Saturday, April 12, 2008

प्यास हिये मैं

राजश्री खत्री
शब्द ढ़ूढते अर्थ को
अर्थ संवादों को कुरेदती,
नासुर बन वे दुख जाते॥
जिन्दगी जंग बन जाती
मैं लक्ष्य तुम योद्धा बनते
गणना विंधे तीरों की होती,
लक्ष्य भेद तुम निकल जाते॥
आशाओं का बादल आता,
शिद्दतों की प्यास लिए मैं।
ओक लगाये बैठी रहती,
प्यास बादल में सिमट जाती॥
स्थितियों से सौदा करती,
हादसों के नाग है डसते।
मेरी पहचान अलग बनती,
अश्रुकंठ अवरूद्ध करते॥
जिन्दगी जंग में टूट जाती
किन्तु शख्शियत अटूट रहती।
तृप्ति और प्यास के भॅवर मैं।
प्रश्न चिह्र बन उलझ जाती॥
जिन क्षणों को जी न पाती,
साथ उनका, छूट जाता
पर हाथ मेरे कुछ न आता,
शब्दों संवादों में मिट जाती॥

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