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वीरों का कर्तव्य

कवि कुलवंत सिंह

साहस संकल्प से साध सिद्धि
विजयी समर में शूर बुद्धि,
दृढ़ निश्चय उन्माद प्रवृद्धि
जवाला सी कर चिंतन शुद्धि ।

कायरता की पहचान भीति है
अंगार शूरता की प्रवृत्ति है,
शोषित जीवन एक विकृति है
नही मृत्यु की पुनरावृत्ति है ।

भर हुंकार प्रलय ला दो
गर्जन से अनल फैला दो,
शक्ति प्रबल भुजा भर लो
प्राणों को पावक कर लो ।

अनय विरुद्ध आवाज उठा दो
स्वर उन्माद घोष बना दो,
शीश भले निछावर कर दो
आंच आन पर आने न दो ।

जीवन में हो मरु तपन
सीने में धधकती अगन,
लक्ष्य हो असीम गगन
कंपित हो जग देख लगन ।

श्रृंगार सृष्टि करती वीरों का
पथ प्रकृति संवारती वीरों का,
आहुति अनल निश्चय वीरों का
शत्रु संहार धर्म वीरों का ।

चट्टानों सा मन दृढ़ कर लो
तन बलिष्ठ सुदृढ़ कर लो,
निर्भयता का वरण कर लो
उन्माद शूरता को कर लो ।

तपन सूर्य की वश कर लो
प्रचण्ड प्रदाह हृदय धर लो,
तूफानों को संग कर लो
शौर्य प्रबल अजेय धर लो ।

गगन भेदी रण शंख बजा दो
वज्र को तुम चूर बना दो,
विजय दुंदुभि स्वर लहरा दो
श्रेय ध्वजा व्योम फहरा दो ।

रोष, दंभ वीरों को वर्जित
करुणा, विनय वीरों को शोभित,
दीन, कातर हों कभी न शोषित
सत्य, न्याय से रहो सुशोभित ।
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