Saturday, April 19, 2008

पदचिन्ह

कवि कुलवंत सिंह
बचपन में मैने
महाभारत पढ़ी थी
युधिष्ठिर का चरित्र भाया था ।
सोचा था -'मै भी
जीवन में सदैव सत्य बोलूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'पागल' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
गौतम बुद्ध को पढ़ा था
उनका साधूपन भाया था ।
सोचा था - 'मै भी
तन से न सही
मन से अवश्य साधू बनूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'बेवकूफ' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
गीता पढ़ी थी
कृष्ण का उपदेश भाया था ।
सोचा था -'मै भी
कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन
अपनाऊँगा ।'
बस कर्म करूंगा
फल की इच्छा नही रखूंगा ।
समझ नही आता -
आज लोग क्यों कहते हैं -
अरे ! इसका खूब फायदा उठा लो
बदले में कुछ नही मांगता !

बचपन में मैने
पढ़ा था - दहेज कुप्रथा है ।
सोचा था - 'बिना दहेज शादी करूंगा
पत्नी को सम्मान दूंगा,
उसके माँ बाप को
अपने माँ बाप का दर्जा दूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं -
धोबी का --------------
न दामाद न बेटा !

बचपन में मैने
गांधी को पढ़ा था ।
सोचा था - ' मै भी अपनाऊँगा
सादा जीवन उच्च विचार'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'गधा' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
मदर टेरेसा को पढ़ा था ।
सोचा था - 'बड़ा हो कर
मै भी करूँगा
लोगों की निस्वार्थ सेवा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं -
जरूर इसकी निस्वार्थ सेवा में भी
कुछ स्वार्थ होगा !
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