Friday, April 25, 2008

बरसात में

वीरेन्द्र जैन
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में
नोटों की बरसात में वोटों की बरसात में

कैसी बिडम्बना है भाई
सावन में आजादी आई
हरा हरा दिखता है अब तो
इनको अब हर हालात में
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में

जकड़न ढीली हो पायेगी
जब घर में गर्मी आयेगी
पूंजी ओ सामंती पल्ले
अभी जुडे हैं साथ मे
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में

इनको अभी खोलना चाहो
तो थोड़ा सा जोर लगाओ
लातों के गुरूदेव कहां
माना करते हैं बात में
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में
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