Monday, April 14, 2008

सबक

सी.आर.राजश्री
एक गरीब लडका माँ की मदद करने के उद्देश्य से दूसरे शहर नौकरी ढूँढ़ने गया। पिता के देहान्त के बाद माँ ने उसकी कई मुश्किलों का सामना करके परवरिश की थी। अब दीपू की बारी थी। वह माँ को आराम की जिन्दगी देना चाहता था। वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। फिर भी शहर में नौकरी की उम्मीद में निकल पडा। माँ ने बहुत समझाया कि अजान शहर में नौकरी परन्तु वह एक न माना। तलाशना मुश्किल है। माँ को साँत्वना देकर वह निकल पडा। शहर में वह पूरा दिन नौकरी की तलाश में घूमता-फिरता रहा पर शहर में नौकरी मिलना कोई आसान बात थोडे है? भूखा-प्यासा, थका माँदा वह एक बडे घर के नौकरी की उम्मीद लेकर गया। मकान मालिक सहृदय जान पडता था। उसने उसे झट नौकरी दे दी। रोज सुबह वह उठता उसे अच्छा खिलाया जाता, छोटा-मोटा काम करके वह रात को भरपेट खाकर सो जाता। महीने की पहली तारीख को उसे १००० रु भी मिल जाते। इसी तरह महीने गुजरते गये। वह पैसों को बचाता रहा। वह मालिक से और काम माँगता पर मालिक कहता, अभी समय है, समय आने पर मैं तुम्हें उचित काम दूँगा। तब तक तुम आराम करो। कभी तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है। एक दिन सुबह होते ही दीपू न करते हुए सिर हिलाकर फिर चला जाता है। दीपू से मालिक ने कहा - चलो तैयार हो जाओ हमें काम पर निकलना है। दीपू खुश हुआ और मालिक के साथ चल पडा। मालिक अपने साथ भैंस की खाल, कुछ बोरे और तीन गधे भी लेता गया। काम की उत्सुकता दीपू को बेचैन किये जा रही थी। चलते चलते दोनों घर से बहुत दूर पहाडी क्षेत्र में पहुँचे। मालिक ने भैंस की खाल बिछाई और दीपू को उस पर लेटने के लिए कहा। दीपू के लेटते ही उसने तुरन्त उस खाल के आरे-छोर को कम कर बाँध दिया। दीपू को कुछ समझ में नहीं आया। तभी एक बहुत बडी गिद्ध उसे भैंस समझकर उठाकर उडने लगा। पहाड के शिखर पर पहुँचते ही गाँठ ढीली पडने के कारण दीपू खाल के बाहर आ गया। दीपू को देखकर गिद्ध उड़ गया। शिखर के ऊपर पहुँचकर उसने मालिक से पूछा - क्या बात है? आपने मुझे इस तरह क्यों बाँधा? आपको क्या चाहिए? यहाँ भला क्या काम हो सकता है?
मालिक ने कहा दीपू जरा दाई और मुडकर देखो और वहाँ पड़े रत्नों को नीचे फैलते जाओ। दीपू ने फिर पूछा वो तो किसका है - घबराओं मत मैं बाताऊँगा - पहले उन रत्नों की नीचे फेंकते जाओ - दीपू दाई ओर मुडकर रत्नों को फैंकता गया तीन-चार बेरी भर जाने पर मालिक चलता बना। दीपू ने फिर पूछा - जरा बाई ओर मुडकर देखो दीपू ने वैसे ही किया। वहाँ पड़े हड्डियों के ढेर को देखकर दीपू भयभीत हो गया। मालिक ने कहा - अच्छा अब मैं चलता हूँ - तुम्हें मौत मुबारक बन। अब दीपू को मालिक की चाल समझ में आई। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था - क्या किया जाये? उसे लगा अब बुरे फँसे गिद्धों के झुण्ड को आते देखकर उसने कुछ नहीं सोचा - बस नीचे कूद गया फिर उसे कुछ याद नहीं उसे बेहोश पाकर उसे अपने शिविर ले गये। उनकी सेवा और चिकित्सा के फलस्वरूप उसे पूरे एक महीने के बाद होश आया। होश आते ही उसे गत बातें याद आ गई। वह झर से उठ कर बैठ गया। गिरी वासी उसे होश में देखकर बहुत खुश हुए। उसकी सेहत का ख्याल रखते हुए थोडे दिन उन्होंने उसे वहाँ रहने के लिए कहा। धीरे धीरे वह संभलता गया और बिलकुल ठीक हो गया। इन दिनों में बेहोशी के कारण वह काफी क्षीण हो गया था। आइने के सामने खुद को भी नहीं पहचान पा रहा था। उसे एक तरकीब सूझी अपने प्रति हुए अपमान का वह बदला लेकर उस मालिक को वह सबक सिखाना चाहता था।
थोडे दिन बाद वह उसी मालिक से काम माँगने गया। दीपू ने अपना नाम बदल लिया और कहा - मैं बहुत मुसीबत में हूँ। कृपया मेरी मदद कीजिए। मालिक को बिलकुल भी पता नहीं चला कि वह दीपू है। उनको आवाज से थोड़ा शक हुआ फिर भी मन में सोचा, दीपू को पक्का भर गया होगा। इतनी ऊँचाई पर से थोडी कोई बच सकता है? मन को दिलासा देकर मालिक उसे नौकरी पर रख लिया। दिन गुजरते गए। फिर एक दिन अचानक उसी तरह मालिक उस लडके से कुछ बोरे, तीन गधे ओर भैंस की खाल लेने को कहा। सब चीजों को लेकर दोनों उसी पहाड़ी के नीचे आए। मालिक ने पहले की तरह खाल बिछाई और उस लडके से लेटने केलिए कहा। उस लडके ने विनम्रता से कहा - मालिक मुझे आपकी बात समझ में नहीं आया। क्या आप मुझे लेट कर बता सकते हैं। मालिक उस खाल पर लेट गया। मौका देखकर उस लडके ने दोनों छोट को कस कर बाँध दिया। मालिक उस भैंस के खाल में ही रह गया फिर उसी प्रकार एक बड़ा सा गिद्ध भैंस समझकर उड चला। पर्वत की चोटी पर पहुँचकर, गाँठ ढीली होने के कारण मालिक खाल के बाहर निकल आया। गिद्ध डरनकर अपने को पहाड की चोटी पर पा कर मालिक डर गया। उसे आशचर्य हुआ कि लडके तुम्हारी ये मजाल, मुझसे दगा करते हो। मालिक आपको शायद पता नहीं चला, मैं ही दीपू हूँ। मालिक ने कहा - दीपू! चिल्लाइए मत! अब आप उन रत्नों को नीचे फेंकते जाइए, मैं आपको बचने का रास्ता बताऊँगा। आपको मुझपर विश्वास अवश्य करना होगा। एक बार जब आपने मुझे इसी चोटी पर छोड़ा तो मैं बच कर निकल आया। हाँ ये तो सच है - मालिक ने कहा फिर आप क्यों घबरो हैं। मैं जरूर आपको बचने की तरकीब बताऊँगा। चलिए! गरदी उन रत्नों को नीचे फेंकिए। मालिक को अब मजबूरन दीपू की बात माननी पड़ी। वे एक एक करके उन रत्नों को नीचे फेंकने लगे। दीपू ने तीन बोरियों में उन्हें भर कर गधा लेकर चलते बना। मालिक ने पूछा - अरे छोकरे - मुझे बचने की तरकीब तो बताओ। अब आप भी जरा बाई ओर देखिए और हो सके तो आप खुद बचकर निकल आइए। मैं तो आपको सबक सिखाना चाहता था। न जाने अपने कितनों के साथ यह हरकत की होगी। फिर किसी को अब आप इस तरह मूर्ख नहीं बना सकते। कहकर दीपू चलता बना। दूर गिद्धों की झुंण्ड पर उड़ते हुए आ रहे थे। मालिक डरते सहमते वहीं पत्थर की बुत बना खडा रहा।
तो बच्चों इस कहानी की पहली शिक्षा तो ये है कि अनजान जगह में नौकरी अनजान लोगों के बीच आसपास में अगल-बगल में करनी चाहिए।
दूसरी यदि तुम किसी को धोखा दोगे या किसी का बुरा चाहोगे तो तुम भी धोखा देने वाला भी कोई होगा।
हर हाल में हमें अपना हिम्मत कभी नहीं खोनी चाहिए। सूझ-बूझ, धैर्य और साहस रूपी औजार से हर मुसीबत को आसानी से ... जा सकता है। है ना!! धीरज धरिए !!!!!!!!!

कोयंबत्तूर के सूर्यन एफ.एम. ९३.५ पर सुबह कही गई तमिल कथा का हिन्दी अनुवाद
सी.आर.राजश्री

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