उद्धृत किए जा रहे हैं - मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः/कलशे शतयाम्ना पथा (ऋ. ९/८६/१६)
कलश में अनेक धारों से रस का फुहारा छूट रहा है। जैसे, युवतियों में... (पृष्ठ १९४)
को वा शयुत्र विधवेव देवरं मर्यं न योषा वृणुते (ऋ. ७/४०/२)
‘‘जैसे विधवा स्त्री शयनकाल में अपने देवर को बुला लेती है, उसी प्रकार मैं भी यज्ञ में आपको सादर बुला रही हूँ। (पृष्ठ १९५)
यत्र द्वाविव जघनाधिषवरण्या/उलूखल सुतानामवेद्विन्दुजल्गुलः (ऋ. १/२८/२)
‘‘जैसे कोई विवृत-जघना युवती अपनी दोनों जंघाओं को फैलाये हुई हो और उसमें..(पृष्ठ १९३)
अभित्वा योषणो दश, जारं न कन्यानूषत/मृज्यसे सोम सातये (ऋ. ९/५६/३)
‘‘कामातुरा कन्या अपने जार (यार ) को बुलाने के लिये इसी प्रकार अंगुलियों से इशारा करती हैं। (पृष्ठ १९३ )
वृषभो न तिग्मश्रृंगोऽन्तर्यूथेषु रोरुवत्‌! (ऋ. १०/८६/१५)
अर्थात्‌ ‘जिस प्रकार टेढ़ी सींग वाला साँड़ मस्त होकर डकरता हुआ रमण करता है, उसी प्रकार तुम भी मुझसे करो। (पृष्ठ १९६)
डॉ. तुलसीराम ने अपने लेख ‘बौद्ध धर्म तथा वर्ण व्यवस्था' (‘हंस', अगस्त २००४) में ऋग्वेद के प्रथम मंडल के छठवें मंत्र का अनुवाद इस तरह किया है, ‘‘यह संभोग्य युवती (यानी जिसके गुप्तांग पर बाल उग आए हों) अच्छी तरह आलिंगन (बद्ध) होकर सूतवत्सा नकुली (यानी एक रथ हाँकने वाले की बेटी, जिसका नाम नकुली था) की तरह लम्बे समय तक रमण करती है। वह बहु-वीर्य सम्पन्न युवती मुझे अनेक बार भोग प्रदान करती हैं।'' इसी लेख में यह भी कहा गया है कि ऋग्वेद के अंग्रेजी अनुवाद राल्फ टी ग्रीफिथ को दसवें मंडल के ८६ वें सूक्त के मंत्र १६ और १७ इतने वीभत्स लगे कि उन्होंने इनका अनुवाद ही नहीं किया।
ऋग्वेद के दसवें मंडल के दसवें सूक्त में सहोदर भाई-बहन यम और यमी का संवाद है जिसमें यमी यम से संभोग याचना करती है। इसी मंडल के ६१ वें सूक्त के पाँचवें-सातवें तथा अथर्ववेद (९/१०/१२) में प्रजापति का अपनी पुत्री के साथ संभोग वर्णन है। यम और यमी के प्रकरण का विवरण अथर्ववेद के अठारहवें कांड में भी मिलता है। (भारतीय विवाह संस्था का इतिहास - वि.का. राजवाडे, पृष्ठ ९७) इसी पुस्तक के पृष्ठ ७८-७९ पर पिता-पुत्री के सम्बन्धों पर चर्चा करते हुए वशिष्ठ प्रजापति की कन्या शतरूपा, मनु की कन्या इला, जन्हू की कन्या जान्हवी (गंगा) सूर्य की पुत्राी उषा अथवा सरण्यू का अपने-अपने पिता के साथ पत्नी भाव से समागन होना बताया गया है। ‘स्त्री-पुरुष समागम सम्बन्धी कई अति प्राचीन आर्ष प्रथाएँ नामक यह अध्याय सगे-सम्बन्धियों के मध्य संभोग-चर्चा पर आधारित है। इस प्रकार के सम्बन्धों की चर्चा महाभारत के ‘शांतिपूर्व' के २०७ वें अध्याय के श्लोक संख्या ३८ से ४८ तक में भीष्म द्वारा की गई है। राजवाडे ने अपनी उक्त संदर्भित पुस्तक के पृष्ठ ११५-११६ पर (श्लोक का क्रम ३७ से ३९ अंकित है।) इन श्लोकों का अर्थ निम्नवत्‌ किया है- कृतयुग (संभवतः सतयुग) में स्त्री-पुरुषों के बीच, जब मन हुआ तब, समागम हो जाता था। माँ, पिता, भाई, बहन का भेद नहीं था। वह यूथावस्था थी। (श्लोक सं. ३८) त्रेता युग में स्त्री-पुरुषों द्वारा एक-दूसरे को स्पर्श करने पर समाज उन्हें उस समय के लिए संभोग करने की अनुमति देता था। यह पसन्द-नापसन्द या प्रिय-अप्रिय का चुनाव करने की व्यवस्था थी। (श्लोक सं. ३९) द्वापर युग में मैथुन धर्म शुरू हुआ। इस पद्धति के अनुसार, स्त्री-पुरुष अपनी टोली में जोड़ियों में रहने लगे, किन्तु अभी भी इन जोड़ियों को स्थिर अवस्था प्राप्त नहीं हुई थी और कलियुग में द्वंद्वावस्था की परिणति हुई, अर्थात्‌ जिसे हम विवाह संस्था कहते हैं उसका उदय हुआ। (श्लोक सं. ४०)
‘खट्टर काका' के पृष्ठ ६४ पर भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग खंड के हवाले से उद्धृत निम्न श्लोक की मानें तो ईश्वरीय सत्ता के तीनों शीर्ष प्रतीक भी इस स्वच्छन्द सम्बन्ध से मुक्त नहीं हैं-स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विष्णुदेवः स्वमातरम्‌/भगनीं भगवान्‌ शंभुः गृहीत्वा श्रेष्ठतामगात्‌!
स्त्री के मुँह से ही स्त्रियों की बुराई सिद्ध करने के आख्यान मिलते हैं। स्त्रियों का यह चरित्र- चित्राण उनकी विश्व-विख्यात ईर्ष्या-भावना की छवि को उद्घाटित करता है। इस प्रकार का एक दृष्टांत महाभारत से यहाँ पर उद्धृत है। आगे, सम्बन्धित खंड में रामरचितमानस से भी ऐसा ही दृष्टांत उद्धृत किया गया है। महाभारत के अनुशासन पर्व के अन्तर्गत ‘दानधर्म' पर्व में पंचचूड़ा, अप्सरा और नारद के मध्य एक लम्बा संवाद है, जिसमें पंचचूड़ा स्त्रियों के दोष गिनती है। इसमें से कुछ श्लोकार्थ यहाँ दिये जा रहे हैं-नारद जी! कुलीन, रूपवती और सनाथ युवतियाँ भी मर्यादा के भीतर नहीं रहतीं। यह स्त्रियों का दोष है॥११॥ प्रभो! हम स्त्रियों में यह सबसे बड़ा पातक है कि हम पापी पुरुषों को भी लाज छोड़कर स्वीकार कर लेती हैं॥१४॥ इनके लिये कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है, जो अगम्य हो। इनका किसी अवस्था-विशेष पर भी निश्चय नहीं रहता। कोई रूपवान हो या कुरूप; पुरुष है- इतना ही समझकर स्त्रियाँ उसका उपभोग करती हैं॥१७॥ जो बहुत सम्मानित और पति की प्यारी स्त्रियाँ हैं; जिनकी सदा अच्छी तरह रखवाली की जाती है, वे भी घर में आने-जाने वाले कुबड़ों, अन्धों, गूँगों और बौनों के साथ भी फँस जाती है॥२०॥ महामुनि देवर्षे! जो पंगु हैं अथवा जो अत्यन्त घृणित मनुष्य (पुरुष) हैं, उनमें भी स्त्रियों की आसक्ति हो जाती है। इस संसार में कोई भी पुरुष स्त्रियों के लिये अगम्य नहीं हैं॥२१॥ ब्रह्मन! यदि स्त्रियों को पुरुष की प्राप्ति किसी प्रकार भी सम्भव न हो और पति भी दूर गये हों तो वे आपस में ही कृत्रिम उपायों से ही मैथुन में प्रवृत्त हो जाती हैं॥२२॥ देवर्षे! सम्पूर्ण रमणियों के सम्बन्ध में दूसरी भी रहस्य की बात यह है कि मनोरम पुरुष को देखते ही स्त्री की योनि गीली हो जाती है॥२६॥ यमराज, वायु, मृत्यू, पाताल, बड़वानल, छुरे की धार, विष, सर्प और अग्नि - ये सब विनाश हेतु एक तरफ और स्त्रियाँ अकेली एक तरफ बराबर हैं॥२९॥ नारद! जहाँ से पाँचों महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँ से विधाता ने सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि की है तथा जहाँ से पुरुषों और स्त्रियों का निर्माण हुआ है, वही से स्त्रियों में ये दोष भी रचे गये हैं (अर्थात्‌ ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं।)॥३०॥
इस आख्यान से दो बातें स्पष्ट सिद्ध होती है। पहली एक ही स्रोत से रची गई चीजों में विधाता ने मात्र स्त्रियों के लिये ही दोषों की रचना करके पक्षपात किया और दूसरी यह कि स्वयं विधाता ही पुरुष-वर्चस्व का पोषक है। अब सवाल यह है कि ऐसे विधाता के विरुद्ध एक जुट होकर विद्रोह करने के लिये सामान्य स्त्रियों को प्रेरित करने के लिये नारीवादिनियों के पास कौन-सी योजना है?

Monday, May 26, 2008

स्त्री मुक्ति का प्रश्न

- कमल किशोर श्रमिक
नारी विमर्श पर कलम चलाने वाले हर पुरुष लेखक को पुरुष होने का एक जोखिम तो लेना ही होता है। उसे अन्तर्विरोधों के तहत प्रायः यह सुनना पड़ता है कि वह पुरुष होने के कारण नारी की परिस्थितियों एवं स्वभाव की जटिलताओं को नहीं समझ सकता। भले ही वह लेखक नारी विमर्श के मुद्दे पर मील का पत्थर प्रमाणित होने वाला इंग्लैण्ड का प्रसिद्ध नारीवादी लेखक जान स्टूअर्ट मिल ही क्यों न हो। मिल १८वीं शताब्दी के दौर में स्त्री पुरुष समानाधिकारों का पक्षधर था। वह इस अवधारणा से भी सहमत नहीं था कि प्रकृति की ओर से एक पुरुष स्त्री से अधिक शक्तिशाली या अधिक बुद्धिमान होता है। अपनी शिक्षिका से प्रभावित लेखक अपनी अवधारणाओं में कहीं भी पुरुष सोच का पक्षधर नहीं है। हाँ, वह समाज संचालन की दृष्टि से स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में फ़र्क करते हुए स्त्री पुरुष दोनों के लिए एक सीमा रेखा के नियंत्राण में रहने पर बल देता है। मगर प्रसिद्ध नारीवादी फ्रांसीसी लेखिका सीमोन द बोउआर ने मिल की पुरुष होने के कारण एवं अपनी यौनमुक्ति की सीमाहीन अवधारणा के कारण मिल को अपनी आलोचना का पात्र बनाया है। हाँ, सीमोन ने अपने दोस्त सात्रा की आलोचना नहीं की। क्योंकि दोनों ही विवाह संस्था के विरोधी एवं व्यक्तिगत्‌ स्तर पर यौन मुक्त जीवन जीने के पक्षधर थे। सात्रा और सीमोन ने विवाह नहीं किया और जीवन भर शारीरिक संबंध रखते हुए दोस्तों की भाँति रहते रहे। उनके बीच एक अलिखित समझौता था कि वे कभी एक दूसरे के अन्यों से यौनिक संबंधों के बारे में कोई हस्तक्षेप नहीं करेंगे। उन्होंने इस समझौते का निर्वाह भी किया परन्तु व्यवहार में होता यह रहा कि सीमोन की महिला मित्रों के साथ जहाँ सात्रा अपने शारीरिक संबंध बना लेता था वहीं सात्रा के पुरुष मित्रों के साथ सीमोन अपने संबंध बना लेती थी। इस मुद्दे पर सीमोन की आत्मकथा में लिखा है कि इन संबंधों के कारण कभी-कभी वे भारी तनाव का अनुभव करते थे। अपनी व्यक्तिगत्‌ चेतना के कारण उन्होंने अंतिम समय तक अपने समझौते का निर्वाह तो किया, मगर नारी स्वतंत्रता के पूर्ण पक्षधर कार्लमार्क्स और जेनी मार्क्स की भाँति कभी स्वतंत्र, शांतिपूर्ण एवं स्नेहपूर्ण दाम्पत्य जीवन नहीं जी पाये। दो शब्दों में कहा जा सकता है कि शांतिपूर्ण समाज संचालन की दृष्टि से सात्रा और सीमोन के जीवन को आदर्श नहीं माना जा सकता। अमेरिका, यूरोप, फ्रांस एवं एशियाई देशों खासतौर से भारत के कुछ प्रतिशत लोगों का यौन मुक्त (फ्री सेक्स) जीवन का खोखलापन आज उजागर हो चुका है। पुरुषों की अपेक्षा ऐसा जीवन जीने वाली महिलायें ३७ प्रतिशत अभी भी बहुत कम हैं मगर जो भी है। वे परित्यक्ता जीवन जीती हुई यौनिक बीमारियों के कारण जहाँ डॉक्टरों के क्लीनिकों के चक्कर लगाती देखी जाती हैं और अपने अंदर एक खोखलापन महसूस करती हैं।
मानव सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास को देखने से पता चलता है कि आदिम कबीलाई युग तक मातृ प्रधान समाज रहा है। जहाँ एक स्त्री पुरुष की जननी होने के कारण कबीले की मुखिया होती थी। प्राकृतिक निर्भरता एवं सामाजिक विकास न होने के कारण उस समय सामाजिक सरोकारों का कोई विस्तार नहीं हुआ था और नहीं यौनिक संबंधों के बारे में किन्हीं विशेष विषयों का सूत्रापात हुआ था। यहाँ तक आपसी संबंधों में रिश्तों का निर्माण भी नहीं हुआ था, तथा नर और मादा के आधार पर आपस में यौनिक संबंध कायम थे। निस्संदेह आदिम समाज में आधुनिक समाज के वरअस्क जो विकास के नाम पर मनुष्यता द्रोही अपसंस्कृति निर्मित हो गई है। कुछ अच्छाइयाँ अवश्य थी, मगर हम आदिम सभ्यता की ओर पीछे नहीं लौट सकते। जान स्टूअर्ट मिल के अनुसार विकसित होते समाज के किसी कालखण्ड में स्त्री स्वयं पुरुष के प्यार में उसकी गुलाम बनती चली गई। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में आंशिक रूप से यह बात भले सत्य हो गई हो, सामाजिक विकास के नियमों के आधार पर यह विश्लेषण सही नहीं है। क्योंकि प्रेम के द्वारा स्वीकार की गई दासता लम्बे समय तक नहीं चल सकती है। हाँ, कार्लमार्क्स की यह ऐतिहासिक अवधारणा कि व्यक्तिगत्‌ सम्पत्ति के चलन के कारण एक पुरुष वर्ग विशेष ने उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया होगा और वस्तुओं के बंटवारे में जानदार स्त्री को भी वस्तु के रूप में बदल दिया गया होगा। कामों का बंटवारा और स्त्री की प्रसव कालीन दुर्बलता भी इसका कारक बनी होगी। बहरहाल यह सब आसानी से घटित नहीं हुआ है। मानव सभ्यता को इस स्थिति में पहुँचने के लिए करोड़ों वर्षों का समय खर्च करना पड़ा है। चूँकि मानव सभ्यता का इतिहास वर्गों के संघर्ष का इतिहास रहा है, अतः इतिहास के किसी कालखण्ड में अगर स्त्रियों ने अपने संघर्ष के द्वारा कुछ सामाजिक अधिकार प्राप्त कर लिए हों तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। यूँ भारतीय संस्कृति के इतिहास की गुफाओं में दाखिल होते समय हम धर्म को अनदेखा नहीं कर सकते और भारतीय धर्मों की नियमावली ने कभी भी स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार प्रदान नहीं किये हैं।
वर्गों, धर्मों, वर्णों, जातियों, उपजातियों में बंटे भारतीय समाज में स्त्री जाति कभी देह(मादा), कभी वस्तु, कभी दासी के रूप में चिद्दित की गयी है। कौन वह जानता है कि वैदिक काल से लगा सामन्ती व्यवस्था तक दलितों और स्त्रियों को पठन-पाठन से लगाकर अनेकानेक सामाजिक अधिकारों से वंचित किया गया। पितृ प्रधान कन्यादान की भारतीय संस्कृति में वह पुरुष वर्ग की भोग्या बनी रही। उसकी मानसिक शारीरिक सभी क्षमताओं का पुरुष वर्ग द्वारा शोषण किया गया। यूँ अपोजिट सेक्स होने के यही कारण हैं कि उच्च वर्ग की रखैल स्त्री निम्न वर्ग के लोगों को अप्राप्य भी रही हैं और शायद यही कारण है कि पुरुष साहित्यकारों द्वारा लिखे साहित्य में भी स्त्री केन्द्रिय भूमिका का निर्वाह करती रही। मगर यहाँ भी उसकी तुलना कभी समंदर(पुरुष) में समाहित होती वहीं से कभी भौरों (पुरुषों) को रसप्लावित करती कली से, कभी वृक्ष (पुरुष) से लिपटी हुई लता से की गई है। संस्कृत साहित्य के महाकवि माघ और कालिदास से लगाकर हिन्दी के महाकवियों सूर, तुलसी, बिहारी आदि के काव्य में उक्त तथ्यों को आसानी से दृष्टिगत्‌ किया जा सकता है। भारतीय गणराज्यों की सामाजिक व्यवस्था में कला की अधिष्ठात्री(देवी) नर्तकी नगरवधू का वह सम्मान जिसकी पालकी में कंधा लगाने के लिए होड़ करते हुए सामन्त पुत्रों(राजकुमारों) की तलवारें टकराने के लिए म्यान से बाहर आ जाती थीं, कितना खोखला था। इसे यशपाल के प्रसिद्ध उपन्यास ‘दिव्या' से आसानी से समझा जा सकता है। प्रश्न उठता है कि क्या इन उच्च वर्गीय नगर वधुओं की तुलना आधुनिक विश्व सुंदरियों से नहीं की जा सकती? आखिर इनकी सामाजिक अस्मिता क्या थी? कहने का तात्पर्य मात्रइतना है कि भारतीय इतिहास के हर कालखण्ड में स्त्री पुरुषों की दासी बनी रही।
शायद यही कारण है कि भारतीय इतिहास एक पुरुष प्रधान इतिहास है। कुछ अपवादों की बात अगर छोड़ दें तो कला, विज्ञान, इतिहास, भूगोल, धर्मदर्शन आदि विषयों की कोई भी प्रतिभावान स्त्री लेखिका हमें हजारों वर्ष तक भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर दिखाई नहीं देती। आखिर इसका कारण क्या है? कारण है समान अवसरों का प्राप्त न होना। जिस देश में महिलाओं को पढ़ने का भी अधिकार प्राप्त नहीं था, उस देश में किसी स्त्री से लेखिका बनने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। हिन्दी की प्रसिद्ध कवयित्री मीराबाई को अपनी काव्य क्षमताओं के प्रदर्शन के लिए कितना जोखिम उठाना पड़ा है, इसे कौन नहीं जानता। प्रसिद्ध लेखिका वर्जीनिया वुल्फ का यह कथन कितना सटीक है कि अगर प्रसिद्ध नाटककार सेक्सपियर की कोई बहन होती और उसकी भी मानसिक क्षमतायें सेक्सपियर के बराबर होती तो भी क्या वह एक प्रसिद्ध नाटककार बन सकती थी? इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सेक्सपियर के काल में उसके देश में स्त्रियों की सामाजिक अस्मिता क्या थी? यहाँ सीमोन द बोउआर के इस कथन का स्वागत किया ही जाना चाहिए कि स्त्री पैदा नहीं होती बना दी जाती है। यहाँ इस बात का उल्लेख करना भी आप्रासंगिक नहीं होगा कि इतिहास के हर काल खण्ड में कुछ पुरुष ऐसे अवश्य रहें होंगे जिन्होंने स्त्रियों की सोचनीय व्यवस्था के बारे में औचित्यपूर्ण ढंग से सोचा होगा। कई बार शोषक वर्ग के लोग भी अपनी वैक्तिक चेतना के आधार पर शोषित वर्ग की पक्षधरता ग्रहण करते दृष्टिगत्‌ होते हैं। वाल्टेयर एक पादरी का पुत्र था। जिसने पादरी एवं चर्च की कठोर आलोचना की थी। मार्क्स मध्यमवर्गीय पिता का पुत्र था, जो जीवन भर मजदूर वर्ग के लिए संघर्ष करता रहा। भारतीय इतिहास में राजा राममोहन राय के पूर्व किसी स्त्री ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज नहीं उठाई थी। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि दलित लेखकों या नारीवादी लेखिकाओं का यह तर्क अधिक विवेकपूर्ण नहीं है कि स्त्री समस्याओं को मात्र स्त्री ही लिख सकती है या दलित समस्याओं को केवल दलित लेखक ही समझ सकते हैं। सच तो यह है कि कई बार उत्पीड़ित वर्ग के लोग अपने महाप्रभुओं के सोच में इतना ढल जाते हैं कि अपने उत्पीड़न के विरुद्ध सोचने की चेतना खो बैठते हैं। इतिहास में पन्ना धाय का या आज भी गांवों में सवर्ण युवकों को देख दलित वृद्धों को चारपाई से उठकर खड़े हो जाने को इसी उदाहरण के रूप में चिद्दित किया जा सकता है। उक्त अवधारणा द्वंद्ववादी दृष्टि से गलत नहीं है। वर्तमान समय जिसे कथित भूमण्डलीकरण का युग कहा जा सकता है में साम्राज्यवादी संस्कृति भी स्त्री को मुक्ति प्रदान करने का दावा कर रही है। पुरुषों की भाँति स्त्रियों की आबादी का एक हिस्सा इस अवधारण का शिकार है। वह अपनी वर्गीय समृद्धता को अपनी मुक्ति मान बैठा है। आज बाज+ार की संस्कृति जिसका एक मात्रउद्देश्य समृद्ध वर्ग को अधिक से अधिक समृद्ध बनाना है। केवल सर्वहारा संगठनों में ही बिखराव नहीं पैदा कर रहा है बल्कि दलितों और स्त्रियों के संगठनों को भी विभाजित करने का प्रयास कर रहा है। आज अमेरिका यूरोप से लगाकर भारत तक में ऐसे नारी संगठन या लेखिकायें मौजूद हैं जो साहित्य में भी आधुनिक या उत्तर आधुनिक विश्लेषण के नाम पर स्त्री के वर्गीय सोच को केवल विकृत ही नहीं कर रही हैं बल्कि पुरुष वर्ग को वर्ग शत्रु के रूप में चिद्दित कर रही हैं और प्रतिशोध की भावना से पुरुषजनित दुर्गुणों को भी अपनाने की वकालत कर रही है। यह भी सत्य है कि स्त्री पर योनिसचिता की भावना पुरुषों की वनिस्पत अधिक लादी गई है, मगर चरित्राहीन व्यक्ति को भी देश का समाज पसंद नहीं करता। यह भी उचित है कि हर स्त्री को अपने देह के मालिकाने का हक मिलना ही चाहिए, मगर बॉडी लैंग्वेज के नाम पर देह मुक्ति से यौनमुक्ति(फ्री सेक्स) तक का सफर सामाजिक संबंधों या रिश्तों को खोखला बना सकता है। तनाव, कुण्ठा, हिंसा से लगाकर यौनिक बीमारियाँ या एड्स पैदा कर सकता है। यहाँ प्रसिद्ध छायावादी कवयित्राी महादेवी वर्मा की नारी विमर्श पर केन्द्रित पुस्तक ‘श्रृंखला की कड़ियाँ' का जिक्र करना चाहता हूँ। इस पुस्तक में महादेवी ने जहाँ पुरुषों के बराबर स्त्रियों के लिए सभी सामाजिक, राजनैतिक अधिकारों के औचित्य को तर्कपूर्ण ढंग से व्यवस्थित किया है वहीं स्त्री को पुरुषों के अवगुणों से बचने की सलाह भी दी है। महादेवी का कहना है कि स्त्री जाति को अपने स्त्री योचित गुणों पर गर्व करना चाहिए और मुक्तता अर्थात्‌ चरित्रहीनता का अनुकरण नहीं करना चाहिए। यौन मुक्तता का नारा देने वाली लेखिकाओं से मैं कहना चाहता हूँ कि इस तरह आप विकृत मानसिकता वाले पुरुष वर्ग से सहयोग करने जा रही हैं। साम्राज्यवादी आर्थिक उदारीकरण की बाजारवादी संस्कृति यही तो चाहती है। वह स्त्री देह को अपने उत्पाद बेचने के लिए विज्ञापन की भाँति इस्तेमाल करती है। मैं स्त्री देह को प्राइवेट फर्म बना दिया जाए इस पक्ष में कतई नहीं हूँ, मगर स्त्री हो या पुरुष उसे यौन संबंधों के पूर्ण स्वतंत्रता यानी स्वच्छंदता दिये जाने का समर्थक भी नहीं हूँ। आज महानगरों की पंच सितारा संस्कृति में ऐसे पुरुष भी पाए जाते हैं जो पुरुष वैश्या की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। चंद समृद्ध वर्ग की महिलायें जो आर्थिक रूप से
आत्मनिर्भर भी हैं, इन्हें अपने साथ यौनिक संबंधों के लिए ले जाती है। क्या मात्रस्त्री होने के कारण इन महिलाओं के क्रियाकलापों को सामाजिक दृष्टि से सराहा जा सकता है? सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए कुछ मर्यादित सीमा रेखा होनी ही चाहिए और स्त्री पुरुष दोनों के लिए समान होनी चाहिए।
सही स्त्री स्वतंत्रता या पुरुष स्वतंत्रता दोनों एक दूसरे पर आधारित हैं। क्योंकि स्त्री पुरुष दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। इनकी समस्या का समाधान भी बिना व्यवस्था परिवर्तन के संभव नहीं है। आज सामन्ती संस्कृति की मार से पीड़ित ग्रामीण क्षेत्र की स्त्रियों को मुक्ति की सर्वाधिक आवश्यकता है। क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र की अशिक्षित महिलायें मानसिक रूप से इतना दबा दी गई है कि इनके अंदर अपने दुख का अहसास तो है मगर दुखों से मुक्ति की चेतना का अभाव है। यह सब अपने दुखों को पूर्व जन्म के कर्मों का फल समझती हैं। इसका निराकरण शिक्षा के द्वारा संभव है। मगर अर्थ प्रधान बाजारवादी संस्कृति में जहाँ अशिक्षित जन मुक्ति की चेतना से वंचित रह जाते हैं वहीं शिक्षित लोग बाजारवादी सांस्कृतिक भटकाव के शिकार बन जाते हैं। मीडिया भी धनपशुओं की होती है। अतः वह भी अपने वर्ग की चाकरी में लगी रहती है। प्रश्न उठता है कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? कैसे स्त्री की चेतना को जगाया जाए कि वह अपने वर्ग के पक्षधर पुरुष के साथ कदम ब कदम आगे बढ़ते हुए सम्पूर्ण वर्गीय मुक्ति के प्रयासों में लग सके। इसके लिए जहाँ हमें मीडिया का विकल्प तलाशना चाहिए वहीं चेतनाशील स्त्री पुरुषों को ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में काम करना चाहिए। क्योंकि इन्हें मुक्ति की अधिक आवश्यकता है और यह सब बाजारवादी सांस्कृतिक भ्रमों से मुक्त भी हैं।

शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में दलित संदर्भ

डॉ० जगत सिंह बिष्ट
समकालीन हिंदी कहानी साहित्य में शैलेश मटियानी एक महत्त्वपूर्ण नाम है। हिंदी कहानी साहित्य के कथा सम्राट प्रेमचंद के बाद सर्वाधिक कहानी रचनाएँ शैलेश ने ही दी है। इनके समय-समय पर करीब ३० कहानी-संग्रह प्रकाशित हुए थे। अब शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ, उनके पुत्र राकेश मटियानी के संपादकत्व में प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद से पाँच खंडों में प्रकाशित हो चुकी है जिसमें शैलेश मटियानी की करीब २५० कहानियाँ संगृहीत है। शैलेश मटियानी का कहानी साहित्य व्यापक जीवन संदर्भों का वाहक है क्योंकि इनके कहानी साहित्य के वृत के अंतर्गत विविध क्षेत्रों, वर्गों और संप्रदायों संबद्ध जीवन संदर्भों का चित्रण हुआ है किंतु इनके कहानी साहित्य में भारतीय समाज के दबे, कुचले, शोषित, उपेक्षित और हाशिए के निम्न वर्गीय जीवन संदर्भों का सर्वाधिक निरूपण हुआ है। वस्तुतः शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में चित्रित यह निम्न वर्ग कुमाऊँ के अंचल से लेकर छोटे-बड़े नगरों एवं महानगरों से संबद्ध है। किंतु इनकी कहानियों में चित्रित उपेक्षित, पीड़ित, शोषित और दबा-कुचला वर्ग चाहे जिस क्षेत्र, वर्ग, संप्रदाय से संबद्ध है अपने प्रकृत रूप में दिखाई देता है। इसका कारण शैलेश मटियानी की अत्यंत संवेदनशील, उस अंतर्दृष्टि को माना जा सकता है जिसने उन्हें अपनी भोगी एवं देखी चीजों को यथार्थ रूप में पकड़ पाने की अद्भुत क्षमता दी है। यही कारण है कि शैलेश मटियानी कुमाऊँ अंचल से संबद्ध कहानीकार होते हुए भी जब वे प्यास, अहिंसा, बिद्दू अंकल, भय जैसी नगरीय जीवन से संबद्ध कहानियाँ लिखते हैं तो वे भी कुमाऊँ अंचल से संबद्ध कपिला, नाबालिग, ब्राह्मण, खरबूजा, अर्द्धांगिनी जैसी कहानियों की भाँति अत्यंत गहरे प्रकृत रूप में दिखाई देती है। इन कहानियों में किसी भी प्रकार का बनावटीपन एवं कृत्रिमता नहीं दीखती। कहना यह है कि हिंदी कहानी साहित्य में प्रेमचंद के बाद ऐसा कोई कहानीकार नहीं दिखाई देता जिसमें शैलेश मटियानी के समान विविध वर्गों, स्थानों और धर्मों से संबद्ध जीवन को, उसके वास्तविक रूप में प्रस्तुत करने की दक्षता हो। शैलेश विविध परिवेश के भीतर से अपनी कहानियों के कथ्य का चयन करते हैं उसके अनुरूप पात्रों के चयन से लेकर उनके मासिक स्तरों का मार्मिक उद्घाटन करते हैं। उससे वे आसपास को ठीक-ठाक जाँचने-परखने की अद्भुत अंतर्दृष्टि का परिचय देते हैं।शैलेश मटियानी ने दलित जीवन संदर्भों पर पर्याप्त कहानियाँ लिखी हैं उन कहानियों में अहिंसा, जुलूस, हारा हुआ, संगीत भरी संध्या, माँ तुम आओ, अलाप, लाटी, भँवरे की जात, आंधी से आंधी तक, परिवर्तन, आक्रोश, भय, आवरण, दो दुखों का एक सुख, चुनाव, प्रेतमुक्ति, चिट्ठी के चार अक्षर, वृत्ति, सतजुगिया, गोपुली गफूरन, गृहस्थी, इब्बू मलंग, प्यास, शरण्य की ओर आदि कहानियाँ प्रमुख रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों में दलित वर्ग से संबंधित चरित्र मुख्यतः तीन रूपों में चित्रित हुए हैं। पहला-वह जो भारतीय समाज व्यवस्था की अमानवीयता से लाचार होकर समझौता करता दिखाई देता है। दूसरा-वह जो समाज व्यवस्था के प्रति आक्रोश तो व्यक्त करता है किंतु उसका आक्रोश इतना दबा होता है कि अंततः टूटकर समझौते की विवशता को झेलता है। तीसरा-वह जो अपनी मान-मर्यादा एवं हितों के लिए समाज व्यवस्था से सीधे टकराता है। अतः कहने में संकोच नहीं है कि शैलेश मटियानी के कहानी साहित्य में चित्रित दलित सरोकार अपने यथार्थ रूप में व्यक्त हुए हैं जिसमें समकालीन भारतीय समाज में आए बदलाव के स्पष्ट स्वर हैं।इनकी अहिंसा कहानी का चरित्र जगेशर दलित वर्ग से संबद्ध है वह शासकीय व्यवस्था से सर्वाधिक संत्रास्त है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद अपनी पत्नी के उपचार के लिए धन एकत्रिात करता है किंतु सरकारी अस्पतालों के कार्यरत कर्मचारियों एवं डॉक्टरों की अमानवीयता एवं भ्रष्ट आचरण के कारण वह ऑपरेशन से पूर्व ही दम तोड़ती चित्रित हुई है। वस्तुतः इस कहानी में जहाँ एक ओर दलित वर्ग की भारतीय समाज में प्रस्थिति का यथार्थ व्यक्त हुआ है वहीं इस कहानी का दलित चरित्र दलित चेतना से युक्त चित्रित हुआ है इसीलिए वह विद्रोह की आग में झुलसता तो दिखाई देता ही है इसके अतिरिक्त वह प्रतिशोध से भरकर डॉक्टर की हत्या करता भी चित्रित हुआ है। इनकी जुलूस कहानी में भी चित्रित दलित चरित्र वर्तमान भारत की घिनौनी राजनीति से यंत्रणा पाते चित्रित हुए हैं। इस कहानी की दलित नारी चरित्र बुधा राम की विधवा माँ सर्वाधिक कष्ट पाती है क्योंकि राजनीति प्रेरित पुलिस तंत्र के द्वारा महालक्ष्मी के दिन जुवारियों की जो धरपकड़ होती है उसमें उसका बेटा भी पुलिस द्वारा गिरफ्तार होता है। कहानीकार ने उसे अनेक प्रकार की आशंकाओं से ग्रस्त होते चित्रित किया है ''कहीं इसकी सरकारी दफ्तर की चपरासगीरी भी न चली जाए? कहाँ अगले ही महिने गौना सिर पर और कहाँ थुक्का फजीहत आ गयी।''१ इनकी हारा हुआ कहानी में भी गैरदलितों की दलितों के प्रति आम धारणा का यथार्थ व्यक्त हुआ है। किंतु इस कहानी में आम धारणा के विपरीत परिणाम निकलते दिखाई देते हैं। इस कहानी का दलित चरित्र दुखहरन मोची अत्यंत असहाय होते हुए भी गैरदलित चरित्र गंडामल पहलवान के द्वारा विधवा पुत्री कैलासों के प्रति बुरी नजर डालने पर, जिस प्रकार का कथन करता है उससे उसकी दलित चेतना व्यक्त होती है, ''कह देना अपने बाप गंडामल पहलवान से, आगे से मेरे घर की तरफ मुँह किया, तो उसकी बेहया आँखों को कटन्नी से बाहर खींचकर बाहर निकाल दूँगा और जबान में ठोक दूँगा जूते की नाल! पता चल जाएगा हराम जादे को कि किसी की बेटी को बुरी नजर से देखना क्या होता है।''२ वस्तुतः इस कहानी में कहानीकार ने एक कमजोर, विवश और लाचार दलित के द्वारा फेंकी गई चुनौती से शक्तिशाली गैरदलित के टूटते मनोबल को दर्शाकर महान आदर्श के साथ-साथ सामाजिक परिर्वन का संकेत भी प्रस्तुत किया है।शैलेश मटियानी की 'संगीत भरी संध्या' कहानी दलित विमर्श से भरी पड़ी है। इस कहानी में दलित चरित्र परंपरावादी और प्रगतिशील दोनों प्रकार के हैं। इस कहानी के रमदिया और गुणवंती दलित चरित्रा परंपरावादी है जो अपने परंपरागत पेशे (नाच-गाना) के प्रति समर्पित दिखाई देते हैं इसीलिए तो इस कहानी का दलित चरित्र रमदिया अपने पेशे से उदासीन भाई सुंदरिया को फटकारता चित्रित हुआ है, ''कमअकल साले, जरा अपनी औकात पर रह। जाने कहाँ से स्साला किसी झुटके का पैदा हो गया है। खानदानी होता, तो जरा तबले-सारंगी-हारमोनियम में सुर लगाता। ले मेरा यार कुल्ली-कबड़ियों के जैसे नीच काम करेगा...अरे स्साल, बोझ ढोना, मजदूरी करना क्या कोई हम लोगों का पेशा है?''३ इसके विपरीत मोहिनी और सुंदरिया अपने पेशे के प्रति नफरत करते चित्रित हुए हैं। दलित नारी चरित्रा मोहिनी तो अपने पति को परंपरा प्राप्त पेशे से चिपके रहने के लिए फटकारती चित्रित हुई है, ''सुंदरिया बेचारे पर क्या बिगड़ रहे हो, भरतार? मैं तो कहती हूँ कि मेरे सुंदरिया भाई जैसे सारे कबीलों में पैदा हो जाएँ, तो जरा हम रंडियों के सुख के दिन देखने को मिलें। यह स्साला अठन्नी-दुअन्नी के भाव से अपने अंग हिलाने का पलीत करम तो छूटे... सुंदरिया का सुर तबले-सारंगी में नहीं लगता है, इसीलिए इस छोरे को छाती से लगाकर रख रही हूँ कि किसी अच्छी जाति-औकात का होगा, तो इस पलीत पेशे को त्यागकर, कहीं इज्जत की रोटी कमा खायेगा।''४ इस कहानी की मोहिनी एवं सुंदरिया दलित चरित्रों की दलित चेतना अकारण नहीं है बल्कि गैरदलितों से मिलने वाली उपेक्षा एवं अमानवीय व्यवहार से मुक्ति की छटपटाहट है। इनकी 'माँ तुम, आओ' कहानी में भी पर्याप्त दलित संदर्भ है। इस कहानी में गैरदलितों की अमानवीयता और दलित वर्ग से संबद्ध चरित्रों को दलित होने के बोध के स्तरों से गुजरते चित्रित किया गया है। इस कहानी के दलित वर्ग से संबद्ध बच्चू बाल चरित्र और बड़ी माँ नारी चरित्र को गैर दलित चरित्र माधो काका दलित होने के त्रासद बोध के धरातल पर ले जाता चित्रित हुआ है। इसके अतिरिक्त, इस कहानी के दलित चरित्रा दलित होने के स्तरों से गुजरते हुए अपार यंत्रणा पाते दीखते हैं इसीलिए तो इस कहानी का बाल चरित्र बच्चू गैरदलित चरित्रा ठाकुर माधो काका की उपेक्षा से दलित होने के आत्मबोध एवं यंत्रणा को व्यक्त करता दिखाई देता है, ''अच्छा बड़ी माँ, एक बात बताओ। माधो काका हरिजन का बच्चा कहते हैं, तो मुझे बहुत बुरा लगता है - लेकिन तुम डूम भी कहती हो तो इतना अच्छा क्यों?''५ इसके अलावा, इस कहानी का गैरदलित चरित्र, दलित बाल चरित्र के पिता पुन्नी ठाकुर की आर्थिक विवशता का फायदा उठाकर, अपनी वचन बद्धता के कारण दलित परिवार के भीतर संघर्ष उत्पन्न करता है किंतु दलित बाल चरित्रों की सोच-समझ के कारण परिवार टूटने से बच जाता है। शैलेश की अलाप कहानी में दलित चरित्र डिगर राम के जीवन की विविध प्रकार के आलाप का कथन हुआ है। एक ऐसा आलाप जिससे आर्थिक रूप से लाचार एक दलित के यथार्थ जीवन की मार्मिक अभिव्यंजना हुई है। इनकी लाटी कहानी में गैरदलितों के द्वारा आर्थिक रूप से विवश दलित नारी चरित्र उत्तमा लाटी के प्रति घोर उपेक्षा का निरूपण हुआ है। अपने प्रेमी डिगरुवा की मृत्यु से अत्यंत आहत होकर विलाप करने पर गैरदलित चरित्र, उसके प्रति सहानुभूति के बजाय संवेदनहीनता का परिचय देते दीखते हैं, ''अब संगमरमर की मूरत जैसी खामोश क्यों बैठी है, ससुरी! बोल? अरे राँड! कुछ तो बोल कि अपने खसम के मरने पर तू क्यों ढाई मील तक मुर्दे के पीछे चुडैल जैसी चली आई और क्यों तूने नौटंकी जैसी भीड़ इकट्ठी कर ली।''६ वस्तुतः लाटी कहानी में दलित नारी चरित्रा के प्रति, इस प्रकार का कथन कहीं न कहीं भारतीय समाज की संवेदन शून्यता ही व्यक्त करता है जिससे दलित वर्ग ने घोर उपेक्षा पाई है। शैलेश की परिवर्तन कहानी दलित संदर्भों की दृष्टि से प्रभावशाली है। क्योंकि इस कहानी में दलित जीवन से संबद्ध वे सारे प्रसंग हैं जिससे दलित विमर्श किया जा सकता है। देवराम और जसुली परिवर्तन कहानी के दलित चरित्रा हैं ये दलित चरित्र गैरदलितों की उपेक्षा एवं अमानवीयता से एक साथ संत्रस्त और आक्रोशित हैं। कहना यह है कि इस कहानी में वर्षों से पीड़ित दलित वर्ग में गैरदलितों के आतंक से मुक्ति की छटपटाहट दिखाई देती है इसीलिए तो इस कहानी का दलित चरित्र देवराम अपनी बिरादरी के सामाजिक उत्थान के लिए चिंताशील दिखाई देता है ''लगभग चालीस-पैंतालीस वर्षों से इसी डुमौड़िया विमलकोट की धरती से लगा हुआ देवराम कभी-कभी बहुत दुखी और कुंठित हो उठता है कि ठाकुरों और ब्राह्मणों की तुलना में बहुत ही कठोर परिश्रम करने पर भी, उसकी जाति बिरादरी के लोगों को न तो आर्थिक सुविधाएँ हो पाती हैं और न सामाजिक क्षेत्र में ही उन लोगों को आदर मिल पाता है।''७ कुल मिलाकर यह कहानी दलित चेतना की वाहक है जिसमें समकालीन भारतीय समाज में व्यक्ति स्वतंत्रता की अनुगूँज है जो शैलेश के समकालीन बोध को प्रदर्शित करती है। इनकी भँवरे की जात और गृहस्थी कहानी एक जैसी हैं। इन दोनों कहानियों में कुमाऊँ अंचल की नाच-गाकर आजीविका चलाने वाली मिरासी दलित जाति से संबद्ध नारी जीवन का मार्मिक चित्रण हुआ है। इन दोनों कहानियों में चित्रित दलित नारी चरित्र मुख्य रूप से आर्थिक कठिनाइयों से संत्रस्त चित्रित हुई हैं और इस कहानी की नारी चरित्र गैरदलितों से भी कम नहीं छली जाती है। फिर भी ये कहानियाँ अलग-अलग प्रभाव छोड़ती दिखाई देती हैं। यद्यपि इन दोनों कहानियों की नवयुवती दलित चरित्र आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए नए मूल्यों को तलाशती दिखाई देती है किंतु इस तलाश में भँवरे की जात कहानी की दलित चरित्रा कुंतुली स्वयं तलाश बन जाती है क्योंकि सामान्यतः एक दलित नवयुवती का गैर दलित विवाहिता पुरुष के साथ प्रेम प्रसंग का जो हश्र होता है, अंततः वही उसके साथ भी होता है। किंतु प्रेम प्रसंगों में विफलता के बावजूद वह कहानी के अंत में महान्‌ आदर्श स्थापित करती दिखाई देती है वह जब अपनी पुत्री के गैरदलित पिता के पास अपने हक़ के लिए जाती है तो वह उसकी पत्नी से प्रभावित होकर, अपना दावा छोड़ती चित्रित हुई है, ''मैं तो नाच-गाकर भी जिन्दगी ठेल लूँगी लेकिन तुम कहाँ तक मायके में पड़ी रहोगी। मैंने अपना दावा छोड़ा।''८ इनकी आक्रोश कहानी में भी दलित पड़ोसी के बच्चों के घर में आने-जाने के कारण एक गैर दलित परिवार के भीतर तनाव उत्पन्न होता चित्रित हुआ है क्योंकि गैर दलित परिवार के मुखिया के मन में संदेह है कि ''आजकल के लौंडे-लौंडियाओं को अंतर्जातीय शादी-ब्याह करते देर क्या लगती है, भला।''९ किंतु जब वह अपने बच्चों को बुलाने पड़ोसी दलित परिवार के घर जाता है तो पड़ोसी कायस्थ परिवार की विधवा नारी चरित्र तारादेवी का देखकर अपना क्रोध भूल जाता है और उसके मन में तारा देवी के प्रति जबरदस्त आकर्षण उत्पन्न होता दिखाई देता है। इतना ही नहीं दलितों की घोर उपेक्षा करने वाला गैर दलित चरित्र कांता बाबू घर लौटते समय न केवल दलित नारी तारादेवी को अपने घर आने का आमंत्रण देता बल्कि दलितों के प्रति अपनी जिस धारणा को व्यक्त करता है, उससे उसकी दलितों के प्रति दोहरी मानसिकता ही व्यक्त होती है, ''अच्छा, अब आप कब आयेंगी, हमारे यहाँ? देखिए, हम लोगों से संकोच न रखिएगा। खासतौर पर मैं तो आज के जमाने में कायस्थ - ब्राह्मणों में आदमी में बाँटकर सोचना हीनता समझता हूँ। आप जब भी अकेली होती हैं, चली आया करें। मैं तो काम के दिनो में सवेरे और शाम को घर पर ही हुआ करता हूँ।''१० वस्तुतः आक्रोश कहानी में शैलेश ने गैरदलित पुरुषों की विडम्बनापूर्ण नियति का उद्घाटन किया है जिससे दलित वर्ग की नारियाँ वर्षों से छली आ रही हैं।दलित संदर्भों पर आधारित शैलेश मटियानी की गोपुली गफूरन कहानी सर्वाधिक प्रभावशाली है। वह अद्वितीय सौंदर्य के कारण गैर दलित चरित्रों के हास-परिहास और काम चेष्टाओं का कारण बनती चित्रित हुई है। इस कहानी के गैर दलित चरित्र खीम सिंह, प्रोफेसर तिवारी, भोपाल शा, अदलूमियाँ और किरपाल गुरु सबके-सब, उसके प्रति आकर्षित होते चित्रित हुए हैं। उसके शरीर के स्पर्श सुख के लिए ही, उसे सहयोग देते दिखाई देते हैं, ''भोपाल शा की दुकान से गोपुली के मालिक देबराम ने गल्ले की उधारी बाँध रखी थी। किरपाल दत्त पुरोहित अपने जजमानों को ताँबे के कलशे देबराम के ही यहाँ से खरीदने की सलाह देते थे। खीम सिंह होटल वाला गोपुली को गरम-गरम शिकार-भुटुवा हाफ चार्ज लेकर खिलाया करता है। अक्सर ही इन लोगों के आमने-सामने आना पड़ता है और दो-चार ठिठोलियाँ भी सहनी पड़ती है।''११ किंतु पति की मृत्यु के बाद सभी गैरदलित चरित्र गोपुली गफूरन के घोर आर्थिक संकट के क्षणों में साथ न देकर अवसरवादिता का परिचय देते हैं, ''गोपुली गफूरन हो गयी कि बालकों के भूखे मरने की नौबत आ गयी और भोपाल शा ने उधार देना बंद कर दिया था।...खीम सिंह की नियत नहीं बदली थी, मगर गोश्त की तश्तरियों से बालकों का पालन-पोषण नहीं हो सकता था। किरपाल गुरु मदद करने को तैयार थे, मगर गोपुली को ताँबे के कलशों पर फूल निकालने की कला नहीं आती थी। बिरादरी के लोगों ने ऐसी पीठ फेरी, आसरा देने की जगह ताने देने लगे।''१२ कहना यह है कि इस कहानी की दलित चरित्र गोपुली के दलित और उसमें भी दलित नारी होने की दोहरी मार झेलती चित्रित हुई है। अंततः वह आर्थिक कठिनाइयों से उबरने के लिए अपने धर्म से भिन्न धर्म से संबद्ध अहमद अली से विवाह तो करती है किंतु वहाँ वह अनेक बंदिशों से घिरती अपरिमित कष्ट पाती दिखाई देती है। इसीलिए तो वह कहती है ''अपने मजे की बात तुम्हीं लोग जानो री! मुझे तो जो कुछ मजा आना था, पिछले साल तक आ चुका।.... अब सिर्फ सजा बाकी रह गयी है।''१३ शैलेश मटियानी की आवरण कहानी की दलित नारी चरित्र रेवती भी गैरदलितों के छल-प्रपंचों का दंश झेलती चित्रित हुई है। वह बाल विधवा है। उसे गाँव का ही गैरदलित चरित्र बहला-फुसलाकर काम वासनाओं का शिकार बनाता है और दलित विधवा के गर्भवती होने पर, उसे अपनाने के बजाए, उसके लिए अनेक प्रकार के संकट उपस्थित करता है। इसके अलावा, उसकी पत्नी दलित नारी चरित्र के प्रति जिस प्रकार का कथन करती है उससे भारतीय समाज में गैर दलितों की दलितों के प्रति अमानवीय धारणा व्यक्त हो जाती है, ''साफ पानी में थूकने से कुछ नहीं होता, मगर कीचड़ में पेशाब करने से भी बुरा होता है राँड मेरी लाड़ली सौत बनके, जैसे मेरे खसम के नाम की सरकारी मुहर लगाकर लाई हो। अरे, बिना मालिक के खेत में बीज किसका पड़ा, किसका नहीं!''१४ इतना ही नहीं, इस कहानी में दलित नारी चरित्र रेवती ठाकुर हरपाल से छली जाने पर, उसे काश्तकारी से बेदखली की पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है। पंचायत बिठाई जाती है किंतु पंच भी ठाकुर हरपाल के पक्ष में निर्णय देते हैं। इस कहानी की दलित नारी चरित्र रेवती तमाम प्रकार के लांछनों और अमानवीयता के बावजूद टूटती नहीं बल्कि पंचों के निर्णय के प्रति विद्रोह करती, अपने स्वाभिमान का परिचय देती है ''पंच महाराज लोगों, हंसों की पाँत गू खा गई, मगर कौवे की जात अपना धरम नहीं छोड़ेगी। जिस दगा बाज नामरद ने थूककर चाट लिया, उसकी जमीन में पाँव रखने तो मर जाना अच्छा है।''१५ इस कहानी में दलित चेतना के स्वर भी व्यक्त हुए हैं। इसीलिए तो ठाकुर हरपाल के द्वारा दलित रेवती को काश्तकारी से बेदखल किए जाने पर, उसके दलित बिरादर विरोध करते चित्रिात हुए हैं, ''अब कोई विलायती वालों का राज नहीं है। जिस जमीन को रेवती बोती-काटती आ रही है, उसे हरपाल नहीं छीन सकता।''१६ यद्यपि इस कहानी का गैर दलित चरित्र हरपाल सब कुछ अपने पक्ष में कर लेता है तथापि वह अपराध बोध से भी कम ग्रसित नहीं दिखाई देता है ''मगर, बिना देवराम के ही, कुछ कहे उन्हें अनुभव हुआ कि अट्टहास से वो अपने नंगे होते को सिर्फ उतना ही ढँक पा रहे हैं, जितना देवराम अपनी सिमटी हुई लंगोटी से अपनी देह को ढँक पा रहा है।''१७शैलेश मटियानी की हत्यारे कहानी में पर्याप्त दलित संदर्भ है। इस कहानी में दलित चेतना मुखरित तो हुई ही है इसके अतिरिक्त दलितों की भावनाओं को भड़काकर राजनीति करने वाले नेताओं की कुत्सित चेष्टाएँ भी अनावृत्त हुई हैं। इस कहानी के शिवचरण केवट और हरफूल चंद दलित चरित्र अपनी दलित बिरादरी के प्रति पर्याप्त चिंताशील हैं। ये दोनों चरित्र केवटपुरा हरिजन समाज जैसे दलित संगठनों के द्वारा दलित बिरादरी को सामाजिक चेतना की प्रदीप्त प्रेरणा देते चित्रित हुए हैं। दलित चरित्रा हरफूल चंद अपनी बिरादरी को क्रांति का आवाहन करता चित्रित हुआ है, ''तो मैं आप लोगों से क्या कह रहा था कि हम हरिजन भाइयों पर जोर-जुल्मों की हुकूमत चलाने के वे नादिरशाही जमाने गुजर चुके, जो हमारे बाप-दादाओं के पीठों पर अपने जालिम निशान छोड़ गए हैं।...अब वक्त आ गया है कि हम हरिजन दुनिया में अपने नामोनिशान छोड़ जाएँगे।''१८ इस कहानी का गैर दलित नेता संकटमोचन सिंह दलितों के साथ मिलकर राजनीति करता चित्रित हुआ है। वह दलित शिवचरण केवट को भड़काकर अपनी सीट सुरक्षित करता दिखाई पड़ता है। किंतु उसकी अवसरवादिता तब सामने आती है, जब दलितों के अवैध कब्जों को नगरपालिका के औजारों से लैश दस्ते के आने पर वह घटना स्थल से नदारत होता है इसीलिए दलित चरित्र शिवचरण केवट उसकी धोखाधड़ी का उद्घाटन करता कहता है, ''ई ससुर ठाकुर संकटमोचन और ताऊ हरफूल चंद दोनों नदारत हैं। दोनों धोखे बाज हैं।''१९ फलतः वह अकेले जूझता अंततः अपने प्राणों से हाथ धो बैठता है, इसीलिए तो उसकी पत्नी रामरती, अपने पति की मौत का जिम्मेदार गैर दलित नेता संकटमोचन सिंह और हरफूल चंद को मानती है, ''हमारे इनके तो सरकार नहीं मारी है, ई राक्षस ससुर ठाकुर संकटमोचन सिंह और तुम्हारे बुढ़ऊ हरफूल चौधरी मरवाय दिए हैं।''२० चिट्ठी के चार अक्षर कहानी की दलित नारी चरित्रा दुर्गा की त्रासदी का मार्मिक चित्रण हुआ है। घर की विवशताओं के कारण, उसे गायों को चराने के लिए वन जाना पड़ता है किंतु उसे वन में ब्राह्मणों एवं ठाकुरों के छोंकरों की छेड़-छाड़ का सामना करना पड़ता है। उसे गैर दलित नव युवक परताप ठाकुर का संरक्षण तो मिलता है किंतु यह संरक्षण, उसके लिए कलंक का कारण बनता है। दोनों के बीच अपार प्रेम होने के बावजूद जातीयता की दीवार, दुर्गा के लिए अपार यंत्रणा का कारण बनता है। फलतः दलित नव युवती दुर्गा के साथ वही होता है जैसा भारतीय समाज में, अपने गैर दलित प्रेमी को अपना सर्वस्य समर्पित करने वाली आम दलित नव युवतियों के साथ होता है। किंतु इस कहानी की दलित चरित्र दुर्गा पर्याप्त प्रगतिशील, साहसी और उदात्त विचार संपन्न चित्रित हुई है इसीलिए तो वह हारती नहीं है। अंततः संघर्ष करती है और अपने प्रेमी की विवशता तथा अपनी नियति से विवश होकर, उसे क्षमा कर उदात्त प्रेम की अभिव्यंजना करती है। इसके अलावा, इस कहानी का गैर दलित ठाकुर परताप भी एक प्रगतिशील चरित्र के रूप में दिखाई देता है। तमाम प्रकार की सामाजिक बाधाओं के बावजूद, वह अपनी प्रेयसी को न अपना पाने के अपराध बोध से संत्रस्त दिखाई देता है और सेना में भर्ती हो जाने के बाद सामाजिक बंदिशों के बावजूद भी अपनी दलित प्रेमिका के प्रति समर्पित चित्रित हुआ है, ''सच प्यारी, तेरे साथ विश्वासघात करने का दुख जैसा मुझे सताता रहा है मेरी ही आत्मा जानती है। मगर अब जब मैं घर लौटूँगा, तो तुझे खुले आम अपनी घरवाली के तौर पर कबूलूँगा।''२१ दलित चेतना की दृष्टि से शैलेश मटियानी की सतजुगिया सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कहानी है। इस कहानी में वर्षों से उपेक्षित एवं शोषित दलित वर्ग की नई पीढ़ी में भारतीय अमानवीय समाज व्यवस्था के प्रति खुला विरोध व्यक्त हुआ है। इस कहानी में दलित वर्ग से संबद्ध चरित्रा दो पीढ़ियों से संबद्ध है। पुरानी पीढ़ी से संबद्ध चरित्र परंपरा से चिपके और नई पीढ़ी के चरित्र परंपरा के प्रति पर्याप्त विद्रोही हैं। इस कहानी का हरराम पुरानी पीढ़ी और परराम नई पीढ़ी से संबद्ध दलित चरित्र हैं। कहानी का पुरानी पीढ़ी से संबद्ध चरित्र हरराम पुरानी मानसिकता को दर्शाते हुए गैर दलित केशवानंद की मरी हुई भैंस को खींचने के पक्ष में हैं किंतु उसका बेटा परराम भैंस को खींचने के लिए साफ मना करता चित्रित हुआ है। फलतः उन दोनों बाप-बेटे के बीच द्वंद्व की स्थिति उत्पन्न होती दिखाई देती है। परंपरा के प्रति आग्रही हरराम अपने बेटे के द्वारा भैंस खींचने की मनाही को ब्रह्मदोह२२ मानता है। जबकि उसके बेटे परराम का स्पष्ट मत है, ''सभी इस बात से सहमत थे कि जब अपना खून-पसीना निचोड़कर पेट पालते हैं, तो कम से कम इतनी तो आजादी तो होनी चाहिए कि जो काम रुचे करें। भैंसखोर मानकर, देह छूते ही सवर्ण उन्हें दुराते थे। इससे इन सभी को ठेस पहुँचती थी, जिनके हर राम जैसे रूढ़ संस्कार नहीं थे।''२३ वस्तुतः इस कहानी में जहाँ एक ओर दलित वर्ग के दो पीढ़ियों के बीच संघर्ष को वाणी तो मिली ही है वहीं कहानीकार की समकालीन बोध दृष्टि भी व्यक्त हुई है। जिससे दलित जीवन संदर्भों के नए युग की अनुगूँज सुनाई देती है। इन्होंने शरण्य की ओर जैसी कहानी भी लिखी हैं जिसकी दलित नारी चरित्र सुख - सुविधाओं की चाह में इधर से उधर भटकती चित्रित हुई है किंतु गैर दलित पुरुषों की अमानवीयता से संत्रस्त होकर अंततः अपने पुराने पति के पास लौटती दिखाई देती है। वस्तुतः इस कहानी में सुख-सुविधाओं के लिए घर-परिवार को छोड़कर दलित नारी की भटकन कुछ और नहीं बल्कि नए मूल्यों की तलाश है किंतु दलित नारी नए मूल्यों के तलाश में असफल होती चित्रिात हुई है। इन कहानियों के अतिरिक्त शैलेश ने वृत्ति, प्यास, इब्बू मलंग, दो दुखों का एक सुख जैसी कहानियाँ भी लिखी हैं जिनमें दलित चरित्र अपने प्रकृत रूप में दीखते हैं। इन कहानियों में शैलेश मटियानी ने समकालीन राजनीति, प्रशासन तंत्र, सामाजिक उपेक्षा एवं आर्थिक दुर्दशा से संत्रस्त दलित जीवन संदर्भों का मार्मिक और यथार्थ चित्रण किया है।वस्तुतः शैलेश मटियानी का कहानी साहित्य मूलतः भारतीय समाज के पिछड़े, वंचितों और आर्थिक रूप से विपन्न निम्न वर्गीय जीवन से संबद्ध रहा है। इसके अतिरिक्त, इनके कहानी साहित्य में भारतीय समाज के हासिए में रहे वर्षों से उपेक्षित एवं शोषित दलित जीवन संदर्भों का भी पर्याप्त चित्रण हुआ है। इस संबंध में श्री प्रकाश मनु का कथन उचित जान पड़ता है, ''दलितों और नीचले वर्ग के लोगों से प्यार करने वाला उनसे बड़ा और कोई लेखक हमारे बीच हुआ ही नहीं। मटियानी का पूरा कथा साहित्य इस बात की गवाही देता है। ...यहाँ प्रेमचंद के बाद शैलेश मटियानी ही सबसे बड़े जनपक्षधर कथाकार साबित होते हैं।''२४ इनके कहानी साहित्य में चित्रित दलित वर्ग कुमाऊँ अंचल से लेकर छोटे-बड़े नगरों एवं महानगरों से संबद्ध रहा है। उनकी कहानियों में दलित वर्ग कई रूपों में चित्रित हुआ है। इनकी कहानियों में जहाँ एक ओर आर्थिक विपन्नता एवं गैर दलितों से संत्रस्त दलितों का चित्रण हुआ है वही भारतीय समाज व्यवस्था के प्रति विरोध करते दलित भी दिखाई देते हैं। शैलेश की कहानियों में दलित नारी सर्वाधिक संत्रस्त दीखती है। इनकी कहानियों में जहाँ एक ओर कथा सम्राट प्रेमचंद की घासवाली कहानी की मुलिया और ठाकुर का कुआँ की गंगी जैसी प्रबुद्ध दलित नारी चरित्र हैं वहीं गैर दलितों की काम पिपासा से दंशित एवं कलंक का बोझ ढोती दलित नारी चरित्र भी है। जो तमाम प्रकार की सामाजिक उपेक्षा एवं आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद भी खुशी-खुशी संघर्ष करती चित्रित हुई है। इस दृष्टि से शैलेश की भँवरे की जात, चिट्ठी के चार अक्षर, शरण्य की ओर, और आवरण, कहानियाँ उलेख्य हैं। इसके अलावा शैलेश के कहानी साहित्य में प्रेमचंद की सद्गति कहानी के गोंड जैसे दलित चरित्र भी हैं जो गैर दलितों की अमानवीयता एवं समाज व्यवस्था के संवेदन शून्यता के प्रति गहरा विरोध व्यक्त करते हैं। उनमें परिवर्तन कहानी का देबराम, सतजुगिया का परराम, हत्यारे का शिवचरण केवट आदि महत्त्वपूर्ण है। इनकी कहानियों में चित्रित कतिपय दलित नारी चरित्र तमाम कठिनाइयों के बावजूद महान्‌ आदर्श प्रस्तुत करती दीखती हैं। इनके कहानी साहित्य में प्रायः चित्रित दलित वर्ग से संबद्ध चरित्र तमाम प्रकार की कठिनाइयों के बावजूद भी मानवीय गुणों से युक्त है। इस संबंध में श्री हृदयेश का कथन उद्धृत है - ''यों उनके कथा-संसार में ...तुच्छ पेशों को चिपटाए गरीब एवं लाचार पात्र हैं, किंतु वे मानवीय गुणों के मामले में गरीब और तुच्छ नहीं हैं।''२५ इसके अलावा शैलेश मटियानी की कहानियों में कतिपय नई पीढ़ी से संबद्ध गैरदलित पुरुष चरित्र दलित वर्ग से संबंध नारियों से संबंध स्थापित करते चित्रित हुए हैं जिससे निश्चित ही समकालीन मूल्य परिवर्तन का संकेत मिलता है। इनके कहानी साहित्य के संबंध में प्रसिद्ध कथाकार पंकज बिष्ट का कथन उचित ही है, ''उनका रचना संसार ऐसे पात्रों से भरा है जो शोषित, पीड़ित और समाज के हाशिए में डाल दिए गए लोग हैं।''२६सन्दर्भ सूची१. शैलेश मटियानी, अहिंसा तथा अन्य कहानियाँ ; साहित्य भंडार ५०, चाहचंद, इलाहाबाद, १९९२, पृ० ११०२. शैलेश मटियानी, हारा हुआ ; आशु प्रकाशन, इलाहाबाद, १९८५, पृ० १२७३. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी संपूर्ण कहानियाँ - ४ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० २६८४. वही, पृ० २६८५. वही, पृ० २८२६. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - २ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० ३४७. शैलेश मटियानी, तीसरा सुख ; प्रतिभा प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९२, पृ० ५७८. शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - २ ; पृ० १०१९. वही, पृ० १६४१०. वही, पृ० १६८११. शैलेश मटियानी, पापमुक्ति तथा अन्य कहानियाँ ; आशु प्रकाशन, इलाहाबाद, १९९४, पृ० ४९१२. वही, पृ० ५५१३. वही, पृ० ५९१४. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - 1 ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० ३४८१५. वही, पृ० ३५२१६. वही, पृ० ३५११७. वही, पृ० ३५४१८. (सं०) राकेश मटियानी, शैलेश मटियानी की संपूर्ण कहानियाँ - ३ ; प्रकल्प प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४, पृ० १६८१९. वही, पृ० १७९२०. वही, पृ० १८०२१. वही, पृ० १८८२२. वही, पृ० ४५१२३. वही, पृ० ४५५२४. आजकल ; अक्टूबर, २००१२५. पहाड़ ; २००१, पृ० १९१२६. आजकल ; अक्टूबर २००१

Sunday, May 25, 2008

सारिका और धर्म युग पत्रिका

आदाब
मैं अलीगढ़ से वाड्रमय पत्रिका निकालता हूं.अगला अंक राही मासूम रजा परकेन्दित होगा.क्या किसी पुस्तकालय से सारिका और धर्म युग पत्रिका का संकलन मिल सकता है .कृप्या अवगत कराये.मेहरबानी होगी. धन्यवाद-
-www.vangmay.com
http://vangmaypatrika.blogspot.com http://dalitank.blogspot.com
http://kabirank.blogspot.com
http://muslimkahanikar.blogspot.com
www.radiosabrang.com
Dr. Firoz Ahmad
Editor- Vangmaya Patrika
B-4, Liberty Homes, Abdullah College Road
Civil Lines, Aligarh, 202002
India ph.no.91 941 227 7331

विमर्श

फ़ीरोज

हिन्दी साहित्य के वर्तमान परिदृश्य में उपन्यास, कहानी और कविता ही मुख्यधारा में है। इधर जब से दलित विमर्श का हंगामा है तो ‘आत्म चरित' की चर्चा भी छुट-पुट रूप में हो रही है, परन्तु साहित्य की दूसरी विधाओं की चर्चा न के बराबर है। गौरतलब यह है कि साहित्य के प्रभाव की दृष्टि से जो भूमिका मुख्यधारा की विधाओं की है, दूसरी विधाएं उसमें पीछे नहीं। प्रमाण के रूप में हम आत्मकथा की बढ़ी मांग को देख सकते हैं। दलित विमर्श में इसकी बढ़ी हुई अहमियत इस बात को साबित करती है कि दूसरी सभी विधाओं की भी भूमिका वही है जो आत्मकथा की। बस प्रतीक्षा है तो विमर्श और आन्दोलन की। इत्तेफाक से स्त्रीविमर्श के पुराधाओं का ध्यान मुख्य धारा की विधाओं की तरफ से इधर-उधर हुआ ही नहीं।
साक्षात्कार भी उन्हीं गैर अहम्‌ मान ली गयी साहित्यिक विधाओं में ऐसी विधा है जो कि बहुआयामी है। सूचना क्रान्ति ने इसके क्षेत्र को व्यापक और प्रभावशाली बनाया है। समाचार और सूचना प्रेषण के प्रामाणिक स्वरूप के रूप में इसको स्थापित किया है। साहित्य के क्षेत्र में भी इसकी भूमिका का पता इसी तथ्य से चलता है कि साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं ने नियमित रूप से साक्षात्कार का प्रकाशन होता है, परन्तु आश्चर्य तब होता है जब हम देखते हैं कि उपन्यास, कहानी और कविता की भाँति साक्षात्कार को अपेक्षित महत्ता प्राप्त नहीं, इसका आलोचनात्मक अध्ययन तो न के बराबर है यही हाल इसके ऐतिहासिक संदर्भों का भी है। यह अध्यताओं की उपेक्षा का शिकार रहा है। साहित्यिक सन्दर्भों में विद्वानों ने इसके सैद्धान्तिक पहलू पर कम ध्यान दिया है। यद्यपि पाठ्यक्रम में परम्परा पूर्ति के लिए स्नातक और स्नात्‌कोत्तर स्तर पर कहीं न कहीं साहित्यिक विधाओं का एक प्रश्न-पत्ररख दिया जाता है और कर्तव्य की इति मान ली जाती है। छात्रों को इन विधाओं से सम्बन्धित उपयुक्त सामग्री भी नहीं मिल पाती है।
साक्षात्कार के सन्दर्भ में उत्साहजनक तथ्य यह है कि जब से पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों की धूम मची है तो पत्रकारिता सम्बन्धी सामग्री की हिन्दी में मार्केट वैल्यू बढ़ी है। धड़ाधड़ विद्वान और व्यावसायिक, दोनों तरह के लोग पुस्तक पर पुस्तक लिखे जा रहे हैं। प्रकाशकों को भी इन पुस्तकों से वित्तीय लाभ हो रहा है। पत्रकारिता सम्बन्धी इन पुस्तकों में छुट-पुट रूप से साक्षात्कार के सैद्धान्ति पक्ष पर प्रकाश डाला जा रहा है, परन्तु यह सारे प्रयास व्यावसायिक आवश्यकता के तहत ही हो रहे हैं।
वाङ्मय अपने सीमित संसाधनों के साथ सीमित समय में चौथे विशेषांक के साथ प्रस्तुत है। सफलता-असफलता की चर्चा को पाठकों पर छोड़ देनी चाहिए इसलिए विद्वजनों से केवल यही निवेदन करना चाहूगा कि जिस प्रकार आरम्भ से वाङ्मय का आग्रह वाद निरपेक्षता का रहा है, उसी क्रम में यह अंक भी प्रस्तुत है। परिणाम के सन्दर्भ में विद्वानों की राय मेरे लिए महत्त्वपूर्ण होगी। पत्रिका के प्रस्तुतिकरण में कितनी सादगी है यह भी निर्धारित पाठकों को ही करना होगा।