Monday, April 7, 2008

बचपन में दीवाली के दिए न चुराए होते तो मैं अफ़सानानिगार न होता! इंतिज़ार हुसेन

प्रेम कुमार
ए०एम०यू० के उर्दू विभाग ने कहानी पर एक सेमिनार आयोजित किया था। सार्क देशों के कई ख्यातनाम साहित्यकार उसमें भाग लेने आए थे और भी कई बड़े नाम उन तीन दिनों में अलीगढ़ में थे, पर उनकी वह व्यस्तता और लोकप्रियता-ग़ज़ल! एक-एक दिन में कई-कई कार्यक्रम, मिलने, बात करने, ऑटोग्राफ़ लेने के लिए ललकते-लपकते लोग, जब जहाँ देखो, वे भीड़ में घिरे खड़े हैं, मुश्किल से दो घंटे का समय मिला, वह भी सुबह एकदम जल्दी, वह उतना कम समय, वे तरह-तरह की रुकावटें और उस पर वह जल्दबाज़ी, उतने चैन से तो बैठ ही नहीं पाए थे तब भी वे यूनिवर्सिर्टी के न्यू गेस्ट हाउस पहुँचा तो दो लोग पहले से उपस्थित थे, परिचय मिला - 'आप यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाते हैं... और आप इनकी पत्नी हैं... राजनीति का काम करती हैं,' उन तीनों की बातचीत को मैं चुप बैठा सुन रहा था, पति-पत्नी बेहद श्रद्धाभाव के साथ उनसे प्रश्न कर रहे थे, उनकी तारीफ़ कर रहे थे, जी, मैं पाकिस्तान के प्रख्यात लेखक इंतिज़ार हुसैन साहब की बात कर रहा हूँ, दरमियाना क़द, गोरा रंग, आकर्षक-सुव्यवस्थित वेश-सफ़ारी सूट की सी दो जेबों वाली शर्ट सौम्य, लुभावना व्यक्तित्त्व! श्वेत केश! बालों ने आगे से ग़ायब होकर मस्तक को और चौड़ा, चिकन्त, चमकदार बना दिया है। सीधे-से, सादे-से शांत-गंभीर से, अल्पभाषी! बातों के बीच के उनके कुछ वाक्यों को चुप-चुप लिखता मैं उनके मन की धरती पर खिंची किसी ऐसी रेखा को तलाश रहा था जो उन्हें हिन्दोस्तान और पाकिस्तान में अलग-अलग बाँट कर दिखा सके, पर नहीं लकीर तो नहीं ढूँढ पाया, चुप बैठा उनके बोले शब्दों को ज़रूर टीपता रहा - 'वजह ये कि मैंने संस्कृत का वह सब अंग्रेज़ी तर्जुमे से किया-पढ़ा इसलिए इस तरह की ग़लतियाँ हुईं... हाँ, जैसे 'धवल' हुआ, मार्कण्डेय को मैं समझ ही नहीं पाया कि वे ऋषि थे। कभी कुछ पढ़ा, कभी कुछ। न जाने क्या-क्या पढ़ा-जाना। फिर गोपीचंद नारंग से डिस्कस किया, तब समझ आया कि वह मार्कण्डेय हैं...!' महिला ने पूछा है - 'आपने कितने पाकिस्तान पढ़ा है?' तुरंत कहा गया - 'उसमें हिस्ट्री है, हिस्ट्री को नॉवेल बनाना होता है। तब बात बनती है। फ़िक्शन नहीं बना तो बात नहीं बनेगी, आप हिस्ट्र नहीं, नॉवेल लिख रहे हैं... हाँ, कुर्तुल के 'आग का दरिया' ने बहुत लोगों को खऱाब किया, लोग हिस्ट्री लिखने की ओर भागे, पर वही दिक्क़त-उसे नॉवेल के फ़िक्शन के इंडियम में बदल पाना बहुतों के लिए मुश्किल हो गया...'
मुझे खला कि मेरे समय में कमी हो रही है, असजग वे भी नहीं थे। बातों के बहाव में जैसे एक बंध लगाया था उन्होंने, मुझे लिखते देखा तो पूछा - 'क्या आप मेरे कहे को नक़ल कर रहे हैं?' सावधान, चौकन्ने-से दिखे। अब आगंतुकों से कल की डिबाई-यात्रा की बात हो रही है - 'हाँ, ये - प्रेमकुमार और असग़र वसाहत गए थे मेरे साथ। इन्हीं की वजह से देख पाया। हाँ, पहले गया था अबुल कलाम क़ासमी के साथ, पर समझ ही नहीं आया कि हमारा घर कहाँ था! इधर-से-उधर चक्कर काटते रहे, सब कुछ बदल गया था, क़ासमी ने कहा-किसी से पूछ लें, समझ नहीं आया कि अपने घर का पता मैं कैसे पूछूँ, किससे पूछूँ?... हाँ, बिना देखे लौट आया था तब... अब इनके साथ गया... वो मकान देखा, बँटवारे के पहले जिन्होंने वो मकान खऱीदा था उनके बच्चों से मिला...! क्या कहूँ...?' बहुत गदगद, बेहद भावुक।
सम्मान में झुके-झुके, इस मुलाक़ात को अपनी ख़ुश कि़स्मती बताकर वे लोग जा चुके थे। एकदम शांत, ख़ास-सी एक मनःस्थिति में बैठे थे इंतिज़ार साहब। मैंने डिबाई, हापुड़, मेरठ, लाहौर का ज़िक्र चलाया। सवाल सुनकर रुके, कुछ सोचते-से लगे और फिर जैसे वे आहिस्ता-आहिस्ता अपनी किसी पुरानी किताब के पन्ने पलट रहे थे - 'डिबाई से हमारी फ़ैमिली हापुड़ गई। वहीं तालीम हुई। एम०ए० मेरठ में किया। जी, छह-सात साल रहा वहाँ। एम०ए० करते ही सैंतालीस के आखिऱ में मैं मेरठ से लाहौर चला गया। लगा क्या था - बस मायूस था। लाहौर देखकर यही सोचा था - यही शहर है - यहीं कहीं बस जाएंगे। नहीं, सोचने की वो उम्र नहीं थी। किसी ने कुछ नहीं सोचा, हमारे लीडरों ने भी तो कुछ नहीं सोचा। यू०पी० के लीडरों का कुछ तसव्वुर ही नहीं था कि इस तक़्सीम के क्या पर्सेप्शंस हैं। सो चले गए हम-बकामिए होशोहवास! जब फ़सादात थम गए - लोग भी आए। हाँ, जैसे जोश साहब! अब अगर मैं एनेलाइज़ करना चाहूँ तो नहीं कर सकता कि क्यों गया था! बड़े-बड़े दिलचस्प वाकि़आत हुए थे। तब मुस्लिम लीग का एक डेलीगेशन लेकर गए थे लियाक़त अली, जिन्ना वग़ैरह हिन्दोस्तानी मुसलमानों की तरफ़ से और देखिए कि चौधरी ख़लीकुर्रहमान वहीं पर रह गए थे तब...
मेरे साथ की वो घटना... यही कि तब में मेरठ में था। माइग्रेट नहीं किया था। मैं जहाँ था, उस मुहल्ले में रोज़ मकान ख़ाली होते जा रहे थे। जब कोई ख़ानदान जाता तो लोग डिमॉरेलाइज़ होते। एक मायूसी का अहसास - जैसे वो घबराए, परेशान हों, जैसे मुहल्ले उजड़ रहे हों... ये मुझे बहुत हांट करता था...' उनकी आँखें जैसे उस जगह, उस काल में जा पहुँची थीं। उस मायूसी के चंद क़तरे जैसे उनके चेहरे पर आ चिपके थे - 'मैंने इस फ़िनोमिना को रिकॉर्ड करने की कोशिश की थी, जिससे कहानी बनी 'कयूमा की दुकान', जब मैं अड़तालीस में लाहौर गया तो 'अदबे लतीफ़' शाए' हुई,' मायूसी के वे क़तरे अब बिला गए थे। चेहरे पर रौशन-रौशन एक ख़ुशी आ बिराजी थी - 'नहीं, लिखी वह मेरठ में थी। लाहौर में अदबी दुनिया से राबिता हो चुका था, यह कहानी मैंने वहाँ पढ़कर सुनाई थी, बड़ी दाद मिली। उस ज़माने में यहाँ या वहाँ जो भी कहानी लिखी जाती थी,उसमें पार्टीशन का ज़िक्र होता था। इस कहानी में सोशल वीरानी-तब्दीली का ज़िक्र ज्य़ादा है, वहाँ केवल फ़साद का ज़िक्र नहीं है। वहाँ जो अच्छे लिखने वाले मेरे सीनियर्स थे। उनसे मुझे दाद मिली। वहाँ से मुझे हौसला हुआ कि मैं कहानी लिख सकता हूँ।
नॉवेल - ५४-५५ में 'चाँद गहन', फिर उसके बाद नॉवेल लिखने का इरादा दिमाग़ से निकल गया। ७०-७१ में नॉवेल लिखने को फिर क़लम उठाया। वो समय था, जब मशरिक़ी पाकिस्तान में सिविल वार क्राइसिस थी। फिर बांगला देश बना। उन दिनों मेरे ज़ेह्‌न पर १९४७ फिर ज़िंदा हो गया। '४७ के दौर के, उस हिस्से के वाकि़आत मुझे १९७१ से मिलते नज़र आए। उस क़ैफ़ियत में यह नॉवेल शुरू किया। बीच में छोड़ दिया। हाँ, चूँकि कहानी की तरफ़ ज्य़ादा रुचि थी। छोड़ दिया - फिर शुरू किया। जी, 'बस्ती' जिसका नाम है।
क्यों, कैसे-क्या कहूँ? बस्ती, जिसमें मैं पैदा हुआ - ज्य़ादा हांट करती थी। ख़्वाबों में आती थी, हिन्दोस्तान - यहाँ के कि़ससे कहानी, जातक कथाएँ...! अमल यूँर शुरू हुआ - जब मैं पाकिस्तान में था तो सैंतालीस की ज़िंदगी मेरा पास्ट बन गई थी। मैं तब उस बचपन, उस फ़िज़ा को याद करता था, जहाँ आँख खोली, जहाँ तालीम ली-इतना-सा, छोटा-सा माज़ी था यहाँ मेरा, हम जब माज़ी में पहुँच गए तो पीछे की तरफ़ सफ़र पहुँच गया। तब किसी ने पूछा था - कहानी में आपको कौन राइटर इंस्पायर करता है? उस ज़माने में लोग इस सवाल पर फ़ौरन चेख़ब, गोर्की, मापासां, लॉरेंस आदि का नाम ले देते थे, पर मुझे रौ आई - मैंने कह दिया कि मैंने तो अपनी नानी अम्मा से कहानी लिखना सीखी। खूब मज़ाक उड़ी मेरी। फिर सोचा कि यह क्यों कहा मैंने, तब बचपन में उनसे सुनी कहानियाँ याद कीं। तब लगा कि इनमें से कुछ का तो अलिफ़-लैला में है, कुछ के बारे में शक हुआ कि इसका सोर्स 'महाभारत' में है, फिर मुझे ख्य़ाल हुआ कि मुझे फ़िक्शन की इस रवायत से आशनाई होनी चाहिए। उन्हें पढ़ा तो उनके जादू का अहसास हुआ। लगा कि नए कि़स्म का जादू है। सोचा कि मुझे इसमें दाख़िल होना चाहिए। लाइब्रेरी गया तो देखा कि वहाँ 'महाभारत' का वॉल्यूम रखा है। पढ़ा-पकड़ लिया उसने। अरे-अब तक जो ख़लासे पढ़े थे 'महाभारत' के वो नहीं 'महाभारत' तो ये है। फिर सारे वॉल्यूम देखे, फिर सफ़र शुरू किया, पूरा समय लगाया। पूरा सफ़र करके लगा कि मैंने बहुत सफ़र पूरा किया है...।'
अजीब-सी ख़ुशी है चेहरे पर। चहक भरे-से बता रहे हैं 'ऐसे डिस्कवर किया जैसे अंधे के पाँव के नीचे बटेर आ जाए। ऐसा इंस्पायर हुआ कि फिर मैंने उस रंग में कहानी लिखनी शुरू कर दी। मेरे अंदर पहले से एक बुनियाद तो मौजूद थी। जब मैं यहाँ की फ़िज़ा को याद करता तो होली, दीवाली-सब याद आते। ये क्यों मनाई जाती है? इनकी अस्ल क्या है? इन त्यौहारों के बारे में पढ़ने की दिलचस्पी हुई और इस तरह हिन्दू माइथोलॉजी में मेरा दाख़िला होता चला और फिर आपने डिबाई वाला मेरा वो द्घर तो देखा है न - मुहल्ला शेख़ान, मुहल्ला शेख़ान में उस द्घर की अजीब पोजीशन थी! इर्द-गिर्दर सब हिन्दुओं के मुहल्ले। दाएं-बाएं, पीछे-सब तरफ़ उनकी आबादी, सारी छतें मिली हुईं! दीवाली पर मुँडेरों पर जो दिए जलते थे, वो मुँडेर हमारी भी, उनकी भी, मैं चाहता कि दिए चुरा लूँ, ख़ूब दिए चुराए! जब आसपास कोई नहीं होता था तो दिए बुझाकर रख लेता था...' ज़ोर की आवाज़ के साथ उनका पहला ठहाका सुनाई दिया है। हाथों के इशारे, आँखों का इधर-उधर चौकन्ने होकर देखना - जैसे इस समय भी वे अतीत के उन दीपकों में से कुछ को चुराकर मुझे दिखाना चाह रहे थे। बड़ी प्यारी, पवित्र-सी श्वेत-श्वेत मुस्कान थी होठों पर - 'घर के पीछे मंदिर। सुबह आँखें खुलतीं तो आरती की आवाज़ें...! सारी फ़िज़ा तसव्वुर में बसी हुई थी।
छुटकारा? छुटकारा आख़िर क्यों, कैस-किससे? इसमें तो मैंने आँखें खोलीं, होश संभाला है। ठीक है, पाकिस्तान से मेरी वाबस्तगी है - इसमें कोई क्लैश नहीं है। बाज़ लोग कहते हैं कि तुम मुसलमान नहीं रहे - या पाकिस्तानी नहीं हो। मैं रिलीजियस आदमी हूँ इसलिए मेरा अपने रूहानी सिलसिले में फ़ेथ है। अतः ये भी अपील करता है, जो मज़हब में विश्वास नहीं करता - उसे न ये अपील करेगा, न वो अपील करेगा,' आवेश मिले-से होते जा रहे हैं शब्द! जल्दी ही संभले भी हैं फौरन - 'उतराज़ात होते रहते हैं! ये भी ज़िन्दगी का एक हिस्सा है। लोग कहते हैं - यह हिन्दोस्तानी ज़मीन से बाहर ही नहीं निकला। मेरा जवाब होता है - पाकिस्तान की ज़मीन का यह मतलब नहीं कि जहाँ जन्मा, उसे फ़रामोश कर दूँ! वो अपनी जगह, ये अपनी जगह, या फिर कहा जाता है कि ये पाकिस्तान के हुए ही नहीं हैं - इन कहानियों का मतलब ये कि इसने पाकिस्तान को क़बूल नहीं किया। मैं कहता हूँ - पाकिस्तान मेरा नया वतन है। पंजाब की ज़मीन पर रहता हूँ। वहाँ को जानता नहीं। आप यदि उम्मीद कर रहे हैं कि मैं बलवंत सिंह की कि़स्म का अफ़साना लिखूँ - तो वह उनका हिस्सा है - उन्होंने कंसीव किया है वह सब!'
छटपटाहट की-सी एक लकीर खिंची है चेहरे पर! लकीर क्या दिखी कि विषय बदले जाने की-सी ज़रूरत लगी - 'लिखने के लिए क्या किसी ख़ास मूड, स्थान या वस्तु की आवश्यकता अनुभव होती है आपको?'
'देखिए, मेरा लगा-बँधा तरीक़ा नहीं है लिखने का। कहानी आती है, दिमाग़ में पकती रहती है... और जब भी यह अहसास होता है कि आज का दिन ख़ाली है और कैफ़ियत होती है तो लिखना शुरू कर देता हूँ! नहीं, कोई ख़ास वक़्त नहीं, जब जिस वक़्त मौक़ा मिले, तय नहीं किया कि ये वक़्त है लिखने को। सुबह का वक़्त लिखने में ज़ाया नहीं करता। सुबह को तो मैं बाहर निकल जाता हूँ टहलने-वहलने...'
- टहलने के अलावा और शौक...?
- अब ज्य़ादा शौक़ रहे नहीं, एक ज़माने में हमारी यारी-दोस्तियाँ बहुत थीं। आवारागर्दी का ऐसा शौक़ कि रातों में द्घूम रहे हैं... कहीं यूँ ही बैठे हैं घंटो- घंटो । अब वो खत्म! अब तो घर में ही बैठे रहते हैं ज्य़ादातर!
- बचपन के शौक़...?
- बचपन के शौक़-गिल्ली-डंडा खेले, पतंगें ख़ूब उड़ाईं - पर लूटकर उड़ाईं, बहुत बड़ी छतें थीं हमारी वहाँ, उन पर कटकर ख़ूब पतंगें गिरती थीं। गुलैल का बड़ार शौक़ - लेकिन परिंदा कोई नहीं मारा, क्योंकि निशाना था ही नहीं, निशाना साधते ही फ़ाख़्ता उड़ जाती थी...' लम्बी-सी राहत भरी एक साँस ली है - 'चलो, अच्छा ही हुआ, नहीं तो अफ़सोस होता कि मैंने परिंदा क्यों मारा...!'
- गोश्त तो आप खाते ही हैं न?
- शर्माता-शर्माता बड़ा शाकाहारी-सा संकोच का एक भाव आया है चेहरे पर - 'अब क्या करें - यह तो हमारी ग़िज़ा रहै। इसके मुताल्लिक़ कभी अहसास नहीं हुआ। यह तो अमल में चला आ रहा है कि हम एक-दूसरे को खाते हैं... नहीं, मैंने जो जातक कथाएँ पढ़ीं, उनसे यह कि हमने तय कर रखा है कि इंसान सबसे बड़ा है। हमारा यह तसव्वुर है कि अशरफ़-उल-मख़्लूक़ात-मैन इज़ गॉड ऑफ़ ऑल क्रिएचर्स - इसमें ये कि आदमी सबसे सुपीरियर! जातक कथा से लगता है कि आदमी अलग नहीं - उन्हीं मख़्लूक़ात में रूला-मिला है। कभी बंदर, कभी चिड़िया-कुछ भी बन सकता है। तरह-तरह के रूप धर सकता है। जातक कथाएँ कहती हैं कि परिंदा-दरिंदा सब एक, सब एक बिरादरी, सारे प्राणियों से अलग करके नहीं देखता मैं भी...!
बेआवाज़ चलकर हिचकते-हिचकते-से शहरयार साहब पास आ खड़े हुए हैं। 'हमें बातचीत करते देखा तो रोकते-रोकते भी तुरंत लौट पड़े हैं - ठीक है, ठीक है - दस बजे सेमिनार में तो आ ही रहे हैं...!' शहरयार साहब के जाते ही वे फिर जहाँ बात रुकी थी, वहीं पहुँच गए हैं - 'मुझे ये अच्छा नहीं लगता कि ये शिकारी परिंदों को क्यों मारते हैं! मैं कोई परिंदा पालता भी नहीं, अच्छा नहीं लगता कि उन्हें पिंजड़े में बंद रखूँ, आज़ाद परिंदे को क़ैद करना मुझे बहुत बुरी बात लगती है। बहिन थी - उसने तोता पाला था - पर मैंने नहीं...'
मैंने चर्चा को फिर से कहानी की ओर मोड़ना चाहा था - 'लेखन की इतनी लम्बी उम्र के इस मोड़ पर आप कहानी को कैसे, क्या कहकर समझाना चाहेंगे?'
- मैं नहीं बता सकता, वो एक नक्क़़ाद बता सकता है, एक टीचर बता सकता है। यदि रायटर को यह मालूम हो जाए कि कहानी क्या होती है तो वो कहानी नहीं लिख सकेगा, इसलिए नक्क़़ाद कहानी लिखने में कमज़ोर होते हैं।
- अच्छा, कहानी लिखने की अपनी प्रक्रिया तो आप...?
- इसके मुताल्लिक़ - ये कि मेरे जे़ह्‌न में कहानी कैसे आ जाती है मुझे नहीं पता, पूरे प्रोसिस को एनेलाइज़ नहीं कर सकता। मैं चीज़ों को देखता हूँ - आइडिया आता है - लिखता हूँ। पर पूरे प्रोसिस को एनेलाइज़ नहीं कर सकता, नहीं, कंटेंट और फ़ॉर्म को आप अलेहदा नहीं कर सकते। या जो ज़बान हम इस्तेमाल करते हैं, उसे भी तो मैं समझता हूँ कि इस तरह डिवीज़न नहीं कर सकते। ये सब मिला-जुला होता है। जब मैं कहानी सोचता हूँ तो वो अपना एक्सप्रेशन साथ लाती है। जातक कथाओं पर आधारित कहानियों का लहजा, उनकी ज़बान अलग है। जब मैंने भिक्षुओं के मुताबिक़ सोचा-उनका बोलना; सोचना-जो मेरे तसव्वु में था, आ गया! 'पत्ते' या 'कछुए' जातक कथाओं के हवाले से लिखी हैं - इसलिए उनमें वो लहजा आया। 'हिकायतें' या 'ज़र्द कुत्ता' - उनके सोचने का तरीक़ा अलग, वो एक्सप्रेशन अलग - उनमें सूफ़ियों वाला लहजा... नहीं ज्य़ादा ड्राफ़्ट नहीं, एक ही ड्राफ्ट में मैं काट-पीट करता रहता हूँ। मैं लेज़ी हूँ लिखने के मामले में। कोशिश करता हूँ कि दोबारा न लिखना पड़े, पर लिखनी पड़ती है कभी-कभी दोबारा भी कहानी...!
- ख़ास-सा वह कोइ भाव, कोई रिश्ता जो आपसे कहानी लिखवाता रहता है?
- रिश्ता-वो जो मेरा अपने बचपन से है - जो बस्ती में गुज़ारा है - वो रिश्ता अब तक चल रहा है - वो ज़िंदा है। मौज़ू कोई हो-वो ही कहानियाँ लिखवाता है मुझसे...!' बेहतरीन-से एक बचपन की, बेहद मीठी-सुरीली-सी, अनक बच्ची-बच्ची आहटों के नटखटपन की, ढेर-ढेर आवाज़ें देर तक सुनाई देती रही थीं तब।
- क्या न होता कि आप अफ़सानानिगार न होते?
बड़ी दुर्लभ, दिव्य-सी मुस्कान तिर रही है होठों पर, चेहरे की गोराई गुलाबी-गुलाबी-सी हो चली है क्षण भर को - 'मैं अफ़सानानिगार न होता अगर अपने बचपन में दीवाली के दिए न चुराए होते मैंने-तो इस कि़स्म का अफ़सानानिगार न होता।'
सग़ीर इफ्राहीम कुछ किताबों के साथ आए हैं, सहमे-से बहुत अदब के साथ किताबें इंतिज़ार साहब को देकर तुरंत वापस लौट गए हैं। पता नहीं उस बीच यकायक क्या सूझा कि मैं इंतिज़ार साहब से पूछ बैठा - 'लेखन के इस मुक़ाम पर आकर क्या कभी नोबेल प्राइज़ पाने का भी ख्य़ाल आता है मन में?'
थोड़ा असहज से दिखे। हड़बड़ाए-अचकचाए-से बोले - 'नहीं, नहीं-मैं तो उस मुक़ाम पर हूँ ही नहीं कि मेरा नाम जाए। हमारे यहाँ से केवल एक नाम-फ़ैज़ साहब का नाम गया था। वो भी नोमीनेशन की मंज़िल तक रह गया। हिन्दोस्तान के साथ तो यही रहा है कि जो अंग्रेज़ी में लिख रहा है। वो नाम कमा रहा है, पर क़ौमी ज़बान पीछे है। उर्दू तो पिट गई, पर हिन्दी भी पीछे है यहाँ!'
- पाकिस्तान में हिन्दी का हाल क्या है? भाषाओं के लिहाज़ से आप यहाँ-वहाँ में क्या अंतर पाते हैं?
- वहाँ - हिन्दी के तर्जुमे बहुत हो रहे हैं पाकिस्तान में। इन दोनों भाषाओं में तर्जुमे का मसला नहीं - बस स्क्रिप्ट को बदलना होता है। उर्दू का देखिए - एक तो यह कि सैंतालीस तक उर्दू की एक रवायत थी। उर्दू - जैसे पाकिस्तान में चली - रफ़्ता-रफ़्ता फ़र्क़ पैदा हुआ, क्यों? पाकिस्तान बनने के बाद सारा नक़्शा बदल गया। हम मिक्स सोसायटी में रहते थे - पर वहाँ-लाहौर-पंजाब में कहीं पता नहीं चलता था कि कोई हिन्दू है। सिखों का जो हिस्सा था, वो भी गए। जब सोशल ख़साइस लिखी जाएंगी तो वो हिन्दोस्तान से भिन्न होंगी, वहाँ जुम्हूरियत में ब्रेक्स आते रहे, वहाँ के लोग मार्शल लॉ और सिविलियन गवर्नमेंट के दरमियान डाँवाडोल रहे, इससे भी एक फ़कऱ् पैदा हो गया, एक और रुझान भी था - पाकिस्तान बनने के बाद वहाँ मुसलमानों को मुसलमान होने का ज्य़ादा शिद्दत से अहसास हुआ। इस्लाम के प्रति एम्फेसिस बढ़ गया। यहाँ का आइडिया था सेक्यूलर इंडिया-और हमारा था कि इस्लामी निज़ाम क़ायम किया जाये, तो ये आइडियाज़ मुख्तलिफ़ हो गए। इसके असरात अदब पर आर्ट पर पड़े।'
पता नहीं प्यास उन्हें भी लगी थी या फिर मेरा ख़याल किया था - द्घंटी बजाई, एक आदमी आया तो पानी लाने को कहा गया। याद दिलाया - 'बिसलरी लाना - हाँ, वो बीमार हो गए इस पानी को पीकर!' यकायक बंद पंखे की ओर देखा - 'आपको गर्मी लग रही होगी...! कहा तो था पर ठीक करने नहीं आया अभी कोई, हमें तो सारा समय बाहर रहना होता है। इधर इस लॉबी में बैठना हुआ ही नहीं...' उन्हें घड़ी देखते देखा तो डरा कि कहीं दस ही बजने वाले न हों। कहीं वे सेमिनार में जाने के लिए उठ ही खड़े न हों, ऐसा कुछ न दिखा तो राहत की एक साँस ली। बचे समय में उनसे अधिकतम सुन लेने की हड़बड़ी में एकदम से सूझा ही नहीं कि क्या पूछूँ और जब चंद पलों बाद सूझा तो ये सूझा कि पूछ बैठा - 'आपका सबसे बड़ा सुख?
जितनी देर सर खुजाया, मौन रहे - फिर फ़ौरन से पेशतर कहा गया - 'ये फ़ैसला मुश्किल है, मसलन - अब मैं याद करता हूँ - एक लम्बा ज़माना गुज़र गया। पच्चीस-तीस साल तक ये हसरत रही कि एक फेरा दिल्ली का लगा लूँ। दोस्तों से मिल लूँ या अपने वतन डिबाई को देख लूँ - वहाँ लोगों से मिल लूँ...' अजीब सुखद-सा अहसास हुआ था - वे डिबाई को अपना कह रहे थे, वतन कह रहे थे। एक-एक शब्द जैसे तोल-तोलकर, धो-माँजकर बाहर लाया जा रहा है - 'हज़रत के उर्स के बहाने ज़ायरीन में शामिल हो गया। जब मैंने औलिया के इलाक़े में क़दम रखा तो वहाँ एक इमली का पेड़ था। मेरे तसव्वुर में मेरे बचपन के सारे देखे इमली के पेड़ ज़िंदा हो गए... और मैंने उस इमली का एक पत्ता चखा... वो मेरी ज़िंदगी का सर्वाधिक ख़ुशी का क्षण था...!' सारा आस-पास बेआवाज़ हो गया था, देखा तो लगा कि जैसे उनका रोम-रोम आज फिर उस सुख को जी रहा था, पी रहा था, मैं हैरान-इतने बड़े रचनाकार की इतनी लम्बी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुख केवल यह-इतना-सा।
चुप-चुप मेरी ओर ऐसे देखा जैसे पूछना चाहा हो कि बताओ, तुम्हें कैसा लगा मेरा सुख! उत्तर देने से बचने के लिए ही शायद मैंने वह अगला प्रश्न पूछ लिया था - 'और सबसे बड़ा दुख?'
इधर-उधर ऐसे देख रहे हैं जैसे किसी दबे-ढके, गुम हुए को तलाश रहे हैं, या फिर बोलने से बचना चाह रहे हैं। चेहरे पर एक हलचल है और ओठों पर ख़ास-सा कंपन! पता नहीं कौन छटपटाहट है आँखों में कि पलक कुछ ज्य़ादा ही जल्दी-जल्दी गिरने-उठने लगे हैं - 'दुख को याद करना मुश्किल है... मतलब वो बहुत पर्सनल होता है... मुझे तो यही याद आता है कि पिछले दिनों मेरे साथ जो वाकय़ा हुआ - मेरी बेगम का इंतिक़ाल हो गया...' लम्बी-गहरी-सी एक ख़ामोशी, मैं टकटकी लगाए उनकी चुप्पी को सुन रहा हूँ। दर्द के वज़न से जैसे हज़ार-हज़ार तोलों का हो गया था एक-एक शब्द - 'सब क्रिया-कर्म करके घर में क़दम रखा तो लगा कि घर एकदम ख़ाली है... सब बदल गया... वो क्षण-बेहद दुख का था...!' उफ़, वह चुप्पी - जैसे कमरे की तमाम आवाज़ों का उसने दम ही निकाल लिया था! भरी-भरी-सी उनकी आँखें जैसे उमड़ पड़ने को व्याकुल थीं।
सावधान था फिर भी क्षण भर की किसी असावधानी ने पुछवा लिया - 'रोना आया था क्या उस क्षण?'
- शायद, उस वक़्त आया था, रोना भी अपनी जगह एक ज़रूरत है, पर मैं वैसे नहीं रोता, वैसे में गिरिया करने का क़ायल नहीं हूँ, पर-तब-शायद रोना आया था... नहीं, वो कैसे, क्या - उसे बयान नहीं किया जा सकता। एक कमी का अहसास होता है मुझे, मैं लफ़्ज़ों में बयान नहीं कर सकता,' सुनकर आश्चर्य हुआ - लफ़्ज़ों में बयान न कर पाने की बात इतना बड़ा एक रचनाकार कह रहा है - वो जो न जाने कितने-कितने, कैसे-कैसे दुखों को लफ़्ज़ों के सहारे ही बयान करता रहा है।
विषय बदलकर मैंने कमरे में आ उगे दर्द और उदासी के उस पर्वत को हिलाना-हटाना चाहा - 'और मलाल?' लम्बी-सी एक साँस ली-वो साँस जो बड़ी-सी एक थकान के बाद लेता है कोई - मलाल 'बहुत-सी चीज़ों का है, भई, यही होता है कि बचपन में बहुत से काम आदमी को कर लेने चाहिए - वो मैंने नहीं किए, बचपन रिच होना चाहिए। जैसे क्या-जैसे मैंने उस उम्र में इश्क़ नहीं किया, जिसने इश्क़ नहीं किया, उसकी ज़िंदगी में बहुत बड़ी कमी रह जाती है, मेरी में रह गई, इसका मुझे अहसास है, ज़िंदगी में सबसे बड़ा काम तो इश्क़ है और वो ही हमने नहीं किया, यानी कि ज़िंदगी का पूरा तजुबा मेरे पास नहीं है, नहीं, ऐसा नहीं है, मौक़े तो आते रहे, जज़्बाती एतबार से ज़िंदगी ख़ाली हो, ऐसा नहीं है, पर जो इश्क़ मेरे तसव्वुर में है उस तजुबे से नहीं आया कोई, क्यों नहीं - आदमी पर दीवानगी तारी तो हो! मेरी ज़िंदगी में कमी ये है कि मैं हमेशा होश में रहता हूँ। यह कमी न होती तो मुम्किन है कि मैं बेहतर लिखने वाला होता।'
- अभी आपने इश्क़ के तसव्वुर का जो...?
- अरे, छोड़िए भी! कोई तसव्वुर नहीं होता-इश्क़ एक तज्रबा है, हर आशिक यह समझता है कि मैं पहला आशिक़ हूँ, दुनिया में और जैसा इश्क़ मैंने किया है, वैसा किसी ने नहीं किया, तो ये कैफ़ियत मेरे यहाँ ज़िंदगी में कभी पैदा नहीं हुई कि मैं समझूँ कि इस धरती पर मैं पहला आशिक हूँ, जी, इश्क़ में आदमी अपनी ज़ात से बाहर निकलता है, दूसरी ज़ात में अपने आपको दरयाफ़्त करता है। आदमी की ज़िंदगी में ये मौक़ा आना चाहिए कि वो अपने में से निकलकर ख़ुद को दूसरी ज़ात में दरयाफ़्त करे, सूफ़ी इस हवाले से ये कर लेते हैं। सूफ़ी का यही कमाल होता है कि ख़ुद को बड़ी ज़ात में - ख़ुद में गुम कर देता है और इस तरह वह एक नया जन्म लेता है। आशिक का तरीक़ा ये है कि वो महबूबा से आइडेंटीफाई करता है और उसके ज़रिए स्वयं को दरयाफ़्त करता है... छोटे-छोटे काम तो और भी ऐसे किए हैं कि ये न करते तो बेहतर आदमी होते, पर... हाँ... ज़िंदगी में एक कमी यह भी कि मैंने कोई बड़ा गुनाह नहीं किया। वो करना चाहिए। बहुत बड़े सवाब का काम भी नहीं किया। क्यों क्या... इसका मतलब यह है कि मेरे यहाँ एडवेंचर्स स्प्रिट नहीं है। एडवेंचर्स स्प्रिट हो तो आदमी इश्क़ भी करता है। गुनाह भी करता है। मार भी खाता है... और इसी तरह कुछ पाता है। आप देखिए-दास्तानों में है... एक शहज़ादा निकला... रास्ता भूला... उसकी जून भी बदली। ख़राबो-ख़स्ता होकर या तो वो मर - खप जाता है या वापस आता है तो एक नयी शख़्सियत होता है, ये हमारी दास्तानें बताती हैं। ओल्ड फ़िक्शन ये नसीहतें देता है। ऐसा अमल न आए तो उसकी शख़्सियत में कमी रह जाती है।'
- ऐसी कोई चाहत जिसके पूरे होने का इंतिज़ार आज भी है आपको?
- भई, ऐसी शदीद, ख़्वाहिश कोई नहीं! हमारी ज्य़ादातर ख़्वाहिशें लिखने-लिखाने से थीं। अब यहीलगता है कि जितनी सलाहियतें थीं, हमने काम कर लिया, यह अहसास भी नहीं कि मेरे पास जौहर था, ज़माने ने पहचाना नहीं, नहीं, जो किया उसका ख़ूब रिकॉग्नीशन भी मिला। फ्रस्ट्रेशन का कोई अहसास मेरे यहाँ नहीं...!' अचानक रुके तो देखा कि गुमसुम, उलझन भरे - से कुछ सोचे जा रहे हैं। एक रहस्य भरी-सी मुस्कान दिखी है ओठों पर - 'देखिए हमारे यहाँ जैसे ग़ालिब शाइर हुआ, उसके यहाँ यह फ्रस्ट्रेशन था कि मुझे पहचाना नहीं, अगला ज़माना आएगा तब लोग पहचानेंगे। मुझ जैसे लिखने वाले को इस टर्म में नहीं सोचना चाहिए... क्योंकि मैं ग़ालिब नहीं हूँ। देखिए - फ्रस्ट्रेशन की सबसे बड़ी कहानी 'कथा-सरित्सागर' से वाबस्ता है। वो शायद जिसने ये कथाएँ लिखीं, उसे ये गुमान था कि जब मेरी ये कहानी राजा को सुनाई जाएगी तो राजा मेरी क़द्र करेगा, राजा ने कहा कि ये कैसी कहानियाँ हैं - उन्हें रद्द कर दिया। पूरी पोथी लेकर वो जंगल में निकल गया। अलाव जलाया। रोता जाता और अपनी कथाओं के वरक़ आग में डालता जाता था। सब डाल दिए... एक वरक़ बच रहा। रजा बीमार हुआ। डॉक्टर बुलाए गए। इलाज बताया राजा कथा सुने। तब तलाश हुई उसकी। उसे बुलाया गया। उसने वो वरक़ सुनाया। राजा ठीक हो गया... उस कथा का एक वरक़ है बाद का बचा यह सब। आप देखिए तो जंगल के जानवरों, परिंदों को इकट्ठा कर लेता था। उन्हें सुनाता था... जला देता था! ऐसी कथाएँ वाबस्ता हैं लिखने वालों के साथ फ्रस्ट्रेशन की। हमने तो न उस दरजे का लिखा-न ऐसा फ्रस्ट्रेशन हमारी ज़िंदगी में आया।'
विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक उन्हें सेमिनार में ले जाने के लिए आ चुके थे। हम दोनों ने एक साथ दीवार पर टँगी घड़ी की ओर देखा था - 'अरे, दस-बीस हो गए! हाँ, अब बस!' चलते-चलते यकायक कल की एक शिकायत याद हो आई थी उन्हें। यूँ वह शिकायत गिरिराज किशोर जी की थी, पर उसे इंतिज़ार साहब तक पहुँचाया मैंने ही था। इसलिए शायद उत्तर भी वे मेरी मार्फ़त ही पहुँचाना चाहते थे। गिरिराज जी को यह ठीक नहीं लगा था कि इंतिज़ार हुसेन ने अपनी थोड़ा पहले की गई भारत की यात्रा के बारे में वहाँ 'डॉन' या अन्य किसी अख़बार अथवा रिसाले में नहीं लिखा। शिकायत याद आते ही चलते-चलते रुके। मेरे दायें कंधे पर अपना बायां हाथ टिकाया। प्यार भरे, बड़े दृढ़-से अंदाज़ में कहा - 'वो सब मुझे कॉलम में नहीं लिखना था। ठीक है, मैं सफ़रनामा लिखूंगा। इस सफ़र के बाद! बता दें आप गिरिराजजी को...!' क़दम फिर दरवाज़े की ओर चले हैं। कहना अब भी जारी है - 'हाँ, मैंने बहैसियत पत्रकार शुरुआत की। वहाँ से रिटायर हुआ तो 'डॉन' में कॉलम लिखने लगा! बस, और कुछ नहीं... बाक़ी-लिखना ही है बस...।

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