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ठण्डा लोहा

धर्मवीर भारती


ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा !ठण्डा लोहा
मेरी दुखती हुई रगों पर ठण्डा लोहा
मेरी स्वप्न-भरी पलकों पर
मेरे गीत-भरे होठों पर
मेरी दर्द-भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब-
एक !पर्त ठण्डे लोहे की
मैं जमकर लोहा बन जाऊँ-
हार मान लूँ-
यही शर्त ठण्डे लोहे की !
ओ मेरी आत्मा की संगिनी
तुम्हें समर्पित मेरी साँस-साँस थी लेकिन
मेरी साँसो में यम के तीखे नेजे-सा
कौन अड़ा है
ठण्डा लोहा !
मेरे और तुम्हारे सारे भोले निश्छल विश्वासों को
आज कुचलने कौन खड़ा है ?
ठण्डा लोहा
फूलों से, सपनों से, आसूँ और प्यार से
कौन है बड़ा ?
ठण्डा लोहा
ओ मेरी आत्मा की संगिनी
अगर जिन्दगी की कारा में,
कभी छटपटाकर मुझको आवाज लगाओ
और कोई उत्तर न पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे-धीरे निगल चुका है,
इस बस्ती में कोई दीप जलानेवाला नहीं बचा है,
सूरज और सितारे ठण्डे
राहें सूनी
विवश हवाएँ
शीश झुकाये
खड़ी मौन हैं,
बचा कौन है
ठण्डा लोहा! ठण्डा लोहा !ठण्डा लोहा

Comments

bahut badhiya prastuti . dhanyawad.

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