Thursday, April 10, 2008

मुन्ना

सी.आर.राजश्री
(शिव केड़ा की कथा पर आधारित )
मुन्ना नाम का था एक लड़का,
घर में था माँ का राज दुलारा,
था बहुत होशियार और सयाना,
चुस्त, चुलबुला पर बहुत काला।
सब दोस्त उसका मजाक उड़ाते,
कालू मुन्ना कह उसे पुकारते,
कहते कि काला रंग सब को नहीं भाता,
इसलिए तू भी हमें तनिक न सुहाता।
रंग भरे इस दुनिया में,
काला रंग माना जाता है बेरंग,
बच्चों की यह बातें सुन कर,
मुन्ना हो जाता बहुत मायूस ।
एक दिन एक गुब्बारे वाला आया,
रंग-बिरंगी गुब्बारे संग अपने लाया,
लाल, नीला, पीला, हरा, गुलाबी,
आकर्षक मनभावन थे और लुभावनी।
बच्चों की भीड वहाँ लग गई ,
सब रंग के गुब्बारे बिक गई,
जैसे-जैसे गुब्बारे होते जाते खाली,
हवा भर नए गुब्बारों की लग जाती पंक्ति।
झूम-झूम कर बच्चे सारे,
पुलकित हो जाते देख गुब्बारे,
हाथों में ले कई गुब्बारे,
छोड़ देते आसमान में, सारे।
गुब्बारे वाले के पास एक था काला गुब्बारा,
किसी ने भी नहीं लिया, किया सबने उसे अनदेखा,
पर मुन्ने को वह अच्छा लगा और उसे खरीदना चाहा,
अपनी तरह उपेक्षित उस गुब्बारे को लेने वह पहुँचा।
मुन्ने ने पूछा क्या काला गुब्बारा नहीं उडेगा?
हैरान हो गुब्बारे वाले ने प्रेम से कहा,
रंग से कुछ फरक थोड़े ही पड़ता है,
गुब्बारा तो अंदर भरी हवा के करामात से उड़ता है।
सोचा मुन्ना फिर क्यों मनुष्य को काले-गोरे से फर्क पड़ता है,
भीतर छिपी शक्ति से ही तो व्यक्तिव का विकास होता है।

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