Tuesday, April 8, 2008

गजल

अतुल अजनबी
कैसे होता है अब गुजर मेरा
आओ देखो कभी ये घर मेरा

एक दिन साथ चल के देख जरा
कितना दुश्वार है सफर मेरा

साजिशे धूप की कुछ ऐसी है।
बच नहीं सकता अब शजर मेरा

गॉव की याद जब सताती है
मन नहीं लगता तब इधर मेरा

उस तरफ जाऊं किस बहाने से
कोई रहता नहीं उधर मेरा

कुछ न पाओगे तुम वफा के सिवा
चीर कर देख लो जिगर मेरा

इक मुलाकात बस हुई उससे
आज तक उस पे है असर मेरा

बस यही दिल में एक हसरत है
मुझको जिन्दा रखे हुनर मेरा

'अजनबी' बन के जिस मकॉ में रहा
कैसे कह दूं कि वो है घर मेरा
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