Monday, April 28, 2008

खो गयी दिशा

- अंजना कुमारी सिंहा
सुधा के लिए जब चौधरी साहब के यहाँ से रिश्ता आया तो मानो सुधा अरमानों के पंख लगाकर उड़ने लग गयी हो। उसे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था। साधारण-सी दिखने वाली सुधा इण्टर द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण थी।
चौधरी साहब शहर के बड़े रईसों में से एक थे, और साकेत उनका एकमात्र पुत्र था। आकर्षक व्यक्तित्व का धनी साकेत एक मल्टीनेशनल कम्पनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था।
शादी के बाद सुधा ससुराल आई तो इतने बड़े घर की जिम्मेदारी सँभालने मात्र के नाम से ही घबरा गयी, पर सुधा के ससुर चौधरी साहब ने उसकी बहुत मदद की। साकेत सुधा की ज्यादा मदद नहीं कर पाता। सुबह नौ बजे दफ्तर जाना और सायं सात बजे लौटना, और लौटकर भी दफ्तर के कामों में व्यस्त रहना। कभी-कभी सुधा को गुस्सा भी आता पर वह शान्त मन से सब सह जाती। शादी को दो महीने बीत गये थे। आज सुबह से ही सुधा को अपनी तबियत सही नहीं लग रही थी। चक्कर आ रहा था, जी खराब हो रहा था। उसने डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि वह माँ बनने वाली है। उसने अपनी रिपोर्ट ली और खुशी-खुशी घर लौट आयी; और सोचने लगी कि यह खबर सबसे पहले साकेत को सुनाऊँगी। वह बेसब्री से साकेत का इन्तजार करने लगी। शाम हुई तो साकेत वापस लौटा, और लौटकर सुधा को ही एक खबर दे बैठा - सुधा मेरा सामान लगा दो।
कहीं जा रहे हैं क्या?
हाँ, मेरा तबादला हो गया है। दूसरे शहर में कल से ही ज्वाइन करना है। साकेत मुझे आपने यह बात पहले नहीं बताई। सुधा मुझे आज ही पता चला है।
साकेत मुझे आपको कुछ जरूरी बात बतानी है।
सुधा जो कहना है, प्लीज बाद में कहना। मैं अभी बहुत थका हुआ हूँ। यह कह कर साकेत सो गया।
लेकिन सुधा की आँखों में नींद नहीं थी। सुधा की इच्छा हो रही थी कि वह अभी साकेत को उठाकर अपनी जिन्दगी की सबसे बड़ी खुशी की खबर दे दे। पर उसने साकेत की तरफ देखा तो वह बहुत गहरी नींद में सो रहा था। सुधा ने साकेत को जगाना ठीक नहीं समझा। वह भी आँख बन्द करके लेट गयी।
पाँच बजे घड़ी का अलार्म बजा! साकेत हड़बड़ाहट के साथ उठा और सुधा को नाश्ता बनाने के लिए कहा। सुधा उठकर नाश्ता बनाने चली गई पर उसका दिमाग रात की उधेड़बुन में ही लगा रहा कि वह साकेत को जाकर अभी बताये या बाद में बताये। उसके अन्तर्मन ने अचानक यह फैसला किया कि जब साकेत नाश्ता करेंगे तब मैं उन्हें जरूर बता दूँगी।
सुधा! सुधा!! नाश्ता तैयार है? जल्दी लाओ मुझे देर हो रही है। साकेत की आवाज सुनकर सुधा का ध्यान टूटा।
साकेत नाश्ता करते समय सुधा को हिदायतों पर हिदायतें दिये जा रहा था।
जब तक पापा नहीं आते, घर का ध्यान रखना। बिना जान-पहचान वाले को घर के अन्दर मत बुलाना। फिर कुछ सोचकर साकेत ने कहा - सुधा रात तुम मुझे कोई जरूरी बात बताना चाहती थीं, क्या बात है? यह सुनकर सुधा का ध्यान टूटा, उसे बड़ी खुशी हुई। जिस बात के लिए वह साकेत को बताने के लिए समय का इन्तजार कर रही थी और चाहकर भी कह नहीं पा रही थी, उसे साकेत ने खुद ही पूछ लिया। वह बोली साकेत, मैं नहीं जानती कि आपको यह जानकर कितनी खुशी होगी, किन्तु यह मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी खुशी ....
सुधा की बात बीच में ही रुक गयी। उसी समय फोन की रिंग बज उठी। साकेत ने फोन उठाया और सुनने लगा। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की बात सुन रहा है। साकेत बोला - ओ.के. बॉस मैं अभी आया। फोन रखकर वह सुधा से बोला - सुधा बॉस का फोन है, वह नीचे खड़े मेरा इन्तजार कर रहे हैं। मैं दस-पन्द्रह दिन बाद आऊँगा।
साकेत चला गया, मगर सुधा भावनाओं के सागर में खो गयी। अपनी बात न कह पाने का उसे दुःख हो रहा था। वह सोच रही थी कि इसके लिए दोषी कौन है - मैं, साकेत या मेरा भाग्य। दरवाजे की घण्टी सुनकर सुधा के विचारों का क्रम टूटा और उसने दरवाजा खोला - सामने चौधरी साहब थे, जो तीर्थ-यात्रा से लौटे थे। सुधा और चौधरी साहब के विचारों में समानता थी। वह उसे अपनी बेटी की तरह चाहते थे। सुधा ने देखते ही उन्हें प्रणाम किया। सुभाशीष देते हुए चौधरी साहब अन्दर आये और आवाज लगाना शुरू किया - साकेत! साकेत!! अभी तक सोया है यह लड़का! साकेत उठो! ऑफिस को देर हो जायेगी।
पिता जी साकेत घर पर नहीं हैं।
नहीं है? कहाँ गया?
उन्हें कम्पनी की ओर से प्रमोशन मिला है तथा ट्रांसफर करके दूसरे शहर में भेज दिया है। वे अपने बॉस के साथ कुछ समय पहले ही गये हैं।
कब लौटने की कह गया है बेटी?
दस-पन्द्रह दिन बाद आने के लिए कह रहे थे।
यह सुनकर वे चिन्ता में डूब गये। साकेत की माँ के गुजरने के बाद उन्होंने ही उसे पाला था। साकेत अब पच्चीस वर्ष का हो गया था, फिर भी वे उसे १२ वर्ष का नन्हा साकेत' ही समझते थे।
सुधा उनकी उस विकलता को समझ रही थी। उनका ध्यान उधर से हटाने के लिए वह बोली - पिताजी आप थके हुए हैं, आराम कीजिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।
सुधा रसोई घर में चाय बना रही थी कि अचानक उसे चक्कर आया और वह बेहोश हो गयी। घर में सफाई का काम करने वाली बाई ने उसे देखा और शोर मचाया। पिताजी दौड़कर आये और सुधा को सँभाला। डॉक्टर को फोन किया।
डॉक्टर आया, चैकअप किया और चौधरी साहब से बोला - घबराने की कोई बात नहीं सुधा माँ बनने वाली है किन्तु यह बहुत कमजोर है। इसे आराम की जरूरत है।
यह सुनकर पिताजी की आँखों में खुशी के आँसू झलक आये। अब वह सुधा का बहुत ख्याल रखने लगे। उन्होंने यह खुशखबरी साकेत को भी दे दी। साकेत को भी यह जानकर बहुत खुशी हुई, उसने सुधा से उसी रात फोन पर बातें कीं-हैलो सुधा! कैसी हो? इतनी बड़ी बात तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताई?
साकेत मैं तो बताने के बारे में सोचती ही रह गयी और उस दिन यही बात आपसे कहना चाहती थी, लेकिन अब पिताजी ने तुम्हें बता ही दिया।
अच्छा कल वापस आ रहा हूँ, बाकी बात मिलने पर होगी।
सुधा खुश थी। साकेत भी इस खुशखबरी को सुन उतना ही खुश था जितनी की वह स्वयं है। धीरे-धीरे वह दिन भी आया जब नन्हीं दिशा का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशी मनाई जा रही थी। पिताजी ने सारा बाजार ही घर में जोड़ लिया था, नन्ही दिशा के लिए। साकेत भी बहुत खुश था।
साकेत ने सुधा से कहा - तू बहू और दिशा को साथ ही ले जा बेटा।
नहीं पिता जी आप यहाँ अकेले रह जायेंगे।
पिताजी ने शून्य की ओर देखकर गहरी सांस लेते हुए कहा - मेरी चिन्ता मत करो बेटा, मैं अकेला रह लूँगा। मुझे तो आजीवन इसी घर में रहना है। तेरी माँ मुझे इसी घर में छोड़ कर चली गयी। एक दिन मेरी भी अर्थी इसी घर से ही निकलेगी।
नहीं पिता जी, ऐसी बात मत कीजिए सुधा ने टोका। वह नन्हीं दिशा को सुलाने चली गयी।
अगले दिन साकेत चला गया। सुधा उसके पुनः लौटने का इंतजार करने लगी। पहले साकेत पहुँचते ही फोन करते थे, पर अब सुधा को लगता था कि मानो वे अब भूल ही जाते हैं कि यहाँ उनका अपना परिवार भी है।
आज सुबह से ही सुधा को कुछ विचित्र-सा अनुभव हो रहा था। एक अजीब-सी बेचैनी उसे बार-बार परेशान कर रही थी। शाम होते-होते यह बेचैनी और भी बढ़ गयी।
सुधा खिन्नवदना पड़ी थी। रात के दस बज रहे थे कि अचानक पिताजी ने सुधा को पुकारा। सुधा उनके पास गयी तो अपने सीने में बड़ा तेज दर्द होने की बात पिताजी ने की। दर्द हुआ तो सुधा उन्हें हास्पीटल ले गयी। शहर छोटा होने के कारण सुविधायें कम थीं। डॉक्टर ने दूसरे शहर में ले जाने की सलाह दी तो सुधा ने साकेत को फोन किया। साकेत ने किसी तरह सुबह तक सँभालने के लिए कहा।
सुबह जब तक साकेत आया, बहुत देर हो चुकी थी। पिताजी का स्वर्गवास हो गया था।
तेरहवीं के बाद जब साकेत जाने लगा तो सुधा ने अश्रुपूरित नेत्रों से साकेत की ओर निहारा। साकेत ने कहा - थोड़ा सब्र करो सुधा, कुछ दिन बाद मैं तुम्हें वहीं बुला लूँगा।
सुधा इसी इन्तजार में दिन काटने लगी। पिताजी के आगे साकेत हफ्ते में एक बार अवश्य फोन करते थे, पन्द्रह-बीस दिन में घर अवश्य आ जाते थे, मगर अब सुधा ही फोन करे, तो ठीक से बात नहीं करते थे। साकेत को क्या हो गया है? क्या अब मैं और दिशा साकेत को प्रिय नहीं? इस तरह की जाने कितनी बातें सुधा के मन में आती थीं। वह खुद को निरीह, असहाय, आरक्षित अनुभव कर रही थी। एक दिन साकेत का फोन आया कि वह घर आ रहे हैं। दोपहर का समय था। सुधा आज कुछ प्रसन्न थी पूर्वी हवा के तीव्र झोंके बार-बार आते और शीतल वायु सुखदायी बन कर वातावरण को मोहक बना रही थी। अचानक दरवाजे की घण्टी बजी। सुधा ने दौड़कर दरवाजा खोला। देखा तो सामने साकेत थे। वे अकेले नहीं थे, उनके साथ एक तीखे नैन-नक्श वाली एक सुन्दर लड़की भी थी।
सुधा ने कहा अरे साकेत यह कौन है? आपने बताया नहीं कि आपके साथ और भी कोई आने वाला है।
सुधा यह कविता है, मेरे साथ आफिस में काम करती है। हम दोनों शादी करने वाले हैं। सुधा का चेहरा सफेद पड़ गया। एकबारगी वह सिर से पैर तक काँप गयी, परन्तु उसने संयत होकर कहा - साकेत! यह कैसा मजाक है?
सुधा, यह मजाक नहीं सच है।
दिशा के बारे में तो सोचो साकेत, उसका क्या होगा? मैं कहाँ जाऊँगी?
दिशा के बारे में सोचकर ही कह रहा हूँ, खामोश रहोगी तो यह घर रहने के लिए मिलेगा और हर महीने आठ हजार रुपये दिशा और तुम्हारे लिये भेजता रहूँगा। साकेत बोल रहा था और सुधा सुन रही थी - हैरान-परेशान विचलित। उसे लगा कि अभी धरती फट जायेगी और वह उसमें समा जायेगी। क्षण भर सँभलते हुए उसने पूछा - साकेत आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?
साकेत का चेहरा कठोर हो चला। उसने कहा - तुमने कभी स्वयं को ठीक से आइने में देखा है? तुममें ऐसा क्या है जो मैं ऐसा न करता? मैं तो पिता जी की वजह से चुप था, वरना तुम्हें तो मैं कब का बता देता।
साकेत शब्दों के बाण चलाये जा रहा था। सुधा किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी सुनती जा रही थी। सुधा का दिल बैठा जा रहा था। उसका पसीना छूट रहा था। साँस की गति तीव्रतर हो गयी थी। उसने नजर उठाकर देखा। दोनों जा चुके थे। सुधा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने दिशा को उठाया और हृदय से लगाकर रोती रही।
घर में एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया गया है। काफी चहल-पहल हो रही है। दिशा इण्टरमीडिएट में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई थी और वह भी पूरे कॉलेज में टॉप। आज उसे एम.बी.बी.एस. में भी प्रवेश मिल गया है। दिशा की सभी सहेलियाँ आयी थीं। इस समय भोजन चल रहा था।
आंटी आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं। रमा ने कहा।
हाँ आंटी, अंकल और दिशा तो बहुत लकी हैं, जो हर रोज आपका पकाया इतना अच्छा खाना खाते हैं। छाया ने कहा।
दिशा अंकल नहीं दिखाई दे रहे, कहीं बाहर गये हैं क्या? रमा पूछ बैठी।
नहीं वो हमारे साथ नहीं रहते हैं।
नहीं रहते? मतलब? तुमने पहले कभी नहीं बताया।
तुमने पहले कभी पूछा ही नहीं। जब मैं छोटी थी तब से मुझे और मम्मी को छोड़कर चले गये थे किसी और औरत के साथ। हमारे लिए वो मर गये।
यह क्या बोल रही हो दिशा, बेटा तुम लोग खाना खाओ। यह अपने पापा से नाराज है, इसलिए ऐसा बोल रही है। सुधा ने बात को नया मोड़ देना चाहा।
दिशा का चेहरा तमतमा गया था, ममा इन्हें सच बताने दो, नहीं तो एक के बाद एक उठने वाले सवालों का जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
सुधा अन्दर चली गयी। दिशा की सहेलियाँ भी खाना खाकर अन्दर चली गयीं। दिशा अकेली बैठी सोचती रही। बचपन से लेकर आज तक की घटना उसे याद आने लगीं। जब वह छोटी थी तो आस-पास के लोग साकेत के बारे में बात करते थे, लेकिन वह समझ नहीं पाती थी। उम्र के साथ-साथ उसकी समझ भी बढ़ती गयी। उसने साकेत के द्वारा भेजे गये पैसे उसकी खैरात समझ कर लेने से इंकार कर दिया। खुद पढ़ती, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती। पढ़ाई में तेज होने के कारण विद्यालय से मिलने वाली सारी सुविधाएँ उसे प्राप्त थीं। वह घटना भी याद आयी जब उसने पढ़ाई का खर्च अधिक होने के कारण आधा घर किराये पर दे दिया था। इस प्रकार दोनों माँ बेटी का खर्च प्रायः आराम से चल ही जाता था। तब माँ ने किसी बात का विरोध नहीं किया था साकेत ने उसके बाद न कभी पैसे भेजे थे और कोई पत्र ही। तो क्या उन्होंने हमको मरा हुआ नहीं समझा? कभी हमारी याद आयी? मेरे कहने पर माँ को बुरा क्यों लगा? आखिर क्या सम्बन्ध है अब हमारा उनसे? अनेक प्रश्न उसके मन में उठ रहे थे। दिशा'! क्या सोच रही हो बेटी? सुधा ने दिशा के कन्धे पर हाथ रख कर पूछा।
सॉरी ममा, मेरा वह सब कहना आपको बुरा लगा, पर मैं क्या करूँ? आज भी जब आपको उस आदमी की याद में रोती देखती हूँ तो नफरत होती है मुझे। मेरे विचार से सच बोलना ही ठीक है। आज हम उनसे झूठ बोलते, कल और सवाल उठते, उनका जवाब क्या देते? मैंने इस किस्से को ही खत्म कर दिया। अब कोई हम से कुछ नहीं पूछेगा। दिशा लगातार बोलती जा रही थी और सुधा हर्ष और विषाद के मिले जुले भाव लिए विस्मय से दिशा को निहार रही थी। उसे हर्ष इस बात का हो रहा था कि नन्ही दिशा कब इतनी बड़ी हो गयी कि सुधा का सहारा बन रही है। अपने हाथों से उसके आँसू पोंछ रही है। विषाद इस बात का कि न जाने क्यों दिशा का साकेत के खिलाफ बोलना उसे अच्छा नहीं लग रहा था।
दिशा ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर रखा था। भाग्य भी उसका पूरा साथ दे रहा था। वह एक के बाद एक सफलता प्राप्त करती गयी। अब उसकी पढ़ाई का आखिरी वर्ष था मानव और दिशा दोनों ही एक दूसरे को पसंद करते थे।
सुधा को भी मानव पसंद था। सुधा दिशा के सामने महसूस नहीं होने देती थी, पर वह आज भी मन ही मन साकेत को बहुत याद करती थी। आज साकेत के आये हुए खत ने उसे और अधिक बेचैन कर दिया। खत में लिखा था -
प्रिय सुधा!
दो महीने पहले, एक लम्बी बीमारी के चलते, कविता की मौत हो गयी है। यह अकेलापन मुझे खाने को दौड़ता है। मैं तुम्हारे और दिशा के पास वापस आ रहा हूँ। प्लीज मना मत करना। मुझे मेरी गलती के लिए माफ कर देना, मैं जल्दी ही आ रहा हूँ।
तुम्हारा साकेत
सुधा सोच रही थी कि साकेत ने जो किया, उसकी माफी दो लाइन के खत में लिखकर माँग ली? खैर ...! मैं शायद उन्हें माफ कर भी दूँ, ... पर दिशा को कैसे समझाऊँ? वह तो साकेत का नाम भी सुनना नहीं चाहती। दिशा के आने का समय हो रहा था, सुधा ने उस पत्र को छिपाना ही उचित समझा।
आज दिशा अकेली घर नहीं लौटी थी। मानव भी दिशा के साथ था।
अरे मानव! तुम, आओ बेटा कैसे हो?
अच्छा हूँ आन्टी।
पढ़ाई कैसी चल रही है?
बहुत अच्छी चल रही है आन्टी, आज मैं आपसे कुछ जरूरी बात करना चाहता हूँ आन्टी।
बोलो बेटा।
आन्टी कालेज में यह हमारा अन्तिम वर्ष, फिर न जाने हम सब कहाँ पहुँचें; आन्टी दिशा मेरी बहुत अच्छी दोस्त है। अगर आपको कोई एतराज न हो तो मैं दिशा को अपना जीवन-साथी बनाना चाहता हूँ। आप तो जानती हैं कि मैं बिल्कुल अकेला हूँ इसलिए मैं यह बात खुद कर रहा हूँ। मानव पलकें झुकाये मौन हो गया।
मानव बेटा मुझे भला क्या एतराज हो सकता है? तुम जैसा दामाद तो किस्मत वालों को मिलता है। दिशा से ही पूछ लो।
दिशा का चेहरा इन बातों को सुनकर लाल हो गया। वह लज्जाती हुई अन्दर चली गयी।
लीजिए आन्टी दिशा की ओर से हाँ का फरमान जारी हो गया है। अब आप जल्दी से सगाई की तैयारी कीजिए। लेकिन शादी हम पढ़ाई पूरी करके ही करेंगे।
जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा।
मानव के चले जाने पर सुधा दिशा के पास गयी, जो आइने में अपने आप को निहार रही थी। दिशा बेटा, तुम इस फैसले से खुश हो न?
हाँ माँ मैं बहुत खुश हूँ।
बेटा! आज मेरे जीवन का बोझ हल्का हो गया। अब तो तेरी सगाई की तैयारी करनी है।
दिशा की सगाई सुधा के लिए बहुत महत्त्व रखती थी। वह इतनी खुश थी कि साकेत और उसके पत्र का उसे कोई ध्यान ही न रहा।
सुधा ने बड़े अरमानों से दिशा और मानव की सगाई की तैयारी की। आने वाले शुक्रवार को दिशा और मानव की सगाई थी। सुधा ने बड़े ही धूमधाम से सगाई समारोह को सम्पन्न कराया। दिशा और मानव भी अपनी आने वाली नयी जिन्दगी को लेकर बहुत खुश थे। सगाई के बाद सुधा और दिशा बहुत थक गयी थीं, दो-चार दिन तो ऐसे ही बीत गये। जब सुधा को साकेत के खत के बारे में ध्यान आया, उसने बात को घुमाकर दिशा से कहा - दिशा अगर आज तुम्हारे पापा होते तो कितने खुश होते।
दिशा ने लगभग चिल्लाते हुए कहा - माँ मैं आपसे हजार बार कह चुकी हूँ कि आप मुझसे उस आदमी के बारे में बात मत किया करिये। आप उसे पापा कहती हैं मेरा? यह शब्द उस आदमी के लिए बिल्कुल नहीं जो अपनी पत्नी और नवजात बच्ची को छोड़ कर चला गया। उसे क्या एहसास होगा मेरी खुशियों का?
दिशा का यह रूप देखकर सुधा लगभग डर-सी गयी। उसने सोचा - साकेत का नाम लेने से दिशा इतनी नाराज हो गयी, यह बताने पर कि वह आ रहे हैं, पता नहीं वह क्या करेगी? इसी डर से उसने साकेत के पत्रा के बारे में उसे कुछ भी नहीं बताया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे सुधा का डर भी बढ़ता जा रहा था।
आज रविवार था, और आज का पूरा दिन दिशा, सुधा के साथ ही व्यतीत करती थी। वह सुधा को आज कोई भी काम नहीं करने देती थी। सुधा ड्राइंग रूप में बैठी टी.वी. देख रही थी और दिशा रसोई में नाश्ता बना रही थी। दरवाजे की घंटी बजी, सुधा ने जाकर दरवाजा खोला, वह हतप्रभ रह गयी। सामने साकेत था। सुधा को इतने दिन बाद साकेत को देखकर बहुत खुशी हो रही थी। इस खुशी का इजहार उसकी आँखों से टप-टप गिरते आँसू कर रहे थे। अचानक उसे दिशा का ख्याल आया और उसने घबराकर साकेत से कहा - आप यहाँ से चले जाइये। दिशा को पता चलेगा तो वह आपे से बाहर हो जायेगी। उसे आपके आने के बारे में मैंने कुछ नहीं बताया। वह आपसे बहुत नफरत करती है।
कैसी बात करती हो, दिशा मेरी बेटी है, मेरा खून है। उसे पता चलेगा तो वह खुश होकर मेरे गले से लग जायेगी।
आप समझते क्यों नहीं? दिशा आपसे नफरत करती है।
तभी दिशा हाथ में गर्म पकौड़ों की प्लेट लेकर कमरे में आयी और साकेत को लक्ष्य करके पूछा - माँ ये कौन हैं?
दिशा, वो ... ये तुम्हारे ...
क्या माँ, कौन हैं ये?
यह क्या सुधा तुम इतनी-सी बात नहीं बता पा रही अपनी बेटी को। चलो मैं ही बता देता हूँ। बेटा मैं तुम्हारा पापा हूँ, कितनी प्यारी है मेरी बेटी बिल्कुल मेरे ऊपर गयी है। साकेत ने दिशा की ओर प्यार से अपनी बाहें फैलायीं।
दिशा ने साकेत को धक्का देते हुए कहा - दूर रहिए मुझसे आप, मैं आप पर तो बिल्कुल ही नहीं गयी। मैं आपकी तरह स्वार्थी नहीं हूँ। मैं आपकी बेटी नहीं हूँ। मैं सिर्फ अपनी माँ की बेटी हूँ।
हाँ बेटा! जानता हूँ कि तुम मुझसे बेहद नाराज हो, बेटा मुझे माफ कर दो। साकेत ने गम्भीर स्वर से कहा।
किस बात की माफ़ी चाहिए आपको, आप मुझे और मेरी माँ को लावारिस छोड़कर चले गये, या इस बात की कि आज बीस साल बाद आपको हमारी याद आयी।
मेरी गलती बहुत बड़ी थी बेटा! पर तुम मुझे माफ कर दो। कहते-कहते साकेत का स्वर कातर हो गया।
हमने तो बीस साल पहले ही आपको माफ कर दिया था, और दूसरी बार जब माफ किया था जब आपके भेजे पैसे लौटाये थे। अब क्या माफी माँगते हैं आप हमसे? मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि आप मुझे और मेरी माँ को माफ कर दीजिए और लौट जाइये। हम अपनी इसी जिन्दगी से बहुत खुश हैं। चले जाइये आप हमारी जिन्दगी से। आप हमारे लिए मर चुके हैं।
दिशा!!' चीखते हुए सुधा ने दिशा को एक चाँटा मार दिया दिमाग खराब है तुम्हारा? जो जी में आये, बोले जा रही हो! अपने पापा से ऐसे बात कर रही हो और वे बार-बार माफी माँग रहे हैं फिर भी?
माँ मैं आपसे साफ-साफ कह रही हूँ, अगर ये यहाँ रहे तो मैं यह घर छोड़ कर चली जाऊँगी।
नहीं दिशा! बेटा तुम रहो, तुम यही रहो। मुझे वास्तव में इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।
सुधा ने बीच में ही कहा - आप भी दिशा की बात को दिल से लगा रहे हैं।
नहीं सुधा! दिशा ठीक कहती है। मैंने स्वार्थवश तुम दोनों को बहुत दुख दिये हैं। आज जब कविता इस दुनिया में नहीं है तो मैं चला आया। मैं स्वार्थी तो हूँ ही सुधा। मैंने सिर्फ अपने विषय में ही सोचा, कहते-कहते साकेत का स्वर भर्रा गया। और वह बाहर चला गया। अतीत की एक-एक घटना चलचित्र की तरह उसके मनःपटल पर आ रही थी। नन्ही दिशा और सुधा को बेसहारा छोड़कर वह कविता के साथ अपनी नयी दुनिया बसाने चला गया था। अपनी बेटी और परिवार के बारे में उसने कुछ नहीं सोचा था। उसे अपराधबोध हो गया था, मगर उसे प्रायश्चित का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ था। कदम बढ़ते जा रहे थे। मन में विचारों का द्वन्द्व चल रहा था। उसे अपने जीवन की कोई दिशा नहीं सूझ रही थी। उसके मुख से सहसा निकल पड़ा खो गयी मेरी दिशा।
साकेत इस बात से अन्जान था कि उसकी कौन-सी दिशा खो गयी-उसकी बेटी दिशा या उसके जीवन की दिशा?
या फिर दोनों? किन्तु उसके मन में यही बात बार-बार आ रही थी - खो गयी मेरी दिशा।

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