Tuesday, April 8, 2008

पोर पोर में छिपा दर्द

राजश्री खत्री
आज फिर वेदनामयी
अनुभूतियॉ विलोड़ित है
अन्तः में लहराती
इठलाती पीड़ाएं
मन की गुफाओं में
अंकुरित हो उठी
बावजूद इसके इनमें
न उमंग है न चाह है
विमुखता है, न आक्रोश है,
बस एक सन्ताप है।
टूटे सपनों की आवाज
धुंध में है, खो गयी
धूप में एक छॉव का
बचा बस, एहसास है
पोर पोर में छिपा दर्द,
आज ऊभर आया है
कॉच सी बिखर गयी मैं
बस झूठी दिलासाएं हैं

एफ-१८७०, राजाजी पुरम
लखनऊ

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