Saturday, April 19, 2008

पाप

कवि कुलवंत सिंह
कितने पाप धरा ने देखे,
आदिकाल से गिनकर लेखे ।
सदियों से मानव को मानव,
शोषित बना रहा बन दानव ।

वसुधा ने सबको अपनाया,
सबके लिए इतना उपजाया ।
धनिकों ने जग को भरमाया,
दीनों को भूखा मरवाया ।

कहीं मनुज ने भंडार भरे,
और कहीं खाने को तरसे ।
मिलकर खाएं कमी न आए,
फिर भी लाखों भूखे सोएं ।

बना स्वार्थी मनुज है इतना,
धरती को भी बांटा कितना ।
कहीं कंगालों ने कर भरे,
तो भूपों ने भंडार भरे ।

प्रजा हमेशा बेहाल रही,
महलों में सदा बहार रही ।
भूपों की अमिट भू हवश ने,
झोंका सदा प्रज्ञा को रण में ।

नृशंस संहार धर्म जैसा,
कौन हुआ है रजा ऐसा ?
समूल नष्ट कर बंधु बांधव,
सिंहासन को किया न ताण्डव !

ठूंस भरी रनिवास रुपसियां,
झरोखा दर्शन करते मियां ।
इंसान बना हैवान कहीं,
बन बैठा नरभक्षी कहीं ।

अबला पर यह बल दिखलाता,
सम्मुख बलशाली भय खाता ।
पुत्र लालसा बेटी को मौत,
जन्म लिया खुद माँ की कोख ।

पैसा बना पापों का मूल,
रिश्ते नाते गया सब भूल ।
कानून न्याय को मिली है छूट,
दीनों को जी भर कर लूट ।

शासक सत्ता को जेब धरें,
जनता कातर हो विकल मरे ।
क्या अंत कहीं अन्यायों का ?
धरा से अनगिनत पापों का !
****************************

No comments: