Wednesday, April 30, 2008

लफ्जों का पुल

निदा फाजली



मस्जिद का गुम्बद सूना है

मन्दिर की घंटी खामोश

जुजदानों में लिपटे

सारे आदशों को

दीमक कब की चाट चुकी है

रंग

गुलाबी

नील

पीले

कहीं नहीं है

तुम उस जानिब

मैं इस जानिब

बीच में मीलों गहरा गार

लफ्जों का पुल टूट चुका है

तुम भी तंहा

हम भी तंहा

***************************

No comments: