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कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु समीर


मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है।
दुःख-ताप में व्यथित चित्त को
यदि आश्वासन दे न सको तो,
विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।।

मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए,
यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो,
(और) वंचना आए आगे,
मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।।

मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है।
मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना,
वहन उसे कर सकूँ स्वयं मैं, मेरी चाह यही है।।

नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे
सुख के दिन पहचान सकूँ मैं,
दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे,
तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।।

Comments

अद्भुत...लाजवाब....क्या कहूँ? शब्द नहीं हैं.
नीरज
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 18 दिसम्बर 2021 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद! !
बेहतरीन रचना

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