Wednesday, April 30, 2008

कविता

वेद पी० शर्मा

भराभर दोपहरी में खींचती है रिक्शा
दो वक्त के भोजन की खातिर
समाज के सभ्रांतों की नजर घूरती है।
उसके झीने चिथड़े में ढंका शरीर नहीं
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कविता

वेद पी० शर्मा




हम नहीं बोलेगें
कड़ी मेहनत ही चीखेगी
इंतहा सहने की खत्म जब होगी
पूंजीपतियों के उद्यागों की नींव दरक रही होगी
है बात सीधी और सच
दायरे में है चिंगारी
जिस दिन भी फैलेगी
अत्याचार,शेषणता लपटों में जल रही होगी
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राजनीति

अश्फाक कादरी
नेताजी के घर पर कोहराम मचा था। उनके तीन दिन से लापता लाडले बेटे की क्षत विक्षत लाश शहर के गंदे नाले में मिली थी। नाते रिश्तेदार, कार्यकर्ता रोते बिलखते नेताजी के घर आ रहे थे, बढ़ चढ़कर अपनी पीड़ा और शोक बयान कर रहे थ, मगर नेतजी अपने ड्रांइंगरूम में पुलिस अधिकारियों के साथ सोच में डूबे थे। लाडले के हत्यारों को पता चल गया था, उसी के दोस्तों ने शराब के नशे में किसी बात पर उसे मार डाला था। मारपीट में मौत हाने पर लाश शहर के गंदे नाले में फेंक कर उसकी तलाश में उसके परिवार के साथ सहयोग में जुट गये थे। जब हत्या का राज खुलने पर पुलिस नेताजी से रिपोर्ट लिखने का आग्रह करी रही थी मगर नेताजी कोई जवाब देने के बजाय सोच में डूबे थे।

एकाएक नेताजी की आखें में चमक उभर आयी और बोले इस हत्या में आपने जिन लड़कों के नाम बताये है। उनका कोई दोष नहीं है। मेरे बेटे की हत्या में गहरी साजिश रची गयी हैं। यह मेरे राजनीतिक विरोधियों की चाल है। मेरे बेटे को मेरे प्रतिद्वन्दी नेता भैयाजी ने मरवाया है। आप उसे तत्काल गिरफ्‌तार करें।

मगर सर, गिरफ्‌तार लड़कों से पूछताछ में भैयाजी का कोई नाम सामने नहीं आया यह तो उनकी आपसी मारपीट का परिणाम है, पुलिस अधिकारी ने समझाना चाहा।

मैं कह रहा हूं कि यह मेरे राजनैतिक दुशमन भैयाजी की चाल है, अगर आप उसे गिरफ्‌तार नही करना चाहते तो मैं आंदोलन छेड़ दूंगा, धरना दूंगा, प्रदशॅन करूंगा, इस हत्या के खिलाफ हमारे कार्यकर्ता जान लड़ा देंगे। नेताजी पूरे जोश में बोले। अपनी चमक को छिपाते हुए वे भी घर के कोहराम में फफक कर शामिल हो गये। नेताजी को मानों राजनीतिक मुद्दा मिल गया था।
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कविता

वेद पी० शर्मा

खो रही अस्तित्व अपना मानव की आत्मा

सोच कर आज घबरा रहा है परमात्मा

सता रही है आज आत्मा को आत्मा

आत्मा ही बन गई है सभी के लिए परमात्मा

बचा रही है उनको जो रोकते हैं धन से जो उसकी साधना

जाना दुश्वार हो गरीब लाचारों को जो करते हैं सामना

और तोड़ देते है यहीं किसी कोने में

टकराती है भूख से जब लोभित होती आत्मा

लोभित हो तो आज तन को ही छोड़ देती है आत्मा

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एक बहुत पुराना डर

मुनीर न्याजी

उस समय

जब यह सारे घर पक्के नहीं होते थे

रास्ते में चलती फिरती मृत्यु का डर

इतना अधिक नहीं था

लोग आकाश की चुप्पी से डरकर

इसी तरह ही शोर मचाते थे

अकेले रहने से वे सब भी

हमारी तरह घबराते थे ।

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लफ्जों का पुल

निदा फाजली



मस्जिद का गुम्बद सूना है

मन्दिर की घंटी खामोश

जुजदानों में लिपटे

सारे आदशों को

दीमक कब की चाट चुकी है

रंग

गुलाबी

नील

पीले

कहीं नहीं है

तुम उस जानिब

मैं इस जानिब

बीच में मीलों गहरा गार

लफ्जों का पुल टूट चुका है

तुम भी तंहा

हम भी तंहा

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मैरीन ड्राइव

आदिल मंसूर



शहरियों से तंग आकर

शोर से दामन छुडाकर

ऊँची-ऊँची बिलडिंगें

खुदकुशी करने की खातिर

सफ ब सफ दरिया किनारे

देर से आकर खडी है ।

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Tuesday, April 29, 2008

मैं

अफजल अहसन

मेरे पीछे-पीछे जिन्दगी

मेरे आगे-आगे मौत

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Monday, April 28, 2008

गुरू

अश्फाक कादरी
भैयाजी चुनाव जीत गये! सलि जयघोष से गूंज उठा । जीत के ढोल बनजे लगे। उनके समर्थक खुशी से नाचने लगे। गुलाल उछलने लगा। कार्यकर्ताओं ने चैन भरी सांस ली। उनके प्रमाण पत्र लेकर जब भैयाजी बाहर निकले तो जाने-अनजाने समर्थकों ने उन्हें फूल मालाओं से लाद दिया। कंधों पर उठाकर जीप पर बिठा दिया और जुलूस बस्ती की ओर चल पड़ा।

तभी भैयाजी की नजर दूर खड़े एक फटेहाल आदमी पर पड़ी, जो काफी समय से हाथ हिलाकर उनका अभिवादन कर रहा था। उन्हें कुछ याद आने लगा इस शहर में अपने गांव से खाली हाथ आये भैयाजी का खुले आसमान के नीचे बसेरा था।

बेरोजगारी ने उन्हें जुर्म की दुनिया में धकेल दिया था। नई-नई बसी बस्ती में भैयाजी ने जमीनों पर कब्जा, जुआ, सट्टे का कारोबार शुरू कर दिया था जिससे उनका ठोर ठिकाना बनने लगा था, मगर पुलिस के रिकार्ड में वे जल्द ही हिस्ट्रीशीटर बन गये। उनके घर पुलिस के छापे पड़ने लगे। एक बार जब पुलिस का छापा पड़ा तो उनकी हाथापाई पुलिस से हो गयी। इसी लुका छिपी में भैया की मुलाकात एक मस्त मौला आदमी से हुई, जिसने उन्हें सबक दिया कि अगर तुम्हें इज्जत की जिन्दगी गुजारनी है तो नेता बन जा, नहीं तो कुत्ते की मौत मारा जायेगा ।

वह दिन और आज का दिन भैयाजी ने नेतागिरी की राह पकड़ी तो विपक्षी पार्टी के कार्यकर्ता बन गये। विपक्षी पाटी के नेताजी का इतिहास भी भैयाजी जैसा ही था जो वे आज नेतागिरी की आड़ में गुण्डागर्दी कर रहे थे। उनके इशारे में भैयाजी अपनी बस्ती में काम करने लगे, अब पुलिस उन पर हाथ डालने से कतराने लगी। नेताजी के साथ रात दिन काम करते हुये भैया ने अपनी स्थिति और मजबूत कर ली इस बार जब चुनाव आये तो उन्हें इस क्षेत्र का टिकट मिला और वे साम दाम दंड के बल पर यह चुनाव जीत गये। आज यह मुकाम उसी मस्तमौला आदमी की सीख पर मिला था। जो सामने फटेहाल हालत में खड़ा था, जो उनका गुरू था।

भैयाजी ने जीप रूकवाई और उस फटेहाल आदमी के पांव छू लिये। समर्थक कुछ समझ नहीं सके। भैयाजी का यह पांव छूना गरीबों के प्रति उनका सम्मान के रूप में लिया। वे जय जय कार कर उठे और जुलूस आगे बढ़ गया।

खो गयी दिशा

- अंजना कुमारी सिंहा
सुधा के लिए जब चौधरी साहब के यहाँ से रिश्ता आया तो मानो सुधा अरमानों के पंख लगाकर उड़ने लग गयी हो। उसे अपनी किस्मत पर विश्वास नहीं हो रहा था। साधारण-सी दिखने वाली सुधा इण्टर द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण थी।
चौधरी साहब शहर के बड़े रईसों में से एक थे, और साकेत उनका एकमात्र पुत्र था। आकर्षक व्यक्तित्व का धनी साकेत एक मल्टीनेशनल कम्पनी में इंजीनियर के पद पर कार्यरत था।
शादी के बाद सुधा ससुराल आई तो इतने बड़े घर की जिम्मेदारी सँभालने मात्र के नाम से ही घबरा गयी, पर सुधा के ससुर चौधरी साहब ने उसकी बहुत मदद की। साकेत सुधा की ज्यादा मदद नहीं कर पाता। सुबह नौ बजे दफ्तर जाना और सायं सात बजे लौटना, और लौटकर भी दफ्तर के कामों में व्यस्त रहना। कभी-कभी सुधा को गुस्सा भी आता पर वह शान्त मन से सब सह जाती। शादी को दो महीने बीत गये थे। आज सुबह से ही सुधा को अपनी तबियत सही नहीं लग रही थी। चक्कर आ रहा था, जी खराब हो रहा था। उसने डॉक्टर को दिखाया तो पता चला कि वह माँ बनने वाली है। उसने अपनी रिपोर्ट ली और खुशी-खुशी घर लौट आयी; और सोचने लगी कि यह खबर सबसे पहले साकेत को सुनाऊँगी। वह बेसब्री से साकेत का इन्तजार करने लगी। शाम हुई तो साकेत वापस लौटा, और लौटकर सुधा को ही एक खबर दे बैठा - सुधा मेरा सामान लगा दो।
कहीं जा रहे हैं क्या?
हाँ, मेरा तबादला हो गया है। दूसरे शहर में कल से ही ज्वाइन करना है। साकेत मुझे आपने यह बात पहले नहीं बताई। सुधा मुझे आज ही पता चला है।
साकेत मुझे आपको कुछ जरूरी बात बतानी है।
सुधा जो कहना है, प्लीज बाद में कहना। मैं अभी बहुत थका हुआ हूँ। यह कह कर साकेत सो गया।
लेकिन सुधा की आँखों में नींद नहीं थी। सुधा की इच्छा हो रही थी कि वह अभी साकेत को उठाकर अपनी जिन्दगी की सबसे बड़ी खुशी की खबर दे दे। पर उसने साकेत की तरफ देखा तो वह बहुत गहरी नींद में सो रहा था। सुधा ने साकेत को जगाना ठीक नहीं समझा। वह भी आँख बन्द करके लेट गयी।
पाँच बजे घड़ी का अलार्म बजा! साकेत हड़बड़ाहट के साथ उठा और सुधा को नाश्ता बनाने के लिए कहा। सुधा उठकर नाश्ता बनाने चली गई पर उसका दिमाग रात की उधेड़बुन में ही लगा रहा कि वह साकेत को जाकर अभी बताये या बाद में बताये। उसके अन्तर्मन ने अचानक यह फैसला किया कि जब साकेत नाश्ता करेंगे तब मैं उन्हें जरूर बता दूँगी।
सुधा! सुधा!! नाश्ता तैयार है? जल्दी लाओ मुझे देर हो रही है। साकेत की आवाज सुनकर सुधा का ध्यान टूटा।
साकेत नाश्ता करते समय सुधा को हिदायतों पर हिदायतें दिये जा रहा था।
जब तक पापा नहीं आते, घर का ध्यान रखना। बिना जान-पहचान वाले को घर के अन्दर मत बुलाना। फिर कुछ सोचकर साकेत ने कहा - सुधा रात तुम मुझे कोई जरूरी बात बताना चाहती थीं, क्या बात है? यह सुनकर सुधा का ध्यान टूटा, उसे बड़ी खुशी हुई। जिस बात के लिए वह साकेत को बताने के लिए समय का इन्तजार कर रही थी और चाहकर भी कह नहीं पा रही थी, उसे साकेत ने खुद ही पूछ लिया। वह बोली साकेत, मैं नहीं जानती कि आपको यह जानकर कितनी खुशी होगी, किन्तु यह मेरी जिन्दगी की सबसे बड़ी खुशी ....
सुधा की बात बीच में ही रुक गयी। उसी समय फोन की रिंग बज उठी। साकेत ने फोन उठाया और सुनने लगा। उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति की बात सुन रहा है। साकेत बोला - ओ.के. बॉस मैं अभी आया। फोन रखकर वह सुधा से बोला - सुधा बॉस का फोन है, वह नीचे खड़े मेरा इन्तजार कर रहे हैं। मैं दस-पन्द्रह दिन बाद आऊँगा।
साकेत चला गया, मगर सुधा भावनाओं के सागर में खो गयी। अपनी बात न कह पाने का उसे दुःख हो रहा था। वह सोच रही थी कि इसके लिए दोषी कौन है - मैं, साकेत या मेरा भाग्य। दरवाजे की घण्टी सुनकर सुधा के विचारों का क्रम टूटा और उसने दरवाजा खोला - सामने चौधरी साहब थे, जो तीर्थ-यात्रा से लौटे थे। सुधा और चौधरी साहब के विचारों में समानता थी। वह उसे अपनी बेटी की तरह चाहते थे। सुधा ने देखते ही उन्हें प्रणाम किया। सुभाशीष देते हुए चौधरी साहब अन्दर आये और आवाज लगाना शुरू किया - साकेत! साकेत!! अभी तक सोया है यह लड़का! साकेत उठो! ऑफिस को देर हो जायेगी।
पिता जी साकेत घर पर नहीं हैं।
नहीं है? कहाँ गया?
उन्हें कम्पनी की ओर से प्रमोशन मिला है तथा ट्रांसफर करके दूसरे शहर में भेज दिया है। वे अपने बॉस के साथ कुछ समय पहले ही गये हैं।
कब लौटने की कह गया है बेटी?
दस-पन्द्रह दिन बाद आने के लिए कह रहे थे।
यह सुनकर वे चिन्ता में डूब गये। साकेत की माँ के गुजरने के बाद उन्होंने ही उसे पाला था। साकेत अब पच्चीस वर्ष का हो गया था, फिर भी वे उसे १२ वर्ष का नन्हा साकेत' ही समझते थे।
सुधा उनकी उस विकलता को समझ रही थी। उनका ध्यान उधर से हटाने के लिए वह बोली - पिताजी आप थके हुए हैं, आराम कीजिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ।
सुधा रसोई घर में चाय बना रही थी कि अचानक उसे चक्कर आया और वह बेहोश हो गयी। घर में सफाई का काम करने वाली बाई ने उसे देखा और शोर मचाया। पिताजी दौड़कर आये और सुधा को सँभाला। डॉक्टर को फोन किया।
डॉक्टर आया, चैकअप किया और चौधरी साहब से बोला - घबराने की कोई बात नहीं सुधा माँ बनने वाली है किन्तु यह बहुत कमजोर है। इसे आराम की जरूरत है।
यह सुनकर पिताजी की आँखों में खुशी के आँसू झलक आये। अब वह सुधा का बहुत ख्याल रखने लगे। उन्होंने यह खुशखबरी साकेत को भी दे दी। साकेत को भी यह जानकर बहुत खुशी हुई, उसने सुधा से उसी रात फोन पर बातें कीं-हैलो सुधा! कैसी हो? इतनी बड़ी बात तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताई?
साकेत मैं तो बताने के बारे में सोचती ही रह गयी और उस दिन यही बात आपसे कहना चाहती थी, लेकिन अब पिताजी ने तुम्हें बता ही दिया।
अच्छा कल वापस आ रहा हूँ, बाकी बात मिलने पर होगी।
सुधा खुश थी। साकेत भी इस खुशखबरी को सुन उतना ही खुश था जितनी की वह स्वयं है। धीरे-धीरे वह दिन भी आया जब नन्हीं दिशा का जन्म हुआ। पूरे घर में खुशी मनाई जा रही थी। पिताजी ने सारा बाजार ही घर में जोड़ लिया था, नन्ही दिशा के लिए। साकेत भी बहुत खुश था।
साकेत ने सुधा से कहा - तू बहू और दिशा को साथ ही ले जा बेटा।
नहीं पिता जी आप यहाँ अकेले रह जायेंगे।
पिताजी ने शून्य की ओर देखकर गहरी सांस लेते हुए कहा - मेरी चिन्ता मत करो बेटा, मैं अकेला रह लूँगा। मुझे तो आजीवन इसी घर में रहना है। तेरी माँ मुझे इसी घर में छोड़ कर चली गयी। एक दिन मेरी भी अर्थी इसी घर से ही निकलेगी।
नहीं पिता जी, ऐसी बात मत कीजिए सुधा ने टोका। वह नन्हीं दिशा को सुलाने चली गयी।
अगले दिन साकेत चला गया। सुधा उसके पुनः लौटने का इंतजार करने लगी। पहले साकेत पहुँचते ही फोन करते थे, पर अब सुधा को लगता था कि मानो वे अब भूल ही जाते हैं कि यहाँ उनका अपना परिवार भी है।
आज सुबह से ही सुधा को कुछ विचित्र-सा अनुभव हो रहा था। एक अजीब-सी बेचैनी उसे बार-बार परेशान कर रही थी। शाम होते-होते यह बेचैनी और भी बढ़ गयी।
सुधा खिन्नवदना पड़ी थी। रात के दस बज रहे थे कि अचानक पिताजी ने सुधा को पुकारा। सुधा उनके पास गयी तो अपने सीने में बड़ा तेज दर्द होने की बात पिताजी ने की। दर्द हुआ तो सुधा उन्हें हास्पीटल ले गयी। शहर छोटा होने के कारण सुविधायें कम थीं। डॉक्टर ने दूसरे शहर में ले जाने की सलाह दी तो सुधा ने साकेत को फोन किया। साकेत ने किसी तरह सुबह तक सँभालने के लिए कहा।
सुबह जब तक साकेत आया, बहुत देर हो चुकी थी। पिताजी का स्वर्गवास हो गया था।
तेरहवीं के बाद जब साकेत जाने लगा तो सुधा ने अश्रुपूरित नेत्रों से साकेत की ओर निहारा। साकेत ने कहा - थोड़ा सब्र करो सुधा, कुछ दिन बाद मैं तुम्हें वहीं बुला लूँगा।
सुधा इसी इन्तजार में दिन काटने लगी। पिताजी के आगे साकेत हफ्ते में एक बार अवश्य फोन करते थे, पन्द्रह-बीस दिन में घर अवश्य आ जाते थे, मगर अब सुधा ही फोन करे, तो ठीक से बात नहीं करते थे। साकेत को क्या हो गया है? क्या अब मैं और दिशा साकेत को प्रिय नहीं? इस तरह की जाने कितनी बातें सुधा के मन में आती थीं। वह खुद को निरीह, असहाय, आरक्षित अनुभव कर रही थी। एक दिन साकेत का फोन आया कि वह घर आ रहे हैं। दोपहर का समय था। सुधा आज कुछ प्रसन्न थी पूर्वी हवा के तीव्र झोंके बार-बार आते और शीतल वायु सुखदायी बन कर वातावरण को मोहक बना रही थी। अचानक दरवाजे की घण्टी बजी। सुधा ने दौड़कर दरवाजा खोला। देखा तो सामने साकेत थे। वे अकेले नहीं थे, उनके साथ एक तीखे नैन-नक्श वाली एक सुन्दर लड़की भी थी।
सुधा ने कहा अरे साकेत यह कौन है? आपने बताया नहीं कि आपके साथ और भी कोई आने वाला है।
सुधा यह कविता है, मेरे साथ आफिस में काम करती है। हम दोनों शादी करने वाले हैं। सुधा का चेहरा सफेद पड़ गया। एकबारगी वह सिर से पैर तक काँप गयी, परन्तु उसने संयत होकर कहा - साकेत! यह कैसा मजाक है?
सुधा, यह मजाक नहीं सच है।
दिशा के बारे में तो सोचो साकेत, उसका क्या होगा? मैं कहाँ जाऊँगी?
दिशा के बारे में सोचकर ही कह रहा हूँ, खामोश रहोगी तो यह घर रहने के लिए मिलेगा और हर महीने आठ हजार रुपये दिशा और तुम्हारे लिये भेजता रहूँगा। साकेत बोल रहा था और सुधा सुन रही थी - हैरान-परेशान विचलित। उसे लगा कि अभी धरती फट जायेगी और वह उसमें समा जायेगी। क्षण भर सँभलते हुए उसने पूछा - साकेत आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?
साकेत का चेहरा कठोर हो चला। उसने कहा - तुमने कभी स्वयं को ठीक से आइने में देखा है? तुममें ऐसा क्या है जो मैं ऐसा न करता? मैं तो पिता जी की वजह से चुप था, वरना तुम्हें तो मैं कब का बता देता।
साकेत शब्दों के बाण चलाये जा रहा था। सुधा किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी सुनती जा रही थी। सुधा का दिल बैठा जा रहा था। उसका पसीना छूट रहा था। साँस की गति तीव्रतर हो गयी थी। उसने नजर उठाकर देखा। दोनों जा चुके थे। सुधा फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने दिशा को उठाया और हृदय से लगाकर रोती रही।
घर में एक छोटी-सी पार्टी का आयोजन किया गया है। काफी चहल-पहल हो रही है। दिशा इण्टरमीडिएट में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई थी और वह भी पूरे कॉलेज में टॉप। आज उसे एम.बी.बी.एस. में भी प्रवेश मिल गया है। दिशा की सभी सहेलियाँ आयी थीं। इस समय भोजन चल रहा था।
आंटी आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं। रमा ने कहा।
हाँ आंटी, अंकल और दिशा तो बहुत लकी हैं, जो हर रोज आपका पकाया इतना अच्छा खाना खाते हैं। छाया ने कहा।
दिशा अंकल नहीं दिखाई दे रहे, कहीं बाहर गये हैं क्या? रमा पूछ बैठी।
नहीं वो हमारे साथ नहीं रहते हैं।
नहीं रहते? मतलब? तुमने पहले कभी नहीं बताया।
तुमने पहले कभी पूछा ही नहीं। जब मैं छोटी थी तब से मुझे और मम्मी को छोड़कर चले गये थे किसी और औरत के साथ। हमारे लिए वो मर गये।
यह क्या बोल रही हो दिशा, बेटा तुम लोग खाना खाओ। यह अपने पापा से नाराज है, इसलिए ऐसा बोल रही है। सुधा ने बात को नया मोड़ देना चाहा।
दिशा का चेहरा तमतमा गया था, ममा इन्हें सच बताने दो, नहीं तो एक के बाद एक उठने वाले सवालों का जवाब देना मुश्किल हो जाएगा।
सुधा अन्दर चली गयी। दिशा की सहेलियाँ भी खाना खाकर अन्दर चली गयीं। दिशा अकेली बैठी सोचती रही। बचपन से लेकर आज तक की घटना उसे याद आने लगीं। जब वह छोटी थी तो आस-पास के लोग साकेत के बारे में बात करते थे, लेकिन वह समझ नहीं पाती थी। उम्र के साथ-साथ उसकी समझ भी बढ़ती गयी। उसने साकेत के द्वारा भेजे गये पैसे उसकी खैरात समझ कर लेने से इंकार कर दिया। खुद पढ़ती, बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती। पढ़ाई में तेज होने के कारण विद्यालय से मिलने वाली सारी सुविधाएँ उसे प्राप्त थीं। वह घटना भी याद आयी जब उसने पढ़ाई का खर्च अधिक होने के कारण आधा घर किराये पर दे दिया था। इस प्रकार दोनों माँ बेटी का खर्च प्रायः आराम से चल ही जाता था। तब माँ ने किसी बात का विरोध नहीं किया था साकेत ने उसके बाद न कभी पैसे भेजे थे और कोई पत्र ही। तो क्या उन्होंने हमको मरा हुआ नहीं समझा? कभी हमारी याद आयी? मेरे कहने पर माँ को बुरा क्यों लगा? आखिर क्या सम्बन्ध है अब हमारा उनसे? अनेक प्रश्न उसके मन में उठ रहे थे। दिशा'! क्या सोच रही हो बेटी? सुधा ने दिशा के कन्धे पर हाथ रख कर पूछा।
सॉरी ममा, मेरा वह सब कहना आपको बुरा लगा, पर मैं क्या करूँ? आज भी जब आपको उस आदमी की याद में रोती देखती हूँ तो नफरत होती है मुझे। मेरे विचार से सच बोलना ही ठीक है। आज हम उनसे झूठ बोलते, कल और सवाल उठते, उनका जवाब क्या देते? मैंने इस किस्से को ही खत्म कर दिया। अब कोई हम से कुछ नहीं पूछेगा। दिशा लगातार बोलती जा रही थी और सुधा हर्ष और विषाद के मिले जुले भाव लिए विस्मय से दिशा को निहार रही थी। उसे हर्ष इस बात का हो रहा था कि नन्ही दिशा कब इतनी बड़ी हो गयी कि सुधा का सहारा बन रही है। अपने हाथों से उसके आँसू पोंछ रही है। विषाद इस बात का कि न जाने क्यों दिशा का साकेत के खिलाफ बोलना उसे अच्छा नहीं लग रहा था।
दिशा ने अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित कर रखा था। भाग्य भी उसका पूरा साथ दे रहा था। वह एक के बाद एक सफलता प्राप्त करती गयी। अब उसकी पढ़ाई का आखिरी वर्ष था मानव और दिशा दोनों ही एक दूसरे को पसंद करते थे।
सुधा को भी मानव पसंद था। सुधा दिशा के सामने महसूस नहीं होने देती थी, पर वह आज भी मन ही मन साकेत को बहुत याद करती थी। आज साकेत के आये हुए खत ने उसे और अधिक बेचैन कर दिया। खत में लिखा था -
प्रिय सुधा!
दो महीने पहले, एक लम्बी बीमारी के चलते, कविता की मौत हो गयी है। यह अकेलापन मुझे खाने को दौड़ता है। मैं तुम्हारे और दिशा के पास वापस आ रहा हूँ। प्लीज मना मत करना। मुझे मेरी गलती के लिए माफ कर देना, मैं जल्दी ही आ रहा हूँ।
तुम्हारा साकेत
सुधा सोच रही थी कि साकेत ने जो किया, उसकी माफी दो लाइन के खत में लिखकर माँग ली? खैर ...! मैं शायद उन्हें माफ कर भी दूँ, ... पर दिशा को कैसे समझाऊँ? वह तो साकेत का नाम भी सुनना नहीं चाहती। दिशा के आने का समय हो रहा था, सुधा ने उस पत्र को छिपाना ही उचित समझा।
आज दिशा अकेली घर नहीं लौटी थी। मानव भी दिशा के साथ था।
अरे मानव! तुम, आओ बेटा कैसे हो?
अच्छा हूँ आन्टी।
पढ़ाई कैसी चल रही है?
बहुत अच्छी चल रही है आन्टी, आज मैं आपसे कुछ जरूरी बात करना चाहता हूँ आन्टी।
बोलो बेटा।
आन्टी कालेज में यह हमारा अन्तिम वर्ष, फिर न जाने हम सब कहाँ पहुँचें; आन्टी दिशा मेरी बहुत अच्छी दोस्त है। अगर आपको कोई एतराज न हो तो मैं दिशा को अपना जीवन-साथी बनाना चाहता हूँ। आप तो जानती हैं कि मैं बिल्कुल अकेला हूँ इसलिए मैं यह बात खुद कर रहा हूँ। मानव पलकें झुकाये मौन हो गया।
मानव बेटा मुझे भला क्या एतराज हो सकता है? तुम जैसा दामाद तो किस्मत वालों को मिलता है। दिशा से ही पूछ लो।
दिशा का चेहरा इन बातों को सुनकर लाल हो गया। वह लज्जाती हुई अन्दर चली गयी।
लीजिए आन्टी दिशा की ओर से हाँ का फरमान जारी हो गया है। अब आप जल्दी से सगाई की तैयारी कीजिए। लेकिन शादी हम पढ़ाई पूरी करके ही करेंगे।
जैसी तुम्हारी मर्जी बेटा।
मानव के चले जाने पर सुधा दिशा के पास गयी, जो आइने में अपने आप को निहार रही थी। दिशा बेटा, तुम इस फैसले से खुश हो न?
हाँ माँ मैं बहुत खुश हूँ।
बेटा! आज मेरे जीवन का बोझ हल्का हो गया। अब तो तेरी सगाई की तैयारी करनी है।
दिशा की सगाई सुधा के लिए बहुत महत्त्व रखती थी। वह इतनी खुश थी कि साकेत और उसके पत्र का उसे कोई ध्यान ही न रहा।
सुधा ने बड़े अरमानों से दिशा और मानव की सगाई की तैयारी की। आने वाले शुक्रवार को दिशा और मानव की सगाई थी। सुधा ने बड़े ही धूमधाम से सगाई समारोह को सम्पन्न कराया। दिशा और मानव भी अपनी आने वाली नयी जिन्दगी को लेकर बहुत खुश थे। सगाई के बाद सुधा और दिशा बहुत थक गयी थीं, दो-चार दिन तो ऐसे ही बीत गये। जब सुधा को साकेत के खत के बारे में ध्यान आया, उसने बात को घुमाकर दिशा से कहा - दिशा अगर आज तुम्हारे पापा होते तो कितने खुश होते।
दिशा ने लगभग चिल्लाते हुए कहा - माँ मैं आपसे हजार बार कह चुकी हूँ कि आप मुझसे उस आदमी के बारे में बात मत किया करिये। आप उसे पापा कहती हैं मेरा? यह शब्द उस आदमी के लिए बिल्कुल नहीं जो अपनी पत्नी और नवजात बच्ची को छोड़ कर चला गया। उसे क्या एहसास होगा मेरी खुशियों का?
दिशा का यह रूप देखकर सुधा लगभग डर-सी गयी। उसने सोचा - साकेत का नाम लेने से दिशा इतनी नाराज हो गयी, यह बताने पर कि वह आ रहे हैं, पता नहीं वह क्या करेगी? इसी डर से उसने साकेत के पत्रा के बारे में उसे कुछ भी नहीं बताया। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे सुधा का डर भी बढ़ता जा रहा था।
आज रविवार था, और आज का पूरा दिन दिशा, सुधा के साथ ही व्यतीत करती थी। वह सुधा को आज कोई भी काम नहीं करने देती थी। सुधा ड्राइंग रूप में बैठी टी.वी. देख रही थी और दिशा रसोई में नाश्ता बना रही थी। दरवाजे की घंटी बजी, सुधा ने जाकर दरवाजा खोला, वह हतप्रभ रह गयी। सामने साकेत था। सुधा को इतने दिन बाद साकेत को देखकर बहुत खुशी हो रही थी। इस खुशी का इजहार उसकी आँखों से टप-टप गिरते आँसू कर रहे थे। अचानक उसे दिशा का ख्याल आया और उसने घबराकर साकेत से कहा - आप यहाँ से चले जाइये। दिशा को पता चलेगा तो वह आपे से बाहर हो जायेगी। उसे आपके आने के बारे में मैंने कुछ नहीं बताया। वह आपसे बहुत नफरत करती है।
कैसी बात करती हो, दिशा मेरी बेटी है, मेरा खून है। उसे पता चलेगा तो वह खुश होकर मेरे गले से लग जायेगी।
आप समझते क्यों नहीं? दिशा आपसे नफरत करती है।
तभी दिशा हाथ में गर्म पकौड़ों की प्लेट लेकर कमरे में आयी और साकेत को लक्ष्य करके पूछा - माँ ये कौन हैं?
दिशा, वो ... ये तुम्हारे ...
क्या माँ, कौन हैं ये?
यह क्या सुधा तुम इतनी-सी बात नहीं बता पा रही अपनी बेटी को। चलो मैं ही बता देता हूँ। बेटा मैं तुम्हारा पापा हूँ, कितनी प्यारी है मेरी बेटी बिल्कुल मेरे ऊपर गयी है। साकेत ने दिशा की ओर प्यार से अपनी बाहें फैलायीं।
दिशा ने साकेत को धक्का देते हुए कहा - दूर रहिए मुझसे आप, मैं आप पर तो बिल्कुल ही नहीं गयी। मैं आपकी तरह स्वार्थी नहीं हूँ। मैं आपकी बेटी नहीं हूँ। मैं सिर्फ अपनी माँ की बेटी हूँ।
हाँ बेटा! जानता हूँ कि तुम मुझसे बेहद नाराज हो, बेटा मुझे माफ कर दो। साकेत ने गम्भीर स्वर से कहा।
किस बात की माफ़ी चाहिए आपको, आप मुझे और मेरी माँ को लावारिस छोड़कर चले गये, या इस बात की कि आज बीस साल बाद आपको हमारी याद आयी।
मेरी गलती बहुत बड़ी थी बेटा! पर तुम मुझे माफ कर दो। कहते-कहते साकेत का स्वर कातर हो गया।
हमने तो बीस साल पहले ही आपको माफ कर दिया था, और दूसरी बार जब माफ किया था जब आपके भेजे पैसे लौटाये थे। अब क्या माफी माँगते हैं आप हमसे? मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि आप मुझे और मेरी माँ को माफ कर दीजिए और लौट जाइये। हम अपनी इसी जिन्दगी से बहुत खुश हैं। चले जाइये आप हमारी जिन्दगी से। आप हमारे लिए मर चुके हैं।
दिशा!!' चीखते हुए सुधा ने दिशा को एक चाँटा मार दिया दिमाग खराब है तुम्हारा? जो जी में आये, बोले जा रही हो! अपने पापा से ऐसे बात कर रही हो और वे बार-बार माफी माँग रहे हैं फिर भी?
माँ मैं आपसे साफ-साफ कह रही हूँ, अगर ये यहाँ रहे तो मैं यह घर छोड़ कर चली जाऊँगी।
नहीं दिशा! बेटा तुम रहो, तुम यही रहो। मुझे वास्तव में इस घर में रहने का कोई अधिकार नहीं।
सुधा ने बीच में ही कहा - आप भी दिशा की बात को दिल से लगा रहे हैं।
नहीं सुधा! दिशा ठीक कहती है। मैंने स्वार्थवश तुम दोनों को बहुत दुख दिये हैं। आज जब कविता इस दुनिया में नहीं है तो मैं चला आया। मैं स्वार्थी तो हूँ ही सुधा। मैंने सिर्फ अपने विषय में ही सोचा, कहते-कहते साकेत का स्वर भर्रा गया। और वह बाहर चला गया। अतीत की एक-एक घटना चलचित्र की तरह उसके मनःपटल पर आ रही थी। नन्ही दिशा और सुधा को बेसहारा छोड़कर वह कविता के साथ अपनी नयी दुनिया बसाने चला गया था। अपनी बेटी और परिवार के बारे में उसने कुछ नहीं सोचा था। उसे अपराधबोध हो गया था, मगर उसे प्रायश्चित का कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। वह किंकर्त्तव्यविमूढ़ था। कदम बढ़ते जा रहे थे। मन में विचारों का द्वन्द्व चल रहा था। उसे अपने जीवन की कोई दिशा नहीं सूझ रही थी। उसके मुख से सहसा निकल पड़ा खो गयी मेरी दिशा।
साकेत इस बात से अन्जान था कि उसकी कौन-सी दिशा खो गयी-उसकी बेटी दिशा या उसके जीवन की दिशा?
या फिर दोनों? किन्तु उसके मन में यही बात बार-बार आ रही थी - खो गयी मेरी दिशा।

Sunday, April 27, 2008

शैशव से श्मशान तक

सी.आर.राजश्री
शैशव का पल है काफी प्यारा,
हर लम्हा है आकर्षक और लुभावना,
अपने ढ़ग से होता अलग एवं निराला,
न कभी लौट आता फिर दुबारा।
माँ के आँचल की छाँव में,
आँखें मूँदें दिन भर सोए रहना,
न काम की चिंता न रोटी की फ़िक्र,
न मन की बातों का होता कभी जिक्र।
शैशव गुजर फिर आता बचपन,
खेलना, कूदना, पढ़ना, लिखना,
हर पल खुशियों को समेटे रहता मन,
परिवार के लाड़-प्यार में बीत जाता बचपन।
बचपन गुजर जब आता यौवन,
कल्पनात्मक तरंग में उड़ता है मन,
अच्छे-बुरे का करना है सही चयन,
मेहनत लगन से ही सँवरता जीवन।
बच्चों की किलकारियों में,
प्यारे जीवन साथी के संग हर कदम में,
भविष्य के सपने संजोएँ नयनों में,
कट जाता पल-पल परिवार के ही देख-रेख में।
जीवन के ढ़लती उम्र में भी,
सफ़र के आखिरी पड़ाव में भी,
जीने की तमन्ना प्रचुर रहती है,
मरने की जरा भी ख्वाईश न रहती है।
कभी बीमारी के शिकंजे में फँसा तन,
कभी प्यार-स्नेह से वंछित बेरौनक जीवन,
लगता है बहुत वीरान, घिर जाता अकेलापन,
खमोशी तोड़ कर मन चाहता अपनापन।
मृत्यु जब द्वार आती है,
जीवन सहम कर रह जाती है,
खट्ठी-मीठी यादों को संग ले जाती है,
सगे-संबंधियों को तड़पा जाती है।
शैशव से श्मशान तक का सफर,
मुश्किल नहीं है, आसान है ये डगर,
समझ लो यारों! जीवन एक ही बार जीना है,
कुछ नया करके, नाम अपना लिखना है,
मानवता को और सबल बनाना है,
सत्य और प्रेम के रास्ते पर ही चलना है,
वांछित मंजिल पाकर दुनिया को मुट्ठी में लेना है,
तकदीर का रोना छोड़ कर खुद ही अपना तकदीर लिखना है।
***********************************************

Saturday, April 26, 2008

लोग क्या कहेगें

अश्फाक कादरी
बाबूजी गुजर गये। जीवन भर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ संघर्ष करने वाले बाबूजी के तीये की बैठक में समाज पूरा उमड़ पड़ा था। तीये की बैठक के बाद जब परिवार मिल बैठा तो उनके पीछे मृत्युभोज करने का प्रश्न सभी के सामने खड़ा था।

बाबूजी पूरे समाज से प्यार करते थे, इसलिए उनके पीछे औसर (मृत्युभोज) तो होना चाहिए काकाजी बोल पड़े थे।

मगर बाबूजी इसके खिलाफ थे बडा बेटा अपनी शंका व्यक्त करने लगा। लोग क्या कहेगें ? मंझला बेटा कहने लगा समाज में पैसे और मान सम्मान में हम किसी से कम है क्या ? जो बाप के मरते ही दो पैसे खर्च न कर सके।

तभी छोटे की ऑंखों में चमक उभर आयी तो फिर बाबूजी के नाम पर महाप्रसाद करेगें, छोटा बोल पड़ा औसर से महाप्रसाद अच्छा है, समाज में इसका विरोध नहीं होगा और हमारी शान रह जायेगी।

फिर बाबूजी के महाप्रसाद में सात मिठाईयां, दही बड़े, पकौड़ी, पक्की मंझला चहकते हुए बोला पूरे गांव को बुलाना चाहिए।

तो फिर ओढावणी छोटे बेटे के ससुर ने झिझकते हुए पूछा। मायरा-मौसायरा आप देवें तो आपकी मर्जी है, हम आपको इन्कार नहीं करेगें बड़ा बोल उठा।
मगर बाबूजी तो इसके खिलाफ थे ससुर जी शंकित होकर बोले।

इस मौके पर आप खर्चा नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेगें, आप लोगों के पास इस वक्त भी बेटी को देने के लिए कुछ नहीं है.... मंझला बोल उठा ।

सभी लोग बाबूजी की आत्मा की शन्ति के लिए महाप्रसाद की तैयारियों में जुट गये और समधी जी बेटी को इस अवसर पर भारी भरकम ओढावती की व्यवस्था में जुट गये।

Friday, April 25, 2008

अंतर

सिद्धेश्वर
नेता और साहित्यकार में
बस!
इतना है फर्क!
एक मंच पर
उछालता है आदशॅ

दूसरा कहानी या कविता में
ठूंसता है तर्क।
******************************

आदशॅ

सिद्धेश्वर
जितना बड़ा आदशॅ
बघारता है !
वह
उतना ही बड़ा साहित्यकार
कहलाता है!
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बरसात में

वीरेन्द्र जैन
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में
नोटों की बरसात में वोटों की बरसात में

कैसी बिडम्बना है भाई
सावन में आजादी आई
हरा हरा दिखता है अब तो
इनको अब हर हालात में
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में

जकड़न ढीली हो पायेगी
जब घर में गर्मी आयेगी
पूंजी ओ सामंती पल्ले
अभी जुडे हैं साथ मे
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में

इनको अभी खोलना चाहो
तो थोड़ा सा जोर लगाओ
लातों के गुरूदेव कहां
माना करते हैं बात में
लकड़ी के दरवाजे जैसे
श्रीमान बिल्कुल ही वैसे
फूल गये बरसात में
********************************

मेघों की श्याम पताकाएं

वीरेन्द्र जैन

सूरज को क्यों ना दिखलाएं
मेघों की श्याम पताकाएं
सारा जल सोख सोख लेता
संग्रहकर्ताओं का नेता
वितरण की व्यर्थ व्यवस्थाएं
सूरज को क्यों ना दिखलाएं
मेघों की श्याम पताकाएं

व्यर्थ हुआ अब विरोध धीमा
मनमानी तोड़ गयी सीमा
गरजें ओ बिजलियां गिरायें
सूरज को क्यों ना दिखलाएं
मेघों की श्याम पताकाएं

कोई होंठ प्यासा न तरसे
मन चाहे खूब नीर बरसे
वर्षा में भीग कर नहायें
सूरज को क्यों ना दिखलाएं
मेघों की श्याम पताकाएं
********************************

गज़ल

कवि कुलवंत सिंह
बड़े हम जैसे होते हैं तो रिश्ता हर अखरता है ।
यहां बनकर भी अपना क्यूँ भला कोई बिछड़ता है ।

सिमट कर आ गये हैं सारे तारे मेरी झोली में,
कहा मुश्किल हुआ संग चांद अब वह तो अकड़ता है ।

छुपा कान्हा यहीं मै देखती यमुना किनारे पर,
कहीं चुपके से आकर हाथ मेरा अब पकड़ता है ।

घटा छायी है सावन की पिया तुम अब तो आ जाओ,
हुआ मुश्किल है रहना अब बदन सारा जकड़ता है ।

जिसे सौंपा थे मैने हुश्न अपना मान कर सब कुछ,
वही दिन रात देखो हाय अब मुझसे झगड़ता है ।

*****************************

वीरों का कर्तव्य

कवि कुलवंत सिंह

साहस संकल्प से साध सिद्धि
विजयी समर में शूर बुद्धि,
दृढ़ निश्चय उन्माद प्रवृद्धि
जवाला सी कर चिंतन शुद्धि ।

कायरता की पहचान भीति है
अंगार शूरता की प्रवृत्ति है,
शोषित जीवन एक विकृति है
नही मृत्यु की पुनरावृत्ति है ।

भर हुंकार प्रलय ला दो
गर्जन से अनल फैला दो,
शक्ति प्रबल भुजा भर लो
प्राणों को पावक कर लो ।

अनय विरुद्ध आवाज उठा दो
स्वर उन्माद घोष बना दो,
शीश भले निछावर कर दो
आंच आन पर आने न दो ।

जीवन में हो मरु तपन
सीने में धधकती अगन,
लक्ष्य हो असीम गगन
कंपित हो जग देख लगन ।

श्रृंगार सृष्टि करती वीरों का
पथ प्रकृति संवारती वीरों का,
आहुति अनल निश्चय वीरों का
शत्रु संहार धर्म वीरों का ।

चट्टानों सा मन दृढ़ कर लो
तन बलिष्ठ सुदृढ़ कर लो,
निर्भयता का वरण कर लो
उन्माद शूरता को कर लो ।

तपन सूर्य की वश कर लो
प्रचण्ड प्रदाह हृदय धर लो,
तूफानों को संग कर लो
शौर्य प्रबल अजेय धर लो ।

गगन भेदी रण शंख बजा दो
वज्र को तुम चूर बना दो,
विजय दुंदुभि स्वर लहरा दो
श्रेय ध्वजा व्योम फहरा दो ।

रोष, दंभ वीरों को वर्जित
करुणा, विनय वीरों को शोभित,
दीन, कातर हों कभी न शोषित
सत्य, न्याय से रहो सुशोभित ।
***************************

Thursday, April 24, 2008

समाजवाद

सिद्धेश्वर
नेता हो या मंत्री
समाजवाद की
नयी परिभाषा अपना रहे हैं!
अमीरों को और अमीर
गरीबों को और गरीब बना रहे हैं!
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भक्ति

सिद्धेश्वर
ईश्वर को हम
बस! इतना जानते हैं....
उनकी मूर्तियां गढ़कर
बाजार में बेच आते हैं......!
तब/जाकर
दो सूखी रोटियां पाते हैं !!

*******************************

सांस्कृतिक आयोजन के अवसर

वीरेन्द्र जैन
नाच उठे चूहे पेटों में
भूख गीत गाये
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये

वस्त्रों के अभाव में
नारी अंग प्रदशर्न हो
हर निर्धन बस्ती आयोजित
ऐसे फैशनो
वीतराग हो गये आदमी
बिन दीक्षा पाये
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये

हैं धृतराष्ट्र शिखंडी जैसे
नायक नाटक के
दशर्क की किस्मत में लिक्खे
हैं केवल धक्के
उठती गिरती रही यवनिका
दाएं से बाएं
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये
***********************

नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ

कवि कुलवंत सिंह

नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ

लेकिन विष तो कण्ठ धरा है !
कवि होने की पीड़ा सह लूँ
क्यों दुख से बेचैन धरा है ?
त्याग, शीलता, तप सेवा का
कदाचित रहा न किंचित मान ।
धन, लोलुपता, स्वार्थ, अहं का,
फैला साम्राज्य बन अभिमान ।
मानव मूल्य आहत पद तल,
आदर्श अग्नि चिता पर सज्जित ।
है सत्य उपेक्षित सिसक रहा,
अन्याय, असत्य, शिखा सुसज्जित ।
ले क्षत विक्षत मानवता को
कांधों पर अपने धरा है ।
नील कण्ठ तो मैं नहीं हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
सौंदर्य नहीं उमड़ता उर में,

विद्रूप स्वार्थ ही कर्म आधार ।
अतृप्त पिपासा धन अर्जन की,
डूबता रसातल निराधार ।
निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा ।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा ?
असहाय रुदन चीत्कारों को,
प्राणों में अपने धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
तृष्णा के निस्सीम व्योम में,

बन पिशाचर भटकता मानव ।
संताप, वेदना से ग्रसित,
हर पल दुख झेल रहा मानव ।
हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?
शिरोधार्य कर अटल सत्य को,
सीने में अंगार धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
***********************************

Wednesday, April 23, 2008

कविता

वेद पी० शर्मा
गर्मी में हांफता
जाड़े में दांत कटकटाता
द्वार पर दिन-रात दस्तक लगाती फिक्र
बिटिया के हाथ पीले करने की
छोटे बेटे को स्कूल भेजने की
बीमार पत्नी को दवा के लिए
इसी आस में
अब जो सरकार आएगी कुछ तो ध्यान लगाएगी
आ गई सरकार पर न छोड़ा दामन
चिन्ता ने एक गरीब पिता का अभी तक
*****************************

कविता

वेद पी० शर्मा
ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं
यदि है तो दे भूखे को रोटी, नंगे को कपड़ा
बेघर को घर ।
नहीं दे सकता ।
दे सकता है मंदिर मस्जिद के नाम पर दंगे
पुरोहित शूद्रों के बहाने इंसानों में भेद
ईश्वर तो मुद्दा है राजनैतिक सत्ता पाने का।
********************************

जीवन का गुलाब

समर सिंह सिसौदिया
यों ही बीत जाते हैं -
पल, घड़ी, दिन, मास !

यों ही निकल आता है दिन,
यों ही घिर आती है शाम !
और फिर, तारों भरी रात,
नीला-सा आकाश !

कब आया जीवन ?
बचपन का हास ?
यौवन-तरंग कब ?
जीवन-विकास ?

जीवन का गुलाब,
श्वेत, पीत, रक्त, रंग बदलता,
कहीं नीली-नीली गहराइयों में,
खो जाता है !

और फिर दिन निकलता है,
फिर गुलाब खिलता है,
लेकर नई आस !
यों ही बीत जाते हैं,
पल, घड़ी, दिन, मास !
********************************

Tuesday, April 22, 2008

सांस्कृतिक आयोजन के अवसर

वीरेन्द्र जैन
नाच उठे चूहे पेटों में
भूख गीत गाये
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये

वस्त्रों के अभाव में
नारी अंग प्रदशर्न हो
हर निर्धन बस्ती आयोजित
ऐसे फैशनो
वीतराग हो गये आदमी
बिन दीक्षा पाये
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये

हैं धृतराष्ट्र शिखंडी जैसे
नायक नाटक के
दशर्क की किस्मत में लिक्खे
हैं केवल धक्के
उठती गिरती रही यवनिका
दाएं से बाएं
ऐसे सांस्कृतिक आयोजन
के अवसर आये

वीरों का कर्तव्य

कवि कुलवंत सिंह
साहस संकल्प से साध सिद्धि
विजयी समर में शूर बुद्धि,
दृढ़ निश्चय उन्माद प्रवृद्धि
जवाला सी कर चिंतन शुद्धि ।

कायरता की पहचान भीति है
अंगार शूरता की प्रवृत्ति है,
शोषित जीवन एक विकृति है
नही मृत्यु की पुनरावृत्ति है ।

भर हुंकार प्रलय ला दो
गर्जन से अनल फैला दो,
शक्ति प्रबल भुजा भर लो
प्राणों को पावक कर लो ।

अनय विरुद्ध आवाज उठा दो
स्वर उन्माद घोष बना दो,
शीश भले निछावर कर दो
आंच आन पर आने न दो ।

जीवन में हो मरु तपन
सीने में धधकती अगन,
लक्ष्य हो असीम गगन
कंपित हो जग देख लगन ।

श्रृंगार सृष्टि करती वीरों का
पथ प्रकृति संवारती वीरों का,
आहुति अनल निश्चय वीरों का
शत्रु संहार धर्म वीरों का ।

चट्टानों सा मन दृढ़ कर लो
तन बलिष्ठ सुदृढ़ कर लो,
निर्भयता का वरण कर लो
उन्माद शूरता को कर लो ।

तपन सूर्य की वश कर लो
प्रचण्ड प्रदाह हृदय धर लो,
तूफानों को संग कर लो
शौर्य प्रबल अजेय धर लो ।

गगन भेदी रण शंख बजा दो
वज्र को तुम चूर बना दो,
विजय दुंदुभि स्वर लहरा दो
श्रेय ध्वजा व्योम फहरा दो ।

रोष, दंभ वीरों को वर्जित
करुणा, विनय वीरों को शोभित,
दीन, कातर हों कभी न शोषित
सत्य, न्याय से रहो सुशोभित ।
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नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ

कवि कुलवंत सिंह

नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है !
कवि होने की पीड़ा सह लूँ
क्यों दुख से बेचैन धरा है ?
त्याग, शीलता, तप सेवा का
कदाचित रहा न किंचित मान ।
धन, लोलुपता, स्वार्थ, अहं का,
फैला साम्राज्य बन अभिमान ।
मानव मूल्य आहत पद तल,
आदर्श अग्नि चिता पर सज्जित ।
है सत्य उपेक्षित सिसक रहा,
अन्याय, असत्य, शिखा सुसज्जित ।
ले क्षत विक्षत मानवता को
कांधों पर अपने धरा है ।
नील कण्ठ तो मैं नहीं हूँ
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
सौंदर्य नहीं उमड़ता उर में,
विद्रूप स्वार्थ ही कर्म आधार ।
अतृप्त पिपासा धन अर्जन की,
डूबता रसातल निराधार ।
निचोड़ प्रकृति को पी रहा,
मानव मानव को लील रहा ।
है अंत कहीं इन कृत्यों का,
मानव! तूँ क्यों न संभल रहा ?
असहाय रुदन चीत्कारों को,
प्राणों में अपने धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
तृष्णा के निस्सीम व्योम में,
बन पिशाचर भटकता मानव ।
संताप, वेदना से ग्रसित,
हर पल दुख झेल रहा मानव ।
हर युग में हो सत्य पराजित,
शूली पर चढ़ें मसीहा क्यों ?
करतूतों से फिर हो लज्जित,
उसी मसीहा को पूजें क्यों ?
शिरोधार्य कर अटल सत्य को,
सीने में अंगार धरा है ।
नीलकण्ठ तो मैं नहीं हूँ,
लेकिन विष तो कण्ठ धरा है ।
***********************************

जातिवाद

सिद्धेश्वर
दलित-दलित-दलित......
इसलिए हम रट लगाते हैं.....
दलित हमेशा दलित बना रहे
और हम
सवर्ण/यही तो चाहते हैं......
******************************

शांति नहीं है सन्नाटा है

वीरेन्द्र जैन
सैनिक चुप्पी साधे बैठे
सीमा पर बन्दूकें ताने
अपने पर तौले बैठे हैं
अनगिन बाज लगाए निशाने
जिसके हाथ आ गया अवसर
वही झपट्ठा दे जाता है
शांति नहीं है सन्नाटा है

सुलग रहा है एक पलीता
धीरे-धीरे धीरे-धीरे
जाने कब वह क्षण आये
जो चट्ठानों की छाती चीरे
विष्फोटों के पहले क्षण तक
कोई नहीं समझ पाता है
शांति नहीं है सन्नाटा है

गज़ल

कवि कुलवंत सिंह
भरम पाला था मैने प्यार दो तो प्यार मिलता है ।
यहाँ मतलब के सब मारे न सच्चा यार मिलता है ।

लुटा दो जां भले अपनी न छोड़ें खून पी लेंगे,
जिसे देखो छुपा के हाथ में तलवार मिलता है ।

बहा लो देखकर आँसू न जग में पोंछता कोई,
दिखा दो अश्क दुनिया को तो बस धिक्कार मिलता है ।

नही मै चाहता दुनिया मुझे अब थोड़ा जीने दो,
मिटाकर खुद को देखो तो भी बस अंगार मिलता है ।

मै पागल हूँ जो दुनिया में सभी को अपना कहता हूँ,
खफा यह मुझसे हैं उनका मुझे दीदार मिलता है ।

मुखौटा देख लो पहना यहाँ हर आदमी नकली,
डराना दूसरे को हो सदा तैयार मिलता है ।
**********************************************

गज़ल

कवि कुलवंत सिंह
दावत बुला के धोखे से है काट सर दिया
हैवां का जी भरा न तो फिर ढा क़हर दिया

दुनिया की कोई हस्ती शिकन इक न दे सकी
अपनों ने उसको घोंप छुरा टुकड़े कर दिया

कण-कण बिखर गया जो किया वार पीठ पर
खुद को रहा समेट कहाँ तोड़ धर दिया

अंडों को खाता साँप ये हैं उसकी आदतें
बच्चे को नर ने खा सच को मात कर दिया

इंसां गिरा है इतना रहा झूठ सच बना
पैसा बना ईमान वही घर में भर दिया

होली जला के रिश्तों की नंगा है नाचता
बन कंस खेल बदतर वह खेल फिर दिया
*******************************************

Monday, April 21, 2008

राशन

सिद्धेश्वर
चुनाव के पहले
गोदामों में नहीं
खुले बाजारों में होता है राशन!
पॉंच वर्ष के लिए
मिल जाती जब कुर्सी
तब दिन-रात मिलता है/आश्वासन!
सिर्फ आश्वासन !!
***********************************

लूट

सिद्धेश्वर
सताधारी
कानून में देते हैं
बीस प्रतिशत की छूट!
तब
जाकर/उनके चेले
बैकों में/दुकानों
में/करते हैं लूट!!
**********************************

अपहरण

सिद्धेश्वर
पहले वह
नेताओं के पकड़ता है चरण!
वर्दीधारियों से लेता है आशीवॉद.....
तब
जाकर/अमीरों के बच्चों का
करता है अपहरण!!
*******************************

Sunday, April 20, 2008

नई पीढी के नाम

वीरेन्द्र जैन
मुझको तो अगली पीढी को केवल यही सिखाना है
तुमको अपने मॉं बापों की बातों में नहिं आना है
हम तुमको कुछ नीति सिखायें
ऐसी तो सामर्थ्य नहीं
हम तुमको उपदेश पिलायें
तो उसका कुछ अर्थ नहीं
हम जीवन भर रहे नपुंसक
हमने अत्याचार सहे
बेईमानियॅां हॅंस कर टालीं
हमने भ्रष्टाचार सहे
भूले से ऐसी पीढी को नहिं आदशॅ बनाना है
मुझको तो अगली पीढी को केवल यही सिखाना है
तुमको अपने मॉं बापों की बातों में नहिं आना है
हमने शोषण होते देखा
तो अपना मुंह फेर लिया
हमने ऑंख मूंद कर झेला
जिसने जो अंधेर किया
कायरता की सहनशीलता
हम लेकर के आये हैं
हमें दिखायीं ऑंखें जिसने
हमने दॉंत दिखाये हैं
तुम नकार दो इस पीढी को तुमको आगे जाना है
मुझको तो अगली पीढी को केवल यही सिखाना है
तुमको अपने मॉं बापों की बातों में नहिं आना है
जो ढांचा बनवाया हमने
केवल एक घोंसला है
हमने जो विकास सौंपा है
पूरी तरह खोखला है
सारी न्याय व्यवस्था तुमको
न्याय नहीं दे पायेगी
लोकतंत्र का लोक दिखावा
झूठा एक चोंचला है
नई व्यवस्था लाना है तो तुमको इसको ढाना है
मुझको तो अगली पीढी को केवल यही सिखाना है
तुमको अपने मॉं बापों की बातों में नहिं आना है
***********************************************

मेरा देश महान नहीं है

वीरेन्द्र जैन
जब तक सब पेटों को रोटी
जब हाथों को काम नहीं है
मेरा देश महान नहीं है

मिलता नागरिकों को जब तक
रोजी का अधिकार नहीं है
जिन्दा रहने के अधिकारों
का कोई आधार नहीं है
संविधान की लिखतों से
जिन्दा रहना आसान नहीं है
मेरा देश महान नहीं है

जब तक राजनीति के कुत्ते
नाम धर्म का ले लड़वाते
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारों से
जब तक हैं वोटों के नाते
जबतक मेहनतकश दरिद्र-
नारायण का सम्मान नहीं है
मेरा देश महान नहीं है

युवकों के भविष्य तय करते
हैं, बूढे मुर्दा पाखण्डी
ऐसे व्याह बाजार लगे हैं
जैसे हो सांड़ों की मण्डी
जब तक नई पीढी के हाथों
अपनी स्वयं कमान नहीं है
मेरा देश महान नहीं है

जब तक सेठों की बहियों पर
रोज अंगूठे टेके जाते
लोकतंत्र के नाम स्वार्थ के
मोटे टिक्कर सैंके जाते
जब तक भारत के हर जन को
पूरा अक्षर ज्ञान नहीं है
मेरा देश महान नहीं है

मेरा देश महान नहीं पर
हो सकना तो संभावित है
वर्तमान प्रारंभ करे तो
फिर भविष्य में गुंजाइश है
आओ इसे महान बनायें
क्यों समझें आसान नहीं है
मेरा देश महान नहीं है
***********************************
२/१ शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल म.प्र.
************************************

चुभा काँटा चमन का फूल

कवि कुलवंत सिंह

चुभा काँटा चमन का फूल माली ने जला डाला
बना हैवान पौधा खींच जड़ से ही सुखा डाला

चला मैं राह सच की हर बशर मेरा बना दुश्मन
जो रहता था सदा दिल में जहर उसने पिला

डाला बड़ी हसरत से उल्फ़त का दिया हमने जलाया था
उसे काफ़िर हवा ने एक झटके में बुझा डाला

सताया डर कि दौलत बँट न जाए पैसे वालों को
थे खुश हम खा के रूखी छीन उसको भी सता डाला

उजाड़े घर हैं कितने उसने पा ताकत को शैतां से
बसाने घर कुँवर का अपनी बेटी को गला डाला
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तप कर गमों की आग में

कवि कुलवंत सिंह

तप कर गमों की आग में कुंदन बने हैं
हम खुशबू उड़ा रहा दिल चंदन सने हैं

हम रब का पयाम ले कर अंबर पे छा गए
बिखरा रहे खुशी जग बादल घने हैं हम

सच की पकड़ के बाँह ही चलते रहे सदा
कितने बने रकीब हैं फ़िर भी तने हैं हम

छुप कर करो न घात रे बाली नहीं हूँ मैं
हमला करो कि अस्त्र बिना सामने हैं हम

खोये किसी की याद में मदहोश है किया
छेड़ो न साज़ दिल के हुए अनमने हैं हम
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Saturday, April 19, 2008

क्लासरूम के अंदर

सी.आर.राजश्री
मेरे प्रिय छात्रों,
जिन्दगी की ढ़लती उम्र में,
जब मैं रहूँगीं तन्हा,
सदैव याद दिलाती रहेगी,
हमारे तुम्हारे बीच का वो हसीन लमहा,
पूस की सुहावनी ठंड़ में,
मुझे उर्जा देकर तपतपाती रहेगी,
जेठ की असहनीय गर्मी में भी,
जो बर्फ सी शीतलता प्रदान करेगी,
और रिमझिम बरसने वाली बरखा,
मिट्टी की, खुशबू के साथ मिलकर,
मेरी सांसों की गति को तीव्र करेगी,
नये आनन्द की बौछार करेगी।
जानू न मैं तुम सबका अता-पता,
सालों बीतने पर भी लेकिन,
मेरे स्मृति-पटल में अंकित रहेंगे,
तुम्हारे ये मासूम प्यार भरे चेहरे,
शायद तुमको नहीं है ये पता।
तुम्हारी शरारत और फुसफुसाहट,
मन में सदैव तरोताजा रहेंगे,
मेरे दिलों से शब्द रूपी फुहार बनकर,
हमेशा कविता का रूप देती रहेंगे,
तुम्हारी बातें नटखट अदाएँ,
मुझे आश्चर्य चकित करते रहते,
तुम्हारे मन के कई रहस्यमयी सवाल,
आखों में झलकते जो दिखाई दिए,
ज्वाला बन मुझे कई पाठ पढ़ाते गए,
सिखाते गए।
अपने खुशियों और गमों के पल को
इस कक्षा के भीतर हमने बाँटें,
पठन-पाठन के साथ-साथ, बातों में उलझाकर,
तुमने मुझे भी बातूनी ही बना डाला,
लेकिन मुझे इसका कतई है न अफसोस,
आनेवाले भविष्य के प्रति जिज्ञासु होकर,
राह के काँटों को दूर करते हुए,
सपने को साकार करने वाले
मेरे प्रिय छात्रों, मेहनत जरूर रंग लाएगी।
कल्पना की उड़ान में,
सृजनात्मक उड़नखटोले में,
दुनिया की नियति को तोड़ दो,
अपना एक नया संसार तुम रचो।
तुममें से कई छात्रों ने मुझे अपना मानकर,
अपनी अंतरंग की बातें कहकर,
अपनेपन से मुझे संबोधित कर,
मेरी बातों की ओर ध्यान देकर,
मेरी सलाह मानकर,
स्नेह के पथ प्रर्दशक बन गए है।
हाँ यह सच है कि मैंने कभी तुम्हें डाटा, कभी फटकारा,
न चाहते हुए भी नियम का पालन किया उल्लंघन किया,
पर जरा सोचा कि, मैंने ऐसे क्यों किया?
तुम्हारी भलाई के सिवा क्या और कोई कारण हो सकता है भला?
इस कक्षा के भीतर हमारे बीच होने वाले नोक जोंक,
मुझे सदा हँसातीं रहेंगे, पठन पाठन के अतिरिक्त,
गपशप के अनमोल पल, यादगार बन मन में सजीव रहेंगे,
मन-मस्तिष्क को जो सदैव सालती रहेगी।
हिन्दी के प्रति मेरी गहरी आस्था,
देश के प्रति मेरा लगाव,
नारी की अस्मिता और मानवकल्याण,
साहित्य में मेरी रुचि,
साहित्य की ओर मुझे खिंचता चला गया,
अहिन्दी प्रान्त में हिन्दी का विरोध,
हमारा सुनिचित व्यवस्थित पाठ्यक्रम,
आपको साहित्य पढाने पर रोकने के बावजूद भी
मेरा अध्ययन जारी है, यह कभी न रुकेगा,
और हाँ शायद मुझे कोई रोक भी नहीं सकता।
मेरे अर्जित ज्ञान को कोई चोर चुरा नहीं सकता,
यदि आप इच्छुक हो तो,
मेरी कक्षा में आकर,
मेरे ज्ञान और अनुभव की चोरी कर सकतें हैं।

मेरी हाजिरी में ही ---।
कितने ही अनगिनत छात्र-छात्राएँ जो
सारे मेरे लिए बहुत प्रिय है,
हमारे तुम्हारे बीच हुई कितनी बातें,
कुछ सार्थक, कुछ निरर्थक लगे शायद,
पर अवश्य जीवन में होंगे ये प्रेरणादायक।
मेरी प्रशंसा हो या न हो,
मुझे इसकी कोई परवाह नहीं
प्यार मिले या मिले दुत्कार
मुझे इसका कोई गम नहीं, गिला नहीं,
बिना किसी भेद भाव के विद्या प्रदान करने वाले,
हर सत्र में, हर रोज, आपका स्वागत है।
अपने घरेलू काम काज और परिवार की देख-रेख,
थका देती है अधिकांश मुझे, परन्तु कक्षा में,
तुम सभी को देखकर दिल खुश हो जाता है,
नई स्फूर्ति जाग उठती है,
दिलोदिमाग तरोताजा हो जाता है।
मेरे प्रिय छात्रों,
जीवन एक पहेली है, सुख-दुख जिसकी सहेली है,
असफलता के बीच जहाँ सफलता छिपी हुई है,
पर न करो अपना ये दिल छोटा, जिन्दगी है बहुत बड़ी,
और समय की भी जहाँ नहीं है कोई कमी,
व्यर्थ में लेकिन न अपना समय गवाँओ,
उक्त समय पर दूर मंजिल को पा लो,
अरे हाँ! इस छोटी सी, प्यारी दुनिया में,
मैं भी तो तुमसे दूर नहीं हूँ,
जब चाहो तुम मुझसे मिलने आ सकते हो, धीरज धरो !!!
मैंने तो अपने लिए पढ़ना, सीखना सब छोड़ दिया है,
सिफॅ तुम्हारे लिए ही तो -
श्रम से, ज्ञान के इस भंड़ार में लगे हुए ताला को तोड़ा है,
तुम्हारी जिन्दादिली ही मुझे सदैव आगे पढ़ने की प्रेरणा देती है और,
उल्लास भरे मेरे उस विद्यार्थी जीवन की ओर मुझे आकर्षित करती है।
अपने अर्जित शिक्षा से एक सुखी जीवन तुम बनाओ,
उस उपवन में महकते हुए रंग-बिरंगे फूलों की जहाँ क्यारियाँ हो,
नित वहाँ भौरों की गुंजन, और तितलियों की रौनक रहे,
उसमे विचरण करते हुए मकरन्द के हर बूँदों का आनन्द ले लो,
रसास्वादन करो,
जिन्दगी के उल्झनों को सुलझाओ,
सकारात्मक सोचो, प्रसन्न रहो, वैर त्यागो,
स्नेह की बाँह पसारो, माता-पिता और बड़ों का आदर करो,
फिर देखो दुनिया तुम्हारी मुट्ठी में होगी।
तुम्हारे चेहरे की मुस्कुराहट सदा बनी रहे,
सारे गमों के बादल विलीन हो जाए,
खुशियों के सैलाब में, उमंगों की तरंगें उठे,
मैं उस भगवान से यही प्रार्थना करती हूँ,
तुम जहाँ भी रहो सलामत रहो
खूब तरक्की करो,
हमने कई कुछ और विषयों पर बातें कहनी-सुननी चाही होगी,
काश हम वे सारी बातें कर पाते,
पर मर्यादा और संस्कृति एक लक्ष्मण-रेखा बनकर गई,
हम उन के बीच उलझ कर चुप ही रह गए,
और शायद वे बातें, अनछुए ही रहे गए,
फिर भी तुम्हारे संग बिताए उन लम्हों को
मैने संजोकर दिल में कैद कर रख लिए है,
जिन्दगी के जंग में,
हौसला कम होने पर,
निराशा के वक्त,
जो बैसाखी-सा मुझे सहारा देगा।
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इतना भी ज़ब्त मत कर

कवि कुलवंत सिंह
इतना भी ज़ब्त मत कर आँसू न सूख जाएँ
दिल में छुपा न ग़म हर आँसू न सूख जाएँ

कोई नहीं जो समझे दुनिया में तुमको अपना
रब को बसा ले अंदर आँसू न सूख जाएँ

अहसास मर न जाएँ, हैवान बन न जाऊँ
दो अश्क हैं समंदर आँसू न सूख जाएँ

मंजर है खूब भारी अपनों ने विष पिलाया
देवों से गुफ़्तगू कर आँसू न सूख जाएँ


कैसे जहाँ बचे यह आँसू की है न कीमत
दुनिया बचा ले रोकर आँसू न सूख जाएँ
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बंदा था मैं खुदा का

कवि कुलवंत सिंह


बंदा था मैं खुदा का, आदिम मुझे बनाया,
इंसानियत ने मेरी मुजरिम मुझे बनाया ।

माँगी सदा दुआ है, दुश्मन को भी खुशी दे,
हैवानियत दिखा के ज़ालिम मुझे बनाया ।

दिल में जिसे बसाया, की प्यार से ही सेवा,
झाँका जो उसके अंदर, खादिम मुझे बनाया ।

है शर्मनाक हरकत अपनों से की जो उसने,
कैसे बयां करूँ मैं, नादिम मुझे बनाया ।

रब ने मुझे सिखाया सबको गले लगाना,
सच को सदा जिताऊँ हातिम मुझे बनाया ।

प्रेम

कवि कुलवंत सिंह
इस काव्य रचना में मात्रिक छंदों के साथ लय बद्धता का ध्यान तो रखा ही गया है साथ ही दो नये प्रयोग भी किए गये हैं ।
एक - पूरी काव्य रचना सिर्फ दो अक्षरीय शब्दों के साथ की गई है ।
दूसरा - किसी भी शब्द की पुनरावृत्ति नही है ।

नायक (नायिका से) :

हम तुम हर पल संग धरा पर,
सुख दुख तम गम धूप छांव उर ।
तन मन प्रण कर प्रीत गीत ऋतु
छल, काल, जाल, विष पान हेतु ।

कोटि भाव नित, होंठ नव गान,
झूम यार मद, लग अंग प्रान ।
तरु लता बंध, भेद चिर मिटा,
काम, रस, प्रेम, बाण कुछ चला ।

भय भूल झूल, राग रति निभा,
रीत मधु मास, रास वह दिखा ।
छवि कांति देह, मुख जरा उठा,
ताल शत धार, आग वन लगा ।

* * * * *

नेपथ्य से :

नीर रंग भर, सात सुर सजा,
झरें फूल नभ, गान युग बजा ।
जप-तप-व्रत, दीप रोली हार,
जगा जग रैन, नत ईश द्वार ।

शील सेवा रत, हरि हाथ सर,
प्यार रब संग, देव देवें वर ।
शूल, शैल, शर, बनें फूल खर
ढ़ाल खुद खुदा, खुशी अंक भर ।

तज राज यश, मिटा पाप ताप,
माया भ्रम क्षुधा, तोड़ डर शाप ।
ठान सत्य मूल, रोम रग धार
बल बुद्धि धूल, रूह नर सार ।

चूर दिन रात, भज राम नाम,
अश्रु आह मरु, शांति शिव धाम ।
बंधु, सखा सब, सुधि विधि छोड़,
लीन प्रभु गान, लोभ निज मोड़ ।

दृग अंत: खोल, ज्ञान अति कोष,
आत्म निज नाद, सांई सच घोष ।
भुला प्रेम जन, सुत, मीत झूठ,
ओम नाम सत, दिल बसा झूम ।

दृढ़ निज बोल, पर सेवा सोम
मेघ घन घोर, विभा सप्त व्योम ।
लिप्त गुरू नाम, रत्न जब भाव,
मोख मिले भक्त, पार मझ नाव ।
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पदचिन्ह

कवि कुलवंत सिंह
बचपन में मैने
महाभारत पढ़ी थी
युधिष्ठिर का चरित्र भाया था ।
सोचा था -'मै भी
जीवन में सदैव सत्य बोलूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'पागल' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
गौतम बुद्ध को पढ़ा था
उनका साधूपन भाया था ।
सोचा था - 'मै भी
तन से न सही
मन से अवश्य साधू बनूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'बेवकूफ' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
गीता पढ़ी थी
कृष्ण का उपदेश भाया था ।
सोचा था -'मै भी
कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचन
अपनाऊँगा ।'
बस कर्म करूंगा
फल की इच्छा नही रखूंगा ।
समझ नही आता -
आज लोग क्यों कहते हैं -
अरे ! इसका खूब फायदा उठा लो
बदले में कुछ नही मांगता !

बचपन में मैने
पढ़ा था - दहेज कुप्रथा है ।
सोचा था - 'बिना दहेज शादी करूंगा
पत्नी को सम्मान दूंगा,
उसके माँ बाप को
अपने माँ बाप का दर्जा दूंगा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं -
धोबी का --------------
न दामाद न बेटा !

बचपन में मैने
गांधी को पढ़ा था ।
सोचा था - ' मै भी अपनाऊँगा
सादा जीवन उच्च विचार'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे
'गधा' क्यों कहते हैं ?

बचपन में मैने
मदर टेरेसा को पढ़ा था ।
सोचा था - 'बड़ा हो कर
मै भी करूँगा
लोगों की निस्वार्थ सेवा ।'
समझ नही आता -
आज लोग मुझे क्यों कहते हैं -
जरूर इसकी निस्वार्थ सेवा में भी
कुछ स्वार्थ होगा !
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पाप

कवि कुलवंत सिंह
कितने पाप धरा ने देखे,
आदिकाल से गिनकर लेखे ।
सदियों से मानव को मानव,
शोषित बना रहा बन दानव ।

वसुधा ने सबको अपनाया,
सबके लिए इतना उपजाया ।
धनिकों ने जग को भरमाया,
दीनों को भूखा मरवाया ।

कहीं मनुज ने भंडार भरे,
और कहीं खाने को तरसे ।
मिलकर खाएं कमी न आए,
फिर भी लाखों भूखे सोएं ।

बना स्वार्थी मनुज है इतना,
धरती को भी बांटा कितना ।
कहीं कंगालों ने कर भरे,
तो भूपों ने भंडार भरे ।

प्रजा हमेशा बेहाल रही,
महलों में सदा बहार रही ।
भूपों की अमिट भू हवश ने,
झोंका सदा प्रज्ञा को रण में ।

नृशंस संहार धर्म जैसा,
कौन हुआ है रजा ऐसा ?
समूल नष्ट कर बंधु बांधव,
सिंहासन को किया न ताण्डव !

ठूंस भरी रनिवास रुपसियां,
झरोखा दर्शन करते मियां ।
इंसान बना हैवान कहीं,
बन बैठा नरभक्षी कहीं ।

अबला पर यह बल दिखलाता,
सम्मुख बलशाली भय खाता ।
पुत्र लालसा बेटी को मौत,
जन्म लिया खुद माँ की कोख ।

पैसा बना पापों का मूल,
रिश्ते नाते गया सब भूल ।
कानून न्याय को मिली है छूट,
दीनों को जी भर कर लूट ।

शासक सत्ता को जेब धरें,
जनता कातर हो विकल मरे ।
क्या अंत कहीं अन्यायों का ?
धरा से अनगिनत पापों का !
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Friday, April 18, 2008

इस गवार को !

कवि कुलवंत सिंह
हो भूख से बेजार बढ़ाकर जब कोई हाथ
उतारता स्वर्ण मुद्रिका जल रही चिता के हाथ
तो इस गवार को भी यह बात समझ आती है ।

लेकिन रहने वाले ऊँची अट्टारिकाओं में
सेकते हैं रोटियां जब जल रही चिताओं में
तो इस गवार को भी यह बात गवारा नही है ।

भरसक मेहनत के बाद जब एक श्रमिक के हाथ
जुटा पाते न रोटी दो वक्त की एक साथ
चुराना एक रोटी का मुझे समझ आता है ।

माँ, पत्नी की लाश पर कर रहे हैं जो नग्न नृत्य
जमीन जायदाद खातिर कर रहे जो भर्त्स कृत्य
यह बात इस गवार को नागवार गुजरती है ।

गाँवों में साधन नहीं, कमाई का ठौर नही
शहरों में भाग आते चार पैसे मिलें कहीं
बदहाल सा जीना उनका समझ आता है ।

लेकिन शहरों से जा खेतों पर कब्जा करना
एक साथ सैकड़ों किसानों की जमीन छिनना
मुझे क्या किसी भी गवार को समझ आता नही ।

कलेजे पर रख पत्थर भेज विदेश बच्चों को
स्वर्णिम भविष्य देने की चाहत लाडलों को
बुढ़ापे में खुद को ढ़ोना समझ आता है ।

लेकिन उन लाडलों का क्या जो छीन कर सब कुछ
बेघर कर देते बूढ़े माँ बाप को समझ तुच्छ
गवार को लगता खूब सयाने वो लाडले हैं ।

पिता का हाथ बंटाता बचपन खेत खलिहान में
माँ का हाथ बंटाता बचपन घरों के काम में
गवार को क्या समझदार को भी समझ आता है ।

लेकिन बचपन खुद को कांधों पर धर जीता है
होटलों, दुकानों, सड़कों, फैक्ट्रियों में पलता है
लगता गवार को हुई बेमानी जिंदगी है ।

कायर बन जो जीते हैं, शांति शांति जपते हैं
कातर बोल रखते हैं, अपमान भी सहते हैं
दमन इन जातियों का एक दिन समझ आता है ।

किंतु ब्याघ्र बन जो छोटे राष्ट्र निगल जाते हैं
दूसरे देशों की भी बागडोर चलाते हैं
इस गवार के पल्ले तो कुछ भी नही पड़ता है ।

नेता बनने से पहले वह खाना खाते हैं
राजनीति में जमने पर बस पैसा खाते हैं
नेताओं का करोड़पति बनना समझ आता है ।

लेकिन आम जनता त्रस्त, अपमान सहती रहे
भूख, गरीबी, जुल्म, भ्रष्टाचार से भिड़ती रहे
देश को बेचें नेता, गवार समझ पाता नही ।

अरे समझदारों ! इस गवार को भी समझा दो
ऊट पटांग हरकतों को भेजे में घुसवा दो
गर नही तो इस गवार को मूर्ख ही बतला दो ।

प्रभात

कवि कुलवंत सिंह

जाग जाग है प्रात हुई,
सकुची, लिपटी, शरमाई ।

अष्ट अश्व रथ हो सवार
रक्तिम छटा प्राची निखार
अरुण उदय ले अनुपम आभा
किरण ज्योति दस दिशा बिखार ।

सृष्टि ले रही अंगड़ाई,
जाग जाग है प्रात हुई ।

कण - कण में जीवन स्पंदन
दिव्य रश्मियों से आलिंगन
सुखद अरुणिम ऊषा अनुराग
भर रही मधु, मंगल चेतन

मधुर रागिनी सजी हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।

अंशु-प्रभा पा द्रुम दल दर्पित
धरती अंचल रंजित शोभित
भृंग - दल गुंजन कुसुम – वृंद
पादप, पर्ण, प्रसून, प्रफुल्लित ।

उनींदी आँखे अलसाई
जाग जाग है प्रात हुई ।

रमणीय भव्य सुंदर गान
प्रकृति ने छेड़ी मद्धिम तान
शीतल झरनों सा संगीत
बिखरते सुर अलौकिक भान ।

छोड़ो तंद्रा प्रात हुई
जाग जाग है प्रात हुई ।

उषा धूप से दूब पिरोती
ओस की बूंदों को संजोती
मद्धम बहती शीतल बयार
विहग चहकना मन भिगोती ।

देख धरा है जाग गई
जाग जाग है प्रात हुई ।

गज़ल

कुलवंत सिंह
रात तन्हा थी न तुम दिन को सज़ा-ए-मौत दो
पास आ जाओ न तुम मुझको सज़ा-ए-मौत दो
इश्क में तेरी अदाओं ने मुझे कैदी किया
हुस्न-ए-जलवों से न तुम मुझको सज़ा-ए-मौत दो
हम तो तेरे थे सदा फिर चाल तूने क्या चली
दूर कर मुझसे न तुम सबको सज़ा-ए-मौत दो
रात काली छा गई हर ओर बरबादी हुई
है नहीं गलती न तुम उसको सज़ा-ए-मौत दो
दूरियां दिल में नहीं हैं, दूर हम क्यों फिर हुए
सुन मुझे रोता न तुम खुद को सज़ा-ए-मौत दो
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Thursday, April 17, 2008

नई सुबह

सी.आर.राजश्री
घिर आई है धूप सुनहरी,
देखो बीत चुकी है रात गहरी,
पक्षियों की चहचहाहट है अनूठी,
भूल जाओ गत पल की यादें कड़वी।

खिल उठा प्रकृति का यौवन,
फूलों की खुश्बू से महक उठा मन,
उत्साह और उमंग से भर उठा तन,
प्रेम के तरंग में झूम उठा जीवन।

गूँज उठे मंदिर में भजन कीर्तन,
प्रभु के चरणों में कर दो सब अर्पण,
सत्य के राह पर से न बहके कदम,
हिम्मत और मेहनत पर चले हरदम।

उठ बिस्तर छोड़, जाग रे मानव,
आलस भरी नींद को तू त्याग दे,
जीवन के पथ पर चलकर,
ढ़ेर सारी खुशियाँ तू बटोर ले,
कर्मपथ पर नाम नया,
अपना तू लिख दें,
न मिलेगा फिर तुझे ऐसा अवसर,
आगे बढ़ चल पूरी कर ले कसर।

Monday, April 14, 2008

सबक

सी.आर.राजश्री
एक गरीब लडका माँ की मदद करने के उद्देश्य से दूसरे शहर नौकरी ढूँढ़ने गया। पिता के देहान्त के बाद माँ ने उसकी कई मुश्किलों का सामना करके परवरिश की थी। अब दीपू की बारी थी। वह माँ को आराम की जिन्दगी देना चाहता था। वह ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था। फिर भी शहर में नौकरी की उम्मीद में निकल पडा। माँ ने बहुत समझाया कि अजान शहर में नौकरी परन्तु वह एक न माना। तलाशना मुश्किल है। माँ को साँत्वना देकर वह निकल पडा। शहर में वह पूरा दिन नौकरी की तलाश में घूमता-फिरता रहा पर शहर में नौकरी मिलना कोई आसान बात थोडे है? भूखा-प्यासा, थका माँदा वह एक बडे घर के नौकरी की उम्मीद लेकर गया। मकान मालिक सहृदय जान पडता था। उसने उसे झट नौकरी दे दी। रोज सुबह वह उठता उसे अच्छा खिलाया जाता, छोटा-मोटा काम करके वह रात को भरपेट खाकर सो जाता। महीने की पहली तारीख को उसे १००० रु भी मिल जाते। इसी तरह महीने गुजरते गये। वह पैसों को बचाता रहा। वह मालिक से और काम माँगता पर मालिक कहता, अभी समय है, समय आने पर मैं तुम्हें उचित काम दूँगा। तब तक तुम आराम करो। कभी तुम्हें कोई परेशानी तो नहीं है। एक दिन सुबह होते ही दीपू न करते हुए सिर हिलाकर फिर चला जाता है। दीपू से मालिक ने कहा - चलो तैयार हो जाओ हमें काम पर निकलना है। दीपू खुश हुआ और मालिक के साथ चल पडा। मालिक अपने साथ भैंस की खाल, कुछ बोरे और तीन गधे भी लेता गया। काम की उत्सुकता दीपू को बेचैन किये जा रही थी। चलते चलते दोनों घर से बहुत दूर पहाडी क्षेत्र में पहुँचे। मालिक ने भैंस की खाल बिछाई और दीपू को उस पर लेटने के लिए कहा। दीपू के लेटते ही उसने तुरन्त उस खाल के आरे-छोर को कम कर बाँध दिया। दीपू को कुछ समझ में नहीं आया। तभी एक बहुत बडी गिद्ध उसे भैंस समझकर उठाकर उडने लगा। पहाड के शिखर पर पहुँचते ही गाँठ ढीली पडने के कारण दीपू खाल के बाहर आ गया। दीपू को देखकर गिद्ध उड़ गया। शिखर के ऊपर पहुँचकर उसने मालिक से पूछा - क्या बात है? आपने मुझे इस तरह क्यों बाँधा? आपको क्या चाहिए? यहाँ भला क्या काम हो सकता है?
मालिक ने कहा दीपू जरा दाई और मुडकर देखो और वहाँ पड़े रत्नों को नीचे फैलते जाओ। दीपू ने फिर पूछा वो तो किसका है - घबराओं मत मैं बाताऊँगा - पहले उन रत्नों की नीचे फेंकते जाओ - दीपू दाई ओर मुडकर रत्नों को फैंकता गया तीन-चार बेरी भर जाने पर मालिक चलता बना। दीपू ने फिर पूछा - जरा बाई ओर मुडकर देखो दीपू ने वैसे ही किया। वहाँ पड़े हड्डियों के ढेर को देखकर दीपू भयभीत हो गया। मालिक ने कहा - अच्छा अब मैं चलता हूँ - तुम्हें मौत मुबारक बन। अब दीपू को मालिक की चाल समझ में आई। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था - क्या किया जाये? उसे लगा अब बुरे फँसे गिद्धों के झुण्ड को आते देखकर उसने कुछ नहीं सोचा - बस नीचे कूद गया फिर उसे कुछ याद नहीं उसे बेहोश पाकर उसे अपने शिविर ले गये। उनकी सेवा और चिकित्सा के फलस्वरूप उसे पूरे एक महीने के बाद होश आया। होश आते ही उसे गत बातें याद आ गई। वह झर से उठ कर बैठ गया। गिरी वासी उसे होश में देखकर बहुत खुश हुए। उसकी सेहत का ख्याल रखते हुए थोडे दिन उन्होंने उसे वहाँ रहने के लिए कहा। धीरे धीरे वह संभलता गया और बिलकुल ठीक हो गया। इन दिनों में बेहोशी के कारण वह काफी क्षीण हो गया था। आइने के सामने खुद को भी नहीं पहचान पा रहा था। उसे एक तरकीब सूझी अपने प्रति हुए अपमान का वह बदला लेकर उस मालिक को वह सबक सिखाना चाहता था।
थोडे दिन बाद वह उसी मालिक से काम माँगने गया। दीपू ने अपना नाम बदल लिया और कहा - मैं बहुत मुसीबत में हूँ। कृपया मेरी मदद कीजिए। मालिक को बिलकुल भी पता नहीं चला कि वह दीपू है। उनको आवाज से थोड़ा शक हुआ फिर भी मन में सोचा, दीपू को पक्का भर गया होगा। इतनी ऊँचाई पर से थोडी कोई बच सकता है? मन को दिलासा देकर मालिक उसे नौकरी पर रख लिया। दिन गुजरते गए। फिर एक दिन अचानक उसी तरह मालिक उस लडके से कुछ बोरे, तीन गधे ओर भैंस की खाल लेने को कहा। सब चीजों को लेकर दोनों उसी पहाड़ी के नीचे आए। मालिक ने पहले की तरह खाल बिछाई और उस लडके से लेटने केलिए कहा। उस लडके ने विनम्रता से कहा - मालिक मुझे आपकी बात समझ में नहीं आया। क्या आप मुझे लेट कर बता सकते हैं। मालिक उस खाल पर लेट गया। मौका देखकर उस लडके ने दोनों छोट को कस कर बाँध दिया। मालिक उस भैंस के खाल में ही रह गया फिर उसी प्रकार एक बड़ा सा गिद्ध भैंस समझकर उड चला। पर्वत की चोटी पर पहुँचकर, गाँठ ढीली होने के कारण मालिक खाल के बाहर निकल आया। गिद्ध डरनकर अपने को पहाड की चोटी पर पा कर मालिक डर गया। उसे आशचर्य हुआ कि लडके तुम्हारी ये मजाल, मुझसे दगा करते हो। मालिक आपको शायद पता नहीं चला, मैं ही दीपू हूँ। मालिक ने कहा - दीपू! चिल्लाइए मत! अब आप उन रत्नों को नीचे फेंकते जाइए, मैं आपको बचने का रास्ता बताऊँगा। आपको मुझपर विश्वास अवश्य करना होगा। एक बार जब आपने मुझे इसी चोटी पर छोड़ा तो मैं बच कर निकल आया। हाँ ये तो सच है - मालिक ने कहा फिर आप क्यों घबरो हैं। मैं जरूर आपको बचने की तरकीब बताऊँगा। चलिए! गरदी उन रत्नों को नीचे फेंकिए। मालिक को अब मजबूरन दीपू की बात माननी पड़ी। वे एक एक करके उन रत्नों को नीचे फेंकने लगे। दीपू ने तीन बोरियों में उन्हें भर कर गधा लेकर चलते बना। मालिक ने पूछा - अरे छोकरे - मुझे बचने की तरकीब तो बताओ। अब आप भी जरा बाई ओर देखिए और हो सके तो आप खुद बचकर निकल आइए। मैं तो आपको सबक सिखाना चाहता था। न जाने अपने कितनों के साथ यह हरकत की होगी। फिर किसी को अब आप इस तरह मूर्ख नहीं बना सकते। कहकर दीपू चलता बना। दूर गिद्धों की झुंण्ड पर उड़ते हुए आ रहे थे। मालिक डरते सहमते वहीं पत्थर की बुत बना खडा रहा।
तो बच्चों इस कहानी की पहली शिक्षा तो ये है कि अनजान जगह में नौकरी अनजान लोगों के बीच आसपास में अगल-बगल में करनी चाहिए।
दूसरी यदि तुम किसी को धोखा दोगे या किसी का बुरा चाहोगे तो तुम भी धोखा देने वाला भी कोई होगा।
हर हाल में हमें अपना हिम्मत कभी नहीं खोनी चाहिए। सूझ-बूझ, धैर्य और साहस रूपी औजार से हर मुसीबत को आसानी से ... जा सकता है। है ना!! धीरज धरिए !!!!!!!!!

कोयंबत्तूर के सूर्यन एफ.एम. ९३.५ पर सुबह कही गई तमिल कथा का हिन्दी अनुवाद
सी.आर.राजश्री

ख्वाहिश एक कलम कीः अमन और चैन

शिखा
कई मर्तबा हम हकीकत से रूबरू होते हुये भी, उस हकीकत से नजरें नहीं मिलाते, चूंकि हमें कई बार हकीकत की गहराई का इल्म नहीं होता और कई बार इन्सान सोचता है, कि बेमतलब हम अपनी जिन्दगी में बेचैनी दाखिल क्यों करें, सुकून की जिन्दगी चल रही है, उसमें किसी बेमजा सोच की क्या जरूरत है ?
हम अपनी- अपनी बेमतलब जिन्दगियों की रफ्तार में इतना आगे निकल चुके हैं कि हमें पीछे मुड़कर देखने में वो मजा नहीं आता, कि आखिर हम कहाँ से चले? हमारा रास्ता क्या है? और हमारी मंजिल क्या है? हुआ यह कि प्रगतिशील भविष्य बनाते- बनाते इन्सान अपनी ही प्रगति का सबसे बड़ा शत्रु बन बैठा।
इन्सान की सोच, जो उसे अन्य जीवों से अलग बनाती है, उस सोच में गन्दगी आ गयी है। इन्सान की रूह में वो पाकीजगी नहीं रही, जोकि बुराईयों का गला घोंट सके। कहीं पर मजहब, कहीं पर वतन को आगे करके हम बुराईयों के दलदल में फँसते चले जा रहे हैं। इन्सान को इन्सान के ऊपर शक और बदगुमानी का इल्म होता है। श्री गिल साहब (जिनके साहित्य पर एक किताब मेरे पति डा० नीलांशु अग्रवाल सम्पादित कर रहे हैं और जिनके साहित्य का उद्देश्य है कविताओं एवं रचनाओं के माध्यम से अमन और शान्ति का सन्देश फैलाना) ने इसे बखूबी बयां किया है -

घबराई नजरों से न देखिये
जनूनी नहीं
न खून का प्यासा
मैं इन्सान हूं
आपकी
और या किसी और की तरह।
मेरा मजहब
मैंने चुना नहीं
फिर भी मेरा प्यार है
सब अकीदों से
न जबान मैंने चुनी
फिर भी मेरा प्यार है
सब जबानों से
कल्चर एक तार के साज हैं।
मैं भी इन्सान हूं
आपके खुदा का बनाया हुआ
फख्र है मुझे इन्सानियत पर
दिल खोलकर हँसो दोस्त
हम सब इन्सान हैं।

जितने सुलझे भाव से, जिस दर्द से श्री गिल साहब ने अपने रूह की आवाज को लफ्जों में पिरोया है, क्या इन जज्बातों को समझकर, अमली जामा पहनाने की फुर्सत आज इन्सान के पास है?
किसी और ने भी लिखा है ''आज के इस इन्सान को ये क्या हो गया, इसका पुराना प्यार कहॉ खो गया।'' सच है, कि गिल साहब ने इस कमी को महसूस किया है। खुदा ने दुनिया बनायी, अलग- अलग वतन बनाये, मजहब बनाये, इन्सान बनाये, उसमें तरह- तरह के मीठे जज्बात जगाये, दोस्ती का, अमन का, चैन का। इन्सान का जन्म हुआ, उसने जज्बातों को रौंदना शुरू किया। उसमें चाहत की जगह ली नफरत ने, खुषबू की जगह ली बदबू ने, इन्सानियत की जगह ली हैवानियत ने, ईमानदारी बदल गयी बेईमानी में, रंगों की जगह खून काम आने लगा। क्या ये सब काफी नहीं इंसानियत के पतन के लिए? जैसा कि श्री गिल साहब ने अपनी व्यथा व्यक्त की है -

मेरा इस पर यकीन नहीं
इन्सान लाता नहीं काल
और अमन करता है बर्बाद
खुशहाली के बाग को।
तराजू तोलता नहीं सबको
और अमन देता नहीं फल
अपने हर बच्चे को।

श्री गिल साहब की ही एक और नज्म है -

उजाड़ की रातों के दरिन्दे
तलवार के लबों से
प्यार करते
और तलवार के ही गुस्से का
शिकार हो जाते।

ऐसा नहीं है कि श्री गिल साहब ने, इन्सान का कोई भी पहलू अनछुआ छोड़ा हो। इन्होंने उसे जिस तरह महसूस किया है, उस समझ की इनकी नज्मों में पूरी तरह अभिव्यक्ति होती है। मानवीय संवेदनाओं का यर्थाथ और मौजूदा हालात में संवेदनहीनता का जो रूप है, वही सबसे बड़ा कारण है, नफरत और दरिन्दगी का। अब सबसे बड़ा प्रश्न है संवेदनहीनता क्यों?
प्रश्न का जवाब है - इन्सान तरक्की कर रहा है। चार अक्षर पढ़कर उसकी सोच पर उसके विचारों पर चादर पड़ चुकी है, यथार्थ से दूर, ''किताबी ज्ञान'' के पास, सिर्फ ''किताबी ज्ञान''। जिसमें मानवीय संवेदनाओं, नैतिक मूल्यों, व्यक्तिगत गुणों या अभिव्यक्तियों का कोई स्थान नहीं है। यहॉ जरूरी होगा कि श्री गिल साहब की नज्म सवाल का जिक्र किया जाए -

जो एटमबम गिरे
क्या कली दोबारा खिलेगी
क्या फिर चिड़िया चहचहायेंगी
क्या बहार दोबारा आयेगी?
जो एटमबम गिरे
क्या दुल्हन की डोली उठेगी
क्या फिर इश्क चाँदनी करेगा
क्या बारिश दोबारा गिरेगी?
जो एटमबम गिरे
क्या जन्म सुबह का होगा
क्या फिर खिलाड़ी खेलेंगे
क्या दुनिया दोबारा बसेगी?
जो एटमबम गिरे
क्या खुदा किसी को बचायेगा
कौन हॅसेगा, कौन मनायेगा
क्या सब खत्म न हो जायेगा?

क्या बात है! ये सिर्फ नज्म नहीं एक दर्द है, जिसमें आने वाले कल पर सवाल उठाया है श्री गिल साहब ने अमन और चैन की गुजारिश सवालों के माध्यम से की है। साथ ही इनके विचारों में, इनकी नज्मों में वातावरण एवं प्रकृति के असंतुलन का दर्द भी स्पष्ट तौर पर झलकता है, जिससे इनका वैज्ञानिक पहलू भी सामने आता है। इसमें एटमबम से ''इन्सानियत'' तबाह होने के साथ- साथ ''वातावरणीय प्रदूषण'' के खतरे पर भी सवाल उठाया गया है। श्री गिल के विचारों में ''ग्लोबल वार्मिंग'' के प्रति भी चेतावनी है जिसकी झलक इनकी नज्म ''अमन का फाखता'' की कुछ चुनिन्दा पंक्तियों से ही समझ में आ जायेगी।

कब से सुन रहा हूं
अमन की फाख्ता
जल्दी छोड़ी जायेगी
और इसकी हिफाजत के लिए
गाढ़ी जा रहीं तोपें
उड़ाये गये इंजन
जनाजों पर
गिद्ध छोड़ी गई
मौत की
रोबॉट बन रहे प्यासे
खेल रहे खिलाड़ी
आग से
जनून का नचाया जा रहा जानवर।

अब सवाल ये उठता है कि क्या ये नज्में सिर्फ कलम और कागज का खेल है, नहीं! ऐसा नहीं है, कागज और कलम तो एक जरिया है। इन नज्मों के माध्यम से श्री गिल साहब ने इन्सान को झकझोड़ने की कोषिष की है। उसकी रूह में ठण्डी पड़ी संवेदनाओं को बाहर लाने की कोशिश की है। वतन, मजहब की दीवार को तोड़कर इन्सान को इन्सान बने रहने की ताकीद की है। विष्व में अमन और चैन के साथ प्रेम का संदेश फैलाने की गुजारिश की है।




Saturday, April 12, 2008

फिसलती रेत सा मेरा तन

राजश्री ख़त्री
चॉद बूंद-बूंद हो रहा,
मन अंधेरे में खो रहा।
रात बहुत बढ चली,
सामने इक अंधेरी गली।
व्यथा ने आहत किया मन,
फिसलती रेत सा मेरा मन।
डरावनी लगती परछाइया।
उम्र के ढेर की है ऊचॉईया।
दर्द! जीवन है ढो रह,
किन्तु मन स्वप्न संजो रहा।
अपनों से दूरी बढ़ गई,
नींद भी उड़न छू होई।
कैसे भूलू कि नारी हॅू
कभी जीती, कभी हारी हॅू।
वक्त की मार सहती रही,
लालसा मनकी मन में रही।
एफ-१८७०, राजाजी पुरम
लखनऊ
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बिन बदरा बरसा सावन

राजश्री ख़त्री
वर्षा का हुआ आगमन,
हर्षित हुआ वैरागी मन,
कुसुमों ने मदिरा हलवाई,
सुरमई हो गई पवन॥
रिमझिम बरखा बरसी,
यादों से ऑखें भर आई
बिन बदरा, बरसा सावन,
खग वृन्दों ने भी छेड़ा वादन॥
अश्रु ने प्यास बुझा डाली,
प्रेम की रीते निभा डाली,
सुधि की इक आस बची,
किन्तु आई न बेला पावन॥

अछूता स्पर्श

राजश्री खत्री
कुछ चटक गया, कुछ चुभ गया,
कुछ टूट गया, कुछ जुड़ गया॥
ये अनजाना बन्धन कैसा है॥
पास रहकर, कोई दूर है,
दूर रहकर भी, कोई पास है।
शेष भूली-बिसरी, यादें है॥
ये बन्धन कैसा है
बिछुड़ गया कोई, कोई आनमिला,
अपनी राह कोई मुड़ लौट चला॥
टूटे सपनों की आवाजें है॥
ये बन्धन कैसा है
कुछ बादल से,
आसमान में छा गये,
कुछ गरज बरस, निकल गये॥
बारिश से आयै भीगा स्पर्श, अछूता स्पर्श सा
ये बन्धन कैसा है।
कुछ ऑसू कोरों, में ही रह गये,
कुछ ढुलुक-ढुलुक बह गये॥
कुछ बूंदें सी में बन्द है॥
में बन्धन कैसा है

प्यास हिये मैं

राजश्री खत्री
शब्द ढ़ूढते अर्थ को
अर्थ संवादों को कुरेदती,
नासुर बन वे दुख जाते॥
जिन्दगी जंग बन जाती
मैं लक्ष्य तुम योद्धा बनते
गणना विंधे तीरों की होती,
लक्ष्य भेद तुम निकल जाते॥
आशाओं का बादल आता,
शिद्दतों की प्यास लिए मैं।
ओक लगाये बैठी रहती,
प्यास बादल में सिमट जाती॥
स्थितियों से सौदा करती,
हादसों के नाग है डसते।
मेरी पहचान अलग बनती,
अश्रुकंठ अवरूद्ध करते॥
जिन्दगी जंग में टूट जाती
किन्तु शख्शियत अटूट रहती।
तृप्ति और प्यास के भॅवर मैं।
प्रश्न चिह्र बन उलझ जाती॥
जिन क्षणों को जी न पाती,
साथ उनका, छूट जाता
पर हाथ मेरे कुछ न आता,
शब्दों संवादों में मिट जाती॥

Thursday, April 10, 2008

मुन्ना

सी.आर.राजश्री
(शिव केड़ा की कथा पर आधारित )
मुन्ना नाम का था एक लड़का,
घर में था माँ का राज दुलारा,
था बहुत होशियार और सयाना,
चुस्त, चुलबुला पर बहुत काला।
सब दोस्त उसका मजाक उड़ाते,
कालू मुन्ना कह उसे पुकारते,
कहते कि काला रंग सब को नहीं भाता,
इसलिए तू भी हमें तनिक न सुहाता।
रंग भरे इस दुनिया में,
काला रंग माना जाता है बेरंग,
बच्चों की यह बातें सुन कर,
मुन्ना हो जाता बहुत मायूस ।
एक दिन एक गुब्बारे वाला आया,
रंग-बिरंगी गुब्बारे संग अपने लाया,
लाल, नीला, पीला, हरा, गुलाबी,
आकर्षक मनभावन थे और लुभावनी।
बच्चों की भीड वहाँ लग गई ,
सब रंग के गुब्बारे बिक गई,
जैसे-जैसे गुब्बारे होते जाते खाली,
हवा भर नए गुब्बारों की लग जाती पंक्ति।
झूम-झूम कर बच्चे सारे,
पुलकित हो जाते देख गुब्बारे,
हाथों में ले कई गुब्बारे,
छोड़ देते आसमान में, सारे।
गुब्बारे वाले के पास एक था काला गुब्बारा,
किसी ने भी नहीं लिया, किया सबने उसे अनदेखा,
पर मुन्ने को वह अच्छा लगा और उसे खरीदना चाहा,
अपनी तरह उपेक्षित उस गुब्बारे को लेने वह पहुँचा।
मुन्ने ने पूछा क्या काला गुब्बारा नहीं उडेगा?
हैरान हो गुब्बारे वाले ने प्रेम से कहा,
रंग से कुछ फरक थोड़े ही पड़ता है,
गुब्बारा तो अंदर भरी हवा के करामात से उड़ता है।
सोचा मुन्ना फिर क्यों मनुष्य को काले-गोरे से फर्क पड़ता है,
भीतर छिपी शक्ति से ही तो व्यक्तिव का विकास होता है।

Tuesday, April 8, 2008

वक्त

समर अय्यूब
कहते है वक्त से पहले इन्सान को कुछ हासिल नहीं होता हर इन्सान की ख्वाईश वक्त की मौहताज रहती हैं। फिर चाहे वो शोहरत हो या दौलत हो या मौत हो या दिल से निकली ख्वाईश हो या कोई आह हो। यह कहानी भी एक ऐसे शख्स की है जो वक्त को भूलकर दुनिया की शह पर भरोसा कर बैठा जो वक्त की खुद मौहताज हैं। यह सब जानते हुए भी फिर न जाने वक्त को भूल औरों से उम्मीदें लगाये बैठे है जहाँ उसको सिर्फ नाकामयाबी हासिल होती हैं।

- ये कहानी कुछ दोस्तों की हैं जो एक छोटे से गाँव में रहा करते थे। एक दिन सब तय करते है कि हम गाँव छोड़कर किसी शहर में रहेगें। सब चले जाते हैं और वो एक बहुत बड़े शहर में रहने लगते हैं। उन में कुछ बहुत अमीर भी थे कुछ गरीब भी थे। उनमें एक लड़का था जो बस जिंदगी में बहुत बड़ा आदमी बनना चाहता था। एक दिन अचानक इसे कोई मदद की जरूरत महसूस हुई तो वह घर से बाहर निकला और चीखने लगा कोई मेरी मदद कर सकता हैं। वहां से उनमें से एक दोस्त अपनी गाड़ी से निकला उसने आवाज दी तुम मेरी मदद कर सकते हो उसने कहा कि मुझे माफ कर दो मेरी गाड़ी में तुम्हारे लिये जगह नहीं हैं और कह के आगे चला गया। फिर थोड़ी देर बाद एक आदमी और गुजरा और उसने आवाज दी क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं। तो वो शक्स अपनी जिंदगी में इतना मसरूफ था कि जब उसने आवाज दी तो उसने सुनी ही नहीं और चलता चला गया। फिर हार कर वो वही बैठ गया और सोचने लगा कि क्या दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो मेरी मदद कर सके ये सोचकर चीखने लगा कि क्या कोई है जो मेरी मदद करेगा। अरे कोई तो मेरी मदद करों थोड़ी देर बाद एक आदमी आया और बोला में तुम्हारी मदद करूगाँ वो फौरन उसके गले लग गया और उसक साथ चला गया। और यहाँ तक कि खुशी के मारे पूछना भूल गया कि तुम्हारा नाम क्या है और किसी ने तो मेरी मदद की नहीं तुम क्यों कर रहे हो मेरी मदद फिर जब उसकी मदद पूरी हो गई तो जिस शक्स ने उसकी मदद की उसने पूछा कि क्या तुम मेरा नाम नहीं पूछोगे कि मैनें तुम्हारी मदद क्योंकि वो बोला मुझे माफ करियेगा में खुशी के मारे आप से पूछना भूल गया। फिर उसने पूछा कि तुम्हारा नाम क्या हैं। और तुमने मेरी मदद क्यों कि उसने कहा दोस्त मेरा नाम वक्त है और ये भी कहा कि - “दोस्त दुनिया में आदमी आपस में एक दूसरे का जरिया तो बन जायेगा लेकिन वो मोहताज मेरा ही रहेगा।”
मो० नं० +91 9760472934
हाऊस न.१० मो. अय्यूब अन्सारी अमीर निशां कैसर लॉज सिविल लाइन अलीगढ।

पोर पोर में छिपा दर्द

राजश्री खत्री
आज फिर वेदनामयी
अनुभूतियॉ विलोड़ित है
अन्तः में लहराती
इठलाती पीड़ाएं
मन की गुफाओं में
अंकुरित हो उठी
बावजूद इसके इनमें
न उमंग है न चाह है
विमुखता है, न आक्रोश है,
बस एक सन्ताप है।
टूटे सपनों की आवाज
धुंध में है, खो गयी
धूप में एक छॉव का
बचा बस, एहसास है
पोर पोर में छिपा दर्द,
आज ऊभर आया है
कॉच सी बिखर गयी मैं
बस झूठी दिलासाएं हैं

एफ-१८७०, राजाजी पुरम
लखनऊ